विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 697, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ६७५ देव्युवाच फूँका जाय ), अभिमन्त्रित जलसे अभिषेक करनेपर इन्हें हृदये निहितं वैद्यश्चन्दनं हिमसंयुक्तम् । बड़ी शान्ति मिलेगी ॥ ५७-५८३ ॥ अमात्याः किमिदं शीघ्रं किमिदं बुद्बुदायते ॥ ५५ ॥ इत्युक्त्वा भिषजः सर्वे निवृत्ता नृपवेश्मतः ॥ ५९ ॥ महारानीने कहा-वैद्यो और मन्त्रियो! राजकुमारीके सूचयन्तः पुनः सर्वे कामाभिप्रायजां व्यथाम् । वक्षःस्थलपर बरफमिला चन्दन रखा गया है, किंतु शीघ्र ही ऐसा कहकर सभी वैद्यराज महलसे लौट गये। जाते-जाते इसमें इस प्रकार बुद्-बुद होने लगा है, मानो यह खौल रहा उन सबने यह भी सूचना दे दी कि सम्भव है यह काम- हो, यह क्या बात है ? ऐसा क्यों हुआ ? ॥ ५५ ॥ जनित वेदना हो ॥ ५९३ ॥ अतिदाहो महान् स्वेदः पिपासा न बुभुक्षते । मातृपृष्टा वरारोहा चिरकालमुवाच सा ॥ ६० ॥ प्रलाप एव किं तस्यां शास्त्रतो ब्रूत निश्चितम् ॥ ५६ ॥ लज्जावती महाभागा मातरं रुदती भृशम् । इसके शरीरमें अत्यन्त दाह हो रहा है, बहुत अधिक मातर्न रोचते नित्यं भाषणं न च भोजनम् ॥ ६१ ॥ पसीने निकलने लगे हैं। इसे प्यास भी बहुत लगती है, परंतु न चाप्युत्सवकं मातः सदाहं हृदयं शृणु । कुछ खानेकी रुचि नहीं होती। यह अधिकाधिक प्रलाप ही इत्युक्त्वा विररामाथ ह्युषा नारी वरानना ॥ ६२ ॥ कर रही है, ये सब लक्षण इसमें क्यों प्रकट हुए हैं? आपलोग तदनन्तर माताने जब बारंबार पूछा, तब सुन्दर अङ्ग- शास्त्रके अनुसार निश्चित करके बताइये ॥ ५६ ॥ वाली उस लज्जाशीला महाभागा उषाने बहुत देरके बाद मातासे वैद्या ऊचुः जोर-जोरसे रोते हुए कहा—'माँ ! सुनो ! न तो मुझे कभी क्रीडाविहारे मिलिताः स्त्रीजना देवसंनिधौ । बोलना अच्छा लगता है और न भोजन करना, कोई उत्सव रूपेणाप्रतिमा देवी राजपुत्री च भाविनी ॥ ५७ ॥ भी नहीं सुहाता है। हृदयमें निरन्तर जलन होती रहती है।' ऐसा दृष्टिपातः कृतस्ताभिस्तेन पुत्त्र्यां व्यथाभवत् । कहकर सुन्दरी नारी उषा चुप हो गयी ॥ ६०-६२ ॥ रक्षामन्त्रैस्तथा पीतैः सर्षपैस्तां कुमारिकाम् ॥ ५८ ॥ सर्वाभिः स्त्रीभिरारब्धमन्योन्यं मुखवीक्षणम् । पानीयैरभिषेकेण परा शान्तिर्भविष्यति । लज्जानुकारि नारीणां यौवनं हि भवेदिति ॥ ६३ ॥ वैद्य बोले-क्रीडा-विहारमें महादेवजीके समीप बहुत-सी इयं च राजकन्या हि भर्तृयोग्या किमुच्यते । स्त्रियाँ एकत्र हुई थीं। हमारी सती-साध्वी राजकुमारी उषा- पितुः प्रसादान्मातुश्च प्राप्नुयात् सदृशं वरम् ॥ ६४ ॥ देवी अनुपम रूपवती हैं। अतः उन सब स्त्रियोंने इनपर दृष्टि- उस समय सभी स्त्रियाँ एक दूसरीका मुख देखने लगीं पात किया है, जिससे इन्हें नजर लग गयी है। इसीसे आपकी और आपसमें कहने लगीं कि युवावस्था नारियोंके लिये प्रायः पुत्रीको यह पीड़ा हुई है। अतः रक्षासम्बन्धी मन्त्रों और लज्जाजनक हुआ करती है। यह राजकन्या भी पतिसमागमक्रे पीली सरसोंसे राजकुमारीकी रक्षा की जाय ( इन्हें झाड़ा- योग्य हो गयी है, अतः इसके लिये और क्या कहा जाय ? यह माता और पिताके प्रसादसे अपने अनुरूप पति प्राप्त करे' ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि बाणयुद्धे उषाविरहो नाम सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाणासुरके युद्धके प्रसङ्गमें उषाविरहविषयक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११७ ॥ अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः उषाका स्वप्नमें प्रियतमके साथ समागम, इससे उषाकी चिन्ता, सखियोंका उसे समझाना, कुम्भाण्डकुमारीके कहनेसे उषाका चित्रलेखाको बुलाकर उसे अपना कष्ट बताना, चित्रलेखाके बनाये हुए चित्रोंसे उषाका अनिरुद्धको पहचानना और उन्हें लानेके लिये चित्रलेखाका द्वारकाको जाना वैशम्पायन उवाच वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! शोणितपुरमें तत्रस्थाः परमा नार्यश्चित्रेण परमाद्भूताः । निवास करनेवाली परम सुन्दरी स्त्रियाँ चित्र-निर्माण-कलाकी ततो हर्म्ये शयानां तु वैशाखे मासि भामिनीम् ॥ १ ॥ दृष्टिसे बड़ी अद्भुत योग्यतावाली थीं। तदनन्तर वैशाखमास- द्वादश्यां शुक्लपक्षस्य सखीगणवृतां तदा । के शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको, जब सखियोंसे घिरी हुई कश्चित् पुरुषः स्वप्ने रमयामास तां शुभाम् ॥ २ ॥ मानिनी उषा अपनी अट्टालिकामें सो रही थी, उसी समय