विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
विष्णुपर्व ] द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ६२३
पाण्ड्यं पौण्ड्रं कलिङ्गं च मात्स्यं चैव जनार्दनः।
जघान सहितान् सर्वान् वङ्गराजं तथैव च ॥ १५ ॥
इन जनार्दनने एक साथ आये हुए पाण्ड्य, पौण्ड्र, कलिङ्ग, मत्स्य तथा वङ्ग देशके समस्त राजाओंको युद्धमे मार डाला था ॥ १५ ॥
एष चैकशतं हत्वा रणे राज्ञां महात्मनाम् ।
गान्धारीमावहद् वीरो महिषीं प्रियदर्शनाम् ॥ १६ ॥
इन वीर श्रीकृष्णने रणभूमिमे एक सौ महामना नरेशोंका वध करके अपनी परम सुन्दरी पटरानी गान्धारीसे विवाह किया था ॥ १६ ॥
तथा गाण्डीवधन्वानं क्रीडन्तं मधुसूदनः ।
जिगाय भरतश्रेष्ठं कुन्त्याः प्रमुखतो विभुः ॥ १७ ॥
गाण्डीव धनुष लेकर युद्धकी क्रीडा करते हुए भरतश्रेष्ठ अर्जुनको इन भगवान् मधुसूदनने कुन्तीके सामने ही जीत लिया (अथवा सहायता देकर उन्हें विजयी बना दिया) ॥ १७ ॥
द्रोणं द्रौणिं कृपं कर्णं भीष्मं चैव सुयोधनम् ।
चक्राङ्गुयानैः प्रहवणे जिगाय पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥
इन पुरुषोत्तमने (अर्जुनद्वारा) रथयुद्धमे द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कर्ण, भीष्म और दुर्योधनको परास्त कर दिया ॥ १८ ॥
वभ्रोश्च प्रियमन्विच्छञ्छङ्खचक्रगदासिभृत् ।
सौवीरराजस्य सुतां प्रसह्य हृतवान् प्रभुः ॥ १९ ॥
वभ्रुका प्रिय चाहते हुए शङ्ख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले भगवान् केशवने सौवीरराजकी पुत्रीको बलपूर्वक हर लिया था ॥ १९ ॥
पर्यस्तां पृथिवीं कृत्स्नां साश्वां सरथकुञ्जराम् ।
वैणुदारिकृते यत्नाज्जिगाय पुरुषोत्तमः ॥ २० ॥
इन पुरुषोत्तमने वैणुदारिके लिये घोड़े, रथ और हाथियोसहित सारी पृथ्वोको, जो अस्त-व्यस्त हो गयी थी, यत्नपूर्वक जीत लिया ॥ २० ॥
अवाप्य तपसो वीर्यं बलमोजश्च माधवः ।
पूर्वदेहे जहारायं बलेस्त्रिभुवनं हरिः ॥ २१ ॥
इन भगवान् माधवने पूर्व शरीरमे वामनरूप होकर तपस्याका बल, वीर्य और ओज पाकर राजा बलिसे त्रिलोकीका राज्य छीन लिया था ॥ २१ ॥
वज्राशनिगदाखङ्गैस्त्रासयद्भिश्च दानवैः।
यस्य नाधिगतो मृत्युः पुरं प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥ २२ ॥
वज्र, अशनि, गदा और खड्गके प्रहारसे त्रास देते हुए दानव प्राग्ज्योतिषपुरमें प्रयत्न करनेपर भी इन्हे मार न सके ॥ २२ ॥
अभिभूतश्च कृष्णेन सगणः सुमहाबलः ।
बलेः पुत्रो महावीर्यो बाणो द्रविणवत्तरः ॥ २३ ॥
महाबली महापराक्रमी तथा अत्यन्त वैभवशाली बलिपुत्र बाणासुरको भी श्रीकृष्णने पराजित कर दिया था ॥ २३ ॥
पीठं तथा महाबाहुः कंसामात्यं जनार्दनः ।
पैठिकं चासिलोमानं निजघान महाबलः ॥ २४ ॥
इन महाबली महाबाहु जनार्दनने कंसके मन्त्री पीठ, पैठिक और असिलोमाको भी मौतके घाट उतार दिया ॥ २४ ॥
जम्भमैरावणं चापि विरूपं च महायशाः ।
जघान पुरुषव्याघ्रो दैत्यं मानुषरूपिणम् ॥ २५ ॥
महायशस्वी पुरुषसिंह श्रीकृष्णने मानवरूपधारी जम्भ, अहिरावण और विरूप नामक दैत्यको कालके गालमें भेज दिया ॥ २५ ॥
तथा नागपतिं तोये कालीयं च महौजसम् ।
निर्जित्य पुण्डरीकाक्षः प्रेषयामास सागरम् ॥ २६ ॥
इसी तरह कमलनयन केशवने यमुनाजीके जलमें रहनेवाले महाबली नागराज कालियको जीतकर समुद्रमें भेज दिया ॥ २६ ॥
संजीवयामास मृतं पुत्रं सान्दीपनेस्तथा ।
निर्जित्य पुरुषव्याघ्रो यमं वैवस्वतं हरिः ॥ २७ ॥
इन्हीं पुरुषसिंह श्रीहरिने वैवस्वत यमको जीतकर सान्दीपिनिके मरे हुए पुत्रको पुनः जीवनदान दिया था ॥ २७ ॥
एवमेष महाबाहुः शास्ता तेषां दुरात्मनाम् ।
देवांश्च ब्राह्मणांश्चैव ये द्विषन्ति सदा नृप ॥ २८ ॥
नरेश्वर ! इस प्रकार यह महाबाहु श्रीकृष्ण उन दुरात्माओंको दण्ड देनेवाले हैं, जो देवताओं और ब्राह्मणोंसे सदा द्वेष रखते हैं ॥ २८ ॥
निहत्य नरकं भौममाहृत्य मणिकुण्डले ।
देवमातुर्ददौ चैव प्रीत्यर्थं वज्रपाणिनः ॥ २९ ॥
इन्होने वज्रपाणि इन्द्रकी प्रसन्नताके लिये भूमिपुत्र नरकासुरको मारकर देवमाता अदितिको उनके दोनों मणिमय कुण्डल लाकर दे दिये ॥ २९ ॥
एवं सदैव दैत्यानां सुराणां च महायशाः ।
भयाभयकरः कृष्णः सर्वलोककरो विभुः ॥ ३० ॥
इस प्रकार सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा, सर्वव्यापी, महायशस्वी भगवान् श्रीकृष्ण सदा ही दुराचारी दैत्योंको भय और धर्मात्मा देवताओंको अभय प्रदान करते हैं ॥ ३० ॥
संस्थाप्य धर्मान् मर्त्येषु यज्ञैरिष्ट्वाऽऽप्तदक्षिणैः ।
कृत्वा देयार्थममितं स्वस्थानं प्रतिपत्स्यते ॥ ३१ ॥
| ६२४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
ये मनुष्योंमें धर्मकी स्थापना करके पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करते हुए देवताओंके असंख्य कार्य सिद्ध करनेके अनन्तर अपने परमधामको पधारेंगे ॥ ३१ ॥
कृष्णो भोगवतीं रम्यामृषिकान्तां महायशाः ।
द्वारकामात्मसात्कृत्वा समुद्रं गमयिष्यति ॥ ३२ ॥
महायशस्वी श्रीकृष्ण भोग-वैभवसे सम्पन्न रमणीय तथा ऋषियोंके लिये कमनीय द्वारकापुरीको अपने अधीन करके अन्ततोगत्वा इसे समुद्रमें डुबो देंगे ॥ ३२ ॥
बहुरत्नसमाकीर्णां चैत्ययूपशताङ्किताम् ।
द्वारकां वरुणावासं प्रवेश्यति सकाननाम् ॥ ३३ ॥
जो बहुसंख्यक रत्नोंसे व्याप्त तथा सैकड़ों चैत्यों और यूपोंसे चिह्नित है, वन-उपवनसहित उस द्वारकापुरीको वरुणालयमें निमग्न कर देंगे ॥ ३३ ॥
तां सूर्यसदनप्रख्यां मतज्ञः शार्ङ्गधन्वनः ।
विसृष्टां वासुदेवेन सागरः प्लावयिष्यति ॥ ३४ ॥
शार्ङ्गधन्वा श्रीकृष्णके मतको जाननेवाला समुद्र इन भगवान् वासुदेवके द्वारा छोड़ी हुई सूर्यलोक-तुल्य तेजस्विनी द्वारकाको अपने जलमें विलीन कर लेगा ॥ ३४ ॥
सुरासुरमनुष्येषु नासीन्न भविता क्वचित् ।
य इमामावसेत् कश्चिदन्यो वै मधुसूदनात् ॥ ३५ ॥
देवताओं, असुरों और मनुष्योंमें इन भगवान् मधुसूदनके सिवा दूसरा कोई ऐसा न तो हुआ है और न कभी होगा ही, जो इनके द्वारा छोड़ी गयी इस द्वारकापुरीमें निवास कर सके ॥ ३५ ॥
एवमेष दशार्हाणां विधाय विधिमुत्तमम् ।
विष्णुर्नारायणः सोमः सूर्यश्च भविता स्वयं ॥ ३६ ॥
इस प्रकार दशार्हवंशी यादवोंके लिये उत्तम विधिक विधान करके ये सर्वव्यापी नारायण देव स्वयं ही चन्द्रमा और सूर्यरूपसे प्रकाशित होंगे ॥ ३६ ॥
अप्रमेयस्त्वचिन्त्यश्च यथा कामचरो वशी ।
मोदत्येष सदा भूतैर्बालः क्रीडनकैरिव ॥ ३७ ॥
ये अप्रमेय, अचिन्त्य, इच्छानुसार विचरनेवाले और सबको वशमें रखनेवाले हैं। जैसे बालक खिलौनोंसे प्रसन्न होता है, उसी प्रकार ये समस्त प्राणियोंके साथ क्रीडा करते हुए आनन्दमग्न होते हैं ॥ ३७ ॥
न प्रमातुं महाबाहुः शक्योऽयं मधुसूदनः ।
परं ह्यपरमेतस्माद् विश्वरूपान्न विद्यते ॥ ३८ ॥
इन महाबाहु मधुसूदनको सीमित प्रमाणोंद्वारा मापा नहीं जा सकता । यह पर और अपररूप जगत् इन विश्वरूप परमेश्वरसे भिन्न नहीं है ॥ ३८ ॥
श्रुतोऽयमेष शतशस्तथा शतसहस्रशः ।
अन्तो हि कर्मणामस्य दृष्टपूर्वो न केनचित् ॥ ३९ ॥
ये ही सैकड़ों और लाखों बार सुने गये हैं। किसीने पहले कभी इनके कर्मोंका अन्त नहीं देखा है ॥ ३९ ॥
एवमेतानि कर्माणि शिशुमध्यगतस्तदा ।
कृतवान् पुण्डरीकाक्षः संकर्षणसहायवान् ॥ ४० ॥
इस तरह बालकोंके बीचमें रहकर संकर्षणसहित कमलनयन श्रीकृष्णने ये पूर्वोक्त कर्म किये थे ॥ ४० ॥
इत्युवाच पुरा व्यासस्तपोवीर्येण चक्षुषा ।
महायोगी महाबुद्धिः सर्वप्रत्यक्षदर्शिवान् ॥ ४१ ॥
पूर्वकल्पके महायोगी, महाबुद्धिमान् और सब कुछ प्रत्यक्ष देखनेवाले व्यासने अपनी तपोबलसे सम्पन्न दृष्टिद्वारा देखकर यह सब कुछ बताया था ॥ ४१ ॥
वैशम्पायन उवाच
इति संस्तुय गोविन्दं महेन्द्रवचनान्मुनिः ।
यदुभिः पूजितः सर्वैर्नारदस्त्रिदिवं ययौ ॥ ४२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार देवराज इन्द्रके आदेशसे भगवान् गोविन्दकी स्तुति करके नारद मुनि समस्त यादवोंसे पूजित हो स्वर्गलोकको चले गये ॥ ४२ ॥
ततस्तद् वसु गोविन्दो दिदेशान्धकवृष्णिषु ।
यथार्हं पुण्डरीकाक्षो विधिवन्मधुसूदनः ॥ ४३ ॥
तदनन्तर कमलनयन मधुसूदन भगवान् गोविन्दने समस्त अन्धक और वृष्णिवंशके लोगोंको विधिपूर्वक वह सारा धन यथोचितरूपसे बाँट दिया ॥ ४३ ॥
यादवाश्च धनं प्राप्य विधिवद् भूरिदक्षिणैः ।
यज्ञैरिष्ट्वा महात्मानो द्वारकामावसन् पुरीम् ॥ ४४ ॥
उस धनको पाकर महामनस्वी यादव प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंका विधिपूर्वक अनुष्ठान करते हुए द्वारकापुरीमें निवास करने लगे ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि नारदवाक्यं नाम द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें नारदजीका वाक्यविषयक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०२ ॥
विष्णुपर्व ] त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ६२५
त्र्यधिकशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्णकी संततिका वर्णन तथा वृष्णिवंशका उपसंहार
जनमेजय उवाच
बहूनां स्त्रीसहस्राणामष्टौ भार्याः प्रकीर्तिताः।
तासामपत्यान्यष्टानां भगवान् प्रब्रवीतु मे ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**भगवन् ! भगवान् श्रीकृष्णकी कई हजार रानियोंमेंसे आठको प्रमुख बताया गया है। उन आठोंकी संतानें कौन-कौन-सी थीं ? यह आप मुझे बताइये ॥
वैशम्पायन उवाच
अष्टौ महिष्यः पुत्रिण्य इति प्राधान्यतः स्मृताः।
सर्वा वीरप्रजाश्चैव तास्वपत्यानि मे शृणु ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन् ! प्रधानतः आठों पटरानियाँ पुत्रवती थीं, ऐसा माना गया है। उनकी सभी संतानें वीर थीं। उन रानियोंके जो-जो संतानें हुईं, मैं बताता हूँ, सुनो ॥ २ ॥
रुक्मिणी सत्यभामा च देवी नाग्नजिती तथा।
सुदत्ता च तथा शैव्या लक्ष्मणा चारुहासिनी ॥ ३ ॥
मित्रविन्दा च कालिन्दी जाम्बवत्यथ पौरवी।
सुभीमा च तथा माद्री रुक्मिणीतनयाञ्छृणु ॥ ४ ॥
रुक्मिणी, सत्यभामा, देवी नाग्नजिती (सत्या), शिविदेशकी राजकुमारी सुदत्ता, मनोहर हासवाली लक्ष्मणा, मित्रविन्दा, कालिन्दी, जाम्बवती, पौरवी और मद्रदेश-की राजकुमारी सुभीमा—ये श्रीकृष्णकी मुख्य रानियाँ थीं। इनमेंसे रुक्मिणीके पुत्रोंका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ ३-४ ॥
प्रद्युम्नः प्रथमं जज्ञे शम्बरान्तकरः शुभः।
