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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

[ विष्णुपर्व ] चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ६६३

चातुर्वर्ण्यं मत्प्रसूतं चातुराश्रम्यमेव च।
चातुर्विध्यस्य कर्ताहमिति बुध्यस्व भारत ॥ १६ ॥

भारत ! चारों वर्ण तथा चारों आश्रम मुझसे ही प्रकट हुए हैं। जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज-इन चार प्रकारके प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाला मैं ही हूँ; इस बातको तुम अच्छी तरह जान लो ॥ १६ ॥

अर्जुन उवाच

भगवन् सर्वभूतेश वेत्तुमिच्छामि ते प्रभो।
पृच्छामि त्वां प्रपन्नोऽहं नमस्ते पुरुषोत्तम ॥ १७ ॥

तब मैं (अर्जुन) ने कहा—भगवन् ! सर्वभूतेश्वर ! प्रभो ! पुरुषोत्तम ! आपको नमस्कार है। मैं आपके स्वरूपोंको भली-भाँति जानना चाहता हूँ; इसीलिये उसके विषयमें आपसे जिज्ञासा करता हूँ और आपकी शरणमें आया हूँ ॥ १७ ॥

वासुदेव उवाच

ब्रह्म च ब्राह्मणाश्चैव तपः सत्यं च भारत।
उग्रं बृहत्तमं चैव मत्तस्तद् विद्धि पाण्डव ॥ १८ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—पाण्डुनन्दन भारत ! ब्रह्म, ब्राह्मण, तप, सत्य, उग्र (संसारबन्धन) और बृहत्तम (कैवल्य)—ये सब मुझसे ही प्रकट होते हैं, ऐसा समझो ॥ १८ ॥

प्रियस्तेऽहं महाबाहो प्रियो मेऽसि धनंजय।
तेन ते कथयिष्यामि नान्यथा वक्तुमुत्सहे ॥ १९ ॥

महाबाहु धनंजय ! मैं तुम्हें प्रिय हूँ और तुम मुझे। इसीलिये मैं तुमसे इस रहस्यका वर्णन करता हूँ, अन्यथा कदापि नहीं कह सकता ॥ १९ ॥

अहं यजूंषि सामानि ऋचश्चाथर्वणानि च।
ऋषयो देवता यज्ञा मत्तेजो भरतर्षभ ॥ २० ॥

भरतश्रेष्ठ ! मैं ही यजुर्वेद, सामवेद, ऋग्वेद और अथर्ववेद हूँ। ऋषि, देवता और यज्ञ मेरे ही तेज हैं ॥ २० ॥

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम्।
चन्द्रादित्यावहोरात्रं पक्षा मासास्तथर्तवः।
मुहूर्ताश्च कलाश्चैव क्षणाः संवत्सरास्तथा ॥ २१ ॥
मन्त्राश्च विविधाः पार्थ यानि शास्त्राणि कानिचित्।
विद्याश्च वेदितव्यं च मत्तः प्रादुर्भवन्ति हि ॥ २२ ॥

पार्थ ! पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, तेज, चन्द्रमा, सूर्य, दिन, रात, पक्ष, मास, ऋतु, मुहूर्त, कला, क्षण, संवत्सर, नाना प्रकारके मन्त्र, जो कोई भी शास्त्र, विद्या और वेदितव्य—ये सब मुझसे ही प्रकट होते हैं ॥ २१-२२ ॥

मन्मयं विद्धि कौन्तेय क्षयं सृष्टिं च भारत।
सच्चासच्च ममैवात्मा सदसच्चैव यत्परम् ॥ २३ ॥

कुन्तीनन्दन भारत ! सृष्टि और संहारको भी मेरा ही स्वरूप समझो। सत्, असत्, सदसत् तथा उससे भी विलक्षण जो तत्त्व है, वह सब मेरा ही आत्मा है ॥ २३ ॥

अर्जुन उवाच

एवमुक्तोऽस्मि कृष्णेन प्रीयमाणेन वै तदा।
तथैव च मनो नित्यमभवन्मे जनार्दने ॥ २४ ॥
एतच्छ्रुतं च दृष्टं च माहात्म्यं केशवस्य मे।
यन्मां पृच्छसि राजेन्द्र भूयांश्चातो जनार्दनः ॥ २५ ॥

अर्जुन कहते हैं—राजेन्द्र ! उस समय प्रसन्न हुए श्रीकृष्णने जब मुझे इस प्रकार उपदेश दिया, तबसे मेरा मन सदा उन्हीं जनार्दनमें संलग्न रहने लगा। इस प्रकार मैंने केशवका माहात्म्य प्रत्यक्ष देखा और सुना है; जिसके विषयमें आप मुझसे पूछ रहे थे। मैंने जो कुछ देखा और जाना है, भगवान् जनार्दन उससे भी महान् हैं ॥ २४-२५ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा कुरुश्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः।
पूजयामास धर्मात्मा गोविन्दं पुरुषोत्तमम् ॥ २६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! यह सुनकर धर्मात्मा कुरुश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरने पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्दका पूजन किया ॥ २६ ॥

विस्मितश्चाभवद् राजा सह सर्वैः सहोदरैः।
राजभिश्च समासीनैर्यै स्तत्रासन् समागताः ॥ २७ ॥

उस समय जो-जो राजा वहाँ पधारे और बैठे हुए थे, उनके तथा अपने समस्त भाइयोंके साथ राजा युधिष्ठिरको बड़ा आश्चर्य हुआ था ॥ २७ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वासुदेवमाहात्म्ये कृष्णार्जुनभाषणे
चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वासुदेव-माहात्म्यके प्रसङ्गमें श्रीकृष्ण और अर्जुनका संवादविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११४ ॥

६६४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंश


पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णके पराक्रमोंका संक्षेपसे वर्णन

जनमेजय उवाच भूय एव द्विजश्रेष्ठ यदुसिंहस्य धीमतः । कर्माण्यपरिमेयाणि श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १ ॥

जनमेजयने कहा-द्विजश्रेष्ठ ! मैं परम बुद्धिमान् यदुसिंह श्रीकृष्णके अपरिमेय कर्मोंका तात्त्विक वर्णन पुनः सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

श्रूयन्ते विविधानि स्म अद्भुतानि महाद्युतेः । असंख्येयानि दिव्यानि प्रकृतान्वपि सर्वशः ॥ २ ॥

महातेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णके अनेक प्रकारके अद्भुत, असंख्य एवं दिव्य चरित्र सुने जाते हैं, जो सर्वथा उनके द्वारा उत्कृष्ट रूपसे किये गये हैं ॥ २ ॥

यान्यहं विविधान्यस्य श्रुत्वा प्रीये महामुने । प्रब्रूयाः सर्वशस्तात तानि मे श्रृण्वतोऽनघ ॥ ३ ॥

निष्पाप महामुने ! तात ! मैं भगवान्‌के जिन-जिन विविध चरित्रोंको सुनकर प्रसन्न होता हूँ, उनका सम्पूर्ण रूपसे वर्णन कीजिये। मैं उन्हें ध्यानसे सुनूँगा ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच बहून्याश्चर्यभूतानि केशवस्य महात्मनः । कथितानि महाबाहो नान्तं शक्यं हि कर्मणाम् ॥ ४ ॥ गन्तुं हि भरतश्रेष्ठ विस्तरेण समन्ततः । अवश्यं हि मया वाच्यं लेशमात्रेण भारत ॥ ५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतश्रेष्ठ ! महाबाहो ! महात्मा केशवके बहुत-से आश्चर्यजनक चरित्र बताये गये। सब ओरसे विस्तारके साथ वर्णन करनेपर उनके कर्मोंका पार पाना असम्भव है। अतः भारत ! मैं संक्षेपसे ही उनके उन कर्मोंका अवश्य वर्णन करूँगा ॥ ४-५ ॥

विष्णोरमितवीर्यस्य प्रथितोदारकर्मणः । आनुपूर्व्या प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमना नृप ॥ ६ ॥

नरेश्वर ! अपरिमित पराक्रमी तथा सुविख्यात उदार कर्मवाले भगवान् विष्णुके चरित्रोंका मैं क्रमशः वर्णन करूँगा, एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ६ ॥

द्वारवत्यां निवंसता यदुसिंहेन धीमता । राष्ट्राणि नृपमुख्यानां क्षोभितानि महात्मनाम् ॥ ७ ॥

द्वारकामें निवास करते हुए यदुकुलसिंह बुद्धिमान् श्रीकृष्णने मुख्य-मुख्य महामनस्वी नरेशोंके राष्ट्रोंमें हलचल मचा दिया था ॥ ७ ॥

यदूनामन्तरप्रेप्सुर्विचक्रो दानवो हतः । पुरं प्राग्ज्योतिषं गत्वा पुनस्तेन महात्मना ॥ ८ ॥ समुद्रमध्ये दुष्टात्मा नरको दानवो हतः ।

उन दिनों एक विचक नामक दानव था, जो यादवोंके छिद्र ही ढूँढ़ा करता था । श्रीकृष्णने उसका वध कर डाला । फिर उन महात्माने प्राग्ज्योतिषपुरमे जाकर समुद्रके भीतर रहनेवाले दुष्टात्मा नरक नामक दानवका संहार किया ॥८॥

वासवं च रणे जित्वा पारिजातो हृतो बलात् ॥ ९ ॥ वरुणश्चैव भगवान् निर्जितो लोहिते ह्रदे ।

एक बार श्रीकृष्णने इन्द्रको भी युद्धमें हराकर बलपूर्वक पारिजात वृक्षका अपहरण कर लिया था । इसी प्रकार लोहितह्रदमें भगवान् वरुणको पराजित किया था ॥ ९½ ॥

दन्तवक्त्रश्च कारूषो निहतो दक्षिणापथे ॥ १० ॥ शिशुपालश्च सम्पूर्णे किल्बिषैकशते हतः ।

करूषदेशका राजा दन्तवक्त्र दक्षिणापथमें उनके द्वारा मारा गया । एक सौ अपराध पूर्ण होनेपर शिशुपालको भी उन्होंने कालके गालमें भेज दिया ॥ १०½ ॥

गत्वा च शोणितपुरं शंकरेणाभिरक्षितः ॥ ११ ॥ बलेः सुतो महावीर्यो बाणो बाहुसहस्रभृत् । महामृधे महाराज जित्वा जीवन् विसर्जितः ॥ १२ ॥

महाराज ! बलिका महापराक्रमी पुत्र बाण एक सहस्र भुजाएँ धारण करता था और भगवान् शङ्करके द्वारा वह सर्वथा सुरक्षित था; किंतु भगवान् श्रीकृष्णने शोणितपुरमें जाकर महासमरमें उसे पराजित किया और जीवित छोड़ दिया ॥

निर्जितः पावकश्चैव गिरिमध्ये महात्मना । शाल्वश्च विजितः संख्ये सौभश्च विनिपातितः ॥ १३ ॥

उन महात्माने मेरु गिरिमें अग्निदेवपर विजय पायी तथा युद्धमें सौभ विमानके अधिपति राजा शाल्वको जीता और मार गिराया ॥ १३ ॥

विक्षोभ्य सागरं चैव पाञ्चजन्यो वशीकृतः । हयग्रीवश्च निहतो नृपाश्चान्ये महाबलाः ॥ १४ ॥

फिर सागरमें क्षोभ पैदा करके पञ्चजनको मारकर पाञ्चजन्य शङ्खपर अधिकार किया । हयग्रीवका वध किया और अन्य महाबली नरेशोंको भी कालके गालमें डाल दिया ॥

जरासंधस्य निधने मोक्षिताः सर्वपार्थिवाः । रथेन जित्वा नृपतीन् गान्धारतनया हृता ॥ १५ ॥

विष्णुपर्व ] षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ६६५


जरासंधकी मृत्यु करवाकर सब राजाओंको उसके बन्धनसे मुक्त किया। एकमात्र रथके द्वारा राजाओंको जीत-कर गान्धार-राजकुमारीका अपहरण किया॥ १५॥

भ्रष्टराज्याश्च शोकार्ताः पाण्डवाः परिरक्षिताः।
दाहितं च वनं घोरं पुरुहूतस्य खाण्डवम् ॥ १६॥
पाण्डव अपने राज्यसे भ्रष्ट हो चुके थे और शोकसे आतुर थे, उस अवस्थामें भगवान् श्रीकृष्णने उन सबकी रक्षा की। इन्द्रके घोर खाण्डववनको अर्जुनद्वारा दग्ध करा दिया॥

गाण्डीवं चाग्निना दत्तमर्जुनायोपपादितम् ।
दौत्यं च तत्कृतं घोरे विग्रहे जनमेजय ॥ १७॥
जनमेजय ! फिर अग्निका दिया हुआ गाण्डीव धनुष अर्जुनको अर्पित किया तथा कौरव-पाण्डवके घोर विग्रहके समय पाण्डवोंका दूतत्व किया॥ १७॥

अनेन यदुमुख्येन यदुवंशो विवर्धितः।
कुन्त्याश्च प्रमुखे प्रोक्ता प्रतिज्ञा पाण्डवान् प्रति॥ १८॥
निवृत्ते भारते युद्धे प्रतिदास्यामि तत्सुतान् ।
इन्हीं यादव-शिरोमणिने यदुवंशकी वृद्धि की और कुन्तीके सामने पाण्डवोंके विषयमें यह प्रतिज्ञा की कि 'महाभारत युद्ध समाप्त होनेपर मैं तुम्हें तुम्हारे पुत्रोंको वापस दे दूँगा'॥

मोक्षितश्च महातेजा नृगः शापात् सुदारुणात् ॥ १९॥
यवनश्च हतः संख्ये काल इत्यभिविश्रुतः ।
इन्होंने महातेजस्वी राजा नृगको अत्यन्त भयंकर शापसे मुक्त किया। कालयवनको युद्धमें मारा (मुचुकुन्दद्वारा उसका नाश करा दिया) ॥ १९ १/२ ॥

वानरौ च महावीर्यौ मैन्दो द्विविद एव च ॥ २०॥
विजितौ युधि दुर्धर्षौ जाम्बवांश्च पराजितः।
दो महापराक्रमी दुर्धर्ष वानर मैन्द और द्विविदको तथा ऋक्षराज जाम्बवान्को भी युद्धमें पराजित किया॥ २० १/२ ॥

सान्दीपनेस्तथा पुत्रस्तव चैव पिता तथा ॥ २१॥
गतौ वैवस्वतवशं जीवितौ तस्य तेजसा।
सान्दीपिनिका पुत्र तथा तुम्हारे पिता परीक्षित्—ये दोनों यमराजके वशमें हो गये थे; परंतु उन श्रीकृष्णके तेजसे जीवित हो गये॥ २१ १/२ ॥

संग्रामा बहवः प्राप्ता घोरा नरवरक्षयाः ॥ २२॥
निहताश्च नृपाः सर्वे कृत्वा तज्जयमद्भुतम् ।
जनमेजयास्य युद्धेषु यथा ते वर्णिता मया ॥ २३॥
जनमेजय ! बड़े-बड़े राजाओंका विनाश करनेवाले बहुत-से घोर संग्राम प्राप्त हुए, परंतु उन युद्धोंमें अद्भुत विजय पाकर भगवान् श्रीकृष्णने जिस प्रकार समस्त नरेशोंको मार गिराया, उसका वर्णन मैं कर चुका हूँ॥ २२-२३॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वासुदेवमाहात्म्ये पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वासुदेव-माहात्म्यविषयक एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११५॥


षोडशाधिकशततमोऽध्यायः

भगवान् शङ्करका बाणासुरको अपने और देवी पार्वतीके पुत्रके रूपमें स्वीकार करना, बाणासुरका उनसे युद्धके लिये वर माँगना और पाना तथा इससे बाण-मन्त्री कुम्भाण्डका चिन्तित होना

जनमेजय उवाच
भूय एव महाबाहोर्यदुसिंहस्य धीमतः।
कर्माण्यपरिमेयाणि श्रुतानि द्विजसत्तम ॥ १॥
त्वत्तः श्रुतवतां श्रेष्ठ वासुदेवस्य धीमतः।
जनमेजयने कहा—विद्वानोंमें उत्तम द्विजश्रेष्ठ ! मैंने आपके मुखसे बुद्धिमान् महाबाहु यदुकुलसिंह वसुदेव-नन्दन श्रीकृष्णके अपरिमेय कर्मोंको फिरसे सुना॥ १ १/२॥

यत् त्वया कथितं पूर्वं बाणं प्रति महासुरम् ॥ २॥
तदहं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण तपोधन ।
तपोधन ! आपने पहले महान् असुर बाणके विषयमें जो चर्चा की है, उसको मैं विस्तारसे सुनना चाहता हूँ ॥ २ १/२ ॥

