भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 698

६७६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


स्वप्नावस्था में पार्वतीजीके बताये अनुसार एक पुरुषने आकर उस शुभलक्षणा असुरराजकुमारीके साथ रमण किया ॥ १-२॥

विचेष्टमाना रुदती देव्या वचनचोदिता।
सा स्वप्ने रमिता तेन स्त्रीभावं चापि लम्भिता ॥ ३ ॥

यद्यपि वह रो-रोकर उस पुरुषके स्पर्शसे बचनेकी विशेष चेष्टा करती रही, परंतु पार्वती देवीके वचनसे प्रेरित थी, इस कारण उसके साथ स्वप्नमें उस पुरुषने बलपूर्वक रमण किया और उसे अपनी स्त्री बना लिया ॥ ३ ॥

शोणिताक्ता प्ररुदती सहसैवोत्थिता निशि।
तां तथा रुदतीं दृष्ट्वा सखी भयसमन्विता ॥ ४ ॥
चित्रलेखा वचः स्निग्धमुवाच परमाद्भुतम्।

उस समय उस राजकन्याकी योनि रक्तसे भीग गयी। वह रातमें सहसा रोती हुई उठ बैठी। उसे इस प्रकार रोती देख उसकी सखी चित्रलेखा भयभीत हो परम अद्भुत स्निग्ध वाणीमें बोली—॥ ४ १/२ ॥

उषे मा भैः किमेवं त्वं रुदती परितप्यसे।
बलेः सुतसुता च त्वं प्रख्याता किं भयानन्विता ॥ ५ ॥

‘उषे ! भयभीत न होओ। तुम क्यों इस प्रकार रोती और संतप्त होती हो ? तुम तो महाराज बलिके पुत्रकी पुत्री हो, अपनी निर्भीकताके लिये विख्यात हो, फिर भी क्यों भयभीत होती हो ? ॥ ५ ॥

न भयं विद्यते लोके तव सुभ्रू विशेषतः।
अभयं तव वामोरु पिता देवान्तको रणे ॥ ६ ॥

‘सुभ्रु ! हम सबके लिये विशेषतः तुम्हारे लिये तो संसारमें भय है ही नहीं। वामोरु ! तुम्हें किसीसे भय नहीं है। तुम्हारे पिता बाण समराङ्गणमें देवताओंके भी काल हैं ॥

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते विषादं मा कृथाः शुभे।
नैवंविधेषु वासेषु भयमस्ति वरानने ॥ ७ ॥

‘शुभे ! उठो, उठो, तुम्हारा कल्याण हो, तुम विषाद न करो। वरानने ! ऐसे निवासस्थानोंमें भय नहीं होता है ॥

असकृद् देवसहितः शचीभर्ता सुरेश्वरः।
अप्राप्त एव नगरं पित्रा ते मृदितो रणे ॥ ८ ॥

‘देवताओंके स्वामी शचीपति इन्द्रने देवताओंकी सेना साथ लेकर अनेक बार आक्रमण किया, परंतु इस नगरतक वे पहुँचने भी नहीं पाये कि तुम्हारे पिताने रणभूमिमें उन्हे रौंद डाला ॥ ८ ॥

अयं देवसमूहस्य भयदश्च पिता तव।
महासुरवरः श्रीमान् बलेः पुत्रो महाबलः ॥ ९ ॥

‘तुम्हारे ये पिता देवसमुदायको भय देनेवाले हैं, महान् असुरोंमें श्रेष्ठ हैं तथा राजा बलिके महाबली एवं कान्तिमान् पुत्र हैं’ ॥ ९ ॥

एवं साभिहिता सख्या बाणपुत्री यशस्विनी।
स्वप्ने रूपं यथा दृष्टं न्यवेदयदनिन्दिता ॥ १० ॥

सखीके ऐसा कहनेपर निन्दारहित यशस्विनी बाणपुत्री उषाने स्वप्नमें जैसा रूप देखा था, वह सब उससे निवेदन किया॥

उषोवाच

एवं संधर्षिता साध्वी कथं जीवितुमुत्सहे।
पितरं किं नु वक्ष्यामि देवशत्रुमरिंदमम् ॥ ११॥

फिर उषा बोली—मैं सती-साध्वी कुमारी थी, जब इस प्रकार मेरा सतीत्व नष्ट कर दिया गया, तब मैं कैसे जीवित रह सकती हूँ। शत्रुओंका दमन करनेवाले अपने देववैरी पितासे क्या कहूँगी ? ॥ ११ ॥

एवं संदूषणकरी वंशस्यास्य महौजसः।
श्रेयो हि मरणं मह्यं न मे श्रेयोऽथ जीवितम् ॥ १२ ॥

इस महातेजस्वी कुलको मैं इस तरह कलङ्कित करनेवाली हूँ। मेरा मर जाना ही अच्छा है। अब जीवित रहना मेरे लिये श्रेयस्कर नहीं है ॥ १२ ॥

ईप्सितो वा यथा कोऽपि पुरुषोऽधिगतो हि मे।
जाग्रतीव यथा चाहमवस्थैवं कृता मम ॥ १३ ॥

मुझे स्वप्नमें ऐसा कोई पुरुष प्राप्त हुआ था, जिसे मानो मैं बहुत चाहती थी—वह मुझे अभीष्ट था। उसने स्वप्नमें भी जाग्रत्-अवस्थाकी भाँति मेरी ऐसी दशा कर डाली है ॥ १३ ॥

निशायां जाग्रतीवाहं नीता केन दशामिमाम्।
कथमेवं कृता नाम कन्या जीवितुमुत्सहे ॥ १४ ॥

रातमें जागती हुई-सी मुझे किसने इस अवस्थाको पहुँचा दिया ? जब कन्या होकर भी मेरी ऐसी दशा कर दी गयी, तब मैं कैसे जीवित रह सकती हूँ ? ॥ १४ ॥

कुलोपक्रोशनकरी कुलाङ्गारी निराश्रया।
जीवितुं न स्पृहेन्नारी साध्वीनामग्रतः स्थिता ॥ १५ ॥

जो नारी कभी सती-साध्वी स्त्रियोंमें आगे रही हो, वह यदि कुलकलङ्किनी, कुलाङ्गारी और निराश्रया हो जाय तो उसे जीवनकी इच्छा नहीं रखनी चाहिये ॥ १५ ॥

इत्येवं वाष्पपूर्णाक्षी सखीजनवृता तदा।
विललाप चिरं कालमुषा कमललोचना ॥ १६ ॥

इस प्रकार सखियोंसे घिरी हुई कमललोचना उषा उस समय नेत्रोंमें आँसू भरकर बहुत देरतक विलाप करती रही ॥

अनाथवत् तां रुदतीं सख्यः सर्वा विचेतसः।
ऊचुश्चाश्रुपरीताक्षीमुषां सर्वाः समागताः ॥ १७ ॥

उसे अश्रुपूर्ण नेत्रोंसे अनाथकी भाँति रोती देख सारी सखियाँ घबरायी हुई-सी वहाँ आ गयीं और इस प्रकार कहने लगीं—॥ १७ ॥