द्वितीयश्चारुदेष्णश्च वृष्णिसिंहो महारथः ॥ ५ ॥
रुक्मिणीके गर्भसे पहले शुभलक्षणसम्पन्न प्रद्युम्नका जन्म हुआ, जिन्होंने आगे चलकर शम्बरासुरका वध किया था। उनके दूसरे पुत्र चारुदेष्ण थे, जो वृष्णिवंशमे सिंहके समान पराक्रमी और महारथी वीर थे ॥ ५ ॥
चारुभद्रश्चारुगर्भः सुदेष्णो द्रुम एव च।
सुषेणश्चारुगुप्तश्च चारुविन्दश्च वीर्यवान् ॥ ६ ॥
चारुबाहुः कनीयांश्च कन्या चारुमती तथा।
तीसरे चारुभद्र, चौथे चारुगर्भ, पाँचवें सुदेष्ण और छठे द्रुम थे, सातवें सुषेण, आठवें चारुगुप्त, नवें पराक्रमी चारुविन्द और दसवें चारुबाहु थे। चारुबाहु सबसे छोटे थे। इनके सिवा रुक्मिणीके एक कन्या भी उत्पन्न हुई थी, जिसका नाम चारुमती था ॥ ६½ ॥
जज्ञिरे सत्यभामायां भानुर्भीमरथः क्षुपः ॥ ७ ॥
रोहितो दीप्तिमांश्चैव ताम्रजाक्षो जलान्तकः।
भानुर्भीमलिका चैव ताम्रपर्णी जलन्धमा ॥ ८ ॥
चतस्रो जज्ञिरे तेषां स्वसारो गरुडध्वजात्।
सत्यभामाके गर्भसे भानु, भीमरथ, क्षुप, रोहित, दीप्तिमान्, ताम्रजाक्ष और जलान्तक—ये आठ पुत्र उत्पन्न हुए। भगवान् गरुड़ध्वजसे इनकी चार बहिनें उत्पन्न हुईं थीं, जिनके नाम थे—भानु, भीमलिका, ताम्रपर्णी और जलन्धमा ॥ ७-८½ ॥
जाम्बवत्याः सुतो जज्ञे साम्बः समितिशोभनः ॥ ९ ॥
मित्रवान् मित्रविन्दश्च मित्रवत्यपि चाङ्गना।
मित्रबाहुः सुनीथश्च नाग्नजित्याः प्रजाः शृणु ॥ १० ॥
जाम्बवतीके ज्येष्ठ पुत्र साम्ब उत्पन्न हुए, जो युद्धमें बड़ी शोभा पाते थे। इनके सिवा मित्रवान्, मित्रविन्द, मित्रबाहु और सुनीथ—ये चार पुत्र और थे। जाम्बवतीके मित्रवती नामवाली एक कन्या भी उत्पन्न हुई थी। अब नाग्नजितीकी संतानोंका वर्णन सुनो ॥ ९-१० ॥
भद्रकारो भद्रविन्दः कन्या भद्रवती तथा।
सुदत्तायां तु शैव्यायां संग्रामजिदजायत ॥ ११ ॥
सत्यजित् सेनजिच्चैव तथा शूरः सपत्नजित्।
नाग्नजितीके भद्रकार और भद्रविन्द नामक दो पुत्र हुए थे तथा भद्रवती नामवाली एक कन्या भी उत्पन्न हुई थी। शिविदेशकी राजकुमारी सुदत्ताके गर्भसे संग्रामजित्, सत्यजित्, सेनजित् और शूरवीर सपत्नजित्—इन चार पुत्रोंका जन्म हुआ था ॥ ११½ ॥
सुभीमायाः सुतो माद्रया वृकाश्वो वृकनिर्वृतिः ॥ १२ ॥
कुमारो वृकदीप्तिश्च लक्ष्मणायाः प्रजाः शृणु।
माद्री सुभीमाके वृकाश्व, वृकनिर्वृत्ति तथा कुमार वृकदीप्ति—ये तीन पुत्र थे। अब लक्ष्मणाकी संतानोंका परिचय सुनो ॥ १२½ ॥
गात्रवान् गात्रगुप्तश्च गात्रविन्दश्च वीर्यवान् ॥१३॥
जज्ञिरे गात्रवत्या च भगिन्याऽनुजया सह।
गात्रवान्, गात्रगुप्त तथा पराक्रमी गात्रविन्द—ये तीन पुत्र लक्ष्मणाके गर्भसे उत्पन्न हुए थे, साथ ही इनकी छोटी बहिन गात्रवतीका भी जन्म हुआ था ॥ १३½ ॥
अश्रुतश्च सुतो जज्ञे कालिन्द्याः श्रुतसम्मतः ॥ १४ ॥
अश्रुतं श्रुतसेनायै प्रददौ मधुसूदनः।
कालिन्दीके दो पुत्र हुए—अश्रुत और श्रुतसम्मत। मधुसूदनने अश्रुत नामक पुत्रको श्रुतसेना नामवाली पत्नीकी गोदमें दे दिया ॥ १४½ ॥
| ६२६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तं प्रदाय हृषीकेशस्तां भार्या मुदितोऽब्रवीत् ॥ १५ ॥
एष वामुभयोरस्तु दायादः शाश्वतीः समाः ।
उसे देकर भगवान् श्रीकृष्ण बड़े प्रसन्न हुए और अपनी उस पत्नीसे बोले—'यह सदाके लिये तुम दोनोंका पुत्र रहे' ॥ १५३ ॥
बृहत्यां तु गदं प्राहुः शैब्यायामङ्गदं सुतम् ॥ १६ ॥
उत्पन्नं कुमुदं चैव श्वेतं श्वेता तथाङ्गना ।
श्रीकृष्णकी बृहती नामवाली पत्नीके गर्भसे गदकी उत्पत्ति बतायी जाती है। शैव्याके गर्भसे अङ्गद, कुमुद और श्वेत नामक पुत्रकी उत्पत्ति कही गयी है। शैव्याके श्वेता नामवाली एक कन्या भी थी ॥ १६३ ॥
अगावहः सुमित्रश्च शुचिश्चित्ररथस्तथा ॥ १७ ॥
चित्रसेनः सुदेवायांश्चित्रा चित्रवती तथा ।
सुदेवाके गर्भसे अगावह, सुमित्र, शुचि, चित्ररथ तथा चित्रसेन ये—पाँच पुत्र और चित्रा तथा चित्रवती—ये दो कन्याएँ उत्पन्न हुई थीं ॥ १७३ ॥
वनस्तम्बश्च जज्ञाते सुतः स्तम्बवनश्च ह ॥ १८ ॥
निवासनोऽवनस्तम्भः कन्या स्तम्बवती तथा ।
उपसन्नश्च शङ्कुश्च वज्रांशुः क्षिप्र एव च ॥ १९ ॥
कौशिक्यां सुतसोमायां यौधिष्ठिर्यां युधिष्ठिरः ।
कपाली गरुडश्चैव जज्ञाते चित्रयोधिनौ ॥ २० ॥
वनस्तम्ब, स्तम्बवन, निवासन तथा अवनस्तम्भ—ये चार पुत्र और स्तम्बवती नामवाली कन्या—इन सबकी उत्पत्ति कौशिकीके गर्भसे हुई थी । उपसन्न, शङ्कु, वज्रांशु और क्षिप्र—ये चार पुत्र सुतसोमाके गर्भसे उत्पन्न हुए थे । यौधिष्ठिरीके गर्भसे युधिष्ठिर नामक पुत्रका जन्म हुआ था । इसके सिवा दो पुत्र और उत्पन्न हुए थे—कपाली तथा गरुड । ये दोनों ही विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले थे ॥ १८-२० ॥
एवमादीनि पुत्राणां सहस्राणि निबोध मे ।
दशायुतं समाख्याता वासुदेवस्य ते सुताः ॥ २१ ॥
अयुतानि तथा चाष्टौ शूरा रणविशारदाः ।
जनार्दनस्य प्रसवः कीर्तितोऽयं तथा मया ॥ २२ ॥
ये तथा इसी तरह और भी सहस्रों पुत्र श्रीकृष्णसे उत्पन्न हुए थे । इस बातको तुम मेरे द्वारा जान लो । भगवान् वासुदेवके वे पुत्र एक लाख अस्सी हजार बताये गये हैं । वे सब के सब रण-कर्म-विशारद तथा शूरवीर थे । इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान् जनार्दनकी संततिका वर्णन किया है ॥ २१-२२ ॥
प्रद्युम्नस्य सुतो जज्ञे वैदर्भ्यां राजसत्तम ।
अनिरुद्धो रणेऽरुद्धो जज्ञे स मृगकेतनः ॥ २३ ॥
नृपश्रेष्ठ ! प्रद्युम्नके विदर्भराजकुमारी रुक्मवतीके गर्भसे अनिरुद्ध नामक पुत्रका जन्म हुआ, जिसकी गतिको युद्धमें कोई रोक नहीं सकता था । अनिरुद्धकी ध्वजापर मृगका चिह्न था ॥ २३ ॥
रेवत्यां बलदेवस्य जज्ञाते निशठोल्मुकौ ।
भ्रातरौ देवसंकाशावुभौ पुरुषसत्तमौ ॥ २४ ॥
बलदेवजीके रेवतीके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके नाम थे निशठ और उल्मुक । ये दोनों भाई देवताओंके समान तेजस्वी तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ थे ॥ २४ ॥
सुतनुश्च सुतारा च शौरेरास्तां परिग्रहः ।
पौण्ड्रकः कपिलश्चैव वसुदेवस्य तौ सुतौ ॥ २५ ॥
वसुदेवके दो पत्नियाँ और थीं—सुतनु तथा सुतारा । इन दोनोंके गर्भसे वसुदेवके दो पुत्र हुए—पौण्ड्रक तथा कपिल ॥ २५ ॥
तारायां कपिलो जज्ञे पौण्ड्रश्च सुतनोः सुतः ।
तयोर्नृपोऽभवत् पौण्ड्रः कपिलश्च वनं ययौ ॥ २६ ॥
इनमेंसे कपिल तो सुताराके गर्भसे उत्पन्न हुआ था और पौण्ड्रक सुतनुका पुत्र था । उन दोनों भाइयोंमेंसे पौण्ड्रक तो राजा हुआ और कपिल वनको चला गया ॥२६॥
तुर्या सम्भवद् वीरो वसुदेवान्महाबलः ।
जरा नाम निषादानां प्रभुः सर्वधनुष्मताम् ॥ २७ ॥
वसुदेवसे उनकी चतुर्थ वर्णवाली भार्यासे एक महाबली वीरका जन्म हुआ था, जिसका नाम था जरा । वह समस्त धनुर्धर निषादोंका स्वामी था ॥ २७ ॥
काश्या सुपाश्र्वं तनयं लेभे साम्बाद् रगस्विनम्।
सानुर्जज्ञेऽनिरुद्धस्य वज्रः सानोरजायत ॥ २८ ॥
काश्याने साम्बसे सुपाश्र्व नामक पुत्र प्राप्त किया, जो महान् वेगशाली था । अनिरुद्धके सानु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । सानुसे वज्रका जन्म हुआ ॥ २८ ॥
वज्राज्जज्ञे प्रतिरथः सुचारुस्तस्य चात्मजः ।
अनमित्राच्छिनिर्जज्ञे कनिष्ठाद् वृष्णिनन्दनात् ॥ २९ ॥
वज्रसे प्रतिरथ उत्पन्न हुआ । प्रतिरथके पुत्रका नाम सुचारु था । वृष्णिके छोटे पुत्र अनमित्रसे शिनिका जन्म हुआ ॥ २९ ॥
शिनेस्तु सत्यवाग् जज्ञे सत्यकश्च महारथः ।
सत्यकस्यात्मजः शूरो युयुधानस्त्वजायत ॥ ३० ॥
शिनिसे महारथी सत्यवादी सत्यक उत्पन्न हुए । सत्यकसे उनके शूरवीर पुत्र युयुधान ( सात्यकि ) का जन्म हुआ ॥ ३० ॥
असङ्गो युयुधानस्य मणिरस्तस्याभवत् सुतः ।
विष्णुपर्व ] चतुरधिकशततमोऽध्यायः ६२७ मणेर्युगन्धरः पुत्र इति वंशः समाप्यते ॥ ३१॥ हुआ । मणिके पुत्रका नाम युगन्धर था। इस प्रकार यहाँ युयुधानका पुत्र असङ्ग और असङ्गका पुत्र मणि वंशका वर्णन समाप्त किया जाता है ॥ ३१ ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वृष्णिवंशानुकीर्तने त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वृष्णिवंशका वर्णनविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०३ ॥ चतुरधिकशततमोऽध्यायः प्रद्युम्नका जन्म, शम्बरासुरद्वारा प्रद्युम्नका सूतिकागृहसे अपहरण, प्रद्युम्न- मायावती-संवाद और प्रद्युम्नका शम्बरासुरके सौ पुत्रोंके साथ युद्ध जनमेजय उवाच लिये उस महान् असुरने मायासे उस बालकको हर लिया य एष भवता पूर्वं शम्बरघ्नेत्युदाहृतः । और उसे दोनों हाथोंसे ऊपर उठाये हुए वह अपने नगरमें प्रद्युम्नः स कथं जघ्ने शम्बरं तद् ब्रवीहि मे ॥ १ ॥ ले गया ॥ ५ ॥ अनपत्या तु तस्यासीद् भार्या रूपगुणान्विता । जनमेजयने पूछा—मुने ! आपने पहले जो यह नाम्ना मायावती नाम मायेव शुभदर्शना ॥ ६ ॥ बताया है कि प्रद्युम्नने शम्बरासुरका वध किया था, उस- उसकी रूप और गुणसे युक्त एक भार्या थी, जिसके के विषयमें मैं यह जानना चाहता हूँ कि प्रद्युम्नने किस कोई संतान नहीं थी । उसका नाम था मायावती, जो प्रकार शम्बरासुरका वध किया था, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥ मायाके समान ही सुन्दर दिखायी देती थी ॥ ६ ॥ वैशम्पायन उवाच ददौ तं वासुदेवस्य पुत्रं पुत्रमित्रात्मजम् । रुक्मिण्यां वासुदेवस्य लक्ष्म्यां कामो धृतव्रतः । तस्या महिष्या मायिन्या दानवः कालचोदितः ॥ ७ ॥ शम्बराान्तकरो जज्ञे प्रद्युम्नः कामदर्शनः । उस कालप्रेरित दानवने भगवान् श्रीकृष्णके उस पुत्रको सनत्कुमार इति यः पुराणे परिगीयते ॥ २ ॥ अपने पुत्रके समान मानकर अपनी उस मायावती भार्याके वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! भगवान् वासुदेवके हाथमें दे दिया ॥ ७ ॥ लक्ष्मीरूपा रुक्मिणीके गर्भसे उत्तम व्रतधारी कामदेव ही मायावती तु तं दृष्ट्वा सम्प्रहृष्टतनूरुहा । प्रद्युम्नरूपसे उत्पन्न हुए, जो कामदेवके समान ही मनोहर हर्षेण महता युक्ता पुनः पुनरुदैक्षत ॥ ८ ॥ दिखायी देते थे । उन्होंने ही शम्बरासुरका विनाश किया था। उस बालकको देखते ही मायावतीके शरीरमें हर्षजनित किन्हीं-किन्हींके मतमें जो पुराणमें सनत्कुमार कहे जाते हैं, रोमाञ्च हो आया । वह बड़े हर्षके साथ बारंबार उसकी वे ही प्रद्युम्नरूपसे प्रकट हुए थे ॥ २ ॥ ओर देखने लगी ॥ ८ ॥ तं सप्तरात्रे सम्पूर्णे निशीथे सूतिकागृहात् । अथ तस्या निरीक्षन्त्याः स्मृतिः प्रादुर्बभूव ह । जहार कृष्णस्य सुतं शिशुं वै कालशम्बरः ॥ ३ ॥ अयं स मम कान्तोऽभूत् स्मृत्वैवं चान्वचिन्तयत् ॥ ९॥ प्रद्युम्नके जन्मके पश्चात् सात रात पूर्ण हो जानेपर बालकका निरीक्षण करती हुई मायावतीके हृदयमें कालरूपी शम्बरासुरने श्रीकृष्णके उस शिशु पुत्रको आधी पूर्वकालकी स्मृति जाग उठी । 'यही तो पूर्वकालमें मेरे रातके समय सूतिकागृहसे हर लिया ॥ ३ ॥ प्रियतम पति थे' यह स्मरण करके वह इस प्रकार सोचने विदितं तस्य कृष्णस्य देवमायानुवर्तिनः । लगी—॥ ९ ॥ ततो न निगृहीतः स दानवो युद्धदुर्मदः ॥ ४ ॥ अयं स नाथो भर्ता मे यस्यार्थेऽहं दिवानिशम् । देवमायाका अनुसरण करनेवाले श्रीकृष्णको भविष्यमें चिन्ताशोकार्णवे मग्ना न विन्दामि रतिं क्वचित् ॥ १० ॥ होनेवाली सारी बातें विदित थीं, इसलिये उन्होंने उस 'ये वे ही मेरे स्वामी एवं भर्ता हैं, जिनके लिये मैं रणदुर्मद दानवको उस समय बंदी नहीं बनाया ॥ ४ ॥ दिन-रात चिन्ता और शोकके समुद्रमें डूबी रहकर कभी कहीं स मृत्युना परीतायुर्मायया संजहार तम् । भी चैन नहीं पाती हूँ ॥ १० ॥ दोर्भ्यामुत्क्षिप्य नगरं स्वं निनाय महासुरः ॥ ५ ॥ अयं भगवता पूर्वं देवदेवेन शूलिना । मृत्युने उसकी आयुपर अधिकार कर लिया था, इस खेदितेन कृतोऽनङ्गो दृष्टो जात्यन्तरे मया ॥ ११ ॥