कथं च देवदेवस्य पुत्रत्वमसुरो गतः॥ ३॥
योऽभिगुप्तः स्वयं ब्रह्मञ्छङ्करेण महात्मना ।
सहवासं गतेनैव सगणेन गुहेन तु॥ ४॥
ब्रह्मन् ! वह असुर देवाधिदेव महादेवजीके पुत्रभावको कैसे प्राप्त हुआ? जिससे महात्मा भगवान् शङ्करने स्वयं उसकी रक्षा की तथा उसके सहवासमें रहनेवाले गणोंसहित भगवान् स्कन्दने भी उसका संरक्षण किया॥ ३-४॥

बलेर्बलवतः पुत्रो ज्येष्ठो भ्रातृशतस्य यः।
वृतो बाहुसहस्रेण दिव्यास्त्रशतधारिणा ॥ ५॥
बलवान् बलिक्रा पुत्र अपने सौ भाइयोंमें ज्येष्ठ था। वह सैकड़ों दिव्यास्त्र धारण करनेवाली सहस्र भुजाओंसे युक्त था॥ ५॥

६६६ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे असंख्येयैश्च महाकायैर्महाबलशतैर्वृतः। ततोऽग्लपयदात्मानं तपसा श्लाघते च सः। वासुदेवेन स कथं वाणः संख्ये पराजितः ॥ ६ ॥ देवश्च परमं तोषं जगाम च सहोमया ॥ १४ ॥ संरब्धश्चैव युद्धार्थी जीवन्मुक्तः कथं च सः। तदनन्तर उसने तपस्याके द्वारा अपने शरीरको गलाना वह असंख्य विशालकाय तथा सैकड़ों महाबली असुरोंसे आरम्भ किया। उसे अपनी तपस्यापर गर्व भी होता था घिरा रहता था तो भी जब वह युद्धकी इच्छासे रोष अर्थात् वह यह समझता था कि मैं ही महान् तपस्वी हूँ और आवेशमें भरकर आया, तब भगवान् वासुदेवने युद्धमें तथा पार्वतीसहित महादेवजी उसपर बहुत संतुष्ट हुए ॥१४॥ उसे पराजित कैसे कर दिया ? तथा किस प्रकार उन्होंने नीलकण्ठः परां प्रीतिं गत्वा चासुरमब्रवीत् । उसे जीवित छोड़ा था ? ॥ ६३ ॥ वरं वरय भद्रं ते यत् ते मनसि वर्तते ॥ १५ ॥ वैशम्पायन उवाच परम प्रसन्नताको प्राप्त होकर भगवान् नीलकण्ठने उस शृणुष्वावहितो राजन् कृष्णस्यामिततेजसः ॥ ७ ॥ असुरसे कहा- 'बाण ! तुम्हारा कल्याण हो । तुम्हारे मनमें मनुष्यलोके बाणेन यथाभूद् विग्रहो महान् । जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो' ॥ १५ ॥ वैशम्पायनजी बोले- राजन् ! मानवलोकमें अमित- अथ वाणोऽब्रवीद् वाक्यं देवदेवं महेश्वरम् । तेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णका बाणासुरके साथ जिस तरह देव्याः पुत्रत्वमिच्छामि त्वया दत्तं त्रिलोचन ॥ १६ ॥ महान् संग्राम हुआ था, उसे ध्यान देकर सुनो ॥ ७३ ॥ तब बाणने देवाधिदेव महेश्वरसे कहा- 'त्रिलोचन ! मैं वासुदेवेन यत्रासौ रुद्रस्कन्दसहायवान् ॥ ८ ॥ आपका दिया हुआ देवी पार्वतीका पुत्रत्व चाहता हूँ' ॥१६॥ बलिपुत्रो रणश्लाघी जित्वा जीवन् विसर्जितः । शंकरस्तु तथेत्युक्त्वा रुद्राणीमिदमब्रवीत् । जहाँ रुद्र और स्कन्दकी सहायतासे सम्पन्न हुए युद्ध- कनीयान् कार्त्तिकेयस्य पुत्रोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥ १७ ॥ श्लाघी बलिपुत्र बाणासुरको भगवान् श्रीकृष्णने जीतकर तब भगवान् शङ्करने 'तथास्तु' कहकर देवी रुद्राणीसे भी जीवित छोड़ दिया ॥ ८३ ॥ इस प्रकार कहा - 'देवि ! तुम इसे पुत्रके रूपमें स्वीकार यथा चास्य वरो दत्तः शंकरेण महात्मना ॥ ९ ॥ करो। यह कार्त्तिकेयका छोटा भाई होगा ॥ १७ ॥ नित्यं सांनिध्यतां चैव गाणपत्यं तथाक्षयम् । यत्रोत्थितो महासेनः सोऽग्निजो रुधिरे पुरे । यथा बाणस्य तद् युद्धं जीवन्मुक्तो यथा च सः ॥ १०॥ तत्रोद्देशे पुरं चास्य भविष्यति न संशयः ॥ १८ ॥ यथा च देवदेवस्य पुत्रत्वं सोऽसुरो गतः । 'जहाँ रुधिरपुरमें अग्निकुमार महासेनका प्रादुर्भाव यदर्थं च महत् युद्धं तद् सर्वमखिलं शृणु ॥ ११ ॥ हुआ था, उस स्थानपर इसकी राजधानी होगी। इसमें महात्मा शङ्करने जिस प्रकार बाणासुरको सदा अपने संशय नहीं है ॥ १८ ॥ समीप रहने और अक्षयभावसे गणपति-पदपर प्रतिष्ठित नाम्ना तच्छोणितपुरं भविष्यति पुरोत्तमम् । होनेका वरदान दिया था। जिस प्रकार बाणासुरका वह मयाभिगुप्तं श्रीमन्तं न कश्चित् प्रसहिष्यति ॥ १९ ॥ युद्ध हुआ, जिस प्रकार श्रीकृष्णने उसे जीवित छोड़ा, जिस 'वह उत्तम नगर शोणितपुरके नामसे विख्यात होगा । तरह वह असुर देवाधिदेव महादेवजीके पुत्रभावको प्राप्त मेरे द्वारा सुरक्षित हुए इस तेजस्वी बाणासुरका वेग कोई हुआ तथा जिस निमित्तसे उस महान् युद्धकी घटना घटित नहीं सह सकेगा' ॥ १९ ॥ हुई, वह सारा वृत्तान्त सम्पूर्ण रूपसे सुनो ॥ ९-११ ॥ ततः स निवसन् बाणः पुरे शोणितसाह्वये । दृष्ट्वा वपुः कुमारस्य क्रीडतश्च महात्मनः । राज्यं प्रशासते नित्यं क्षोभयन् सर्वदेवताः ॥ २० ॥ बलिपुत्रो महावीर्यो विस्मयं परमं गतः ॥ १२ ॥ तदनन्तर शोणितपुरमें निवास करता हुआ बाण सदा एक समय क्रीड़ामें लगे हुए महामनस्वी कुमार स्कन्दके अपने राज्यका शासन करने लगा। वह सम्पूर्ण देवताओंको सुन्दर शरीरको देखकर महापराक्रमी बलिपुत्र बाणासुरको क्षोभमें डाले रहता था ॥ २० ॥ बड़ा विस्मय हुआ ॥ १२ ॥ अथ वीर्यमदोन्मत्तो बाणो बाहुसहस्रवान् । तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना तपश्चर्तुं सुदुष्करम् । अचिन्तयन् देवगणान् युद्धमाकाङ्क्षते सदा ॥ २१ ॥ रुद्रस्याराधनार्थाय देवस्य स्यां यथा सुतः ॥ १३ ॥ इसके बाद सहस्रबाहु बाणासुर अपने बल-पराक्रमके उस समय उसके मनमें रुद्रदेवकी आराधनाके लिये मदसे उन्मत्त हो देवताओंको कुछ भी न समझकर सदा अत्यन्त दुष्कर तपस्या करनेका विचार उत्पन्न हुआ। उस सबके साथ युद्धकी आकाङ्क्षा रखने लगा ॥ २१ ॥ तपका उद्देश्य यही था कि मैं किसी प्रकार महादेवजीका पुत्र हो जाऊँ ॥ १३ ॥

विष्णुपर्व ] षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ६६७

ध्वजं चास्य ददौ प्रीतः कुमारो ह्यग्नितेजसम्।
वाहनं चैव बाणस्य मयूरं दीप्ततेजसम् ॥ २२॥
बाणासुरपर प्रसन्न हुए कुमार कार्तिकेयने उसे अग्नि-के तुल्य तेजस्वी ध्वज तथा तेजसे प्रकाशित मयूर वाहन-रूपमें प्रदान किया ॥ २२ ॥

न देवा न च गन्धर्वा न यक्षा नापि पन्नगाः।
तस्य युद्धे व्यतिष्ठन्त देवदेवस्य तेजसा ॥ २३॥
देवाधिदेव महादेवजीके तेजसे सुरक्षित हुए बाणासुरके सामने युद्धमें न तो देवता ठहर पाते थे, न गन्धर्व, न यक्ष टिक पाते थे, न नाग ॥ २३ ॥

त्र्यम्बकेनाभिगुप्तश्च दर्पोत्सिक्तो महासुरः।
भूयो मृगयते युद्धं शूलिनं सोऽभ्यगच्छत ॥ २४॥
त्रिनेत्रधारी शिवके द्वारा सुरक्षित हुआ वह महान् असुर बलके घमंडमें भर गया और वारंवार युद्धका ही अवसर ढूँढ़ने लगा। एक दिन वह त्रिशूलधारी भगवान् शङ्करके पास गया ॥ २४ ॥

स रुद्रमभिगम्याथ प्रणिपत्याभिवाद्य च।
बलिसूनुरिदं वाक्यं पप्रच्छ वृषभध्वजम् ॥ २५॥
वृषभध्वज रुद्रदेवके पास जाकर उन्हें प्रणाम और अभिवादन करनेके पश्चात् बलिपुत्र बाणने उनसे यह बात पूछी—॥ २५ ॥

असकृन्निर्जिता देवाः ससाध्याः समरुद्गणाः।
मया मदबलोत्सेकात् ससैन्येन तवाश्रयात् ॥ २६॥
'प्रभो ! आपका सहारा पाकर सेनासहित मैंने बलके मद और अभिमानपूर्वक साध्यों और मरुद्गणोंसहित देवताओं-को अनेक बार परास्त किया है ॥ २६ ॥

इमं देशं समागम्य वसन्ति स्म पुरे सुखम्।
ते पराजयसंत्रस्ता निराशा मत्पराजये ॥ २७॥
'वे मुझे पराजित करनेकी ओरसे तो निराश हैं; परंतु मेरे द्वारा पुनः पराजित होनेके भयसे डरे हुए हैं, अतः इस देशमें आकर इसी नगरमें सुखपूर्वक निवास करते हैं ॥ २७ ॥

नाकपृष्ठमुपागम्य निवसन्ति यथासुखम्।
सोऽहं निराशो युद्धस्य जीवितं नाद्य कामये ॥ २८ ॥
'साथ ही मेरी आज्ञा ले स्वर्गमें भी जाकर वहाँ सुख-पूर्वक रहते हैं, अतः मैं युद्धसे निराश हो गया हूँ। अब युद्ध न मिलनेसे मुझे जीवित रहनेकी इच्छा नहीं होती ॥ २८ ॥

अयुध्यतो वृथा ह्येषां बाहूनां धारणं मम।
तद् ब्रूहि मम युद्धस्य कश्चिदागमनं भवेत्।
न मे युद्धं विना देव रतिरस्ति प्रसीद मे ॥ २९ ॥
'यदि युद्धका सुयोग न मिला तो मेरे लिये इन सहस्र भुजाओंका बोझ ढोना व्यर्थ है; अतः बताइये, क्या मुझे युद्धका अवसर प्राप्त हो सकता है ? देव ! युद्धके बिना मेरा मन कहीं नहीं लग रहा है। अतः इसके लिये मुझपर कृपा कीजिये' ॥ २९ ॥

ततः प्रहस्य भगवानब्रवीद् वृषभध्वजः।
भविता बाण युद्धं वै यथा तच्छृणु दानव ॥ ३०॥
यह सुनकर भगवान् वृषभध्वज ठठाकर हँस पड़े और इस प्रकार बोले—'बाणासुर ! जिस प्रकार तुम्हें युद्धका अवसर प्राप्त होगा, वह सुनो ॥ ३० ॥

ध्वजस्यास्य यदा भङ्गस्तव तात भविष्यति।
स्वस्थाने स्थापितस्याथ तदा युद्धं भविष्यति ॥ ३१॥
'तात ! अपने स्थानपर स्थापित हुआ तुम्हारा यह ध्वज जब खण्डित होकर गिर जायगा, तब तुम्हें युद्ध प्राप्त होगा' ॥ ३१ ॥

इत्येवमुक्तः प्रहसन् बाणस्तु बहुशो मुदा।
प्रसन्नवदनो भूत्वा पादयोः पतितोऽब्रवीत् ॥ ३२॥
उनके ऐसा कहनेपर बाणासुरका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। वह आनन्दमें मग्न हो बारंबार जोर-जोरसे हँसने लगा और भगवान् शिवके चरणोंमें गिरकर इस प्रकार बोला—॥

दिष्ट्या बाहुसहस्रस्य न वृथा धारणं मम।
दिष्ट्या सहस्राक्षमहं विजेता पुनराहवे ॥ ३३ ॥
'प्रभो ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि मेरे लिये इन सहस्र भुजाओंको धारण करना व्यर्थ नहीं होगा। सौभाग्यसे मैं पुनः युद्धमें सहस्रलोचन इन्द्रको परास्त करूँगा' ॥ ३३ ॥

आनन्देनाश्रुपूर्णाभ्यां नेत्राभ्यामरिमर्दनः।
पञ्चाङ्गलिशतैर्देवं पूजयन् पतितो भुवि ॥ ३४॥
ऐसा कहकर शत्रुमर्दन बाण आनन्दाँसुओंसे परिपूर्ण नेत्रों तथा पाँच सौ अञ्जलियोंद्वारा महादेवजीकी पूजा करता हुआ पुनः पृथ्वीपर उनके चरणोंमें पड़ गया ॥ ३४ ॥

ईश्वर उवाच

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ बाहूनामात्मनः स्वकुलस्य तु।
सदृशं प्राप्स्यसे वीर युद्धमप्रतिमं महत् ॥ ३५॥
तब महादेवजी बोले— वीर ! उठो, उठो ! तुम अपनी इन भुजाओं तथा कुलके अनुरूप ऐसा महान् युद्ध प्राप्त करोगे, जिसकी कहीं तुलना नहीं है ॥ ३५ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्ततो बाणस्त्र्यम्बकेन महात्मना।
हर्षेणात्युच्छ्रितः शीघ्रं ननाम वृषभध्वजम् ॥ ३६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन् ! महात्मा त्र्यम्बकके ऐसा कहनेपर हर्षसे उत्फुल्ल हुए बाणासुरने भगवान् वृषभध्वजको शीघ्र नमस्कार किया ॥ ३६ ॥

६६८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


शितिकण्ठविसृष्टस्तु बाणः परपुरंजयः।
ययौ स्वभवनं तत्र यत्र ध्वजगृहं महत् ॥ ३७ ॥
तदनन्तर भगवान् नीलकण्ठसे विदा लेकर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाला बाणासुर अपने घरको गया, जहाँ विशाल ध्वजगृह बना हुआ था ॥ ३७ ॥

तत्रोपविष्टः प्रहसन् कुम्भाण्डमिदमब्रवीत् ।
प्रियमावेदयिष्यामि भवतो यन्मनोगतम् ॥ ३८ ॥
वहाँ बैठकर हँसते हुए बाणने अपने मन्त्री कुम्भाण्डसे इस प्रकार कहा—‘मन्त्रिप्रवर ! मैं तुम्हें प्रिय समाचार निवेदन करूँगा, जो तुम्हारे मनको अभीष्ट है’ ॥ ३८ ॥

इत्येवमुक्तः प्रहसन् बाणमप्रतिमं रणे।
प्रोवाच राजन् किं त्वेतद्वक्तुकामोऽसि मत्प्रियम्॥३९॥
उसका ऐसा कथन सुनकर हँसते हुए कुम्भाण्डने युद्धमें अनुपम वीरता प्रकट करनेवाले बाणासुरसे कहा—‘राजन् ! यह क्या बात है ? आप मेरे किस प्रिय समाचारको बताना चाहते हैं ? ॥ ३९ ॥

विस्मयोत्फुल्लनयनः प्रहर्षादिव भाषसे।
त्वत्तः श्रोतुमिहेच्छामि वरं किं लब्धवानसि ॥ ४० ॥
देवदेवप्रसादेन स्कन्दस्य च महात्मनः।
‘आपके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे हैं। आप अत्यन्त हर्षसे प्रेरित होकर बोल रहे हैं। मैं यहाँ आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ कि आपने देवाधिदेव महादेवजीकी कृपा और महात्मा स्कन्दके प्रसादसे कौन-सा वर प्राप्त किया है ? ॥ ४० १/२ ॥

