विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 696, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें६७४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
कर चुका है, जहाँ साक्षात् भगवान् महेश्वर हाथमें त्रिशूल धारण किये नित्य निवास करते हैं ॥ ३९ ॥
पुत्रोऽयमिति जानीहि गिरिजां योऽब्रवीद्धरः ।
त्राणं प्रति महादेवस्तव तातमुपे शृणु ॥ ४० ॥
'उषे ! सुनो ! तुम्हारे पिता बाणासुरके लिये महान् देवता भगवान् हरने पार्वती देवीसे कहा था कि 'तुम इसे अपना पुत्र जानो' ॥ ४० ॥
का व्यथा ते मुखे स्वेदो नासाग्रे च विराजते ।
नीहारविन्दवः पद्मे राजन्ते शरदागमे ॥ ४१ ॥
'तुम्हें क्या पीड़ा है ? तुम्हारे मुख और नासाग्र-भागमें पसीनेकी बूँदें सुशोभित हो रही हैं, ठीक उसी तरह जैसे शरत्काल आनेपर कमलके ऊपर ओसके कण शोभा पाते हैं ॥ ४१ ॥
सम्पूर्णचन्द्रप्रतिमं मुखं चन्द्रो यथा घने ।
न शोभते तु विच्छायं किमर्थं कारणं वद ॥ ४२ ।
'पूर्ण चन्द्रमाके समान तुम्हारा मुख आज बादलमं छिपे हुए चन्द्रमाकी भाँति कान्तिहीन दिखायी देनेके कारण शोभा नहीं पा रहा है। ऐसा किस लिये हो रहा है, कारण बताओ ? ॥ ४२ ॥
श्वासान् मुञ्चसि वाले त्वं न रतिं यासि भावतः ।
गृहाण भोजनं दिव्यं यत् ते मनसि वर्तते ॥ ४३ ॥
'बाले ! तुम लंबी साँस छोड़ रही हो, मनसे प्रसन्न नहीं हो रही हो, इसका क्या कारण है ? तुम्हारे मनमें जैसी रुचि हो, उसके अनुकूल दिव्य भोजन ग्रहण करो ॥ ४३ ॥
ताम्बूलं रोचते पूर्वं तत् किमर्थं न गृह्यते ।
मिष्टानि यानि वस्तूनि दुर्लभानीतरैर्जनैः ॥ ४४ ॥
गृहाण देवि उत्तिष्ठ वद पीडां शरीरजाम् ।
'पहले तो तुम्हें पान बहुत अच्छा लगता था, अब उसे ग्रहण क्यों नहीं करती हो ? देवि ! उठो और जो दूसरे लोगोंके लिये दुर्लभ हैं ऐसी मीठी वस्तुएँ ग्रहण करो। बताओ, कैसी पीड़ा हो रही है' ॥ ४४½ ॥
इति कोलाहलं श्रुत्वा उषावेश्मसमुद्भवम् ॥ ४५ ॥
दासीभिः कीर्तितं तत्र मातुरग्रे पृथक् पृथक् ।
उषाके महलमे होनेवाले इस कोलाहलको सुनकर दासियोंने उसकी माताके आगे पृथक्-पृथक् इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ ४५½ ॥
राजपुत्री यदा देवि समायाता गृहे सती ॥ ४६ ॥
जलक्रीडाविहाराच्च मूकेव परिलक्ष्यते ।
'देवि ! सती-साध्वी राजकुमारी उषा जलक्रीड़ा और विहारसे जब घर लौटी हैं, तभीसे मौन-सी दिखायी देती हैं ॥
अतो दासीजना देवि वदामस्त्वां वयं जनाः ॥ ४७ ॥
को मोहः किमिदं मौनं कः स्वापो म्लानता कथम् ।
विचार्य भिषजो देवि दिश्यन्तां कष्टशान्तये ॥ ४८ ॥
'अतः महारानी ! हम दासियाँ आपको यह बात बता रही हैं—राजकुमारीपर यह कैसा मोह छा रहा है? उनका यह मौन किसलिये हैं ? क्या कारण है कि वे निरन्तर सोयी पड़ी रहती हैं ? उनमें म्लानता कैसे आ गयी है ? देवि ! इन सब बातोंपर विचार करके उनके इस कष्टकी शान्तिके लिये वैद्योंको नियुक्त कीजिये ॥ ४७-४८ ॥
शिरीषपुष्पसदृशं यच्छरीरं सुकोमलम् ।
तत् कथं सहते देवि व्याधिभारं वरानने ॥ ४९ ॥
'देवि ! वरानने ! जो शरीर शिरीषपुष्पके समान अत्यन्त कोमल है, वह रोगका भार कैसे सहन करता है'? ॥
इति श्रुत्वा तदा देवी सत्वरा हंसगामिनी ।
प्राप्य देशमुपा यत्र किमिदं कष्टलक्षणम् ॥ ५० ॥
यह सुनकर वे हंसगामिनी देवी उस समय बड़ी उतावलीके साथ उठीं और जहाँ उषा सोयी थी, उस स्थानमें पहुँचकर पूछने लगीं कि 'यह कैसा कष्टदायक लक्षण प्रकट हुआ है' ? ॥
पल्लवाकृतिहस्तेन कोमलं तत्करं तदा ।
स्पृष्ट्वाङ्गुलीरनायासं स्फोटयामास भामिनी ॥ ५१ ॥
उस साध्वी महारानीने अपने पल्लवाकार हाथसे उषाके कोमल हाथका स्पर्श करके अनायास ही उसकी अङ्गुलियोंको चटकाया ५१ ॥
किमस्ति तव कल्याणि का व्यथा तव वर्तते ।
एते वैद्याः समागत्य पृच्छन्ति भवतीं हि तत् ॥ ५२ ॥
फिर उन्होंने पूछा—'कल्याणि ! तुम्हें कैसा कष्ट है ? ये वैद्यलोग आकर तुमसे इस विषयमें जिज्ञासा करते हैं ॥ ५२ ॥
वैद्या ऊचुः
जलक्रीडां गता तत्र राजपुत्री सखीगणैः ।
पार्वत्याः क्रीडितं तत्र जानीमः श्रमसम्भवम् ॥ ५३ ॥
वैद्य बोले—महारानी ! हम जानते हैं, राजकुमारी अपनी सखियोंके साथ जलक्रीड़ाके लिये उस स्थानपर गयी थी, जहाँ पार्वतीदेवीका क्रीडा-विहार चल रहा था । वहाँ जो परिश्रम हुआ, उसीसे यह कष्ट बढ़ गया ॥ ५३ ॥
श्रमाद् ग्लानिः समुत्पन्ना जृम्भणं च पुनः पुनः ।
स्वापश्च जायते तेन मा भयं कर्तुमर्हसि ॥ ५४ ॥
श्रमसे ग्लानि उत्पन्न हुई है, उसीसे बारंबार अँगड़ाई आ रही है तथा परिश्रमके ही कारण सारे अङ्गोंमें शिथिलता आ गयी है, जिससे यह सो रही हैं, अतः आपको इसके लिये भय नहीं करना चाहिये ॥ ५४ ॥