| ६२८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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'प्राचीन कालमें इनके द्वारा खेदमें डाले जानेपर देवाधिदेव त्रिशूलधारी भगवान् शङ्करने इन्हें अनङ्ग बना दिया था (इनके शरीरको जलाकर भस्म कर दिया था)। आज दूसरे जन्ममें इनका मुझे दर्शन हुआ है॥ ११॥
कथमस्य स्तनं दास्ये मातृभावेन जानती।
भर्तुर्भार्थ्या त्वहं भूत्वा वक्ष्ये वा पुत्र इत्युत॥ १२॥
'जब मैं इस रहस्यको जानती हूँ, तब मातृभावसे इनके मुखमें अपना स्तन कैसे दूँगी। ये मेरे पति हैं, मैं इनकी पत्नी होकर इन्हें पुत्र कैसे कहूँगी'॥ १२॥
एवं संचिन्त्य मनसा धात्र्यास्तं सा समर्पयत्।
रसायनप्रयोगैश्च शीघ्रमेव व्यवर्धयत्॥ १३॥
मन-ही-मन ऐसा सोचकर मायावतीने बालक प्रद्युम्नको एक धायके हाथमें सौंप दिया तथा रसायनके प्रयोगोंसे उन्हें शीघ्र ही बड़ा कर दिया॥ १३॥
धात्र्याः सकाशात् स च तां शृण्वन् रुक्मिणिनन्दनः।
मायावतीमविज्ञानान्मेने स्वामेव मातरम्॥ १४॥
रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न धायसे मायावतीकी प्रशंसा सुनकर उसे अनजानमें अपनी ही माता मानने लगे॥ १४॥
सा च तं वर्द्धयामास कार्ष्णिं कमललोचनम्।
मायाश्वास्मै ददौ सर्वा दानवीः काममोहिता॥ १५॥
मायावतीने कमलनयन श्रीकृष्ण-कुमारको जब बड़ा कर लिया, तब उनके प्रति कामभावसे मोहित होकर उन्हें समस्त दानवी मायाओंकी शिक्षा दे दी॥ १५॥
स यदा यौवनस्थस्तु प्रद्युम्नः कामदर्शनः।
चिकीर्षितज्ञो नारीणां सर्वास्त्रविधिपारगः॥ १६॥
प्रद्युम्न जब युवावस्थामें स्थित हुए, तब साक्षात् कामदेवके समान दिखायी देने लगे। वे स्त्रियोंके मनोभावोंके ज्ञाता और सम्पूर्ण अस्त्रोंके प्रयोगमें पारंगत थे॥ १६॥
तं सा मायावती कान्तं कामयामास कामिनी।
इङ्गितैश्चापि वीक्षन्ती प्रालोभयत सस्मिता।
प्रसञ्जन्तीं तु तां देवीं बभाषे चारुहासिनीम्॥ १७॥
उस समय मायावतीने कामवती नारीकी भाँति अपने उस प्रियतम पतिकी कामना की। वह मुसकराती हुई देखने और अपने हाव-भावोंसे उन्हें लुभाने लगी। उस मनोहर हासवाली देवी मायावतीको अपने प्रति आसक्त होती देख वे इस प्रकार बोले॥ १७॥
प्रद्युम्न उवाच
मातृभावं व्यतिक्रम्य किमेवं वर्तसेऽन्यथा।
अहो दुःस्वभावासि स्त्रीत्वे चपलमानसा॥ १८॥
प्रद्युम्नने कहा—अरी! तू मातृ-भावका उल्लङ्घन करके इस तरह विपरीत बर्ताव कैसे कर रही है? अहो! तू दुःशीला जान पड़ती है। तेरा चित्त अपने स्त्रीत्वको लेकर चञ्चल हो उठा है॥ १८॥
या पुत्रभावमुत्सृज्य मयि लोभात् प्रवर्तसे।
न तु तेऽहं सुतः सौम्ये कोऽयं शीलविपर्ययः॥ १९॥
तभी तो तू मेरे प्रति पुत्रभावका परित्याग करके कामलोभसे प्रेरित हो विपरीत बर्ताव कर रही है। इससे तो जान पड़ता है, मैं तेरा पुत्र नहीं हूँ। सौम्ये! तेरे शील-स्वभावमें यह उलट-फेर कैसा?॥ १९॥
तत्त्वमिच्छाम्यहं देवि कथितं को न्वयं विधिः।
विद्युत्सम्पातचपलः स्वभावः खलु योषिताम्॥ २०॥
या नरेषु प्रसज्जन्ते नगाग्रेषु घना इव।
देवि! मैं यथार्थ बात जानना चाहता हूँ, तू ठीक-ठीक बता दे कि तेरा यह व्यवहार कैसा है? निश्चय ही नारियोंका स्वभाव विद्युतपातके समान चपल होता है। जैसे बादल पर्वत-शिखरोंसे सक्त होते हैं, उसी तरह काममोहित स्त्रियाँ सभी पुरुषोंपर आसक्त हो जाती हैं॥ २० १/२॥
यदि तेऽहं सुतः सौम्ये यदि वा नात्मजः शुभे॥ २१॥
कथितं तत्त्वमिच्छामि किमिदं ते चिकीर्षितम्।
सौम्ये! शुभे! यदि मैं तेरा पुत्र होऊँ तो वह बता दे, अथवा यदि तेरा पुत्र न भी होऊँ तो वह भी बता दे। मैं तेरे मुखसे यथार्थ बात सुनना चाहता हूँ। तू यह क्या करना चाहती है॥ २१ १/२॥
एवमुक्ता तु सा भीरुः कामेन व्यथितेन्द्रिया॥ २२॥
प्रियं प्रोवाच वचनं विविक्ते केशवात्मजम्।
न त्वं मम सुतः कान्त नापि ते शम्बरः पिता॥ २३॥
उनके इस प्रकार पूछनेपर भीरूहृदया मायावती, जिसकी सारी इन्द्रियाँ कामसे व्यथित हो उठी थीं, एकान्तमें अपने प्रियतम केशवकुमारसे इस प्रकार बोली—'प्राणवल्लभ! तुम मेरे पुत्र नहीं हो और शम्बरासुर भी तुम्हारा पिता नहीं है॥ २२-२३॥
रूपवानसि विक्रान्तस्त्वं जात्या वृष्णिनन्दन।
पुत्रस्त्वं वासुदेवस्य रुक्मिण्यानन्दवर्धनः॥ २४॥
'वृष्णिकुलनन्दन! तुम जन्मसे ही रूपवान् और पराक्रमी हो। वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके पुत्र हो और माता रुक्मिणीका आनन्द बढ़ानेवाले उनके लाड़ले लाल हो॥ २४॥
दिवसे सप्तमे बालो जातमात्रोऽपवाहितः।
सूतिकागारमध्यात् त्वं शिशुरुत्तानशायितः॥ २५॥
मम भर्त्ता हतोऽसि त्वं बलवीर्यप्रवर्तिना।
पितुस्ते वासुदेवस्य धर्षयित्वा गृहं महत्॥ २६॥
'तुम्हारे जन्मके सातवें दिन जब कि तुम बालशिशुके रूपमे शय्यापर उत्तान सुलाये गये थे, मेरा भरण-पोषण करने-
विष्णुपर्व ] चतुरधिकशततमोऽध्यायः ६२९
वाले तथा बल और पराक्रमपूर्वक किसी कार्यमें प्रवृत्त होनेवाले शम्बरासुरने तुम्हारे पिता भगवान् वासुदेवके विशाल गृहको तिरस्कृत करके सूतिकागारके भीतरसे तुम्हारा अपहरण कर लिया ॥ २५-२६ ॥
पाकशासनकल्पस्य हृतस्त्वं शम्बरेण ह।
सा च ते करुणं माता त्वां बालमनुशोचती ॥ २७ ॥
अत्यर्थं तप्यते वीर विवत्सा सौरभी यथा।
'तुम इन्द्रके समान तेजस्वी पिताके पुत्र हो, तो भी शम्बरासुरने तुम्हें हर लिया। वीर! तुम्हारी माता रुक्मिणी भी तुम-जैसे बालकके लिये निरन्तर शोकमग्न रहकर करुण विलाप करती और अत्यन्त संतप्त होती हैं, ठीक उसी तरह जैसे अपने बछड़ेसे बिछुड़ी हुई गाय उसके लिये क्रन्दन करती रहती है ॥ २७$\frac{१}{२}$॥
सोऽपि शक्रादपि महान् पिता ते गरुडध्वजः ॥ २८ ॥
इह त्वां नाभिनाजानाति बालमेवापवाहितम् ।
'तुम्हारे पिता भगवान् गरुडध्वज इन्द्रसे भी महान् हैं, किंतु उन्हें भी इस बातका पता नहीं है कि तुम बाल्यावस्थामें ही यहाँ हर लाये गये हो ॥ २८$\frac{१}{२}$॥
कान्त वृष्णिकुमारस्त्वं न हि त्वं शम्बरात्मजः ॥ २९ ॥
वीर नैवंविधान् पुत्रान् दानवा जनयन्ति हि।
'प्रियतम ! तुम वृष्णिकुलके कुमार हो, शम्बरके पुत्र नहीं। वीर ! दानव तुम-जैसे पुत्रोंको जन्म नहीं देते ॥ २९$\frac{१}{२}$॥
अतोऽहं कामयामि त्वां न हि त्वं जनितो मया ॥ ३० ॥
रूपं ते सौम्य पश्यन्ती सीदामि हृदि दुर्बला ।
'सौम्य ! इसीलिये मै तुम्हें चाहती हूँ, क्योंकि मैने तुम्हें उत्पन्न नहीं किया है। मैं दुर्बल अबला तुम्हारे मनोहर रूपका दर्शन करके मन-ही-मन कामसे संतत हो रही हूँ ॥ ३०$\frac{१}{२}$॥
यन्मे व्यवसितं कान्त यत् तु मे हृदि वर्तते ॥ ३१ ॥
तन्मे मनसि वार्ष्णेय प्रतिसंधातुमर्हसि ।
'प्राणवल्लभ ! वृष्णिनन्दन ! मैंने जो कुछ करनेका निश्चय किया है, मेरे हृदयमें जो भाव है, उसे तुम मेरे मनोमन्दिरमें निवास करके पूर्ण करो ॥ ३१$\frac{१}{२}$ ॥
एष ते कथितः सर्वः सद्भावस्त्वयि यो मम ॥ ३२ ॥
यथा न मम पुत्रस्त्वं न पुत्रः शम्बरस्य च।
'तुम्हारे प्रति मेरे हृदयमे जो सद्भाव था, यह सब मैंने तुम्हे बता दिया, न तो तुम मेरे पुत्र हो और न शम्बरासुरके ही' ॥ ३२$\frac{१}{२}$ ॥
श्रुत्वैवमखिलं सर्वं मायावत्या प्रभाषितम् ॥ ३३ ॥
चक्रायुधात्मजः क्रुद्धः शम्बरं स समाह्वयत् ।
सर्वमायास्रविच्छोऽसौनाम विधाव्य चात्मनः ॥ ३४ ॥
मायावतीकी कही हुई यह सारी बात सुनकर भगवान् चक्रपाणिके पुत्र प्रद्युम्न कुपित हो उठे। वे समस्त मायाओंके ज्ञाता थे, उन्होंने अपना नाम सुनाकर शम्बरासुरको युद्धके लिये ललकारनेका निश्चय किया ॥३३-३४॥
अहो दानवदुष्टात्मा केशवस्यात्मजं शिशुम् ।
हरते निर्भयश्चैव भयमद्य करोम्यहम् ॥ ३५॥
वे मन-ही-मन कहने लगे, 'अहो ! इस दुष्टात्मा दानव ने केशवके शिशु पुत्रका अपहरण किया है, तो भी यह निर्भय बना बैठा है और मैं आज इससे भय मान रहा हूँ ॥ ३५ ॥
कथं वै क्रोधमागच्छेद् वध्यते वा कथं मया ।
प्रथमं किं करिष्यामि येन कुप्यति मन्दधीः ॥ ३६ ॥
'अब यह किस प्रकार मेरे ऊपर कुपित होगा और कैसे मेरे द्वारा इसका वध किया जायगा ? मैं पहले क्या करूँ, जिससे यह मन्दबुद्धि दानव मुझपर कुपित हो ? ॥ ३६ ॥
अस्ति चास्य ध्वजं चित्रं सिंहकेतुविभूषितम् ।
तोरणं गृहमासाद्य उच्छ्रितं मेरुशृङ्गवत् ॥ ३७॥
'इसके यहाँ एक विचित्र ध्वज है, जो सिंहके चिह्नसे युक्त पताकाद्वारा विभूषित है। वह ध्वज बाहरी फाटकपर लगा है और मेरु पर्वतके शिखरके समान ऊँचा जान पड़ता है ॥ ३७ ॥
एतदुन्मथ्य पातिष्ये भल्लेन निशितेन वै ।
ध्वजच्छेदं विदित्वाथ शम्बरो निष्क्रमिष्यति ॥ ३८ ॥
'आज मैं अपने तीखे भल्लसे इसको काट गिराऊँगा। अपने ध्वजको खण्डित हुआ जानकर शम्बरासुर युद्धके लिये निकलेगा ॥ ३८ ॥
ततो युद्धेन हत्त्वाऽऽजौ गन्तास्मि द्वारकां प्रति ।
इत्युक्त्वा सज्यमाचक्रे सशरं चापमोजसा ॥ ३९ ॥
'तब मैं युद्धके द्वारा समराङ्गणमे इसका वध करके द्वारका-पुरीको जाऊँगा।' मन-ही-मन ऐसा कहकर प्रद्युम्नने वलपूर्वक धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और उसपर बाणका संधान किया ॥
विच्छेद ध्वजरत्नं तु शम्बरस्य महाभुजः !