ईप्सितं किं त्वया प्राप्तं तन्मे ब्रूहि महासुर ॥ ४१ ॥
शितिकण्ठप्रसादेन स्कन्दगोपायनेन च।
‘महान् असुर ! आपने भगवान् नीलकण्ठके कृपा-प्रसाद और स्वामी स्कन्दके संरक्षणद्वारा कौन-सा अभीष्ट वर प्राप्त किया है, यह मुझे बताइये ॥ ४१ १/२ ॥

कच्चित्त्रैलोक्यराज्यं ते व्यादिष्टं शूलपाणिना ॥ ४२ ॥
कच्चिदिन्द्रस्तव भयात् पातालमुपयास्यति ।
‘क्या भगवान् शूलपाणिने आपको तीनों लोकोंका राज्य दे दिया ? क्या देवराज इन्द्र आपके भयसे पाताललोकको चले जायेंगे ? ॥ ४२ १/२ ॥

कच्चिद् विष्णुपरीत्रासं विमोक्ष्यन्ति दितेः सुताः॥ ४३ ॥
पातालवासमुत्सृज्य कच्चित् तव वलाश्रयात् ।
विबुधावासनिरता भविष्यन्ति महासुराः ॥ ४४ ॥
‘क्या दितिके पुत्र अब भगवान् विष्णुका भय त्याग देंगे ? क्या आपके बलका सहारा लेकर बड़े-बड़े असुर पातालका निवास छोड़कर स्वर्गलोकमें वास करेंगे ॥ ४३-४४ ॥

बलिर्विष्णु पराक्रान्तो बद्धस्तव पिता नृप।
सलिलौघाद् विनिष्क्रम्य कच्चिद् राज्यमवाप्स्यति ॥ ४५॥
‘राजन् ! क्या आपके पिता राजा बलि, जो विष्णुके पराक्रमसे अभिभूत हो पातालमें बँधे हुए हैं, समुद्रकी जल-राशिसे बाहर निकलकर पुनः त्रिलोकीका राज्य प्राप्त करेंगे ॥

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यस्रग्गन्धलेपनम् ।
कच्चिद् वैरोचनिं तात द्रक्ष्यामः पितरं तव ॥ ४६॥
‘तात ! क्या हमलोग तुम्हारे पिता विरोचनकुमार बलि-को पुनः दिव्यमाला, दिव्यवस्त्र, दिव्यपुष्पोंके हार, दिव्य गन्ध तथा दिव्य अनुलेपन धारण किये देखेंगे ? ॥ ४६ ॥

कच्चित् त्रिभिः क्रमैः पूर्वं हृतांल्लोकानिमान् प्रभो।
पुनः प्रत्यानयिष्यामो जित्वा सर्वान् दिवौकसः ॥ ४७ ॥
‘प्रभो ! पहले विष्णुके तीन पगोंद्वारा जो हर लिये गये थे, उन्हीं इन तीनों लोकोंको क्या हम पुनः समस्त देवताओं-को पराजित करके लौटा लायेंगे ? ॥ ४७ ॥

स्निग्धगम्भीरनिर्घोषं शङ्खस्वनपुरोजवम् ।
कच्चिन्नारायणं देवं जेष्यामः समितिज्जयम् ॥ ४८ ॥
‘जिनकी वाणीका घोष मेघगर्जनाके समान स्निग्ध एवं गम्भीर है तथा जिनके आगे उनका शङ्खनाद वेगपूर्वक चलता है, उन युद्धविजयी नारायणदेवको क्या हमलोग जीत सकेंगे ? ॥ ४८ ॥

कच्चिद् वृषभध्वजस्तात प्रसादसुमुखस्तव ।
यथा ते हृदयोत्कम्पः साश्रुविन्दुः प्रवर्तते ॥ ४९ ॥
‘तात ! क्या भगवान् वृषभध्वज आपके प्रति कृपा करनेके लिये प्रसन्नमुख हुए हैं ? आपके हृदयमें जैसा कम्प हो रहा है और नेत्रोंसे जिस प्रकार आनन्दके आँसू झर रहे हैं, उनको देखते हुए पूर्वोक्त बातोंका ही अनुमान होता है ॥

कच्चिदीश्वरतोषेण कार्तिकेयमतेन च।
प्राप्तवानसि सर्वेषामस्माकं राज्यसम्पदम् ॥ ५० ॥
‘क्या भगवान् शिवके संतोष और कार्तिकेयकी सम्मतिसे आपने हम सब लोगोंके लिये राज्य-सम्पत्ति प्राप्त की है ?’ ॥

इति कुम्भाण्डवचनैश्चोदितः सोऽसुरोत्तमः ।
बाणो वाणीमसंसक्तां प्रोवाच वदतां वरः ॥ ५१ ॥
तब कुम्भाण्डकी ऐसी बातोंसे प्रेरित होकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ असुरप्रवर बाणने अस्खलित वाणीमें कहा ॥ ५१ ॥

बाण उवाच
चिरात्प्रभृति कुम्भाण्ड न युद्धं प्राप्यते मया ।
ततो मया मुदा पृष्टः शितिकण्ठः प्रतापवान् ॥ ५२॥
बाणासुर बोला—कुम्भाण्ड ! चिरकालसे मुझे युद्ध नहीं प्राप्त हो रहा था, इसलिये मैंने प्रतापी भगवान् नीलकण्ठसे प्रसन्नतापूर्वक पूछा—॥ ५२ ॥

युद्धाभिलाषः सुमहान् देव संजायते मम ।
अभिप्राप्स्याम्यहं युद्धं मनसस्तुष्टिवर्धनम् ॥ ५३ ॥

विष्णु० पर्व १]

देवें। मेरे मनमें युद्धकी बड़ी अभिलाषा हो रही है। क्या मैं कभी ऐसा युद्ध प्राप्त करूँगा, जो मेरे मनके उद्वेगको दूर करनेवाला हो' ॥ ५३ ॥

ततोऽहं देवदेवेन हरेणाविशतासिना ।
प्रहस्य सुचिरं कालमुक्तोऽस्मि वचनं प्रियम् ।
प्राप्स्यसे सुमहद् युद्धं त्वं वानाप्रतिमं महत् ॥ ५४ ॥

मेरी यह बात सुनकर धनुर्धारी देवोंके देव महादेवने देरतक हँसकर मुझसे यह प्रिय वचन कहा—'बाणासुर ! तुम्हें ऐसा महान् युद्ध प्राप्त होगा; जिसकी कहीं तुलना नहीं है ॥

मयूरध्वजभङ्गेस्ते भविष्यति यदासुर ।
तदा त्वं प्राप्स्यसे युद्धं सुमहद् दितिनन्दन ॥ ५५ ॥

'दितिनन्दन असुर ! जब तुम्हारा मयूरध्वज टूटकर गिर जायगा, तब तुम्हें महान् युद्धका अवसर प्राप्त होगा' ॥ ५५ ॥

ततोऽहं परमप्रीतो भगवन्तं वृषध्वजम् ।
प्रणम्य शिरसा देवं तवान्तिकमुपागतः ॥ ५६ ॥

तब मैं अत्यन्त प्रसन्न हो भगवान् वृषध्वज देवको सिर झुकाकर प्रणाम करके तुम्हारे पास आया हूँ ॥ ५६ ॥

इत्येवमुक्तः कुम्भाण्डः प्रोवाच नृपतिं तदा ।
अहो न शोभनं राजन् यदेवं भाषसे वचः ॥ ५७ ॥

बाणासुरके ऐसा कहनेपर कुम्भाण्डने उस असुरराजसे कहा—'अहो राजन् ! आप जो ऐसी बात कह रहे हैं, इसका परिणाम अच्छा नहीं है' ॥ ५७ ॥

एवं कथयतोस्तत्र तयोरन्योन्यमुच्छ्रितः ।
ध्वजः पपात वेगेन शक्राशनिसमाहतः ॥ ५८ ॥

वे दोनों वहाँ आपसमें ऐसी बातें कर रहे थे कि इतनेमें ही बाणासुरका ऊँचा ध्वज इन्द्रके वज्रसे आहत हो बड़े वेगसे गिर पड़ा ॥ ५८ ॥

तं तथा पतितं दृष्ट्वा सोऽसुरो ध्वजमुत्तमम् ।
प्रहर्षमतुलं लेभे मेने चाहवमागतम् ॥ ५९ ॥

अपने उस उत्तम ध्वजको टूटकर गिरा हुआ देख बाणासुरको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ और उसे यह विश्वास हो गया कि अब युद्धका अवसर आना ही चाहता है ॥ ५९ ॥

ततश्चकम्पे वसुधा शक्राशनिसमाहता ।
ननादान्तर्हितो भूमौ वृषदंशो जगर्ज च ॥ ६० ॥

तदनन्तर इन्द्रके वज्रके आघातसे पीड़ित हो पृथ्वी काँपने लगी। भूमिमें छिपा हुआ बिलाव आर्तनाद एवं गर्जना करने लगा ॥ ६० ॥

देवानापि यो देवः सोऽप्यवर्षत वासवः ।
शोणितं शोणितपुरे सर्वतः परमं ततः ॥ ६१ ॥

जो देवताओंके भी देवता हैं, वे इन्द्र शोणितपुरमें सब ओर बहुत रक्तकी वर्षा करने लगे ॥ ६१ ॥


उन्हें गिरा हुआ देखकर वह अत्यन्त भयभीत ले।
खरदंष्ट्रो घोरिकां खड्गीं भरणीं सप्तमीमथ ॥ ५२॥

आकाशसे दुर्लक्षणोंका दर्शन करके बहुत बड़ी उल्का धरतीपर गिरी। अपने रथके देवियोंसे वेष्ठित हुए सूर्यदेव अपनी दाहक सहस्रों किरणोंको छोड़ने लगे ॥ ५१ ॥

चैत्यवृक्षेषु सहसा धाराः शतसहस्रशः ।
शोणितस्य स्रवन् घोरा निपेतुस्तारका भृशम् ॥ ६३ ॥

चैत्य-वृक्षोंपर सहसा शोणितकी सैकड़ों-हजारों धाराएँ गिरने लगीं, जो बड़ी भयंकर प्रतीत होती थीं। आकाशसे बारंबार तारे टूटकर गिरने लगे ॥ ६३ ॥

राहुरग्रसदादित्यमपर्वणि विशांपते ।
लोकक्षयकरे काले निर्घाताश्चापतन्महान् ॥ ६४ ॥

प्रजानाथ ! राहुने बिना पर्वके ही सूर्यको ग्रस लिया। वह लोकविनाशक समय प्राप्त होनेपर भारी गड़गड़ाहटके साथ वज्रपात होने लगा ॥ ६४ ॥

दक्षिणां दिशमाश्रित्य धूमकेतुः स्थितोऽभवत् ।
अनिशं चाप्यविच्छिन्ना ववुर्वाताः सुदारुणाः ॥ ६५ ॥

धूमकेतु दक्षिण दिशा में आकर स्थित हो गया। निरन्तर अविच्छिन्नभावसे अत्यन्त दारुण वायु चलने लगी ॥ ६५ ॥

श्वेतलोहितपर्यन्तः कृष्णग्रीवस्तडिद्युतिः ।
त्रिवर्णपरिवो भानुः संध्यारागमथावृणोत् ॥ ६६ ॥

सूर्यपर तीन रंगके घेरे पड़ गये। किनारे-किनारे तो सफेद और लाल रंगके घेरे थे; किंतु कण्ठभागमें काले रंगका घेरा था। उसमें सूर्यकी कान्ति विद्युत् के समान प्रतीत होती थी। उन्होंने अपनी उस दीप्तिसे संध्याकालकी लालीको ढक दिया ॥ ६६ ॥

वक्रमङ्गारकमग्नो कृत्तिकासु भयंकरः ।
बाणस्य जन्म नक्षत्रं भरणीमभि दारुणः ॥ ६७ ॥

मङ्गल वक्रगतिसे कृत्तिका में आकर स्थित हो गये, जो भयकी सूचना दे रहे थे। ये सब प्रकारसे बाणासुरके जन्मनक्षत्र रोहिणीकी भरणीनामी पर रहे थे ॥ ६७ ॥

अनेकशाखाढ्यश्चाग्र्य निपपात महीतले ।
अर्चितः सर्वकन्याभिर्दानवानां महात्मनाम् ॥ ६८ ॥

बहुत-सी शाखाओंसे युक्त चैत्यवृक्ष, जो महापराक्रमी दानवोंकी समस्त कन्याओं द्वारा पूजित होता था, सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ६८ ॥

एवं विविधरूपाणि निमित्तानि विभावयन् ।
बाणो बलमदोन्मत्तो निश्चयं नाधिवच्छति ॥ ६९ ॥

इस प्रकार भाँति-भाँतिके उत्पातोंको देखता हुआ बाण बाणासुर किसी निश्चयपर नहीं ...

६७० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


विचेतास्त्वभवत् प्राज्ञः कुम्भाण्डस्तत्त्वदर्शिवान्।
बाणस्य सचिवस्तत्र कीर्तयन् बहु किल्बिषम् ॥ ७० ॥
परंतु बाणासुरकें विद्वान् मन्त्री तत्त्वदर्शी कुम्भाण्ड नाना प्रकारके दुष्परिणामोंका वर्णन करते हुए अचेत-से हो गये ॥ ७० ॥

उत्पाता ह्यत्र दृश्यन्ते कथयन्तो न शोभनम् ।
तव राज्यविनाशाय भविष्यन्ति न संशयः ॥ ७१ ॥
वे बोले—‘असुरराज ! यहाँ बहुत-से उत्पात दिखायी देते हैं, जो शुभ परिणामके सूचक नहीं हैं। वे आपके राज्यका विनाश करनेमें सहायक होंगे, इसमें संदेह नहीं है ॥ ७१ ॥

वयं चान्ये च सचिवा भृत्यास्ते च तवानुगाः ।
क्षयं यास्यन्ति नचिरात् सर्वे पार्थिव दुर्नयात् ॥ ७२ ॥
‘पृथ्वीनाथ ! आपकी दुर्नीतिसे हम तथा दूसरे मन्त्री और आपके अनुगामी सेवक—ये सब-के-सब शीघ्र ही नष्ट हो जायेंगे ॥ ७२ ॥

यथा शक्रध्वजवरोः स्वदर्पात् पतनं भवेत् ।
बलमाकाङ्क्षतो मोहात् तथा बाणस्य नर्दतः ॥ ७३ ॥
‘आपके अपने ही दर्पसे जिस तरह पूर्वोक्त चैत्यवृक्षका जो अपनी ऊँचाईसे इन्द्रध्वजको छू लेता था, पतन हो गया, उसी प्रकार बलकी आकाङ्क्षा रखकर गर्जना करनेवाले आप बाणासुरका भी अपने ही मोहवश अभिमानसे पतन हो जायगा ॥ ७३ ॥

देवदेवप्रसादात् तु त्रैलोक्यविजयं गतः ।
उत्सेकाद् दृश्यते नाशो युद्धाकाङ्क्षी ननर्द ह ॥ ७४ ॥
‘देवाधिदेव महादेवजीके प्रसादसे जिन्होंने तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त कर ली, उन्हीं असुरराजका अब अभिमानवश विनाश दिखायी देता है, तभी तो आप युद्धकी अभिलाषा लेकर गर्जना करने लगे हैं' ॥ ७४ ॥

बाणः प्रीतमनास्त्वेवं पपौ पानमनुत्तमम् ।
दैत्यदानवनारीभिः सार्धमुत्तमविक्रमः ॥ ७५ ॥
परंतु बाणासुरको इसकी परवा नहीं थी, वह उत्तम पराक्रमी असुर प्रसन्नचित्त होकर दैत्यों और दानवोंकी स्त्रियोंके साथ उत्तम मधुपान करने लगा ॥ ७५ ॥

कुम्भाण्डश्चिन्तयाविष्टो राजवेश्माभ्ययात् तदा ।
अचिन्तयच्च तत्त्वार्थं तैस्तैरुत्पातदर्शनैः ॥ ७६ ॥
मन्त्री कुम्भाण्ड उस समय चिन्तित होकर राजभवनको चले गये तथा भिन्न-भिन्न उत्पातोंको देखकर तात्त्विक अर्थका चिन्तन करने लगे ॥ ७६ ॥

राजा प्रमादी दुर्बुद्धिर्जितकाशी महासुरः ।
युद्धमेवाभिलषते न दोषान्मम्यते मदात् ॥ ७७ ॥
वे मन-ही-मन सोचने लगे, यह असुरोंका राजा महान् असुर बाण प्रमादी हो गया है। इसकी बुद्धि बिगड़ गयी है। यह विजयश्रीसे उल्लसित हो बारंबार युद्धकी ही अभिलाषा रखने लगा है। बलके मदसे उन्मत्त होकर इसमें दोष नहीं मान रहा है ॥ ७७ ॥