तच्छ्रुत्वा तु ध्वजच्छेदं प्रद्युम्नेन महात्मना ॥ ४० ॥
क्रुद्धस्त्वाज्ञापयामास पुत्रान् वै कालशम्बरः।
जिघांसध्वं महावीरा रौक्मिणेयं त्वरान्विताः ॥ ४१ ॥
नैवं वै द्रष्टुमिच्छामि मम विप्रियकारकम् ।
उस बाणके द्वारा महाबाहु प्रद्युम्नने शम्बरासुरके ध्वज-रत्नको काट डाला। महात्मा प्रद्युम्नके द्वारा ध्वजके खण्डित होनेका समाचार सुनकर कुपित हुए कालशम्बरने अपने पुत्रोंको आज्ञा दी, 'महावीरो ! इस रुक्मिणीपुत्रको तुरंत
६३० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
मार डालनेकी चेष्टा करो। इसने मेरा अप्रिय किया है, अब मैं इस तरह इसे जीवित देखना नहीं चाहता' ॥ ४०-४१॥
श्रुत्वा तु शम्बराद्वाक्यं सुतास्ते शम्बरस्य ह ॥ ४२ ॥
संनद्धा निर्ययुर्हृष्टाः प्रद्युम्नवधकाङ्क्षया।
शम्बरका यह आदेश सुनकर उसके पुत्र कवच आदिसे सुसज्जित हो प्रद्युम्नके वधकी इच्छासे हर्षपूर्वक निकले ॥४२॥
चित्रसेनोऽतिसेनश्च विष्वक्सेनो गदस्तथा ॥ ४३ ॥
श्रुतसेनः सुषेणस्तु सोमसेनो मनस्तथा।
सेनानी सैन्यहन्ता च सेनाहा सैनिकस्तथा ॥ ४४ ॥
सेनस्कन्धोऽतिसेनश्च सेनको जनकः सुतः।
सकालो विकलः शान्तः स शातान्तकरोऽशुचिः॥४५॥
कुम्भकेतुः सुदंष्ट्रश्च केशिरित्येवमादयः।
चित्रसेन, अतिसेन, विष्वक्सेन, गद, श्रुतसेन, सुषेण, सोमसेन, मन, सेनानी, सैन्यहन्ता, सेनाहा, सैनिक, सेनस्कन्ध, अतिसेन, सेनक, जनक, सुत, सकाल, विकल, शान्त, शातान्तकर, अशुचि, कुम्भकेतु, सुदंष्ट्र और केशि आदि उनके नाम थे ॥ ४३-४५॥
चक्रतोमरशूलानि पट्टिशानि परश्वधान् ॥ ४६ ॥
गृहीत्वा निर्ययुर्हृष्टा मन्युना परमाप्लुताः।
आह्वयंतस्तममित्रं वै तस्थुः संग्राममूर्धनि ॥ ४७ ॥
वे सब-के-सब हर्ष और उत्साहसे परिपूर्ण हो प्रद्युम्नके प्रति क्रोधसे भरकर चक्र, तोमर, शूल, पट्टिश और फरसे लिये निकले और अपने उस शत्रुको ललकारते हुए युद्धके मुहानेपर खड़े हो गये ॥ ४६-४७ ॥
प्रद्युम्नस्तु महाबाहु रथमारुह्य सत्वरम्।
निर्ययौ चापमादाय संग्रामाभिमुखस्तदा ॥ ४८ ॥
उस समय महाबाहु प्रद्युम्न तुरंत ही रथपर आरूढ़ हो धनुष लेकर युद्धक्षेत्रकी ओर चल दिये ॥ ४८ ॥
ततः प्रवृत्तं युद्धं तु तुमुलं लोमहर्षणम्।
शम्बरस्य तु पुत्राणां केशवस्य च सूनुना ॥ ४९ ॥
तदनन्तर शम्बरासुरके पुत्रोंका केशवकुमारके साथ भयंकर एवं रोमाञ्चकारी युद्ध आरम्भ हो गया ॥ ४९ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः समहोरगचारणाः।
देवराजं पुरस्कृत्य विमानाग्रेषु धिष्ठिताः ॥ ५० ॥
फिर तो सब देवता, गन्धर्व, बड़े-बड़े नाग और चारण देवराज इन्द्रको आगे करके विमानोंके अग्रभागोंमें स्थित हुए ॥
नारदस्तुम्बुरुश्चैव हाहाहूहूश्च गायनाः।
अप्सरोभिः परिवृताः सर्वे तत्रावतस्थिरे ॥ ५१ ॥
नारद, तुम्बुरु, हाहा और हूहू—ये गान करनेवाले गन्धर्व अप्सराओंसे घिरकर सभी उन विमानोंमें स्थित थे ॥ ५१ ॥
देवराजप्रतीहारो गन्धर्वश्चित्रमद्भुतम्।
शशंस देवराजाय वज्रिणे तद्विचेष्टितम् ॥ ५२ ॥
देवराज इन्द्रका प्रतीहार गन्धर्व वज्रधारी इन्द्रको प्रद्युम्नकी विचित्र एवं अद्भुत चेष्टाएँ सुनाने लगा—॥५२॥
शम्बरस्य शतं पुत्रा एकः कृष्णस्य चात्मजः।
बहूनां युध्यतामेष कथं विजयमाप्नुयात् ॥ ५३ ॥
'एक ओर तो शम्बरासुरके सौ पुत्र हैं और दूसरी ओर श्रीकृष्णके एकमात्र पुत्र प्रद्युम्न हैं, बहुत-से योद्धाओंके सामने ये अकेले ही कैसे विजय पा सकते हैं' ॥ ५३ ॥
तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्य प्रहस्य बलसूदनः।
उवाच वचनं चेदं शृणु योऽस्य पराक्रमः ॥ ५४ ॥
उसका वह कथन सुनकर बलसूदन इन्द्र जोर-जोरसे हँस पड़े और बोले—'प्रद्युम्नका जो पराक्रम है, उसका वर्णन सुनो ॥
कामोऽयं पूर्वदेहे तु हरक्रोधाग्निना हतः।
रत्या प्रसादितो देवः कामपत्नया त्रिलोचनः।
परितुष्टेन देवेन वरमस्याः प्रदीयते ॥ ५५ ॥
'ये कामदेव हैं, जो पूर्वशरीरमें रहते समय भगवान् शंकरकी क्रोधाग्निसे भस्म हो गये थे, फिर कामपत्नी रतिने महादेवजीको प्रसन्न किया। प्रसन्न हुए महादेवजीने उसे वर दिया ॥ ५५ ॥
विष्णुर्मानुषदेहस्तु द्वारकायां भविष्यति।
तस्य पुत्रत्वमस्यैव भविष्यति न संशयः ॥ ५६ ॥
'भगवान् विष्णु मानव-शरीर धारण करके जब द्वारकामें निवास करेंगे, उस समय तुम्हारे स्वामी कामदेव उनके पुत्र होंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ५६ ॥
अनङ्ग इति विख्यातस्त्रैलोक्ये तु महायशाः।
तत्रोत्पन्नो महातेजाः शम्बरं घातयिष्यति ॥ ५७ ॥
'इस समय ये महायशस्वी कामदेव तीनों लोकोंमें अनङ्ग नामसे विख्यात होंगे और द्वारकामें उत्पन्न होनेपर महान् तेजसे सम्पन्न हो शम्बरासुरका वध करेंगे ॥ ५७ ॥
सप्ताहे जातमात्रे तु रुक्मिण्याः क्रोडसंस्थितम्।
आस्थाय शम्बरो मायां प्रद्युम्नमपनेष्यति ॥ ५८ ॥
'उनके जन्मसे केवल सात दिनका समय व्यतीत होनेपर रुक्मिणीकी गोदमें स्थित हुए प्रद्युम्नको मायाका आश्रय ले शम्बरासुर हर ले जायगा ॥ ५८ ॥
तद् गच्छ शम्बरगृहं भार्या मायावती भव।
मायारूपप्रतिच्छन्ना शम्बरं मोहयिष्यसि ॥ ५९ ॥
'अतः तू शम्बरासुरके घर जा और उसकी मायामयी भार्या बन जा। मायासे अपने यथार्थ रूपको छिपाकर तू शम्बरासुरको मोहमें डाले रहेगी ॥ ५९ ॥
| विष्णुपर्व ] | पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः | ६३१ |
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तत्र त्वमात्मनः कान्तं बालरूपं विवर्धय ।
प्राप्तयौवनदेहस्तु शम्बरं निहनिष्यति ॥ ६० ॥
‘वहाँ तुम्हें अपने प्रियतम कामदेव बालरूपमें प्राप्त होंगे। धायद्वारा उनका पालन-पोषण करके तुम उन्हें बड़ा बनाना। जब वे तरुण शरीर प्राप्त कर लेंगे, उस समय शम्बरासुरका वध करेंगे’ ॥ ६० ॥
ततस्त्वया सहानुङ्गो द्वारकां वै गमिष्यति ।
रमिष्यति त्वया सार्द्धं शैलपुत्र्या यथा ह्यहम् ॥ ६१ ॥
‘तदनन्तर कामदेव तुम्हारे साथ द्वारकामें जायेंगे और जैसे पार्वतीके साथ मैं रहता हूँ, उसी प्रकार तुम्हारे साथ वे आनन्दपूर्वक रहेंगे’ ॥ ६१ ॥
एवमादिश्य देवेशो जगाम पुरुषोत्तमः ।
कैलासं मेरुसंकाशं सिद्धचारणसेवितम् ॥ ६२ ॥
‘ऐसा आदेश देकर देवेश्वर पुरुषोत्तम शिव सिद्ध-चारण-सेवित कैलासपर्वतको, जो मेरुगिरिके समान है, चले गये ॥
कामपत्नी प्रणम्याथ देवदेवमुमापतिम् ।
जगाम शम्बरगृहं कालस्यान्तं प्रतीक्षती ॥ ६३ ॥
‘इसके बाद कामपत्नी रति देवाधिदेव उमापतिको प्रणाम करके कालके अन्तकी प्रतीक्षा करती हुई शम्बरासुरके घरको चली गयी ॥ ६३ ॥
एवमेष महाबाहुः शम्बरं निहनिष्यति ।
सह पुत्रेण प्रद्युम्नो हन्ता तस्य दुरात्मनः ॥ ६४ ॥
‘इस प्रकार ये महाबाहु प्रद्युम्न पुत्रोंसहित शम्बरासुरका संहार कर डालेंगे; क्योंकि वे ही इस दुरात्माका अन्त करनेवाले हैं’ ॥ ६४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शम्बरवधे चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शम्बरासुरका वधविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०४ ॥
पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः
प्रद्युम्नद्वारा शम्बरासुरकी सेना और मन्त्रियोंका संहार
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रवृद्धं युद्धं तु तुमुलं लोमहर्षणम् ।
शम्बरस्य तु पुत्राणां रुक्मिण्या नन्दनस्य च ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! तत्पश्चात् शम्बरासुरके पुत्रों तथा रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नका घोर रोमाञ्चकारी युद्ध आरम्भ हुआ ॥ १ ॥
ततः क्रुद्धा महादैत्याः शरशक्तिपरश्वधान् ।
चक्रतोमरकुन्तानि भुशुण्डीर्मुसलानि च ॥ २ ॥
युगपत् पातयन्ति स्म प्रद्युम्नोपरि वेगिताः ।
उस समय क्रोधमें भरे हुए बड़े-बड़े वेगशाली दैत्य एक ही साथ प्रद्युम्नपर बाण, शक्ति, फरसे, चक्र, तोमर, कुन्त, भुशुण्डी और मुसलोंकी वर्षा करने लगे ॥ २॥ ॥
कार्ष्णायनिस्तु संक्रुद्धः सर्वास्त्रधनुषश्च्युतैः ॥ ३ ॥
एकैकं पञ्चभिः क्रुद्धश्चिच्छेद रणमूर्धनि ।
यह देख श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न अत्यन्त कुपित हो उठे और अपने सर्वास्त्रवर्णी धनुषसे छूटे हुए पाँच-पाँच बाणोंद्वारा उन्होंने युद्धके मुहानेपर शत्रुओंके प्रत्येक अस्त्रको क्रोधपूर्वक काट डाला ॥ ३॥ ॥
पुनरेवासुराः क्रुद्धाः सर्वे ते कृतनिश्चयाः ॥ ४ ॥
ववृषुः शरजालानि प्रद्युम्नवधकाङ्क्षया ।
तब वे सभी असुर पुनः कुपित हो युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके प्रद्युम्नके वधकी इच्छासे बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे ॥ ४॥ ॥
ततः प्रकुपितोऽनङ्गो धनुरादाय सत्वरः ॥ ५ ॥
शम्बरस्य जघानाशु दश पुत्रान् महौजसः ।
इससे अनङ्गस्वरूप प्रद्युम्नका क्रोध बहुत बढ़ गया । उन्होंने तुरंत ही धनुष हाथमें लेकर अपने बाणोंद्वारा शम्बरासुरके दस महाबली पुत्रोंको तत्काल कालके गालमें भेज दिया ॥ ५॥ ॥
ततोऽपरेण भल्लेन कुपितः केशवात्मजः ॥ ६ ॥
चिच्छेदाशु शिरस्तस्य चित्रसेनस्य वीर्यवान् ।
तत्पश्चात् कुपित हुए पराक्रमी केशवकुमारने दूसरे भल्लसे बड़ी शीघ्रताके साथ चित्रसेनका मस्तक काट डाला ॥ ६॥ ॥
ततस्ते हतशेषास्तु समेत्य समयुद्ध्यत ॥ ७ ॥
शरवर्षे विमुञ्चन्तो ह्यभ्यधावञ्जिघांसितुम् ।
सतः संधाय बाणांस्ते विमुञ्चन्तो रणोत्सुकाः ॥ ८ ॥
तदनन्तर जो मरनेसे बच गये, वे सब एक साथ संगठित होकर युद्ध करने लगे । बाणोंकी वर्षा करते हुए उन्होंने प्रद्युम्नको मार डालनेकी इच्छासे उनपर धावा किया । वे बाणोंको धनुषपर रखकर युद्धके लिये उत्सुक हो उन्हें छोड़ने लगे ॥ ७-८ ॥
क्रीडन्निव महातेजाः शिरांस्तेषामपातयत् ।
६३२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
निहत्य समरे सर्वांश्छतमुत्तमधन्विनाम् ॥ ९ ॥