महोत्पातभयं चैव न तन्मिथ्या भविष्यति ।
अपीदानीं भवेन्मिथ्या सर्वमुत्पातदर्शनम् ॥ ७८ ॥
महान् उत्पातोंसे जिस भयकी सूचना मिल रही है। वह मिथ्या नहीं होगा। क्या कोई ऐसा उपाय है, जिससे इस समय यह सारा उत्पात-दर्शन मिथ्या हो जाय ? ॥ ७८ ॥

इह त्वास्ते त्रिनयनः कार्तिकेयश्च वीर्यवान् ।
तेनोत्पन्नोऽपिदोषोनः कच्चिद् गच्छेत् पराभवम् ॥ ७९ ॥
यहाँ साक्षात् त्रिनेत्रधारी भगवान् शिव रहते हैं। पराक्रमी कार्तिकेय भी यहीं विराजमान हैं, इससे हमारे लिये उत्पन्न हुआ यह दोष भी क्या शान्त हो जायगा ? ॥ ७९ ॥

उत्पन्नदोषप्रभवः क्षयोऽयं भविता महान् ।
दोषाणां न भवेन्नाश इति मे धीयते मतिः ॥ ८० ॥
इन उत्पन्न हुए उत्पातरूपी दोषोंसे यह सूचित होता है कि यहाँ महान् संहार होनेवाला है। मेरा तो यही निश्चय है कि अब इन दोषोंका नाश नहीं हो सकता ॥ ८० ॥

नियतो दोष एवायं भविष्यति न संशयः ।
दौरात्म्यान्नृपतेरस्य दोषभूता हि दानवाः ॥ ८१ ॥
इस राजाका जो यह दुरात्मभाव है, यही हमारे लिये नियत दोष होगा, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि समस्त दानव ही इस दोषसे युक्त हैं ॥ ८१ ॥

देवदानवसंघानां यः कर्ता भुवनप्रभुः ।
भगवान् कार्तिकेयश्च कृतवाँल्लोहिते पुरे ॥ ८२ ॥
जो देवताओं और दानवोंके समुदायोंकी सृष्टि करनेवाले तथा समस्त भुवनोंके प्रभु हैं, उन भगवान् शिव तथा कार्तिकेयने बाणासुरको शोणितपुरमें बसा दिया था ॥ ८२ ॥

प्राणैः प्रियतरो नित्यं भविष्यति गुहः सदा ।
तद्विशिष्टश्च बाणोऽपि शिवस्य सततं प्रियः ॥ ८३ ॥
स्कन्द तो सदा भगवान् शिवके लिये प्राणोंसे भी अधिक प्रिय होंगे और उनके साथ रहकर बाणासुर भी निरन्तर उनका प्रिय बना रहेगा ॥ ८३ ॥

दर्पोत्सेकात् तु नाशाय वरं याचितवान् भवम् ।
युद्धहेतोः स लुब्धस्तु सर्वथा न भविष्यति ॥ ८४ ॥
परंतु इसने बलके घमंडमें आकर अपने ही विनाशके लिये भगवान् शङ्करसे युद्धके लिये वर माँग लिया। युद्धलोलुप होनेके कारण यह सर्वथा अपना अस्तित्व खो देगा ॥ ८४ ॥

विष्णुपर्व ] सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ६७१


यदि विष्णुपुरोगानामिन्द्रादीनां दिवौकसाम्।
भवित्री घनवत् प्राप्तिर्महस्तात् कृता भवेत् ॥ ८५ ॥
यदि भगवान् विष्णुको आगे करके इन्द्र आदि देवता मेघोंकी घटाके समान यहाँ छा जायँ तो भी भगवान् शङ्करके हाथसे उनके उस आक्रमणका प्रतीकार हो सकता है ॥८५॥

पतयोश्च हि को युद्धं कुमारभवयोरिह।
शक्तो दातुं समागम्य बाणसाहाय्यकाङ्क्षिणोः ॥ ८६ ॥
बाणासुरकी सहायताकी इच्छा रखनेवाले इन भगवान् शङ्कर और कुमार कार्तिकेयके सामने आकर कौन इन्हें युद्धका अवसर दे सकता है ? ॥ ८६ ॥

न च देववचो मिथ्या भविष्यति कदाचन ।
भविष्यति महत् युद्धं सर्वदैत्यविनाशनम् ॥
परंतु महादेवजीका वचन कभी मिथ्या नहीं होगा । (जब उन्होंने महान् युद्ध होनेकी बात कही है, तब) समस्त दैत्योंका विनाश करनेवाला महायुद्ध होकर ही रहेगा ॥ ८७ ॥

स एवं चिन्तयाविष्टः कुम्भाण्डस्तत्त्वदर्शिवान्।
स्वस्तिप्रणिहितां बुद्धिं चकार स महासुरः ॥ ८८ ॥
इस प्रकार चिन्तामग्न होकर महान् असुर तत्त्वदर्शी कुम्भाण्डने अपनी बुद्धिको कल्याणचिन्तनमें लगाया ॥८८॥

ये हि देवैर्विरुध्यन्ते पुण्यकर्मभिराहवे।
यथा बलिर्नियमितस्तथा ते यान्ति संक्षयम् ॥ ८९ ॥
जो युद्धमें पुण्यकर्मा देवताओंके साथ विरोध रखते हैं अथवा वे देवता ही जिनके विरोधमे खड़े हो जाते हैं, वे जिस प्रकार राजा बलि बाँधे गये थे, उसी प्रकार बन्धनमें पड़कर नष्ट हो जाते हैं ॥ ८९ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि बाणयुद्धे षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाणासुरका युद्धविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११६ ॥


सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः

शिव-पार्वतीका क्रीड़ाविहार, पार्वतीका उषाको पतिसमागमक्रे लिये वर देना तथा उषाकी विरह-व्यथाका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

क्रीडाविहारोपगतः कदाचिदभवद् भवः।
देव्या सह नदीतीरे रम्ये श्रीमति स प्रभुः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! किसी समय प्रभावशाली भगवान् शङ्कर गङ्गा नदीके शोभासम्पन्न रमणीय तटपर देवी पार्वतीके साथ क्रीड़ा-विहारके लिये गये ॥ १ ॥

शतानि तत्राप्सरसां चिक्रीडुश्च समन्ततः ।
सर्वर्तुकवने रम्ये गन्धर्वपतयस्तथा ॥ २ ॥
वहाँ सभी ऋतुओंकी शोभासे सुशोभित सर्वर्तुक वनमें सब ओर सैकड़ों अप्सराएँ तथा गन्धर्वराज क्रीडा कर रहे थे ॥ २ ॥

कुसुमैः पारिजातस्य पुष्पैः संतानकस्य च।
गन्धोद्दाममिवाकाशं नदीतीरं तु सर्वशः ॥ ३ ॥
पारिजात और संतानक नामक कल्पवृक्षके पुष्पोंद्वारा उस नदी-तटका सारा आकाश उद्दाम सुगन्धसे व्याप्त हो रहा था ॥ ३ ॥

वेणुवीणामृदङ्गैश्च पणवैश्च सहस्रशः।
वाद्यमानैः स शुश्राव गीतमप्सरसां तदा ॥ ४ ॥
वेणु, वीणा, मृदङ्ग और पणव आदि सहस्रों वाद्योंकी मधुर ध्वनिके साथ अप्सराओंका मनोहर गीत उन्होंने सुना ॥ ४ ॥

सूतमागधकल्पैश्चास्तुवन्नप्सरसां गणाः।
देवदेवं सुवपुषं स्रग्विणं रक्तवाससम् ॥ ५ ॥
श्रीमहेशं देवदेवमर्चयन्ति मनोरमम्।
अप्सराओंके समुदाय सूत और मागधोंके-से वचनोंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति करते थे। सुन्दर शरीरधारी देवाधिदेव महादेव फूलोंके हार धारण किये लाल रङ्गके वस्त्रसे सुशोभित थे। उन श्रीमहेश्वरका रूप बड़ा ही मनोरम था। सब अप्सराएँ वहाँ उन देवाधिदेवकी पूजा करती थीं ॥५॥

ततस्तु देव्या । रूपेण चित्रलेखा वराप्सराः ॥ ६ ॥
भवं प्रसादयामास देवी च प्राहसत् तदा ।
प्रसादयन्तीमीशानं प्रहसन्त्यप्सरोगणाः ॥ ७ ॥
इसी समय चित्रलेखा नामवाली श्रेष्ठ अप्सरा देवी पार्वतीका रूप धारण करके महादेवजीको रिझाने लगी। यह देख देवी पार्वती उस समय जोर-जोरसे हँसने लगीं। महादेवजीको रिझानेमें लगी हुई उस चित्रलेखाको लक्ष्य करके दूसरी अप्सराएँ भी हँसने लगीं ॥ ६-७ ॥

भवस्य पार्षदा दिव्या नानारूपा महौजसः।
देव्या ह्यानुज्ञया सर्वे क्रीडन्ते तत्र तत्र ह ॥ ८ ॥

१७२श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

भगवान् शङ्करके जो नाना रूपधारी दिव्य एवं महाबली पार्षद थे, वे सब देवी पार्वतीकी आज्ञासे विभिन्न स्थानोंमें क्रीडा कर रहे थे ॥ ८ ॥

अथ ते पार्षदस्तत्र रहस्ये सुविपश्चितः।
महादेवस्य रूपेण तच्चिह्नं रूपमास्थिताः ॥ ९ ॥
ततो देव्याः सुरूपेण लीलया वदनेन च।
तदनन्तर वे विद्वान् पार्षद एकान्तमें जाकर महादेवजीके रूपसे उन्हींके समान ध्वज आदि चिह्न तथा आकार धारण करके खड़े हो गये। फिर तो अप्सराएँ भी महादेवीके समान सुन्दर रूप, लीला और मुख एवं वार्तालापसे युक्त हो उनके साथ क्रीडा करने लगीं ॥ ९½ ॥

देवी प्रहासं मुमुचे ताश्चैवाप्सरसस्तदा।
ततः किलकिलाशब्दः प्रादुर्भूतः समन्ततः ॥ १० ॥
यह देख उस समय देवी पार्वती तथा वे अप्सराएँ जोर-जोरसे ठहाका मारकर हँसने लगीं। इससे वहाँ चारों ओर किलकिलाहट का शब्द गूँज उठा ॥ १० ॥

प्रहर्षमतुलं लेभे भवः प्रीतमनास्तदा।
बाणस्य दुहिता कन्या तत्रोषा नाम भामिनी ॥ ११ ॥
उस समय भगवान् शङ्करको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ। उनका मन प्रसन्न हो गया। उस अवसरपर बाणासुरकी पुत्री भामिनी उषा भी वहीं थी ॥ ११ ॥

देवं संक्रीडितं दृष्ट्वा देव्या सह नदीगतम्।
दीप्यमानं महादेवं द्वादशादित्यतेजसम् ॥ १२ ॥
उसने देखा, बारह सूर्योंके समान तेजस्वी महादेवजी अपनी दीप्तिसे देदीप्यमान हैं और नदीके तटपर देवी पार्वतीके साथ मधुर क्रीडामें आसक्त हो रहे हैं ॥ १२ ॥

नानारूपं वपुः कृत्वा देव्याः प्रियचिकीर्षया।
उषा मनोरथं चक्रे पार्वत्याः संनिधौ तथा ॥ १३ ॥
वे देवीका प्रिय करनेकी इच्छासे नाना रूप धारण करके क्रीड़ा कर रहे हैं। यह देख उषाने देवी पार्वतीके समीप ही मनमें यह संकल्प किया ॥ १३ ॥

धन्या हि भर्तृसहिता रमत्येवं समागता।
मनसा त्वथ संकल्पमुषया भाषितं तथा ॥ १४ ॥
'वह नारी धन्य है, जो पतिके साथ इस तरह मिलकर रमण करती है।' अपने इस मानसिक संकल्पको उषाने मन-ही-मन दुहराया ॥ १४ ॥

विज्ञाय तमभिप्रायमुपायाः पर्वतात्मजा।
प्राह देवी ततो वाक्यमुषां हर्षयती शनैः ॥ १५ ॥
उषाके उस अभिप्रायको जानकर पार्वती देवी उसे हर्ष प्रदान करती हुई धीरेसे बोलीं—॥ १५ ॥

उपे त्वं शीघ्रमप्येवं भर्त्रा सह रमिष्यसि।
यथा देवो मया सार्धं शङ्करः शत्रुनाशनः ॥ १६ ॥
'उपे ! तुम भी शीघ्र ही पतिके साथ इसी तरह रमण करोगी, जैसे शत्रुनाशन भगवान् शङ्कर मेरे साथ रमण करते हैं' ॥ १६ ॥

एवमुक्ते तदा देव्या वाक्ये चिन्ताविलेक्षणा।
उषा भावं तदा चक्रे भर्त्रा रंस्ये कदा सह ॥ १७ ॥
देवीके ऐसा कहनेपर उषाकी आँखें इस चिन्तासे मुँद गयीं कि पता नहीं, यह सौभाग्य कब प्राप्त होगा ? उस समय उसने मन-ही-मन यह अभिलाषा की कि मैं पतिके साथ कब रमण करूँगी ॥ १७ ॥

तदा हैमवती वाक्यं सम्प्रहस्येदमब्रवीत्।
उपे शृणुष्व वाक्यं मे यदा संयोगमेष्यसि ॥ १८ ॥
तब हिमवान्-कुमारीने हँसकर उससे यह बात कही— 'उपे ! मेरी बात सुनो, तुम्हें पतिका संयोग कब प्राप्त होगा, यह बताती हूँ ॥ १८ ॥

वैशाखे मासि हर्म्यस्था द्वादश्यां त्वां दिनक्षये।
रमयिष्यति यः स्वप्ने स ते भर्ता भविष्यति ॥ १९ ॥
'वैशाख मासकी द्वादशी तिथिको प्रदोषकालमें अट्टालिकापर सोयी हुई तुम्हारे साथ जो पुरुष स्वप्नमें आकर रमण करेगा, वही तुम्हारा पति होगा' ॥ १९ ॥

एवमुक्ता दैत्यसुता कन्यागणसमावृता।
अपाक्रामत हर्षेण रममाणा यथासुखम् ॥ २० ॥
देवीने जब ऐसी बात कही, तब कन्याओंके समुदायसे घिरी हुई दैत्यराजकुमारी उषा बड़े हर्षमें भरकर वहाँसे हट गयी और सुखपूर्वक इधर-उधर विचरने लगी ॥ २० ॥

ततः सखीभिर्हस्यन्ती हर्षेणोत्फुल्ललोचना।
तालिकासंनिपातैश्च ह्यन्योन्यं जघ्नुरूर्जिताः ॥ २१ ॥
फिर तो सखियाँ उसके साथ परिहास करने लगीं। उषाके नेत्र हर्षसे खिल उठे। वे सब उत्साहमें भरकर एक दूसरीके हाथपर तालियाँ देने लगीं ॥ २१ ॥

किन्नर्यो यक्षकन्याश्च नानादैत्यकन्यकाः।
अप्सरोगणकन्याश्च उपायाः सखितां गताः ॥ २२ ॥
किन्नरियाँ, यक्षकन्याएँ, अनेकानेक दैत्योंकी कुमारियाँ तथा अप्सराओंकी पुत्रियाँ भी उषाकी सखी हो गयी थीं ॥ २२ ॥

उक्ता च तत्र ताभिश्च भर्ता तव वरानने।
भविष्यत्यचिरेणैव देव्या वचनकल्पितः ॥ २३ ॥
उन सबने उषासे कहा—'सुमुखि ! अब तो पार्वती देवीके कथनानुसार शीघ्र ही तुम्हें पतिकी प्राप्ति होगी ॥ २३ ॥

विष्णुपर्व सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ६७३

न हि देव्या वचो मिथ्या भविष्यति कदाचन । रूपाभिजनसम्पन्नः पतिस्ते कल्पितस्तया ॥ २४ ॥

'देवीका वचन कभी मिथ्या नहीं होगा। उन्होंने तुम्हारे लिये मनोहर रूप और उत्तम कुलसे सम्पन्न पतिका निर्माण किया है' ॥ २४ ॥

उषा सखीनां तद् वाक्यं प्रतिपूज्य यथाविधि । दत्तं मनोरथं देव्या भावयन्ती व्यवस्थिता ॥ २५ ॥

'उषा सखियोंके उस कथनका विधिवत् आदर करके देवीके दिये हुए मनोरथका चिन्तन करती हुई खड़ी रही ॥ २५ ॥

ततः क्रीडाविहारं तमनुभूय सहोमया । गतेऽहनि ततः सर्वा नार्यस्ताः परमाद्भुताः ॥ २६ ॥ ययुः स्वानालयान् सर्वा देवी चादर्शनं गता ।

तत्पश्चात् पार्वतीजीके साथ उस क्रीडाविहारके सुखका अनुभव करके दिन व्यतीत होनेपर वे सब परम अद्भुत रूपवाली नारियाँ अपने-अपने घरोंको चली गयीं तथा देवी पार्वती भी अदृश्य हो गयीं ॥ २६१/२ ॥