प्रद्युम्नः समराकाङ्क्षी तस्थौ संग्राममूर्धनि ।
महातेजस्वी प्रद्युम्न खेल-सा करते हुए इनके मस्तक काट-काटकर गिराने लगे । समराङ्गणमे जो सौ उत्तम धनुर्धर वीर थे, उन सबका संहार करके वे मनमें और भी युद्धकी अभिलाषा लिये संग्रामके मुहानेपर खड़े हो गये ॥ ९½॥
हतं पुत्रशतं श्रुत्वा शम्बरः क्रोधमादधे ॥ १० ॥
सूतं संचोदयामास रथं मे संप्रयोजय ।
अपने सौ पुत्रोंका वध हुआ सुनकर शम्बरासुरको बड़ा क्रोध हुआ । उसने सारथिको आदेश दिया कि मेरे रथको जोतो ॥ १०½ ॥
राज्ञो वाक्यं निशाम्याथ प्रणम्य शिरसा भुवि ॥ ११ ॥
ससैन्यं नोदयामास रथं स सुसमाहितम् ।
राजाकी यह बात सुनकर सारथिने पृथ्वीपर मस्तक टेककर प्रणाम किया और सेनासहित रथको पूरी सावधानीके साथ युद्धके लिये प्रेरित किया ॥ ११½ ॥
युक्तमृष्यसहस्रेण सर्पयोक्त्रेण योजितम् ॥ १२ ॥
शार्दूलचर्मसंविष्टं किङ्किणीजालमालिनम् ।
ईहामृगगणाकीर्णं पङ्क्तिभिर्विराजितम् ॥ १३ ॥
उस रथमें एक सहस्र मृग जुते हुए थे । वह सर्पोंकी रस्सियोंसे जोता गया था । वह रथ व्याघ्रचर्मसे ढका हुआ था, उसमें घुँघुरुओंकी माला शोभा दे रही थी, वह कृत्रिम पशु-पक्षियोंसे व्याप्त तथा दस चित्रभागोंसे विभूषित था ॥
ताराचित्रपिनद्धाङ्गं स्वर्णकूवरभूषितम् ।
सुपताकमहोच्छ्रायं मृगराजोग्रकेतनम् ॥ १४ ॥
उसके सारे अङ्ग तारिकाओंके चित्रसे व्याप्त थे । सोनेका कूबर उस रथकी शोभा बढ़ा रहा था । उसका बहुत ही ऊँचा भाग सुन्दर पताकाओंसे सुशोभित था। उसमें सिंहके चिह्नवाली उग्र ध्वजा फहरा रही थी ॥ १४ ॥
सुविभक्तवरणं च लोहेषावज्रकूवरम् ।
मन्दरोदग्रशिखरं चारुचामरभूषितम् ॥ १५ ॥
उस रथका आवरण सुन्दर विभागपूर्वक बना हुआ था । उसमें लोहेके हरसे और वज्रमणिजटित कूबर शोभा पाते थे । उसका शिखर मन्दराचलके समान ऊँचा था । वह सुन्दर चँवरसे विभूषित था ॥ १५ ॥
नक्षत्रमालापिहितं हेमदण्डसमाहितम् ।
विराजमानं श्रीमन्तमारोहच्छम्बरो रथम् ॥ १६ ॥
नक्षत्रोंकी मालाओंसे आवृत्त तथा सुवर्णमय दण्डसे सुस्थिर बने हुए उस शोभाशाली कान्तिमान् रथपर शम्बरासुर आरूढ़ हुआ ॥ १६ ॥
काञ्चनं चित्रसंनाहं धनुर्गृह्य शरांस्तथा ।
प्रस्थितः समराकाङ्क्षी मृत्युना परिचोदितः ॥ १७ ॥
सोनेका विचित्र कवच, धनुष और बाण धारण करके कालसे प्रेरित हो युद्धकी इच्छासे वह प्रस्थित हुआ ॥ १७ ॥
चतुर्भिः सचिवैः सार्द्धं सैन्येन महता वृतः ।
दुर्धरः केतुमाली च शत्रुहन्ता प्रमर्दनः ॥ १८ ॥
एतैः परिवृतोऽमात्यैर्युयुत्सुः प्रस्थितो रणे ।
उसके साथ चार मन्त्री थे और वह विशाल सेनासे घिरा हुआ था । दुर्धर, केतुमाली, शत्रुहन्ता और प्रमर्दन—इन मन्त्रियोंमें घिरा हुआ वह युद्धकी इच्छासे रणभूमिकी ओर प्रस्थित हुआ ॥ १८½ ॥
दशनागसहस्राणि रथानां द्वे शते तथा ॥ १९ ॥
हयानां चाष्टसाहस्रैः प्रयुतश्च पदातिनाम् ।
एतैः परिवृतो योधैः शम्बरः प्रययौ तदा ॥ २० ॥
दस हजार हाथी, दो सौ रथ, आठ हजार घोड़े और दस लाख पैदल इतने योद्धाओंमे घिरे हुए शम्बरासुरने उस समय युद्धके लिये प्रस्थान किया ॥ १९-२० ॥
प्रयातस्य तु संग्रामे उत्पाता बहवोऽभवन् ।
गृध्रचक्राकुलं व्योम संध्याकाराभ्रनादितम् ॥ २१ ॥
युद्धके लिये जाते समय उसके सामने बहुत-से उत्पात प्रकट हुए । आकाशमें गृध्रोंका मण्डल मँडराने लगा । संध्याकालके समान लाल रङ्गके बादल गड़गड़ाने लगे ॥ २१ ॥
गर्जन्ति परुषं मेघा निर्घाताश्चाम्बरात् पतन् ।
शिवा विनेदुरशिवं सैन्यं संकालयन्महत् ॥ २२ ॥
मेघ बड़े कठोर शब्दमें गर्जना करने लगे, आकाशसे बिजली गिरने लगी, गीदड़ियाँ अमङ्गलसूचक बोली बोलने लगीं, जिससे सेनाके महान् संहारकी सूचना मिलती थी ॥
ध्वजशीर्षेऽपतद्गृध्रः काङ्क्षन् वै दानवासृजम् ।
रथाग्रे पतितश्चास्य कबन्धो भुवि दृश्यते ॥ २३ ॥
गीध दानवोंके रक्तका पान करनेकी इच्छा रखकर उसकी ध्वजाके अग्रभागपर जा बैठा । उसके रथके सामने पृथ्वीपर कबन्ध पड़ा हुआ दिखायी देने लगा ॥ २३ ॥
चीचींकूचीति वाशन्ति शम्बरस्य रथोपरि ।
खर्भानुग्रस्त आदित्यः परिघैः परिवेष्टितः ॥ २४ ॥
शम्बरासुरके रथके ऊपर बहुत-से पक्षी 'चीचीं कूची' ऐसी बोली बोलने लगे । सूर्यको राहुने ग्रस लिया और उनपर अनेक घेरे पड़ गये ॥ २४ ॥
स्फुरते नयनं चास्य सव्यं भयनिवेदनम् ।
बाहुः प्रकम्पते सव्यः प्रास्खलन् रथवाजिनः ॥ २५ ॥
उसका बायाँ नेत्र फड़कने लगा, जो भयकी सूचना दे रहा था । बायीं भुजा काँपने लगी और रथके घोड़े लड़खड़ाकर गिरने लगे ॥ २५ ॥
विष्णुपूर्व ] पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः । ६३३
ध्वाङ्क्षो मूर्ध्नि निपतितः शम्बरस्य सुरारिणः ।
ववर्ष रुधिरं देवः शर्कराङ्गारमिश्रितम् ॥ २६ ॥
देवद्रोही शम्बरासुरके मस्तकपर कौआ जा बैठा, पर्जन्य-देव कंकड़ और अङ्गारोंसे मिश्रित रक्तकी वर्षा करने लगे ॥
उल्कापातसहस्राणि निपेतु रणमूर्धनि ।
प्रतोदो न्यपतद्धस्तात् सारथेर्हययायिनः ॥ २७ ॥
संग्रामके मुहानेपर सहस्रों उल्कापात होने लगे, घोड़े हाँकनेवाले सारथिके हाथसे चाबुक गिर पड़ा ॥ २७ ॥
एतानचिन्तयित्वा तु उत्पातान् समुपस्थितान् ।
प्रययौ शम्बरः क्रुद्धः प्रद्युम्नवधकाङ्क्षया ॥ २८ ॥
इन उपस्थित हुए उत्पातोंकी कोई परवा न करके क्रोधमें भरा हुआ शम्बरासुर प्रद्युम्नको मार डालनेकी इच्छासे आगे बढ़ा ॥ २८ ॥
भेरीमृदङ्गशङ्खानां पणवानकदुन्दुभेः ।
युगपन्नाद्यमानानां पृथिवी समकम्पत ॥ २९ ॥
उस समय एक ही साथ भेरी, मृदङ्ग, शङ्ख, पणव, आनक और दुन्दुभि आदि बाजे बज उठे। उनकी तुमुल ध्वनिसे यह पृथ्वी काँपने लगी ॥ २९ ॥
तेन शब्देन महता संत्रस्ता मृगपक्षिणः ।
नमन्ताद् दुद्रुवुस्तस्माद् भयविकलवचेतसः ॥ ३० ॥
उस महान् शब्दसे सारे पशु-पक्षी संत्रस्त हो गये और भयसे व्याकुलचित्त होकर सब ओर भागने लगे ॥ ३० ॥
रणमध्ये स्थितः कार्ष्णिश्चिन्तयन् निधनं रिपोः ।
सैन्यैः परिवृतोऽसंख्यैर्युद्धाय कृतनिश्चयः ॥ ३१ ॥
उस समय रणभूमिके मध्यभागमें शत्रुके वधका चिन्तन करते हुए श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न असंख्य सेनाओंसे घिरे हुए युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके खड़े हुए थे ॥ ३१ ॥
क्रुद्धः शरसहस्रेण प्रद्युम्नं समताडयत् ।
सम्प्राप्तांश्चैव तान् बाणांश्चिच्छेद कृतहस्तवत् ॥ ३२ ॥
शम्बरासुरने कुपित होकर प्रद्युम्नपर एक हजार बाणोंका प्रहार किया, उन बाणोंको अपने पास आते ही प्रद्युम्नने एक सिद्धहस्त योद्धाकी भाँति काट डाला ॥ ३२ ॥
प्रद्युम्नो धनुरानम्य शरवर्षं मुमोच ह ।
तस्मिन् सैन्ये न कोऽप्यस्ति यो न विद्धः शरेण वै ॥ ३३ ॥
अब प्रद्युम्न धनुष लेकर बाणोंकी वर्षा करने लगे। उस समय उस सेनामें ऐसा कोई भी सैनिक नहीं था, जो उनके बाणोंसे विद्ध न हुआ हो ॥ ३३ ॥
प्रद्युम्नशरपातेन तत् सैन्यं विमुखीकृतम् ।
शम्बरस्य तथाभ्याशे स्थितं संहृत्य भीतवत् ॥ ३४ ॥
प्रद्युम्नके बाणोंके प्रहारसे वह सारी सेना युद्धसे विमुख हो गयी तथा भयभीतकी भाँति शम्बरासुरके समीप सिमटकर खड़ी हो गयी ॥ ३४ ॥
स्वबलं विद्रुतं दृष्ट्वा शम्बरः क्रोधमूर्च्छितः ।
आज्ञापयामास तदा सचिबान् दानवेश्वरः ॥ ३५ ॥
अपनी सेनाको भागती देख दानवराज शम्बर क्रोधसे अचेत-सा हो गया। उस समय उसने अपने मन्त्रियोंको आज्ञा दी—॥ ३५ ॥
गच्छध्वं मन्नियोगेन प्रहरध्वं रिपोः सुतम् ।
नोपेक्षणीयः शत्रुर्वै वध्यतां क्षिप्रेमव वै ॥ ३६ ॥
'तुम सब लोग जाओ और मेरे आदेशसे शत्रुके उस पुत्र-पर प्रहार करो। तुम्हें इस शत्रु की उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। इसे शीघ्र ही मार डालो ॥ ३६ ॥
उपेक्षित इव व्याधिः शरीरं नाशयेद् ध्रुवम् ।
तदेष दुर्मतिः पापो वध्यतां मत्प्रियेप्सया ॥ ३७ ॥
'यदि इसकी उपेक्षा की गयी तो यह उपेक्षित रोगकी भाँति निश्चय ही शरीरका नाश कर डालेगा, अतः मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे इस दुर्बुद्धि पापीका वध कर डालो' ॥ ३७ ॥
ततस्ते सचिवाः क्रुद्धाः शिरसा गृह्य शासनम् ।
शरवर्षं विमुञ्चन्तस्त्वरिता नोदयन् रथान् ॥ ३८ ॥
तब उन मन्त्रियोंने स्वामीकी आज्ञाको शिरोधार्य करके क्रोधपूर्वक बाणवर्षा करते हुए बड़ी उतावलीके साथ रथोंको हाँका ॥ ३८ ॥
तान् दृष्ट्वा धावतः संख्ये क्रुद्धो मकरकेतनः ।
चापमुद्यम्य सम्भ्रान्तस्तस्थौ प्रमुखतो बली ॥ ३९ ॥
युद्धमें उन्हें धावा करते देख बलवान् मकरध्वज प्रद्युम्न भी कुपित हो उठे और बड़े वेगसे धनुष उठाकर शत्रुओंके सामने खड़े हो गये ॥ ३९ ॥
दुर्धरं पञ्चविंशत्या शरैः संनतपर्वभिः ।
विभेद सुमहातेजाः केतुमालिं त्रिषष्टिभिः ॥ ४० ॥
सप्तत्या शत्रुहन्तारं द्व्यशीत्या तु प्रमर्दनम् ।
विभेद परमावर्षी रुक्मिण्या नन्दिवर्धनः ॥ ४१ ॥
रुक्मिणीका आनन्द बढ़ानेवाले महातेजस्वी प्रद्युम्नने अत्यन्त अमर्षमें भरकर झुकी हुई गाँठवाले पचीस बाणोंसे दुर्धरको, तिरसठ बाणोंसे केतुमालीको, सत्तर बाणोंसे शत्रुहन्ताको और बयासी बाणोंसे प्रमर्दनको घायल कर दिया।
ततस्ते सचिवाः क्रुद्धाः प्रद्युम्नं शरवृष्टिभिः ।
एकैकशो विभेदाजौ षष्टिभिः षष्टिभिः शरैः ॥ ४२ ॥
तदनन्तर वे कुपित हुए मन्त्री भी प्रद्युम्नको बाण-वर्षाका निशाना बनाने लगे। उनमेंसे एक-एकने प्रद्युम्नको साठ-साठ बाण मारे ॥ ४२ ॥
तानप्राप्ताञ्छरान् बाणैश्चिच्छेद मकरध्वजः ।
ततोऽर्द्धचन्द्रमादाय दुर्धरस्य स सारथिम् ॥ ४३ ॥
६३४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
जघान पश्यतां राज्ञां सर्वेषां सैनिकस्य वै।
उन बाणोंको अपने पास आनेसे पहले ही प्रद्युम्नने तीखे सायकोंसे काट डाला। तत्पश्चात् एक अर्धचन्द्राकार बाण लेकर समस्त राजाओं और उनके सैनिकोंके देखते-देखते दुर्धरके सारथिको मार डाला ॥ ४३ १/२ ॥
चतुर्भीरथ नाराचैः सुपर्वैः कङ्कतेजितैः ॥ ४४ ॥
जघान चतुरः सोऽश्वान् दुर्धरस्य रथं प्रति ।
फिर उत्तम गाँठवाले, कङ्कपत्रयुक्त चार तीखे नाराचोंद्वारा दुर्धरके रथसम्बन्धी चार घोड़ोंको कालके गालमें भेज दिया ॥ ४४ १/२ ॥
एकेन योक्त्रं छत्रं च ध्वजमेकेन वन्धुरम् ॥ ४५ ॥
षष्ट्या च युगचक्राक्षं चिच्छेद मकरध्वजः ।
इसके बाद एक बाणसे रथको जोड़नेवाली रस्सी, छत्र और ध्वज तथा एक बाणसे बन्धुरके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। फिर साठ बाणोंसे प्रद्युम्नने रथके जुए, धुरे और पहियोंको भी काट डाला ॥ ४५ १/२ ॥
अथापरं शरं गृह्य कङ्कपत्रं सुतेजितम् ॥ ४६ ॥
मुमोच हृदये तस्य दुर्द्धरस्यान्त्यजीविनः ।
तदनन्तर प्रद्युम्नने कङ्कपक्षीके पर लगे हुए और अत्यन्त तेज किये हुए एक बाणको लेकर दूसरेके आश्रयपर जीनेवाले दुर्धरके हृदयपर छोड़ा ॥ ४६ १/२ ॥
स गतासुर्गतश्रीको गतसत्त्वो गतप्रभः ॥ ४७ ॥
निपपात रथोपस्थात् क्षीणपुण्य इव ग्रहः ।
तब वह दुर्धर निष्प्राण हो शोभा और सत्त्वसे रहित हो गया। उसकी कान्ति फीकी पड़ गयी। वह रथकी बैठकमेंसे नीचे गिर पड़ा। उस समय वह, जिसका पुण्य क्षीण हो गया हो ऐसे ग्रहके समान दीखने लगा ॥ ४७ १/२ ॥
दुर्धरे निहते शूरे दानवे दानवेश्वरः ॥ ४८ ॥
केतुमाली शरव्रातैरभिदुद्राव कृष्णजम् ।
दुर्धर शूर दानव था, उसके मारे जानेपर दानवेश्वर केतुमाली भी कृष्णकुमार प्रद्युम्नपर बाणोंके समूहोंको छोड़ता हुआ चढ़ आया ॥ ४८ १/२ ॥
प्रद्युम्नमथ संक्रुद्धो भ्रुकुटीभीषणाननः ॥ ४९ ॥
कृत्याभ्यधावत् सहसा तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ।
तदनन्तर क्रोधमें भरा हुआ केतुमाली भृकुटी चढ़ाकर मुखको भीषण बना प्रद्युम्नपर सहसा दौड़ पड़ा और उनसे कहने लगा 'खड़ा रह ! खड़ा रह !' ॥ ४९ १/२ ॥
संक्रुद्धः कृष्णसूनुस्तु शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ५० ॥
पर्वतं वारिधाराभिः प्रावृषीव यथा घनः ।
यह सुनकर श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नको बड़ा क्रोध हुआ, उन्होंने बाणोंकी वर्षा करके केतुमालीको ढक दिया, ठीक उसी तरह जैसे वर्षा ऋतुमें बादल जलकी धाराओंसे पर्वतको आच्छादित कर देता है ॥ ५० १/२ ॥
स विद्धो दानवामात्यः प्रद्युम्नेन धनुष्मता ॥ ५१ ॥
चक्रमादाय चिक्षेप प्रद्युम्नवधकाङ्क्षया ।
धनुर्धर प्रद्युम्नके द्वारा घायल हुए दानवमन्त्री केतुमालीने प्रद्युम्नका वध करनेकी इच्छासे चक्र लेकर उनके ऊपर चलाया ॥ ५१ १/२ ॥
तं तु प्राप्तं सहस्रारं कृष्णचक्रसमद्युतिम् ॥ ५२ ॥
निपत्योत्पत्य सहसा सर्वेषामेव पश्यताम् ।
तेनैव तस्य चिच्छेद केतुमालेः शिरस्तदा ॥ ५३ ॥
श्रीकृष्णके चक्रके समान तेजस्वी उस सहस्रार चक्रको पास आया देख प्रद्युम्नने सहसा उछलकर उसे पकड़ लिया और सबके देखते-देखते उस समय उसी चक्रसे केतुमालीका सिर काट लिया ॥ ५२-५३ ॥
तद् दृष्ट्वा कर्म विपुलं रौक्मिणेयस्य देवराट् ।
विस्मयं परमं प्राप्तः सर्वैर्देवगणैः सह ।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव पुष्पवर्षैरवाकिरन् ॥ ५४ ॥
रुक्मिणीकुमारका वह महान् कर्म देखकर समस्त देवताओंसहित देवराज इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। उस समय गन्धर्वों और अप्सराओंने उनके ऊपर फूलोंकी वर्षा की ॥ ५४ ॥
केतुमालिं हतं दृष्ट्वा शत्रुहन्ता प्रमर्दनः ।
महाबलसमूहेन प्रद्युम्नमथ दुद्रुवे ॥ ५५ ॥
केतुमालीको मारा गया देख शत्रुहन्ता और प्रमर्दन विशाल सैन्यसमूहके साथ प्रद्युम्नपर टूट पड़े ॥ ५५ ॥
ते गदां मुसलं चक्रं प्रासतोमरसायकान् ।
भिन्दिपालान् कुठारांश्च भास्वरान् कूटमुद्गरान् ॥ ५६ ॥
युगपत् संक्षिपन्ति स्म वधार्थं कृष्णनन्दने ।
वे गदा, मुसल, चक्र, प्रास, तोमर, सायक, भिन्दिपाल, कुठार और चमकीले कूटमुद्गरोंको एक साथ ही श्रीकृष्णकुमारके वधके लिये उनके ऊपर फेंकने लगे ॥ ५६ १/२ ॥
सोऽपि तान्यस्त्रजालानि शस्त्रजालैरनेकधा ॥ ५७ ॥
चिच्छेद बहुधा वीरो दर्शयन् पाणिलाघवम् ।
वीर प्रद्युम्नने भी अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए शस्त्रसमूहोंद्वारा शत्रुओंके अस्त्र-जालके बारंबार बहुतेरे टुकड़े कर डाले ॥ ५७ १/२ ॥
गजान् सोऽभ्यहनत् क्रुद्धो गजारोहान् सहस्रशः ॥ ५८ ॥
रथान् सारथिभिः सार्धं हयांश्चैव ममर्द् ह ।
पातयंस्ताञ्छरव्रातैर्नाविद्धः कश्चिदीक्ष्यते ॥ ५९ ॥
उन्होंने कुपित होकर सहस्रों हाथियों और हाथीसवारोंको मार डाला। सारथियोंसहित रथों और घोड़ोंको भी रौंद-
विष्णुपर्व ] पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ६३५
कर मिट्टीमें मिला दिया। उन सबको धराशायी करते हुए प्रद्युम्नने अपने बाण-समूहोंद्वारा समस्त सैनिकोंको बींध डाला। कोई भी ऐसा नहीं दिखायी देता था, जो उनके बाणोंसे विद्ध न हुआ हो ॥ ५८-५९ ॥
एवं सर्वाणि सैन्यानि ममन्थ मकरध्वजः ।
नदीं प्रावर्तयद् घोरां शोणिताम्बुतरङ्गिणीम् ॥ ६० ॥
इस प्रकार मकरध्वजने शत्रुको सारी सेनाओंको मथ डाला और एक भयानक नदी बहा दी, जो रक्तमय जलकी तरङ्गोंसे सुशोभित होती थी ॥ ६० ॥
मुक्ताहारोर्मिबहुलां मांसमेदःसपङ्किनीम् ।
छत्रद्वीपां शरावर्तां रथैः पुलिनमण्डिताम् ॥ ६१ ॥
मोतियोंके हार उसमें उठती हुई बहुसंख्यक लहरोंके समान प्रतीत होते थे। वसा और मेदे कीचके समान जान पड़ते थे। छत्र द्वीप और बाण आवर्त (भँवर) के समान थे। रथ ही उस नदीके तट बनकर उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ६१ ॥
केयूरकुण्डलाकूर्मीं ध्वजमत्स्यविभूषिताम् ।
नागग्राहवतीं रौद्रामसिनक्रविभूषिताम् ॥ ६२ ॥
केयूर और कुण्डल उसमें कछुएका भ्रम उत्पन्न करते थे। ध्वजरूपी मत्स्य उसकी शोभा बढ़ाते थे। हाथीरूपी ग्राहोंसे युक्त होनेके कारण वह बड़ी भयङ्कर जान पड़ती थी। खड्गरूपी नाकें उसके आभूषण थे ॥ ६२ ॥
केशशैवलसंछन्नां श्रोणिसूत्रमृणालिकाम् ।
वक्त्राननसुपद्मां च हंसचामरवीजिताम् ॥ ६३ ॥
वह केशरुपी सेवारसे ढकी हुई थी, कटिसूत्र कमल-नालके समान प्रतीत होते थे, सुन्दर मुख ही उसमें खिले हुए मनोहर कमल थे, हिलते हुए चँवर हंसोंके पक्ष-सञ्चालन-की भाँति प्रतीत होते थे, मानो उनके द्वारा उस नदीको हवा की जा रही थी ॥ ६३ ॥
शिरस्तिमिसमाकीर्णां शोणितौघप्रवर्तिनीम् ।
नदीं दुस्तरणीं भीमामनङ्गेन प्रवर्तिताम् ॥ ६४ ॥
दुष्प्रेक्षां दुर्गमां रौद्रां हीनतेजःसुदुस्तराम् ।
शस्त्रग्राहवतीं घोरां यमराष्ट्रविवर्द्धनीम् ॥ ६५ ॥
(हाथी आदि पशुओंके कटे हुए) मस्तक उसमें तिमि नामक मत्स्यके समान सब ओर व्याप्त थे। वह शोणितकी वेगयुक्त धारा बहा रही थी। अनङ्गरूप प्रद्युम्नके द्वारा बहायी गयी वह रक्तनदी अत्यन्त दुस्तर, दुर्लक्ष्य, दुर्गम एवं भयंकर थी। तेजोहीन पुरुषोंके लिये उसे पार करना अत्यन्त कठिन था। शस्त्ररूपी ग्राहोंसे युक्त वह घोर नदी यमराजके राज्यकी वृद्धि कर रही थी ॥ ६४-६५ ॥
तत्र रुक्मिसुतः श्रीमान् विलोडयति धन्विनः ।
शत्रुहन्तारमाभित्य शरानभ्यकिरद् बहून् ॥ ६६ ॥
उस युद्धमें श्रीमान् रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नने बहुत-से धनुर्धरोंको मथ डाला और शत्रुहन्तापर अनेक बाणोंकी वर्षा की ॥ ६६ ॥
शत्रुहन्ता पुनः क्रुद्धो मुमोच शरमुत्तमम् ।
प्रद्युम्नस्य समासाद्य हृदये निपपात ह ॥ ६७ ॥
तब पुनः क्रोधमें भरे हुए शत्रुहन्ताने एक उत्तम बाण छोड़ा, जो प्रद्युम्नकी छातीपर जाकर लगा ॥ ६७ ॥
स विद्धस्तेन बाणेन प्रद्युम्नो न व्यकम्पत ।
शक्तिं जग्राह बलवाञ्छत्रुहन्त्रे मुमूर्षवे ॥ ६८ ॥
उस बाणसे घायल होकर बलवान् प्रद्युम्न तनिक भी विचलित नहीं हुए, उन्होंने मरणासन्न शत्रुहन्ताके लिये एक शक्ति उठायी ॥ ६८ ॥
सा क्षिप्ता रौक्मिणेयेन शक्तिर्ज्वालाकुला रणे ।
पपात हृदयं भित्त्वा शक्राशनिसमस्वना ॥ ६९ ॥
रणभूमिमें रुक्मिणीकुमारने वह अग्निकी ज्वालासे युक्त शक्ति चला दी। इन्द्रके वज्रकी भाँति गड़गड़ाहट पैदा करती हुई वह शक्ति शत्रुहन्ताका हृदय विदीर्ण करके पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ६९ ॥
स भिन्नहृच्च त्रस्ताङ्गो मुक्तमर्मास्थिबन्धनः ।
पपात रुधिरोद्गारी शत्रुहन्ता महाबलः ॥ ७० ॥
हृदय विदीर्ण हो जानेसे उसके सारे अङ्ग शिथिल हो गये, मर्मस्थानों और अस्थियोंके बन्धन खुल गये, उस दशामें महाबली शत्रुहन्ता रक्त वमन करता हुआ धरतीपर गिर पड़ा ॥ ७० ॥
पतितं शत्रुहन्तारं दृष्ट्वा तस्थौ प्रमर्दनः ।
जग्राह मुसलं सोऽथ वचनं चेदमाददे ॥ ७१ ॥
शत्रुहन्ताको धराशायी हुआ देख प्रमर्दन युद्धके लिये डट गया। उसने मुसल हाथमें ले लिया और यह बात कही—॥ ७१ ॥
तिष्ठ किं प्राकृतैरेभिः करिष्यसि रणप्रियः ।
मां योधयस्व दुर्बुद्धे ततस्त्वं न भविष्यसि ॥ ७२ ॥
'अरे ! खड़ा रह ! तुझे युद्ध बड़ा प्रिय है न ? इन प्राकृत सैनिकोंके मारनेसे तू क्या लाभ उठायेगा। दुर्बुद्धे ! तू मेरे साथ युद्ध कर, फिर तो तू नहीं हो जायगा ॥ ७२ ॥
वृष्णिवंशकुले जातः शत्रुरस्मत्पिता तव ।
पुत्रं हन्तास्म्यहं तस्य ततोऽसौ निहतो भवेत् ॥ ७३ ॥
'तू वृष्णिकुलमें उत्पन्न हुआ है, तेरा पिता हमलोगोंका शत्रु है, मैं उसके पुत्रको मार डालूँगा, फिर वह स्वयं ही मर जायगा ॥ ७३ ॥
मृतेन तेन दुर्बुद्धे सर्वदेवक्षयो भवेत् ।
दैतेया दानवाः सर्वे मोदन्तां हतशत्रवः ॥ ७४ ॥
६३६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
'दुर्बुद्धे ! उसके मरनेसे समस्त देवताओंका क्षय हो जायगा, इस प्रकार अपने शत्रुओंके मर जानेपर समस्त दैत्य और दानव आनन्दके भागी होंगे ॥ ७४ ॥
हते त्वयि ममास्त्रेण त्वत्समुत्थैश्च शोणितैः। शम्बरस्य तु पुत्राणां करोम्युदकसक्रियाम् ॥ ७५ ॥
'मेरे अस्त्रसे तेरा वध हो जानेपर तेरे ही रक्तसे मैं शम्बरासुरके पुत्रोंका तर्पण करूँगा ॥ ७५ ॥
अद्य सा भीष्मकसुता करुणं विलपिष्यति । निहतं त्वां च श्रुत्वैव यौवनस्थं गतायुषम् ॥ ७६ ॥