काश्चिदश्वैस्तथा यानैर्गजैरन्यास्तथा रथैः ॥ २७ ॥ पुरं प्रविविशुर्हृष्टाः काश्चिदाकाशमास्थिताः ।

उनमेंसे कुछ तो घोड़ोंपर, कुछ पालकियोंपर, कुछ हाथियोंपर और कुछ नारियाँ रथोंपर आरूढ़ होकर बड़े हर्षके साथ नगरमे प्रविष्ट हुईं। कुछ अप्सराकोटिक़ी स्त्रियाँ आकाशमार्गसे अभीष्ट स्थानको चली गयीं ॥ २७१/२ ॥

ततः प्रभृति सा देवी काममोहं गता विभो ॥ २८ ॥ देव्यास्तु वचनं स्मृत्वा संस्मरन्ती पतिं तदा । निद्रां न भजते रात्रौ न दिवा भोजनं तथा ॥ २९ ॥

विभो ! तभीसे वह देवी उषा कामजनित मोहके वशीभूत हो गयी। पार्वतीजीके वचनको याद करके पतिका चिन्तन करती हुई उषा उन दिनों न तो रातमें नींद लेती और न दिनमे भोजन करती थी ॥ २८-२९ ॥

स्मरन्ती पतिभावं सा विललाप नृपात्मजा । निन्दन्ती शशिनं नाके सेवते न च चन्दनम् ॥ ३० ॥

वह राजकुमारी पतिभावका स्मरण करती हुई एकान्तमे विलाप किया करती थी। आकाशमे उदित हुए चन्द्रमाकी निन्दा करती और चन्दनका भी सेवन नहीं करती थी (विरहाग्नि बढ़ जानेके कारण उसे चन्द्रमा और चन्दन भी तापदायक प्रतीत होते थे।) ॥ ३० ॥

सा बाला मोहिता राजन् कामेन परिपीडिता । उपचर्यन्ति तां सख्यो विज्वरामपि सज्वराम् ॥ ३१ ॥

राजन् ! कामसे अत्यन्त पीड़ित हुई वह बाला अपनी सुध-बुध खो चुकी थी। यद्यपि उसे ज्वर आदि रोग नहीं लगे थे, तो भी उसे ज्वरग्रस्त मानकर सखियाँ उसके लिये तदनुरूप उपचार करती थीं ॥ ३१ ॥

तप्यते हृदयं तस्या लेपितं चन्दनेन च । कपोल पाण्डिमाच्छिन्नं नेत्रे जलसमन्विते ॥ ३२ ॥

चन्दनसे लिप्त होनेपर भी उसका हृदय तप्त होता रहता था। उसके गुलाबी गालमें सफेदी और पीलेपनका चिह्न प्रकट होने लगा तथा दोनों नेत्र आँसुओंसे भरे रहते थे ॥ ३२ ॥

जृम्भणं च तथा स्वापो देहे तस्या व्यवर्धत । पद्मिनीकन्दचूर्णानि शीतलानि मुहुर्मुहुः ॥ ३३ ॥ क्षिपन्ति सख्यो हृदये पीडिते मन्मथाग्निना । व्यजनानि प्रकुर्वन्ति पृच्छन्ति च पुनः पुनः ॥ ३४ ॥

उसके शरीरमें अँगड़ाई और तन्द्राकी वृद्धि होने लगी। सखियाँ कामाग्निसे पीड़ित हुए उसके वक्षःस्थलपर बारंबार कमलिनीकन्दके शीतल चूर्ण बिखेरा करती थीं। वे बारंबार व्यजन डुलातीं और इस प्रकार पूछती थीं—॥ ३३-३४ ॥

का व्यथा किं शरीरं ते किमिदं तव भामिनि । किं तुभ्यं रोचते देवि तदाचक्ष्वहि वरानने ॥ ३५ ॥

'भामिनि ! तुम्हे कौन-सी व्यथा है ? तुम्हारा शरीर कैसा हो गया ? यह तुम्हें क्या हुआ है ? देवि ! वरानने ! तुम्हे क्या अच्छा लगता है ? यह सब बताओ ॥ ३५ ॥

कस्मादिदं समुत्पन्नं दुःखसाध्यं मनोरमे । त्वन्मनोऽनुगतं वाक्यं वदन्त्येतास्तु सारिकाः ॥ ३६ ॥ शुका नीलतमाः सुभ्रु पठन्ति हि पुमानिव । प्रह्लादजननं वाक्यं किमर्थं नाद्य भाषसे ॥ ३७ ॥

'मनोरमे ! यह दुःसाध्य रोग तुम्हें कहाँसे उत्पन्न हुआ है ? देखो ! ये सारिकाएँ तुम्हारे मनके अनुकूल बोली बोलती है। सुभ्रु ! ये अत्यन्त नीले तोते पुरुषके समान पढ़ रहे हैं। आज तुम इनके प्रति आह्लादजनक वचन क्यों नहीं बोल रही हो ॥ ३६-३७ ॥

तव तातो महावीरो देवानापि दुर्जयः । तस्याग्रे तिष्ठते कोऽपि न भूमौ वरवर्णिनि ॥ ३८ ॥

'वरवर्णिनि ! तुम्हारे पिता महान् वीर हैं, देवताओंके लिये भी दुर्जय है। इस पृथ्वीपर उनके सामने कोई ठहर नहीं सकता ॥ ३८ ॥

बलेः पुत्रो महावीरो वाणो हि दुरतिक्रमः । जितामरावतीकं च नगरं शोणिताह्वयम् । यत्र संतिष्ठते देवः शूलहस्तो महेश्वरः ॥ ३९ ॥

'बलिके पुत्र महावीर वाण सर्वथा दुर्जय हैं। यह शोणितपुर नगर अपने वैभवसे अमरावतीको भी पराजित

म० ह० २२ -

६७४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे


कर चुका है, जहाँ साक्षात् भगवान् महेश्वर हाथमें त्रिशूल धारण किये नित्य निवास करते हैं ॥ ३९ ॥

पुत्रोऽयमिति जानीहि गिरिजां योऽब्रवीद्धरः ।
त्राणं प्रति महादेवस्तव तातमुपे शृणु ॥ ४० ॥

'उषे ! सुनो ! तुम्हारे पिता बाणासुरके लिये महान् देवता भगवान् हरने पार्वती देवीसे कहा था कि 'तुम इसे अपना पुत्र जानो' ॥ ४० ॥

का व्यथा ते मुखे स्वेदो नासाग्रे च विराजते ।
नीहारविन्दवः पद्मे राजन्ते शरदागमे ॥ ४१ ॥

'तुम्हें क्या पीड़ा है ? तुम्हारे मुख और नासाग्र-भागमें पसीनेकी बूँदें सुशोभित हो रही हैं, ठीक उसी तरह जैसे शरत्काल आनेपर कमलके ऊपर ओसके कण शोभा पाते हैं ॥ ४१ ॥

सम्पूर्णचन्द्रप्रतिमं मुखं चन्द्रो यथा घने ।
न शोभते तु विच्छायं किमर्थं कारणं वद ॥ ४२ ।

'पूर्ण चन्द्रमाके समान तुम्हारा मुख आज बादलमं छिपे हुए चन्द्रमाकी भाँति कान्तिहीन दिखायी देनेके कारण शोभा नहीं पा रहा है। ऐसा किस लिये हो रहा है, कारण बताओ ? ॥ ४२ ॥

श्वासान् मुञ्चसि वाले त्वं न रतिं यासि भावतः ।
गृहाण भोजनं दिव्यं यत् ते मनसि वर्तते ॥ ४३ ॥

'बाले ! तुम लंबी साँस छोड़ रही हो, मनसे प्रसन्न नहीं हो रही हो, इसका क्या कारण है ? तुम्हारे मनमें जैसी रुचि हो, उसके अनुकूल दिव्य भोजन ग्रहण करो ॥ ४३ ॥

ताम्बूलं रोचते पूर्वं तत् किमर्थं न गृह्यते ।
मिष्टानि यानि वस्तूनि दुर्लभानीतरैर्जनैः ॥ ४४ ॥
गृहाण देवि उत्तिष्ठ वद पीडां शरीरजाम् ।

'पहले तो तुम्हें पान बहुत अच्छा लगता था, अब उसे ग्रहण क्यों नहीं करती हो ? देवि ! उठो और जो दूसरे लोगोंके लिये दुर्लभ हैं ऐसी मीठी वस्तुएँ ग्रहण करो। बताओ, कैसी पीड़ा हो रही है' ॥ ४४½ ॥

इति कोलाहलं श्रुत्वा उषावेश्मसमुद्भवम् ॥ ४५ ॥
दासीभिः कीर्तितं तत्र मातुरग्रे पृथक् पृथक् ।

उषाके महलमे होनेवाले इस कोलाहलको सुनकर दासियोंने उसकी माताके आगे पृथक्-पृथक् इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ ४५½ ॥

राजपुत्री यदा देवि समायाता गृहे सती ॥ ४६ ॥
जलक्रीडाविहाराच्च मूकेव परिलक्ष्यते ।

'देवि ! सती-साध्वी राजकुमारी उषा जलक्रीड़ा और विहारसे जब घर लौटी हैं, तभीसे मौन-सी दिखायी देती हैं ॥

अतो दासीजना देवि वदामस्त्वां वयं जनाः ॥ ४७ ॥
को मोहः किमिदं मौनं कः स्वापो म्लानता कथम् ।
विचार्य भिषजो देवि दिश्यन्तां कष्टशान्तये ॥ ४८ ॥

'अतः महारानी ! हम दासियाँ आपको यह बात बता रही हैं—राजकुमारीपर यह कैसा मोह छा रहा है? उनका यह मौन किसलिये हैं ? क्या कारण है कि वे निरन्तर सोयी पड़ी रहती हैं ? उनमें म्लानता कैसे आ गयी है ? देवि ! इन सब बातोंपर विचार करके उनके इस कष्टकी शान्तिके लिये वैद्योंको नियुक्त कीजिये ॥ ४७-४८ ॥

शिरीषपुष्पसदृशं यच्छरीरं सुकोमलम् ।
तत् कथं सहते देवि व्याधिभारं वरानने ॥ ४९ ॥

'देवि ! वरानने ! जो शरीर शिरीषपुष्पके समान अत्यन्त कोमल है, वह रोगका भार कैसे सहन करता है'? ॥

इति श्रुत्वा तदा देवी सत्वरा हंसगामिनी ।
प्राप्य देशमुपा यत्र किमिदं कष्टलक्षणम् ॥ ५० ॥

यह सुनकर वे हंसगामिनी देवी उस समय बड़ी उतावलीके साथ उठीं और जहाँ उषा सोयी थी, उस स्थानमें पहुँचकर पूछने लगीं कि 'यह कैसा कष्टदायक लक्षण प्रकट हुआ है' ? ॥

पल्लवाकृतिहस्तेन कोमलं तत्करं तदा ।
स्पृष्ट्वाङ्गुलीरनायासं स्फोटयामास भामिनी ॥ ५१ ॥

उस साध्वी महारानीने अपने पल्लवाकार हाथसे उषाके कोमल हाथका स्पर्श करके अनायास ही उसकी अङ्गुलियोंको चटकाया ५१ ॥

किमस्ति तव कल्याणि का व्यथा तव वर्तते ।
एते वैद्याः समागत्य पृच्छन्ति भवतीं हि तत् ॥ ५२ ॥

फिर उन्होंने पूछा—'कल्याणि ! तुम्हें कैसा कष्ट है ? ये वैद्यलोग आकर तुमसे इस विषयमें जिज्ञासा करते हैं ॥ ५२ ॥

वैद्या ऊचुः

जलक्रीडां गता तत्र राजपुत्री सखीगणैः ।
पार्वत्याः क्रीडितं तत्र जानीमः श्रमसम्भवम् ॥ ५३ ॥

वैद्य बोले—महारानी ! हम जानते हैं, राजकुमारी अपनी सखियोंके साथ जलक्रीड़ाके लिये उस स्थानपर गयी थी, जहाँ पार्वतीदेवीका क्रीडा-विहार चल रहा था । वहाँ जो परिश्रम हुआ, उसीसे यह कष्ट बढ़ गया ॥ ५३ ॥

श्रमाद् ग्लानिः समुत्पन्ना जृम्भणं च पुनः पुनः ।
स्वापश्च जायते तेन मा भयं कर्तुमर्हसि ॥ ५४ ॥

श्रमसे ग्लानि उत्पन्न हुई है, उसीसे बारंबार अँगड़ाई आ रही है तथा परिश्रमके ही कारण सारे अङ्गोंमें शिथिलता आ गयी है, जिससे यह सो रही हैं, अतः आपको इसके लिये भय नहीं करना चाहिये ॥ ५४ ॥

विष्णुपर्व ] अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ६७५ देव्युवाच फूँका जाय ), अभिमन्त्रित जलसे अभिषेक करनेपर इन्हें हृदये निहितं वैद्यश्चन्दनं हिमसंयुक्तम् । बड़ी शान्ति मिलेगी ॥ ५७-५८३ ॥ अमात्याः किमिदं शीघ्रं किमिदं बुद्बुदायते ॥ ५५ ॥ इत्युक्त्वा भिषजः सर्वे निवृत्ता नृपवेश्मतः ॥ ५९ ॥ महारानीने कहा-वैद्यो और मन्त्रियो! राजकुमारीके सूचयन्तः पुनः सर्वे कामाभिप्रायजां व्यथाम् । वक्षःस्थलपर बरफमिला चन्दन रखा गया है, किंतु शीघ्र ही ऐसा कहकर सभी वैद्यराज महलसे लौट गये। जाते-जाते इसमें इस प्रकार बुद्-बुद होने लगा है, मानो यह खौल रहा उन सबने यह भी सूचना दे दी कि सम्भव है यह काम- हो, यह क्या बात है ? ऐसा क्यों हुआ ? ॥ ५५ ॥ जनित वेदना हो ॥ ५९३ ॥ अतिदाहो महान् स्वेदः पिपासा न बुभुक्षते । मातृपृष्टा वरारोहा चिरकालमुवाच सा ॥ ६० ॥ प्रलाप एव किं तस्यां शास्त्रतो ब्रूत निश्चितम् ॥ ५६ ॥ लज्जावती महाभागा मातरं रुदती भृशम् । इसके शरीरमें अत्यन्त दाह हो रहा है, बहुत अधिक मातर्न रोचते नित्यं भाषणं न च भोजनम् ॥ ६१ ॥ पसीने निकलने लगे हैं। इसे प्यास भी बहुत लगती है, परंतु न चाप्युत्सवकं मातः सदाहं हृदयं शृणु । कुछ खानेकी रुचि नहीं होती। यह अधिकाधिक प्रलाप ही इत्युक्त्वा विररामाथ ह्युषा नारी वरानना ॥ ६२ ॥ कर रही है, ये सब लक्षण इसमें क्यों प्रकट हुए हैं? आपलोग तदनन्तर माताने जब बारंबार पूछा, तब सुन्दर अङ्ग- शास्त्रके अनुसार निश्चित करके बताइये ॥ ५६ ॥ वाली उस लज्जाशीला महाभागा उषाने बहुत देरके बाद मातासे वैद्या ऊचुः जोर-जोरसे रोते हुए कहा—'माँ ! सुनो ! न तो मुझे कभी क्रीडाविहारे मिलिताः स्त्रीजना देवसंनिधौ । बोलना अच्छा लगता है और न भोजन करना, कोई उत्सव रूपेणाप्रतिमा देवी राजपुत्री च भाविनी ॥ ५७ ॥ भी नहीं सुहाता है। हृदयमें निरन्तर जलन होती रहती है।' ऐसा दृष्टिपातः कृतस्ताभिस्तेन पुत्त्र्यां व्यथाभवत् । कहकर सुन्दरी नारी उषा चुप हो गयी ॥ ६०-६२ ॥ रक्षामन्त्रैस्तथा पीतैः सर्षपैस्तां कुमारिकाम् ॥ ५८ ॥ सर्वाभिः स्त्रीभिरारब्धमन्योन्यं मुखवीक्षणम् । पानीयैरभिषेकेण परा शान्तिर्भविष्यति । लज्जानुकारि नारीणां यौवनं हि भवेदिति ॥ ६३ ॥ वैद्य बोले-क्रीडा-विहारमें महादेवजीके समीप बहुत-सी इयं च राजकन्या हि भर्तृयोग्या किमुच्यते । स्त्रियाँ एकत्र हुई थीं। हमारी सती-साध्वी राजकुमारी उषा- पितुः प्रसादान्मातुश्च प्राप्नुयात् सदृशं वरम् ॥ ६४ ॥ देवी अनुपम रूपवती हैं। अतः उन सब स्त्रियोंने इनपर दृष्टि- उस समय सभी स्त्रियाँ एक दूसरीका मुख देखने लगीं पात किया है, जिससे इन्हें नजर लग गयी है। इसीसे आपकी और आपसमें कहने लगीं कि युवावस्था नारियोंके लिये प्रायः पुत्रीको यह पीड़ा हुई है। अतः रक्षासम्बन्धी मन्त्रों और लज्जाजनक हुआ करती है। यह राजकन्या भी पतिसमागमक्रे पीली सरसोंसे राजकुमारीकी रक्षा की जाय ( इन्हें झाड़ा- योग्य हो गयी है, अतः इसके लिये और क्या कहा जाय ? यह माता और पिताके प्रसादसे अपने अनुरूप पति प्राप्त करे' ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि बाणयुद्धे उषाविरहो नाम सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बाणासुरके युद्धके प्रसङ्गमें उषाविरहविषयक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११७ ॥ अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः उषाका स्वप्नमें प्रियतमके साथ समागम, इससे उषाकी चिन्ता, सखियोंका उसे समझाना, कुम्भाण्डकुमारीके कहनेसे उषाका चित्रलेखाको बुलाकर उसे अपना कष्ट बताना, चित्रलेखाके बनाये हुए चित्रोंसे उषाका अनिरुद्धको पहचानना और उन्हें लानेके लिये चित्रलेखाका द्वारकाको जाना वैशम्पायन उवाच वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! शोणितपुरमें तत्रस्थाः परमा नार्यश्चित्रेण परमाद्भूताः । निवास करनेवाली परम सुन्दरी स्त्रियाँ चित्र-निर्माण-कलाकी ततो हर्म्ये शयानां तु वैशाखे मासि भामिनीम् ॥ १ ॥ दृष्टिसे बड़ी अद्भुत योग्यतावाली थीं। तदनन्तर वैशाखमास- द्वादश्यां शुक्लपक्षस्य सखीगणवृतां तदा । के शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको, जब सखियोंसे घिरी हुई कश्चित् पुरुषः स्वप्ने रमयामास तां शुभाम् ॥ २ ॥ मानिनी उषा अपनी अट्टालिकामें सो रही थी, उसी समय