'आज वह भीष्मककी पुत्री रुक्मिणी तो तुझ-जैसे नौजवान बेटेको मारा गया और गतायु हुआ सुनकर निश्चय ही करुण विलाप करेगी ॥ ७६ ॥
स ते पिता चक्रधरो निष्फलाशो भविष्यति । हतं त्वां संविदित्वाथ प्राणांस्त्यक्ष्यतिमन्दधीः ॥ ७७ ॥
'तेरे उस पिता चक्रधारी कृष्णकी आशा अब निष्फल हो जायगी। तुझे मारा गया जानकर वह मन्दबुद्धि मानव अपने प्राणोंका परित्याग कर देगा' ॥ ७७ ॥
इत्युक्त्वा परिघेणाशु ताडयद् रुक्मिणीसुतम् । ताडितो हि महातेजा रौक्मिणेयः प्रतापवान् ॥ ७८ ॥ दोर्भ्यामुत्क्षिप्य तस्यैव रथं मह्यां व्यचूर्णयत् ।
ऐसा कहकर उसने तुरंत ही रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नपर परिघसे प्रहार किया। उससे ताड़ित हुए महान् तेजस्वी और प्रतापी प्रद्युम्नने अपनी दोनों भुजाओंसे उसके रथको ही ऊपरको उछाल दिया और पृथ्वीपर गिराकर चूर-चूर कर डाला ॥ ७८३ ॥
सोऽवप्लुत्य रथात् तस्मात् पदातिरवतस्थिवान् ॥७९॥ तां गदां गृह्य सहसा रौक्मिणेयमुपाद्रवत् । तयैव गदया कामः प्रमर्दनमपोथयत् ॥ ८० ॥
प्रमर्दन उस रथसे कूदकर पैदल ही युद्धके लिये खड़ा हो गया और अपनी उस प्रसिद्ध गदाको हाथमें लेकर उसने सहसा रुक्मिणीकुमारपर आक्रमण किया, परंतु प्रद्युम्नने उसकी फेंकी हुई उस गदासे ही प्रमर्दनको मार गिराया ॥
हते प्रमर्दने दैत्ये दृष्ट्वा सर्वे प्रदुद्रुवुः । न शक्ताः प्रमुखे स्थातुं सिंहत्रासाद् गजा इव ॥ ८१ ॥
दैत्य प्रमर्दनके मारे जानेपर समस्त असुर सैनिक भाग खड़े हुए। सिंहके भयसे भागे हुए हाथियोंके समान वे प्रद्युम्नके सामने ठहर न सके ॥ ८१ ॥
सारमेयं यथा दृष्ट्वाविगणो वै पलायते । तथा सेना विपद्यन्ती प्रद्युम्नस्य भयार्दिता ॥ ८२ ॥
जैसे शिकारी कुत्तेको देखकर भेड़ोंका समूह पलायन करने लगता है, उसी प्रकार प्रद्युम्नके भयसे पीड़ित हुई दैत्यसेना विषादग्रस्त होकर भागने लगी ॥ ८२ ॥
क्षतजादिग्धवस्त्रा चै मुक्तकेशा विशोभना । रजस्वलेव युवतिः सेना समवगूहते ॥ ८३ ॥
उन सब सैनिकोंके वस्त्र खूनसे रँग गये थे, केश खुले हुए थे। वे शोभाहीन हो गये थे। इस अवस्थामें वह दैत्यसेना रजस्वला युवतीकी भाँति कहीं छिप जानेका प्रयत्न करने लगी ॥ ८३ ॥
मदनशरविभिन्ना सैनिकानभ्ययायाद् युवतिसदृशवेषा साध्वसैः पीड्यमाना । रतिसमरमशक्ता वीक्षितुं सोच्छ्वसन्ती स्वगृहमगनकामा नेच्छते स्थातुमत्र ॥ ८४ ॥
युवतीके समान वेष धारण करनेवाली वह दैत्यसेना कामदेव (प्रद्युम्न) के बाणोंसे घायल हो सैनिकोंकी ओर चली। उस समय वह भय आदिसे पीड़ित हो रही थी। समररूपी सुरतको तो देखनेमें भी असमर्थ थी, केवल उच्छ्वास लेती हुई अपने घरको जाना चाहने लगी, वहाँ ठहरना नहीं ॥ ८४ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शम्बरसैन्यभङ्गो नाम पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शम्बरासुरकी सेनाका पलायनविषयक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०५ ॥
षडधिकशततमोऽध्यायः
शम्बरासुर और प्रद्युम्नका मायामय युद्ध, शम्बरकी चिन्ता, देवराज इन्द्रकी आज्ञासे नारदजीका प्रद्युम्नको उनके पूर्वस्वरूपका स्मरण दिलाना और आवश्यक कर्तव्य सुझाना
वैशम्पायन उवाच
यावदेनं शरैर्हन्मि मम विप्रियकारकम् ।
शम्बरस्तु ततः क्रुद्धः सूतमाह विशाम्पते ।
शत्रुप्रमुखतो वीर रथं मे वाहय द्रुतम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—प्रजानाथ ! तब शम्बरासुरने कुपित होकर अपने सारथिसे कहा—'वीर ! तुम शीघ्र
विष्णुपर्व ] षडधिकशततमोऽध्यायः [ ६३७
ही मेरे रथको शत्रुके सामने ले चलो, जिससे अपना अप्रिय करनेवाले इस प्रद्युम्नको मैं अपने बाणोंसे मार डालूँ' ॥ १½ ॥
ततो भर्तुर्वचः श्रुत्वा सूतस्तत्प्रियकारकः ॥ २ ॥
रथं संचोदयामास चामीकरविभूषितम् ।
तं दृष्ट्वा रथमायान्तं प्रद्युम्नः फुल्लोचनः ॥ ३ ॥
तब स्वामीका यह वचन सुनकर उनका प्रिय करनेवाले सूतने उस सुवर्णभूषित रथको आगे बढ़ाया। उस रथको आते देख प्रद्युम्नके नेत्र हर्षसे खिल उठे ॥ २-३ ॥
संदधे चापमादाय शरं कनकभूषितम् ।
तेनाहनत् सुसंक्रुद्धः कोपयञ्छम्बरं रणे ॥ ४ ॥
उन्होंने अत्यन्त कुपित हो धनुष लेकर उसपर एक सुवर्णभूषित बाण रखा और उस बाणसे शम्बरासुरका क्रोध बढ़ाते हुए उसे रणभूमिमें घायल कर दिया ॥ ४ ॥
हृदये ताडितस्तेन देवशत्रुः सुविह्वलः ।
रथशक्तिं समाश्रित्य तस्थौ सोऽथ विचेतनः ॥ ५ ॥
उस बाणने उसकी छातीमें चोट पहुँचाई थी, इससे वह देवशत्रु शम्बर अत्यन्त व्याकुल हो अचेत हो गया और रथशक्तिका सहारा लेकर टिका रहा ॥ ५ ॥
स चेतनां पुनः प्राप्य धनुरादाय शम्बरः ।
विव्याध कार्ष्णिं कुपितः सप्तभिर्निशितैः शरैः ॥ ६ ॥
फिर होशमें आनेपर कुपित हुए शम्बरासुरने धनुष हाथमें ले सात पैने बाणोंद्वारा श्रीकृष्णकुमारपर प्रहार किया ॥ ६ ॥
तानप्राप्ताञ्शरान् सोऽथ सप्तभिः सप्तधाच्छिनत् ।
शम्बरं च जघानाथ सप्तत्या निशितैः शरैः ॥ ७ ॥
उन बाणोंको अपने पास पहुँचनेसे पहले ही प्रद्युम्नने सात सायकोंसे मारकर सात बार खण्डित किया, साथ ही सत्तर तीखे बाणोंसे शम्बरासुरको घायल कर दिया ॥ ७ ॥
पुनः शरसहस्रेण कङ्कबर्हिणवाससा ।
अहनच्छम्बरं क्रोधाद् धाराभिरिव पर्वतम् ॥ ८ ॥
इसके बाद गीध और मोरकी पाँख लगे हुए एक हजार बाणोंकी क्रोधपूर्वक वर्षा करके उन्होंने पुनः शम्बरासुरको आहत कर दिया, ठीक उसी तरह जैसे मेघ जलकी धाराओंसे पर्वतको आप्लावित कर देता है ॥ ८ ॥
प्रदिशो विदिशश्चैव शरधारासमावृताः ॥ ९ ॥
अन्धकारीकृतं व्योम दिनकर्ता न दृश्यते ।
समस्त दिशाएँ और विदिशाएँ बाणधारासे आवृत्त हो गयीं। आकाशमें अन्धकार छा गया। दिनकर सूर्यका दीखना बंद हो गया ॥ ९½ ॥
ततोऽन्धकारमुत्सार्य वैद्युतास्त्रेण शम्बरः ॥ १० ॥
प्रद्युम्नस्य रथोपस्थे शरवर्षे मुमोच ह ।
तब शम्बरासुरने वैद्युतास्त्रका प्रयोग करके अन्धकारका निवारण कर दिया और प्रद्युम्नके रथकी बैठकमें बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १०½ ॥
तदस्त्रजालं प्रद्युम्नः शरेणानतपर्वणा ॥ ११ ॥
चिच्छेद बहुधा राजन् दर्शयन् पाणिलाघवम् ।
राजन् ! प्रद्युम्नने अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए झुकी हुई गाँठवाले बाणसे शत्रुके उस अस्त्रजालको अनेक टुकड़ोंमें छिन्न-भिन्न कर दिया ॥ ११½ ॥
हते तस्मिन् महावर्षे शराणां कार्ष्णिना तदा ॥ १२ ॥
द्रुमवर्षे मुमोचाथ मायया कालशम्बरः ।
श्रीकृष्णकुमारद्वारा जब बाणोंकी वह महावृष्टि शान्त कर दी गयी, तब कालशम्बरने मायाद्वारा वृक्षोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ १२½ ॥
द्रुमवर्षोच्छ्रितं दृष्ट्वा प्रद्युम्नः क्रोधमूर्च्छितः ॥ १३ ॥
आग्नेयास्त्रं मुमोचाथ तेन वृक्षाननाशयत् ।
वृक्षोंकी उस वर्षाको बढ़ती देख प्रद्युम्न क्रोधसे मूर्च्छित-से हो गये, फिर तो उन्होंने आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया और उसके द्वारा समस्त वृक्षोंका नाश कर डाला ॥
भस्मीभूते वृक्षवर्षे शिलासंघातमुत्सृजन् ॥ १४ ॥
प्रद्युम्नस्तं तु वायव्यैः प्रोत्सारयत संयुगे ।
वृक्षोंकी वर्षा नष्ट हो जानेपर उसने शिलासमूह बरसाना आरम्भ किया, परंतु प्रद्युम्नने युद्धस्थलमें वायव्यास्त्रका प्रयोग करके उन शिलाओंको दूर हटा दिया ॥ १४½ ॥
ततो मायां परां चक्रे देवशत्रुः प्रतापवान् ॥ १५ ॥
सिंहान् व्याघ्रान् वराहांश्च तरक्षून्नृक्षवानरान् ।
वारणान् वारिदप्रख्यान् हयानुष्ट्रान् विशाम्पते ॥ १६ ॥
मुमोच धनुरायम्य प्रद्युम्नस्य रथोपरि ।
प्रजानाथ ! तब प्रतापी देवशत्रु शम्बरने दूसरी माया प्रकट की। उसने धनुष तानकर प्रद्युम्नके रथपर सिंह, व्याघ्र, वराह, तरक्षु (सेई), रीछ, वानर, मेघोंके समान काले-काले हाथी, घोड़े और ऊँटके रूपोंमें बाणोंका प्रहार किया ॥ १५-१६½ ॥
गान्धर्वास्त्रेण चिच्छेद सर्वांस्तान् खण्डशस्तदा ॥१७॥
प्रद्युम्नने गान्धर्वास्त्रका प्रयोग करके उन सबके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ १७ ॥
प्रद्युम्नेन तु सा माया हता तां वीक्ष्य शम्बरः ।
अन्यां मायां मुमोचाथ शम्बरः क्रोधमूर्च्छितः ॥ १८ ॥
प्रद्युम्नने वह माया नष्ट कर दी, यह देखकर क्रोधसे मूर्च्छित हुए शम्बरासुरने दूसरी मायाका प्रयोग किया ॥
| ६३८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
गजेन्द्रान् भिन्नवदनान् षष्टिहायनयौवनान् ।
महामात्रोत्तमारूढान् कल्पितान् रणकोविदान् ॥ १९ ॥
उसने साठ वर्षोंकी अवस्थावाले नवयौवनसम्पन्न बहुत-से गजराज प्रकट किये, जिनके मस्तकसे मदकी धारा फूट रही थी । उनके ऊपर अच्छे-अच्छे महावत बैठे थे । उन्हें युद्धकी सजासे सजाया गया था । वे सब-के-सब युद्धकी कलामें चतुर जान पड़ते थे ॥ १९ ॥
तामापतन्तीं मायां तु कार्ष्णिः कमललोचनः ।
सैंहीं मायां समुत्स्रष्टुं चक्रे बुद्धिं महामनाः ॥ २० ॥
उस गजप्रकार मायाको अपनी ओर आती देख कमल-नयन महामना श्रीकृष्णकुमारने सिंहरूपिणी मायाके प्रयोगका विचार किया ॥ २० ॥
सा सृष्टा सिंहमाया तु रौक्मिणेयेन धीमता ।
माया नागवती नष्टा आदित्येनेव शर्वरी ॥ २१ ॥
बुद्धिमान् रुक्मिणीनन्दनके द्वारा जब वह सिंहमयी माया रची गयी, तब जैसे सूर्योदयसे रात्रिका अन्धकार नष्ट होता है, उसी प्रकार वह हाथियोंसे युक्त माया विलीन हो गयी ॥ २१ ॥
निहतां हस्तिमायां तु तां समीक्ष्य महासुरः ।
अन्यां सम्मोहिनीं मायां सोऽसृजद् दानवोत्तमः॥२२॥
उस हस्तिमयी मायाका नाश हुआ देख महान् असुर दानवराज शम्बरने दूसरी सम्मोहिनी नामक मायाका प्रयोग किया ॥ २२ ॥
तां दृष्ट्वा मोहिनीं नाम मायां मयविनिर्मिताम् ।
संज्ञास्त्रेण तु प्रद्युम्नो नाशयामास वीर्यवान् ॥ २३ ॥
मयद्वारा निर्मित उस मोहिनी मायाको देखकर पराक्रमी प्रद्युम्नने संज्ञास्त्रके द्वारा उसका नाश कर डाला ॥ २३ ॥