६७६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


स्वप्नावस्था में पार्वतीजीके बताये अनुसार एक पुरुषने आकर उस शुभलक्षणा असुरराजकुमारीके साथ रमण किया ॥ १-२॥

विचेष्टमाना रुदती देव्या वचनचोदिता।
सा स्वप्ने रमिता तेन स्त्रीभावं चापि लम्भिता ॥ ३ ॥

यद्यपि वह रो-रोकर उस पुरुषके स्पर्शसे बचनेकी विशेष चेष्टा करती रही, परंतु पार्वती देवीके वचनसे प्रेरित थी, इस कारण उसके साथ स्वप्नमें उस पुरुषने बलपूर्वक रमण किया और उसे अपनी स्त्री बना लिया ॥ ३ ॥

शोणिताक्ता प्ररुदती सहसैवोत्थिता निशि।
तां तथा रुदतीं दृष्ट्वा सखी भयसमन्विता ॥ ४ ॥
चित्रलेखा वचः स्निग्धमुवाच परमाद्भुतम्।

उस समय उस राजकन्याकी योनि रक्तसे भीग गयी। वह रातमें सहसा रोती हुई उठ बैठी। उसे इस प्रकार रोती देख उसकी सखी चित्रलेखा भयभीत हो परम अद्भुत स्निग्ध वाणीमें बोली—॥ ४ १/२ ॥

उषे मा भैः किमेवं त्वं रुदती परितप्यसे।
बलेः सुतसुता च त्वं प्रख्याता किं भयानन्विता ॥ ५ ॥

‘उषे ! भयभीत न होओ। तुम क्यों इस प्रकार रोती और संतप्त होती हो ? तुम तो महाराज बलिके पुत्रकी पुत्री हो, अपनी निर्भीकताके लिये विख्यात हो, फिर भी क्यों भयभीत होती हो ? ॥ ५ ॥

न भयं विद्यते लोके तव सुभ्रू विशेषतः।
अभयं तव वामोरु पिता देवान्तको रणे ॥ ६ ॥

‘सुभ्रु ! हम सबके लिये विशेषतः तुम्हारे लिये तो संसारमें भय है ही नहीं। वामोरु ! तुम्हें किसीसे भय नहीं है। तुम्हारे पिता बाण समराङ्गणमें देवताओंके भी काल हैं ॥

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते विषादं मा कृथाः शुभे।
नैवंविधेषु वासेषु भयमस्ति वरानने ॥ ७ ॥

‘शुभे ! उठो, उठो, तुम्हारा कल्याण हो, तुम विषाद न करो। वरानने ! ऐसे निवासस्थानोंमें भय नहीं होता है ॥

असकृद् देवसहितः शचीभर्ता सुरेश्वरः।
अप्राप्त एव नगरं पित्रा ते मृदितो रणे ॥ ८ ॥

‘देवताओंके स्वामी शचीपति इन्द्रने देवताओंकी सेना साथ लेकर अनेक बार आक्रमण किया, परंतु इस नगरतक वे पहुँचने भी नहीं पाये कि तुम्हारे पिताने रणभूमिमें उन्हे रौंद डाला ॥ ८ ॥

अयं देवसमूहस्य भयदश्च पिता तव।
महासुरवरः श्रीमान् बलेः पुत्रो महाबलः ॥ ९ ॥

‘तुम्हारे ये पिता देवसमुदायको भय देनेवाले हैं, महान् असुरोंमें श्रेष्ठ हैं तथा राजा बलिके महाबली एवं कान्तिमान् पुत्र हैं’ ॥ ९ ॥

एवं साभिहिता सख्या बाणपुत्री यशस्विनी।
स्वप्ने रूपं यथा दृष्टं न्यवेदयदनिन्दिता ॥ १० ॥

सखीके ऐसा कहनेपर निन्दारहित यशस्विनी बाणपुत्री उषाने स्वप्नमें जैसा रूप देखा था, वह सब उससे निवेदन किया॥

उषोवाच

एवं संधर्षिता साध्वी कथं जीवितुमुत्सहे।
पितरं किं नु वक्ष्यामि देवशत्रुमरिंदमम् ॥ ११॥

फिर उषा बोली—मैं सती-साध्वी कुमारी थी, जब इस प्रकार मेरा सतीत्व नष्ट कर दिया गया, तब मैं कैसे जीवित रह सकती हूँ। शत्रुओंका दमन करनेवाले अपने देववैरी पितासे क्या कहूँगी ? ॥ ११ ॥

एवं संदूषणकरी वंशस्यास्य महौजसः।
श्रेयो हि मरणं मह्यं न मे श्रेयोऽथ जीवितम् ॥ १२ ॥

इस महातेजस्वी कुलको मैं इस तरह कलङ्कित करनेवाली हूँ। मेरा मर जाना ही अच्छा है। अब जीवित रहना मेरे लिये श्रेयस्कर नहीं है ॥ १२ ॥

ईप्सितो वा यथा कोऽपि पुरुषोऽधिगतो हि मे।
जाग्रतीव यथा चाहमवस्थैवं कृता मम ॥ १३ ॥

मुझे स्वप्नमें ऐसा कोई पुरुष प्राप्त हुआ था, जिसे मानो मैं बहुत चाहती थी—वह मुझे अभीष्ट था। उसने स्वप्नमें भी जाग्रत्-अवस्थाकी भाँति मेरी ऐसी दशा कर डाली है ॥ १३ ॥

निशायां जाग्रतीवाहं नीता केन दशामिमाम्।
कथमेवं कृता नाम कन्या जीवितुमुत्सहे ॥ १४ ॥

रातमें जागती हुई-सी मुझे किसने इस अवस्थाको पहुँचा दिया ? जब कन्या होकर भी मेरी ऐसी दशा कर दी गयी, तब मैं कैसे जीवित रह सकती हूँ ? ॥ १४ ॥

कुलोपक्रोशनकरी कुलाङ्गारी निराश्रया।
जीवितुं न स्पृहेन्नारी साध्वीनामग्रतः स्थिता ॥ १५ ॥

जो नारी कभी सती-साध्वी स्त्रियोंमें आगे रही हो, वह यदि कुलकलङ्किनी, कुलाङ्गारी और निराश्रया हो जाय तो उसे जीवनकी इच्छा नहीं रखनी चाहिये ॥ १५ ॥

इत्येवं वाष्पपूर्णाक्षी सखीजनवृता तदा।
विललाप चिरं कालमुषा कमललोचना ॥ १६ ॥

इस प्रकार सखियोंसे घिरी हुई कमललोचना उषा उस समय नेत्रोंमें आँसू भरकर बहुत देरतक विलाप करती रही ॥

अनाथवत् तां रुदतीं सख्यः सर्वा विचेतसः।
ऊचुश्चाश्रुपरीताक्षीमुषां सर्वाः समागताः ॥ १७ ॥

उसे अश्रुपूर्ण नेत्रोंसे अनाथकी भाँति रोती देख सारी सखियाँ घबरायी हुई-सी वहाँ आ गयीं और इस प्रकार कहने लगीं—॥ १७ ॥

विष्णुपर्व ] अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ६७७


दुष्टेन मनसा देवि शुभं वा यदि वाशुभम् ।
क्रियते न च ते सुभ्रु किंचिद् दुष्टं मनः शुभे ॥ १८ ॥

'देवि ! दुष्ट हृदयसे यदि शुभ या अशुभ कर्म किया जाता है तो उसका कोई अनिष्टकारी फल होता है, परंतु सुभ्रु ! शुभे ! तुम्हारे मनमें तो कभी कोई दोष आया नहीं ॥ १८ ॥

प्रसह्य दैवसंयोगाद् यदि भुक्तासि भामिनि ।
स्वप्नयोगेन कल्याणि व्रतलोपो न विद्यते ॥ १९ ॥

'भामिनि ! कल्याणि ! यदि दैव-संयोगसे स्वप्नमें किसी पुरुषने बलात्कारपूर्वक तुम्हारा उपभोग कर लिया है तो इससे तुम्हारे कौमार-व्रतका लोप नहीं हुआ है ॥ १९ ॥

व्यभिचारेण ते देवि नास्ति कश्चिद् व्यतिक्रमः ।
न च स्वप्नकृतो दोषो मर्त्यलोकेऽस्ति सुन्दरि ॥ २० ॥

'देवि ! तुम्हारे इस व्यभिचारसे कोई अपराध नहीं बना है। सुन्दरि ! मर्त्यलोकमे स्वप्नावस्थामे किये गये किसी अशुभ कर्मका दोष नहीं लगता है ॥ २० ॥

एवं विप्रर्षयो देवि धर्मज्ञाः कथयन्ति वै।
मनसा चैव वाचा च कर्मणा च विशेषतः ।
दुष्टा या त्रिभिरेतैस्तु पापा सा प्रोच्यते बुधैः ॥ २१ ॥

'देवि ! धर्मज्ञ ब्रह्मर्षि प्रायः ऐसा ही कहते हैं । जो नारी मन, वाणी तथा विशेषतः क्रिया—इन तीनोंसे दूषित है, उसीको विद्वान् पुरुष 'पापिनी' कहते हैं ॥ २१ ॥

न च ते दृश्यते भीरु मनः प्रचलितं सदा ।
कथं त्वं दोषसंदुष्टा नियता ब्रह्मचारिणी ॥ २२ ॥

'भीरु ! तुम्हारा मन तो सदा ही स्थिर है, वह कभी चञ्चल होता नहीं देखा जाता है। तुम नियमपूर्वक ब्रह्मचर्य-पालनमें तत्पर रहकर भी दोषोंसे दूषित कैसे हो सकती हो ॥

यदि सुप्ता सती साध्वी शुद्धभावा मनस्विनी ।
इमामवस्थां प्राप्ता त्वं नैव धर्मो विलुप्यते ॥ २३ ॥

'तुम्हारा भाव शुद्ध है, तुम मनको वशमें रखनेवाली हो, सती-साध्वी हो । फिर भी यदि सुप्तावस्थामें तुम इस दशाको पहुँच गयी तो इससे तुम्हारे धर्मका लोप नहीं होता है ॥ २३ ॥

यस्या दुष्टं मनः पूर्वं कर्मणा चोपपादितम् ।
तामाहुरसती नाम सती त्वमसि भामिनि ॥ २४ ॥

'जिस स्त्रीका पहले मन दूषित होता है, फिर वह क्रिया-द्वारा दोषका सम्पादन करती है, उसीको असती (कुलटा) कहते हैं; भामिनि ! तुम तो सती हो ॥ २४ ॥

कुलजा रूपसम्पन्ना नियता ब्रह्मचारिणी ।
इमामवस्थां नीतासि कालो हि दुरतिक्रमः ॥ २५ ॥

'तुम उत्तम कुलमें उत्पन्न, मनोहर रूपसे सम्पन्न, संतोष आदि नियमोंका पालन करनेवाली तथा ब्रह्मचारिणी होकर भी इस दशाको पहुँचा दी गयीं; यह देखकर यही कहना पड़ता है कि काल दुर्लङ्घ्य है (वह जिसको जिस अवस्थामें चाहे डाल सकता है)' ॥ २५ ॥

इत्येवमुक्तां रुदतीं बाष्पेणावृतलोचनाम् ।
कुम्भाण्डदुहिता वाक्यं परं त्विदमब्रवीत् ॥ २६ ॥

सखियोंके ऐसा कहनेपर भी उषा रोती ही रही। उसके नेत्र आँसुओंसे भरे ही रहे। तब कुम्भाण्डकी पुत्री चित्रलेखा-ने यह उत्तम बात कही— ॥ २६ ॥

त्यज शोकं विशालाक्षि अपापा त्वं वरानने ।
श्रुतं मे यदिदं वाक्यं याथातथ्येन तच्छृणु ॥ २७ ॥

'विशाललोचने ! यह शोक छोड़ो। वरानने ! तुम सर्वथा पापरहित हो। मैंने जो यह बात सुन रखी है, उसे यथार्थ-रूपसे बताती हूँ, सुनो ॥ २७ ॥

उषे यदुक्ता देव्यासि भर्तारं ध्यायती तदा ।
समीपे देवदेवस्य स्मर भामिनि तद् वचः ॥ २८ ॥

'उषे ! भामिनि ! देवाधिदेव महादेवजीके समीप उस दिन जब तुम पतिका चिन्तन कर रही थीं, उस समय देवी पार्वतींने तुमसे जो बात कही थी, उसे याद करो ॥ २८ ॥

द्वादश्यां शुक्लपक्षस्य वैशाखे मासि यो निशि ।
हर्म्ये शयानां रुदतीं स्त्रीत्वं समुपनेष्यति ॥ २९ ॥
भविता स हि ते भर्ता शूरः शत्रुनिबर्हणः ।

'वैशाख मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिको रात्रिके समय अट्टालिकापर सोयी हुई तुझे तेरे रोते रहनेपर भी जो पुरुष स्वप्नमें अपनी स्त्री बना लेगा, वह शत्रुसूदन शूरवीर पुरुष ही तेरा पति होगा ॥ २९½ ॥

इत्युवाच वचो हृष्टा देवी तव मनोगतम् ॥ ३० ॥
न हि तद् वचनं मिथ्या पार्वत्या यदुदाहृतम् ।
सा त्वं किमिदमत्यर्थं रोदिषीन्दुनिभानने ॥ ३१ ॥

'हर्षमें भरी हुई पार्वती देवीने यह तुम्हारे मनके अनुरूप बात कही थी। पार्वतीजीने जो कह दिया, वह वचन कभी मिथ्या नहीं हो सकता। अतः चन्द्रमुखि ! तुम इस घटनाके लिये यह अत्यन्त रोदन क्यों कर रही हो?' ॥ ३०-३१ ॥

एवमुक्ता तया बाला स्मृत्वा देवीवचस्ततः ।
अभवन्नष्टशोका सा बाणपुत्री शुभेक्षणा ॥ ३२ ॥

चित्रलेखाके ऐसा कहनेपर पार्वती देवीके वचनका स्मरण करके वह असुरबाला शुभलोचना बाणपुत्री उषा शोकरहित हो गयी ॥ ३२ ॥

६७८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

उषोवाच स्मरामि भामिनि वचो देव्याः क्रीडागते भवे ।
यथोक्तं सर्वमखिलं प्राप्तं हर्म्यतले मया ॥ ३३ ॥

उषा बोली—भामिनि ! जब महादेवजी क्रीडामें तत्पर थे, उस समय देवी पार्वतीजीने जो बात कही थी, वह मुझे याद आ रही है। उन्होंने जो कुछ कहा था, वह सब पूर्णरूपसे इस अट्टालिकाके भीतर मैंने अनुभव किया है ॥

भर्ता तु मम यश्चैष लोकनाथस्य भार्यया ।
व्यादिष्टः स कथं ज्ञेयस्तत्र कार्ये विधीयताम् ॥ ३४ ॥

यदि भगवान् विश्वनाथकी भार्या पार्वती देवीने इसी पुरुषको मुझे पतिरूपमें प्रदान किया है तो उसका पता कैसे लगेगा ? इसके लिये कोई उपाय करो ॥ ३४ ॥

इत्येवमुक्ते वचने कुम्भाण्डदुहिता पुनः।
व्याजहार यथान्यायमर्थतत्त्वविशारदा ॥ ३५ ॥

उषाके ऐसा कहनेपर अर्थतत्त्वके ज्ञानमें कुशल कुम्भाण्ड-कुमारी चित्रलेखाने पुनः यह न्यायोचित बात कही—॥

न हि तस्य कुलं देवि न कीर्ति नापि पौरुषम् ।
कश्चिज्जानाति तत्त्वेन किमिदं त्वं विमुह्यसे ॥ ३६ ॥

'देवि ! उस पुरुषका न तो कोई कुल जानता है, न उसकी कीर्ति और पुरुषार्थका ही किसीको ठीक-ठीक पता है; फिर इस विषयको लेकर तुम क्यों मोहित हो रही हो ॥३६॥

अदृष्टाश्रुतश्चैव दृष्टः स्वप्ने च यः शुभे ।
कथं ज्ञेयो भवेद् भीरु सोऽस्माभी रतिस्करः ॥ ३७ ॥

'शुभे ! भीरु ! जिसको तुमने सपनेमें देखा है, उसे दूसरे किसीने न तो कभी देखा है और न उसके विषयमें कुछ सुना ही है, फिर हम तुम्हारे उस रति तस्करका पता कैसे लगा सकती हैं ? ॥ ३७ ॥

येन त्वमसितापाङ्गि मत्तकाशिनि विक्रमात् ।
रुदती प्रसभं भुक्ता प्रविश्यान्तःपुरं सखि ॥ ३८ ॥
न ह्यसौ प्राकृतः कश्चिद् यः प्रविष्टः प्रसह्य ते ।
नगरं लोकविख्यातमेकः शत्रुनिबर्हणः ॥ ३९ ॥

'मतवाली सी प्रतीत होनेवाली और कजरारे नेत्रोंवाली सखि ! जिसने अन्तःपुरमें घुसकर तुम्हारे रोते रहनेपर भी बलपूर्वक तुम्हारा उपभोग किया है, वह कोई साधारण मनुष्य नहीं है। जो तुम्हारे इस लोकविख्यात नगरमें बलपूर्वक अकेला ही घुस आया, वह कोई शत्रुमर्दन शूरवीर ही हो सकता है ॥ ३८-३९ ॥

आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च महौजसौ ।
न शक्ताः शोणितपुरं प्रवेष्टुं भीमविक्रमाः ॥ ४० ॥

'बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दोनों महाबली अश्विनीकुमार—ये भयानक पराक्रमी देवता भी शोणितपुरमें प्रवेश नहीं कर सकते ॥ ४० ॥

सोऽयमेतैः शतगुणैर्विशिष्टश्चारिसूदनः ।
प्रविष्टः शोणितपुरं बाणमाक्रम्य मूर्धनि ॥ ४१ ॥

'उपर्युक्त देवता यदि सौगुने होकर आ जायँ तो उनसे विशिष्ट यह शत्रुसूदन वीर होगा, जिसने बाणासुरके मस्तकपर पैर रखकर शोणितपुरमें प्रवेश किया है ॥ ४१ ॥

यस्या नैवंविधो भर्ता भवेद् युद्धविशारदः ।
कस्तस्या जीवितेनार्थो भोगैर्वास्त्यम्बुजेक्षणे ॥ ४२ ॥

'कमललोचने ! जिस नारीका पति ऐसा युद्धविशारद वीर न हो, उसके जीवन अथवा भोगोंसे क्या लाभ ? ॥४२॥

धन्यास्यनुगृहीतासि यस्यास्ते पतिरीदृशः ।
प्राप्तो देव्याः प्रसादेन कन्दर्पसमविक्रमः ॥ ४३ ॥

'तुम धन्य हो, तुमपर देवीका महान् अनुग्रह है; क्योंकि तुम्हें पार्वती देवीके प्रसादसे ऐसा कामदेव-तुल्य पराक्रमी पति प्राप्त हुआ है ॥ ४३ ॥

इदं तु यत् कार्यतमं शृणु त्वं तन्मयेरितम् ।
विज्ञेयो यस्य पुत्रो वै यन्नामा यत्कुलश्च सः ॥ ४४ ॥

'इस समय जो यह सबसे महान् कार्य है, वह मेरे मुखसे सुनो । पहले तुम्हें इस बातको जान लेना चाहिये कि वह किसका पुत्र है ? उसका क्या नाम है ? और वह किस कुलमें उत्पन्न हुआ है ?' ॥ ४४ ॥

इत्येवमुक्ते वचने तत्रोषा काममोहिता ।
उवाच कुम्भाण्डसुतां कथं ज्ञास्याम्यहं सखि ॥ ४५ ॥

उसके ऐसा कहनेपर वहाँ काममोहित उषा कुम्भाण्ड-कुमारीसे बोली—'सखि ! यह सब मैं कैसे जानूँगी ॥ ४५ ॥

त्वमेव चिन्तय सखि नोत्तरं प्रतिभाति मे ।
स्वकार्ये मुह्यते लोको यथा जीवं लभाम्यहम् ॥ ४६ ॥

'सखि ! तुम्हीं कोई उपाय सोचो, मुझे तो कोई उत्तर नहीं सूझता । अपने कार्यमें प्रायः सब लोग मोहित हो जाते हैं। अतः तुम्हीं कोई ऐसा उपाय करो, जिससे मुझे नूतन जीवन प्राप्त हो' ॥ ४६ ॥

उषाया वचनं श्रुत्वा रामा वाक्यमिदं पुनः ।
उवाच रुदतीं चोपां कुम्भाण्डदुहिता सखी ॥ ४७ ॥

उषाकी यह बात सुनकर उसकी सखी कुम्भाण्डकुमारी रामा (जो चित्रलेखा अप्सराके अंशसे उत्पन्न होनेके कारण चित्रलेखा भी कही जाती थी) रोती हुई उषासे पुनः इस प्रकार बोली—॥ ४७ ॥

कुशला ते विशालाक्षि सर्वथा संधिविग्रहे ।
अप्सरा चित्रलेखा वै क्षिप्रं विज्ञाप्यतां सखि ॥ ४८ ॥

[विष्णुपूर्व] अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ६७९


'विशाल नेत्रोंवाली सखि ! तुम यह बात शीघ्र ही चित्रलेखा अप्सराको सूचित कर दो; वह तुम्हारे संधि-विग्रह (मन्त्रणा देने) के कार्यमें सर्वथा कुशल है ॥ ४८ ॥

अस्याः सर्वमशेषेण त्रैलोक्यं विदितं सदा ।
एवमुक्ता तदैवोषा हर्षेणागतविस्मया ॥ ४९ ॥

'उसे समस्त त्रिलोकीकी सारी बातें सदा ज्ञात रहती हैं।' उसके ऐसा कहनेपर उषाको तत्काल बड़ा हर्ष और विस्मय हुआ ॥ ४९ ॥

तामप्सरसमानाय्य चित्रलेखां सखीं प्रियाम् ।
कृताञ्जलिपुटा दीना उषा वचनमब्रवीत् ॥ ५० ॥

उसने अपनी प्यारी सखी चित्रलेखा नामक अप्सराको बुलवाकर दोनों हाथ जोड़ दीनभावसे अपना हार्दिक दुःख निवेदन किया ॥ ५० ॥

सा तच्छ्रुत्वा तु वचनमुषायाः परिकीर्तितम् ।
आश्वासयामास सखी बाणपुत्रीं यशस्विनीम् ॥ ५१ ॥

उषाकी कही हुई बात सुनकर सखी चित्रलेखाने उस यशस्विनी बाणपुत्रीको आश्वासन दिया ॥ ५१ ॥

ततः सा विस्मयाविष्टा वचनं प्राह दुर्वचम् ।
चित्रलेखामप्सरसं प्रणयात् तां सखीमिदम् ॥ ५२ ॥

तब आश्चर्यचकित हुई उषाने अपनी सखी चित्रलेखा नामक अप्सराको सम्बोधित करके बड़े प्यारसे यह कठिनाईसे कहनेयोग्य बात कही—॥ ५२ ॥

परमं शृणु मे वाक्यं यत्त्वां वक्ष्यामि भामिनि ।
भर्तारं यदि मेऽद्य त्वं नानयिष्यसि मत्प्रियम् ॥ ५३ ॥
कान्तं पद्मपलाशाक्षं मत्तमातङ्गगामिनम् ।
त्यक्ष्याम्यहं ततः प्राणानचिरात् तनुमध्यमे ॥ ५४ ॥

'भामिनि ! मैं तुमसे जो उत्तम बात कहती हूँ, उसे सुनो। मेरे प्रियतम पति बड़े ही कमनीय हैं, उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान सुन्दर हैं, वे मतवाले हाथीके समान मन्दगतिसे चलते हैं, पतली कमरवाली सखि ! यदि तुम आज मेरे उन प्राणनाथको यहाँ नहीं ले आओगी तो मैं शीघ्र ही अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगी' ॥ ५३-५४ ॥

चित्रलेखाब्रवीद् वाक्यमुषां हर्षयती शनैः ।
नैषोऽर्थः शक्यतेऽस्माभिर्वेत्तुं भामिनि सुव्रते ॥ ५५ ॥

यह सुनकर चित्रलेखा उषाका हर्ष बढ़ाती हुई धीरे-धीरे यों बोली—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाली भामिनि ! तुम्हारे इस मनोरथको मैं किसी तरह जान नहीं सकती हूँ ॥

न कुलेन न वर्णेन न शीलेन न रूपतः ।
न देशाच्च विश्रुतः स हि चारो मया सखि ॥ ५६ ॥

सखि ! तुम्हारे उस चित्तचोरका कुल, वर्ण, शील, रूप और देश कुछ भी तो मुझे ज्ञात नहीं है ॥ ५६ ॥

किं तु कर्तुं यथा शक्यं बुद्धिपूर्वं मया सखि ।
प्राप्तं च शृणु मे वाक्यं यथा काममवाप्स्यसि ॥ ५७ ॥

'सखि ! फिर भी मैं बुद्धिपूर्वक जैसा जो कुछ कर सकती हूँ, करूँगी; इस समय जो कर्तव्य प्राप्त है, उसके विषयमें मेरी बात सुनो, जिससे तुम अपना मनोरथ पा लोगी ॥

देवदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
ये विशिष्टाः प्रभावेण रूपेणाभिजनेन च ॥ ५८ ॥
यथाप्रभावं तान् सर्वानलिखिष्याम्यहं सखि ।
मनुष्यलोके ये चापि प्रवरा लोकविश्रुताः ॥ ५९ ॥

'देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षस—इनमें जो-जो प्रभाव, रूप और कुलकी दृष्टिसे बढ़े-चढ़े हैं, उन सबका उनके प्रभावके अनुसार ही मैं चित्र बनाऊँगी। सखि ! मनुष्य-लोकमें भी जो विश्वविख्यात श्रेष्ठ पुरुष हैं, उनका भी चित्र अङ्कित करूँगी ॥ ५८-५९ ॥

सप्तरात्रेण ते भीरु दर्शयिष्यामि तानहम् ।
ततो विज्ञाय पादस्थं भर्तारं प्रतिपत्स्यसे ॥ ६० ॥

'भीरु ! सात रातमें उन सबके चित्र बनाकर मैं तुम्हें उन सबका दर्शन कराऊँगी । तदनन्तर पहचान लेनेपर तुम मनोनीत पतिको अपने पैरोंपर पड़ा हुआ पाओगी' ॥ ६० ॥

सा चित्रलेखया प्रोक्ता उषा हितचिकीर्षया ।
क्रियतामेवमित्याह चित्रलेखां सखीं प्रियाम् ॥ ६१ ॥

चित्रलेखाने हित-साधन करनेकी इच्छासे जब पूर्वोक्त बात कही, तब उषा अपनी प्यारी सखी चित्रलेखासे बोली, 'अच्छा, ऐसा ही करो' ॥ ६१ ॥

ततः कुशलहस्तत्वाद् यथालेख्यं समन्ततः ।
इत्युक्त्वा सप्तरात्रेण कृत्वा लेख्यगतांस्तु तान् ॥ ६२ ॥
चित्रपट्टगतान् मुख्यानानयामास शोभना ।

तब 'तथास्तु' कहकर चित्रलेखाने सब ओरसे यथायोग्य चित्र तैयार किये; क्योंकि इस कलामें उसके हाथ सधे हुए थे । उसने सात रातोंमें सब प्रमुख पुरुषोंके चित्र अङ्कित कर लिये । फिर वह सुन्दरी चित्रपट्टमें स्थापित हुए उन सब लोगोंको वहाँ ले आयी ॥ ६२½ ॥

ततः प्रास्तीर्य पट्टं सा चित्रलेखा स्वयंकृतम् ॥ ६३ ॥
उषायै दर्शयामास सखीनां तु विशेषतः ।

तदनन्तर चित्रलेखाने अपने बनाये हुए उस चित्रपट्टको फैलाकर उषाको तथा विशेषतः उसकी सब सखियोंको भी दिखाया ॥ ६३½ ॥

एते देवेषु ये मुख्यास्तथा दानववंशजाः ॥ ६४ ॥
किन्नरोरगयक्षाणां राक्षसानां समन्ततः ।
गन्धर्वासुरदैत्यानां ये चान्ये भोगिनः स्मृताः ॥ ६५ ॥

६८०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

वह बोली—'ये देवताओंमें जो मुख्य-मुख्य पुरुष हैं, उनके चित्र हैं तथा इस ओर दानववंशी वीर अङ्कित किये गये हैं। इनके चारों ओर किन्नर, नाग, यक्ष और राक्षसोंके चित्र हैं; गन्धर्व, असुर, दैत्य तथा अन्यान्य सर्पोंके भी चित्र हैं ॥ ६४-६५ ॥

मनुष्याणां च सर्वेषां ये विशिष्टतमा नराः।
तानेतान् पश्य सर्वांस्त्वं यथैव लिखितान् मया ॥ ६६ ॥

'समस्त मनुष्योंमें जो विशिष्टतम पुरुष हैं, वे इधर हैं। इन सबको जैसा मैंने अङ्कित किया है, देखो ॥ ६६ ॥

यस्ते भर्ता यथारूपः स मया लिखितः सखि।
तं त्वं प्रत्यभिज्ञानीहि स्वप्ने यं दृष्टवत्यसि ॥ ६७ ॥

'सखि ! जो तुम्हारा पति है और उसका जैसा रूप है, वह सब मैंने अङ्कित किया है। तुमने स्वप्नमें जिसे देखा है, उसे इस चित्रपट्टमे पहचानो' ॥ ६७ ॥

ततः क्रमेण सर्वांस्तान् दृष्ट्वा सा मत्तकाशिनी।
देवदानवगन्धर्वविद्याधरगणानथ ॥
अतीत्य च यदून् सर्वान् ददर्श यदुनन्दनम् ॥ ६८ ॥

तब मतवाली सी प्रतीत होनेवाली उषाने क्रमशः उन सबको देखकर देवता, दानव, गन्धर्व और विद्याधरगणोंको लाँघकर समस्त यदुवंशियों तथा यदुनन्दन श्रीकृष्णको देखा ॥

तत्रानिरुद्धं दृष्ट्वा सा विस्मयोत्फुल्ललोचना।
उवाच चित्रलेखां तामयं चौरः स वै सखि ॥ ६९ ॥
येनाहं दूषिता पूर्वं स्वप्ने हर्म्यगता सती।
सोऽयं विज्ञातरूपो मे कुतोऽयं रतितस्करः ॥ ७० ॥

वहीं अनिरुद्धका चित्र देखकर उसके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे और वह चित्रलेखासे बोली—'सखि ! यही वह चोर है, जिसने अट्टालिकापर सोते समय पहले स्वप्नमें आकर मुझे दूषित किया था। इसके रूपको तो मैं खूब पहचानती हूँ, परंतु यह रतिचोर कहाँसे आया था, यह नहीं जान सकी ॥

चित्रलेखे वदस्वैनं तत्त्वतो मम शोभने।
कुलशीलाभिजनतो नाम किं चास्य भामिनि।
ततः पश्चाद् विधास्यामि कार्यस्यास्य विनिश्चयम् ॥ ७१ ॥

'शोभने ! चित्रलेखे ! मुझे इसका ठीक-ठीक परिचय दो। भामिनि ! इन चोर महोदयका कुल, शील, अभिजन और नाम क्या है ? यह सब जान लेनेके पश्चात् मैं अपने इस कर्तव्यका निश्चय करूँगी' ॥ ७१ ॥

चित्रलेखोवाच
अयं त्रैलोक्यनाथस्य नप्ता कृष्णस्य धीमतः।
भर्ता तव विशालाक्षि प्रद्युम्निर्भिमविक्रमः ॥ ७२ ॥

चित्रलेखा बोली—'विशाललोचने ! ये तुम्हारे पति साक्षात् त्रिलोकीनाथ बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णके पोते हैं और प्रद्युम्नके पुत्र हैं। इनका पराक्रम बड़ा भयङ्कर है ॥ ७२ ॥

न ह्यस्ति त्रिषु लोकेषु सदृशोऽस्य पराक्रमे।
उत्पाट्य पर्वतानेष पर्वतैरेव शातयेत् ॥ ७३ ॥

पराक्रममें इनकी समानता करनेवाला तीनों लोकोंमें कोई नहीं है। ये पर्वतोंको ही उखाड़कर उन पर्वतोंद्वारा ही शत्रुओंका संहार कर सकते हैं ॥ ७३ ॥

धन्यास्यनुगृहीतासि यस्यास्ते यदुपुङ्गवः।
त्र्यक्षपत्न्या समादिष्टः सदृशः सज्जनः पतिः ॥ ७४ ॥

तुम धन्य हो, तुमपर देवीका बड़ा अनुग्रह है, जिससे तुम्हारे लिये पार्वतीजीने परमयोग्य यदुकुलतिलक अनिरुद्धको पतिरूपमें प्रदान किया है। इनके पूर्वज श्रेष्ठतम पुरुष हैं॥

उपोवाच
त्वमेवात्र विशालाक्षि योग्या भव वरानने।
न शक्या हि गतिश्चान्या अगंत्या मे गतिर्भव ॥ ७५ ॥

उषा बोली--वरानने ! विशाललोचने ! तुम ही इस कार्यको करने योग्य हो। मुझे तुम्हारे सिवा दूसरा कोई सहारा नहीं मिल सकता। तुम मुझ अशरणको शरण देनेवाली बनो ॥

अन्तरिक्षचरा च त्वं योगिनी कामरूपिणी।
उपायस्यास्य कुशला क्षिप्रमानय मे प्रियम् ॥ ७६ ॥

तुम आकाशमें विचरनेवाली और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली योगिनी हो, इस उपायके ज्ञानमें भी कुशल हो, अतः मेरे प्रियतमको शीघ्र ले आओ ॥ ७६ ॥

उपायश्चिन्त्यतां भीरु सम्प्रतर्क्य प्रिये सुखम्।
सिद्धार्था संनिवर्तेस्व येनोपायेन सुन्दरि ॥ ७७ ॥

भीरु ! सुन्दरी ! मुझे प्रियसङ्गमका सुख कैसे मिले, इसपर भलीभाँति तर्क-वितर्क करके कोई ऐसा उपाय सोचो, जिससे सफलमनोरथ होकर लौटो ॥ ७७ ॥

भवेदापत्सु यन्मित्रं तन्मित्रं शस्यते बुधैः।
कामार्ता चास्मि सुश्रोणि भव मे प्राणधारिणी ॥ ७८ ॥

जो आपत्तिकालमे मित्र हो, उसी मित्रकी विद्वान् पुरुष प्रशंसा करते है। सुश्रोणि ! मैं कामसे पीड़ित हो रही हूँ, तुम मेरे प्राणोंकी रक्षा करनेवाली बनो ॥ ७८ ॥

यद्येनं मे विशालाक्षि भर्तारममरोपमम्।
अद्य नानयसि क्षिप्रं प्राणांस्त्यक्ष्याम्यहं शुभे ॥ ७९ ॥

शुभे ! विशाललोचने ! यदि तुम मेरे इन देवोपम पतिको आज यहाँ नहीं ले आओगी तो मैं शीघ्र ही अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगी ॥ ७९ ॥

उषाया वचनं श्रुत्वा चित्रलेखाब्रवीद् वचः।
श्रोतुमर्हसि कल्याणि वचनं मे शुचिस्मिते ॥ ८० ॥

विष्णुपर्व ] अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ६८१


उषाकी यह बात सुनकर चित्रलेखा बोली--'कल्याणि ! पवित्र मुसकानवालीुषे ! पहले मेरी बात तो सुनो। ॥८०॥

यथा बाणस्य नगरी रक्ष्यते देवि सर्वशः।
द्वारकापि तथा भीरु दुराधर्षा सुरैरपि ॥ ८१ ॥

'देवि ! जैसे बाणासुरकी नगरी सब ओरसे सुरक्षित है, भीरु ! उसी प्रकार द्वारकापुरी भी है। देवता भी उसका पराभव नहीं कर सकते ॥ ८१ ॥

अयस्मयप्रतीच्छन्ना गुप्तद्वारा च सा पुरी।
गुप्ता वृष्णिकुमारैश्च तथा द्वारकवासिभिः ॥ ८२ ॥

'वह लोहेके किवाड़ोंसे ढकी हुई है। उस पुरीका प्रवेश-द्वार पूर्णतः गुप्त (सुरक्षित) है। वृष्णिवंशीकुमार तथा अन्य द्वारकावासी उस नगरीकी रक्षा करते हैं ॥ ८२ ॥

प्रान्ते सलिलसंयुक्ता विहिता विश्वकर्मणा।
रक्ष्यते पुरुषैर्घोरैः पद्मनाभस्य शासनात् ॥ ८३ ॥

'विश्वकर्माने उस पुरीका निर्माण किया है। उसके प्रान्त-भागमें समुद्रकी जलराशि ही खाईके रूपमे विद्यमान है। पद्मनाभ श्रीकृष्णके आदेशसे बड़े भयंकर पुरुष उसकी रक्षा करते हैं ॥ ८३ ॥

शैलप्राकारपरिखादुर्गमार्गप्रवेशिनी ।
सप्तप्राकाररचिता पर्वतैर्धातुमण्डितैः ॥ ८४ ॥

'पर्वत ही उसके परकोटे हैं। समुद्र ही खाई है। दुर्गके मार्गसे ही उसमे प्रवेश होता है। धातुमण्डित पर्वतोंके बने हुए सात परकोटोंसे वह पुरी घिरी हुई है ॥ ८४ ॥

न च शक्यमविज्ञातैः प्रवेष्टुं द्वारकां पुरीम्।
आत्मानं मां च रक्षस्व पितरं च विशेषतः ॥ ८५ ॥

'अपरिचित व्यक्ति द्वारकापुरीमें कभी प्रवेश नहीं कर सकते, अतः अनिरुद्धको लानेका हठ छोड़कर तुम अपनी, मेरी और विशेषतः अपने पिताकी रक्षा करो' ॥ ८५ ॥

उषोवाच

तव योगप्रभावेण शक्यं तत्र प्रवेशनम्।
बहुना किं प्रलापेन प्रतिज्ञा श्रूयतां मम ॥ ८६ ॥

उषा बोली--सखि ! योगशक्तिके प्रभावसे तुम्हारा द्वारकापुरीमें प्रवेश हो सकता है। अधिक प्रलाप करनेसे क्या लाभ ? मेरी प्रतिज्ञा सुन लो ॥ ८६ ॥

अनिरुद्धस्य वदनं पूर्णचन्द्रसमप्रभम्।
यद्यहं तन्न पश्यामि यास्यामि यमसादनम् ॥ ८७ ॥

यदि मैं अनिरुद्धका पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान् वह मनोहर मुख नहीं देखूँगी तो यमलोकको चली जाऊँगी ॥ ८७ ॥

दूतमसाद्य कार्याणां सिद्धिर्भवति भामिनि।
तस्माद् दौत्येन मे गच्छ जीवन्तीं मां यदीच्छसि ॥ ८८ ॥

भामिनि ! अच्छे दूतको पाकर कार्योंकी सिद्धि हो जाती है; अतः यदि तुम मुझे जीवित रखना चाहती हो तो मेरी दूती बनकर द्वारकाको चली जाओ ॥ ८८ ॥

यदि त्वं मे विजानासि सख्यं प्रेम्णा च भाषितम्।
क्षिप्रमानय मे कान्तं तवास्मि शरणं गता ॥ ८९ ॥

यदि तुम मेरे सखित्वको जानती हो और प्रेमपूर्वक कही हुई मेरी बातपर विश्वास करती हो तो मेरे प्रियतमको शीघ्र यहाँ ले आओ। मैं तुम्हारी शरणमें आयी हूँ ॥८९॥

जीवितस्य हि संदेहं क्षयं चैव कुलस्य च।
कामार्ता हि न पश्यन्ति कामिन्यो मदविह्वलाः ॥ ९० ॥

प्राणोंके लिये संशय उपस्थित हो और कुलका भी संहार हो जाय, किंतु कामपीड़ित मदमत्त कामिनियाँ इन बातोंकी ओर नहीं देखती हैं ॥ ९० ॥

प्रयत्नो युज्यते कार्येष्विति शास्त्रनिदर्शनम्।
त्वं च शक्ता विशालाक्षि द्वारकायां प्रवेशने ॥ ९१ ॥
संस्तुतासि मया भीरु कुरु मे प्रियदर्शनम्।

सभी कार्योंके लिये प्रयत्न करना उचित है, यह शास्त्रकी आज्ञा है। विशाललोचने ! तुम द्वारकापुरीमें प्रवेश करनेमें समर्थ हो। भीरु ! मैंने तुम्हारी बड़ी स्तुति की है। तुम मुझे मेरे प्रियतमका दर्शन करा दो ॥ ९१ १/२ ॥

चित्रलेखोवाच

सर्वथा संस्तुता तेऽहं वाक्यैरमृतसोदरैः ॥ ९२ ॥
कारिता च समुद्योगं प्रियैः कान्तैश्च भाषितैः।
एषा गच्छाम्यहं भीरु क्षिप्रं वै द्वारकां पुरीम् ॥ ९३ ॥

चित्रलेखा बोली--सखि ! तुम्हारे अमृतोपम वचनोंद्वारा मेरी सब प्रकारसे स्तुति ही की गयी है। तुम्हारे इन प्रिय एवं मनोरम वचनोंने मुझे इस कार्यके लिये उद्योग करनेको विवश कर दिया है। भीरु ! यह देखो, अब मैं शीघ्र ही द्वारकापुरीको जाती हूँ ॥ ९२-९३ ॥

भर्तारमानयिष्याद्य तव वृष्णिकुलोद्भवम्।
अनिरुद्धं महाबाहुं प्रविश्य द्वारकां पुरीम् ॥ ९४ ॥

आज तुम्हारे पति वृष्णिवंशावतंस महाबाहु अनिरुद्धको मैं द्वारकापुरीमें प्रवेश करके ले आऊँगी ॥ ९४ ॥

सा वचस्तथ्यमशिवं दानवानां भयावहम्।
उक्त्वा चान्तर्हिता क्षिप्रं चित्रलेखा मनोजवा ॥ ९५ ॥

यह वचन यथार्थ होनेके साथ ही दानवोंके लिये अमङ्गलकारक और भयावह था। इसे कहकर मनके समान वेगशालिनी चित्रलेखा तत्काल अन्तर्धान हो गयी ॥ ९५ ॥

सखीभिः सहिता ह्युषा चिन्तयन्ती तु सा स्थिता।
तृतीये तु मुहूर्ते सा नष्टा बाणपुरात् तदा ॥ ९६ ॥

उषा अपनी सखियोंके साथ अभीष्ट कार्यका चिन्तन

६८२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे करती हुई वहीं खड़ी रही; किंतु चित्रलेखा उस समय द्वारा सुरक्षित द्वारकापुरीमें जा पहुँची ॥ ९७ ॥ तृतीय मुहूर्त्तमें बाणपुरसे अदृश्य हुई थी ॥ ९६ ॥ कैलासशिखराकारैः प्रासादैरुपशोभिताम् । सखीप्रियं चिकीर्षन्ती पूजयन्ती तपोधनान् । ददर्श द्वारकां रम्यां दिवि तारामिव स्थिताम् ॥ ९८ ॥ क्षणेन समनुप्राप्ता द्वारकां कृष्णपालिताम् ॥ ९७ ॥ कैलासशिखरके समान ऊँचे-ऊँचे महलोंसे सुशोभित सखीका प्रिय करनेकी इच्छा लिये तपस्वी मुनियोंका रमणीय द्वारकापुरीको उसने आकाशमें प्रकाशित होती हुई पूजन करती हुई चित्रलेखा एक ही क्षणमें श्रीकृष्ण- ताराके समान देखा ॥ ९८ ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि उषाहरणे चित्रलेखाया द्वारकागमने अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें उषाहरणके प्रसङ्गमें चित्रलेखाका द्वारकागमनविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११८ ॥ एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः चित्रलेखा और नारदजीका संवाद, चित्रलेखाका नारदजीसे तामसी विद्या ग्रहणकर अनिरुद्धको शोणितपुर ले जाना, उषा और अनिरुद्धका गान्धर्व-विवाह, अनिरुद्धका वाणासुरके सैनिकों तथा वाणासुरके साथ युद्ध, उनका नागपाशमें बँधकर बंदी होना तथा नारदजीका द्वारका जाना वैशम्पायन उवाच तब चित्रलेखा दोनों हाथ जोड़कर लोकपूजित दिव्य अथ द्वारवतीं प्राप्य स्थिता सा भवनान्तिके । देवर्षि नारदसे इस प्रकार बोली-॥ ५ ॥ प्रवृत्तिहरणार्थाय चित्रलेखा व्यचिन्तयत् ॥ १ ॥ भगवञ्छ्रूयतां वाक्यं दौत्येनाहमिहागता । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! तदनन्तर अनिरुद्धं मुने नेतुं यदर्थं च शृणुष्व मे ॥ ६ ॥ द्वारकापुरीके पास पहुँचकर चित्रलेखा एक घरके पास 'भगवन् ! मेरी बात सुनिये । मैं दूती होकर यहाँ आयी खड़ी हो गयी और अनिरुद्धके पास संदेश भेजनेके लिये कोई हूँ । मुने ! मैं अनिरुद्धको यहाँसे ले जाना चाहती हूँ, किस युक्ति सोचने लगी ॥ १ ॥ लिये, यह मुझसे सुनिये ॥ ६ ॥ अथ चिन्तयती सा तु बुद्धिवुद्ध्यर्थनिश्चयम् । नगरे शोणितपुरे बाणो नाम महासुरः । अपश्यन्नारदं तत्र ध्यायन्तमुदके मुनिम् ॥ २ ॥ तस्य कन्या वरारोहा नाम्नोपेति च विश्रुता ॥ ७ ॥ बुद्धिसे बोद्धव्य विषयका जो निश्चय होता है, उसीका 'शोणितपुर नगरमें जो बाण नामसे प्रसिद्ध महान् असुर विचार करती हुई चित्रलेखाने वहाँ नारदमुनिको देखा, है, उसके एक सुन्दर अङ्गवाली कन्या है, जो उषाके नामसे जो समुद्रके जलमें ध्यान लगाये बैठे थे ॥ २ ॥ विख्यात है ॥ ७ ॥ तं दृष्ट्वा चित्रलेखा तु हर्षोत्फुल्ललोचना । भगवन् सानुरक्ता च प्रद्युम्निं पुरुषोत्तमम् । उपसृत्याभिवाद्याथ तत्रैवाधोमुखी स्थिता ॥ ३ ॥ देव्या वरविसर्गेण तस्य भर्ता विनिर्मितः ॥ ८ ॥ उन्हें देखकर चित्रलेखाके नेत्र हर्षसे खिल उठे। वह 'भगवन् ! वह प्रद्युम्नकुमार पुरुषोत्तम अनिरुद्धके उनके पास गयी और उन्हें प्रणाम करके वहीं नीचे मुँह प्रति अनुरक्त है; देवी पार्वतीके वरदानके अनुसार अनिरुद्ध किये खड़ी हो गयी ॥ ३ ॥ ही उसके पति नियत हुए हैं ॥ ८ ॥ नारदस्त्वारिशपं दत्त्वा चित्रलेखामथाब्रवीत् । तं च नेतुं समायाता तत्र सिद्धिं विधत्स्व मे । किमर्थमिह सम्प्राप्ता श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ४ ॥ मया नीतेऽनिरुद्धे तु नगरं शोणिताह्वयम् ॥ ९ ॥ नारदजीने आशीर्वाद देकर चित्रलेखासे कहा-'यहाँ प्रवृत्तिः पुण्डरीकाक्षे त्वयाऽऽख्येया महामुने । किसलिये आयी हो, यह मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ' ॥४॥ 'मैं उन्हींको ले जानेके लिये आयी हूँ। मेरे उद्देश्यकी देवर्षिमथ तं दिव्यं नारदं लोकपूजितम् । सिद्धिका कोई उपाय कीजिये । महामुने ! जब मैं अनिरुद्धको कृताञ्जलिपुटा भूत्वा चित्रलेखा त्वथाम्रवीत् ॥ ५ ॥ शोणितपुर नगरमें पहुँचा दूँ, तब आप कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णको यह समाचार बतावें ॥ ९३ ॥