शम्बरस्तु ततः क्रुद्धो हतया मायया तदा ।
सैंहीं मायां महातेजाः सोऽसृजद् दानवेश्वरः॥ २४ ॥
जब वह माया भी नष्ट हो गयी, तब कुपित हुए महा-तेजस्वी दानवराज शम्बरने सिंहमयी मायाकी सृष्टि की ॥२४॥
सिंहानापततो दृष्ट्वा रौक्मिणेयः प्रतापवान् ।
अस्त्रं गान्धर्वमादाय शरभानसृजत् तदा ॥ २५ ॥
सिंहको अपने ऊपर आते देख प्रतापी रुक्मिणीकुमारने गान्धर्वास्त्र लेकर शरभोंकी सृष्टि की ॥ २५ ॥
तेऽष्टापदा बलोदग्रा नखदंष्ट्रायुधा रणे ।
सिंहान् विद्रावयामासुर्वायुर्जलधरानिव ॥ २६ ॥
वे आठ पैरोंवाले तथा प्रचण्ड बलशाली थे । नख और दाढ़ें ही उनके आयुध थीं । जैसे वायु बादलोंको उड़ा देती है, उसी प्रकार उन शरभोंने शत्रुके उन सिंहोंको मार भगाया ॥ २६ ॥
सिंहान् विद्रवतो दृष्ट्वा माययाष्टापदेन वै ।
शम्बरश्चिन्तयामास कथमेनं निहन्मि वै ।
अहो मूर्खस्वभावोऽहं यन्मया न हतः शिशुः ॥ २७ ॥
शरभमयी मायासे सिंहोंको भागते देख शम्बरासुर इस चिन्तामें पड़ा कि मैं किस प्रकार प्रद्युम्नका वध करूँ । अहो ! मैं बड़े मूर्खस्वभावका हूँ, क्योंकि मैंने बाल्यावस्थामें ही इसका वध नहीं कर डाला ॥ २७ ॥
प्राप्तयौवनदेहस्तु कृतास्त्रश्चापि दुर्मतिः ।
तत् कथं निहनिष्यामि शत्रुं रणशिरःस्थितम् ॥ २८ ॥
अब तो जवानीका शरीर पाकर यह दुर्बुद्धि शत्रु सम्पूर्ण अस्त्रोंका ज्ञाता भी हो चुका है । अतः युद्धके मुहानेपर खड़े हुए इस शत्रुको मैं किस प्रकार वध करूँगा ॥ २८ ॥
माया सा तिष्ठते तीव्रा पन्नगी नाम भीषणा ।
दत्ता मे देवदेवेन हरेणासुरघातिना ॥ २९ ॥
अच्छा, वह पन्नगी नामक अत्यन्त दुःसह एवं भीषण माया अभी मेरे पास मौजूद है, जिसे असुरघाती देवाधिदेव महादेवजीने मुझे दिया था ॥ २९ ॥
तां सृजामि महामायामाशीविषसमाकुलाम् ।
तया दग्धेत दुष्टात्मा ह्येष मायामयो बली ॥ ३० ॥
विषधर सर्पोंसे युक्त उस महामायाकी मैं सृष्टि करता हूँ, उससे यह बलवान् मायामय दुष्टात्मा शत्रु अवश्य दग्ध हो जायगा ॥ ३० ॥
सा सृष्टा पन्नगी माया विषज्वालासमाकुला ।
तया पन्नगमय्या तु सरथं सहवाजिनम् ॥ ३१ ॥
ससूतं स हि प्रद्युम्नं बबन्ध शरबन्धनैः ।
ऐसा सोचकर उस असुरने पन्नगी मायाकी सृष्टि की, जो विषकी ज्वालाओंसे व्याप्त थी । उस सर्पमयी मायासे शम्बरने रथ, घोड़े और सारथिसहित प्रद्युम्नको सर्पाकार बाणोंके बन्धनोंद्वारा बाँध लिया ॥ ३१½ ॥
बध्यमानं तदा दृष्ट्वा आत्मानं वृष्णिवंशजः ॥ ३२ ॥
मायां संचिन्तयामास सौपर्णीं सर्पनाशिनीम् ।
अपनेको सर्पोंसे बद्ध होते देख वृष्णिवंशी प्रद्युम्नने सर्पोंको नाश करनेवाली सौपर्णी ( गरुड़सम्बन्धिनी ) मायाका चिन्तन किया ॥ ३२½ ॥
सा चिन्तिता महामाया प्रद्युम्नेन महात्मना ॥ ३३ ॥
सुपर्णा विचरन्ति स्म सर्पा नष्टा महाविषाः ।
महात्मा प्रद्युम्नने ज्यों ही उस महामायाका चिन्तन किया, त्यों ही वहाँ बहुत-से गरुड़ पक्षी आकर विचरने लगे और वे महाविषधर सर्प नष्ट हो गये ॥ ३३½ ॥
भग्नायां सर्पमायायां प्रशंसन्ति सुरासुराः ॥ ३४ ॥
विष्णुपर्व ] पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ६३९
साधु वीर महाबाहो रुक्मिण्यानन्दवर्धन ।
यत् त्वया धर्षिता माया तेन स्म परितोषिताः ॥ ३५ ॥
उस सर्पमयी मायाके नष्ट होनेपर देवता और असुर सभी प्रद्युम्नकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे, ‘रुक्मिणीका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु वीर ! तुमने बहुत अच्छा किया। तुम्हारे द्वारा जो इस मायाकी पराजय हुई है, इससे हम बहुत संतुष्ट हैं’ ॥ ३४-३५ ॥
हतायां सर्पमायायां शम्बरोऽचिन्तयत् पुनः ।
अस्ति मे कालदण्डाभो मुद्गरो हेमभूषितः ॥ ३६ ॥
उस सर्पमयी मायाके नष्ट होनेपर शम्बरासुरने पुनः सोचा, ‘अभी मेरे पास सुवर्णभूषित मुद्गर है, जो कालदण्डके समान भयंकर है॥ ३६ ॥
तमप्रतिहतं युद्धे देवदानवमानवैः ।
पुरा यो मम पार्वत्या दत्तः परमतुष्टया ॥ ३७ ॥
‘वह युद्धमे देवता, दानवों और मानवोंके द्वारा भी प्रतिहत होनेवाला नहीं है, मैं उसीका प्रयोग करूँगा। पूर्व-कालमें परम संतुष्ट हुई पार्वती देवीने मुझे वह मुद्गर दिया और इस प्रकार कहा—॥ ३७ ॥
गृहाण शम्बरेमं त्वं मुद्गरं हेमभूषितम् ।
मया सृष्टं स्वदेहे वै तपः परमदुश्वरम् ॥ ३८ ॥
‘शम्बर ! तू यह सुवर्णभूषित मुद्गर ग्रहण कर। मैंने अपने शरीरसे अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके इसकी सृष्टि की है॥ ३८ ॥
मायान्तकरणं नाम सर्वासुरविनाशनम् ।
अनेन दानवौ रौद्रौ बलिनौ कामरूपिणौ ॥ ३९ ॥
शुम्भश्चैव निशुम्भश्च सगणौ सूदतौ मया ।
प्राणसंशयमापन्ने त्वया मोक्ष्यः स शत्रवे ॥ ४० ॥
‘यह मायाओंका अन्त करनेवाला तथा समस्त असुरोंका विनाशक है। इसके द्वारा मैंने इच्छानुसार रूप धारण करने-वाले दो बलवान् एवं भयंकर दानव शुम्भ और निशुम्भका उनके सैनिकगणोंसहित संहार किया है। प्राणसंकटकी स्थिति आनेपर ही तुझे अपने शत्रुपर इस मुद्गरका प्रयोग करना चाहिये’ ॥ ३९-४० ॥
इत्युक्त्वा पार्वती देवी तत्रैवान्तरधीयत ।
तदहं मुद्गरं श्रेष्ठं मोचयिष्यामि शत्रवे ॥ ४१ ॥
‘ऐसा कहकर पार्वती देवी वहीं अन्तर्धान हो गयी थीं, अतः मैं उसी श्रेष्ठ मुद्गरका अपने शत्रुपर प्रहार करूँगा’ ॥
तस्य विज्ञाय चित्तं तु देवराजोऽभ्यभाषत ।
गच्छ नारद शीघ्रं त्वं प्रद्युम्नस्य रथं प्रति ॥ ४२ ॥
सम्बोधय महाबाहुं पूर्वजातिं च मोक्षय ।
वैष्णवास्त्रं प्रयच्छास्मै वधार्थं शम्बरस्य च ॥ ४३ ॥
अभेद्यं कवचं चास्य प्रयच्छासुरसूदने ।
उस समय उसके मनोभावको जानकर देवराज इन्द्रने नारदजीसे कहा—‘नारदजी ! आप शीघ्र ही प्रद्युम्नके रथके पास चले जाइये और उन महाबाहु वीरको समझाइये तथा उन्हें उनके पूर्वजन्मका स्मरण दिलाइये। साथ ही शम्बरासुर-के वधके लिये उन्हें वैष्णवास्त्र प्रदान कीजिये। असुरसंहारके कर्ममें लगे हुए इन्हें अभेद्य कवच भी दीजिये’ ॥४२-४३३/२॥
एवमुक्तो मघवता नारदः प्रययौ त्वरम् ॥ ४४ ॥
आकाशेऽधिष्ठितोऽवोचन्मकरध्वजकेतनम् ।
इन्द्रके ऐसा कहनेपर नारदजी बड़ी उतावलीके साथ वहाँ गये और आकाशमें खड़े होकर मकरध्वज कामसे इस प्रकार बोले—॥ ४४१/२ ॥
कुमार पश्य मां प्राप्तं देवगन्धर्वनारदम् ।
प्रेषितं देवराजेन तव सम्बोधनाय वै ॥ ४५ ॥
‘कुमार ! देखो, मैं देवगन्धर्व नारद यहाँ आया हूँ। देवराज इन्द्रने मुझे तुमको समझानेके लिये यहाँ भेजा है ॥
स्मर त्वं पूर्वकं भावं कामदेवोऽसि मानद ।
हरकोपानलाद् दग्धस्तेनानङ्ग इहोच्यसे ॥ ४६ ॥
‘मानद ! तुम अपने पूर्वजन्मका स्मरण करो। तुम साक्षात् कामदेव हो। भगवान् शङ्करकी क्रोधाग्निसे दग्ध हो गये थे, इसलिये इस जगत्में अनङ्ग कहलाते हो ॥४६॥
त्वं वृष्णिवंशजातोऽसि रुक्मिण्या गर्भसम्भवः ।
जातोऽसि केशवेन त्वं प्रद्युम्न इति कीर्त्यसे ॥ ४७ ॥
‘तुम्हारा वर्तमान जन्म वृष्णिवंशमें हुआ है। तुम रुक्मिणीदेवीके गर्भसे उत्पन्न हुए हो। साक्षात् भगवान् केशवने तुम्हें जन्म दिया है। तुम प्रद्युम्न नामसे पुकारे जाते हो ॥ ४७ ॥
आहृत्य शम्बरेण त्वमिहानीतोऽसि मानद ।
सप्तरात्रे त्वसम्पूर्णे सूतिकागारमध्यतः ॥ ४८ ॥
‘मानद ! तुम्हारे जन्मकी सातवीं रात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि शम्बरासुर तुम्हे सूतिकागारसे हरकर यहाँ उठा लाया ॥ ४८ ॥
वधार्थं शम्बरस्य त्वं ह्रियमाणो ह्युपेक्षितः ।
केशवेन महाबाहो देवकार्यार्थसिद्धये ॥ ४९ ॥
‘महाबाहो ! देवताओंका कार्य सिद्ध करने और शम्बरासुरको मारनेके लिये ही भगवान् श्रीकृष्णने तुम्हारे अपहरणकी उपेक्षा की ॥ ४९ ॥
यैषा मायावती नाम भार्या वै शम्बरस्य तु ।
रतिं तां विद्धि कल्याणीं तव भार्या पुरातनीम् ॥ ५० ॥
‘यह जो मायावती नामसे प्रसिद्ध शम्बरासुरकी भार्या बनी बैठी है, इसे तुम अपनी कल्याणमयी पुरातन पत्नी रति समझो ॥ ५० ॥
६४० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
तव संरक्षणार्थाय शम्बरस्य गृहेऽवसत्।
मायां शरीरजां तस्य मोहनार्थं दुरात्मनः ॥ ५१ ॥
रतेः सम्पादनार्थाय प्रेषयत्यनिशं तदा।
'तुम्हारे शरीरकी रक्षा करनेके लिये ही इसने शम्बरासुरके घरमें निवास किया है। उस दुरात्मा दैत्यको मोहनेके लिये यह अपने शरीरसे एक मायामयी स्त्री प्रकट करके उसकी प्रसन्नताके लिये सदा भेजा करती है ॥ ५१॥'
एवं प्रद्युम्न बुद्ध्वा चै तत्र भार्या प्रतिष्ठिता ॥ ५२ ॥
हत्वा तं शम्बरं वीर वैष्णवास्त्रेण संयुगे।
गृह्य मायावतीं भार्या द्वारकां गन्तुमर्हसि ॥ ५३ ॥
'प्रद्युम्न ! यह सब जानकर ही तुम्हारी पत्नी वहाँ स्थिरतापूर्वक रहती है। वीर ! तुम वैष्णवास्त्रके द्वारा युद्धमें शम्बरासुरका वध करके अपनी भार्या मायावतीको साथ ले द्वारकाको जानेयोग्य हो ॥ ५२-५३ ॥'
गृहाण वैष्णवं चास्त्रं कवचं च महाप्रभम्।
शक्रेण तव संगृह्य प्रेषितं शत्रुसूदन ॥ ५४ ॥
'शत्रुसूदन ! यह वैष्णव अस्त्र तथा अत्यन्त कान्तिमान् कवच संग्रह करके इन्द्रने तुम्हारे लिये भेजा है। तुम इन्हें ग्रहण करो ॥'
शृणु मे ह्यपरं वाक्यं क्रियतामविशङ्कया।
अस्य देवरिपोस्तात मुद्गरो नित्यमूर्जितः ॥ ५५ ॥
पार्वत्यां परितुष्टायां दत्तः शत्रुनिबर्हणः।
अमोघश्चैव संग्रामे देवदानवमानवैः ॥ ५६ ॥
'अब तुम मेरी दूसरी बात सुनो और निःशङ्क होकर उसका पालन करो। तात ! इस देवद्रोहीका मुद्गर नित्य शक्तिशाली है। पार्वती देवीने प्रसन्न होकर वह शत्रुनाशक मुद्गर इसे प्रदान किया था। यह संग्राममें देवताओं, दानवों और मानवोंके लिये भी अमोघ है ॥ ५५-५६ ॥'
तदस्त्रप्रतिघातार्थं देवीं त्वं स्मर्तुमर्हसि।
स्तव्या चैव नमस्या च महादेवी रणोत्सुकैः ॥ ५७ ॥
'उस अस्त्रका निवारण करनेके लिये तुम्हें पार्वती देवीका स्मरण करना चाहिये। युद्धके लिये उत्सुक रहनेवाले वीरोंको महादेवी पार्वतीकी स्तुति और वन्दना अवश्य करनी चाहिये॥'
तत्र वै क्रियतां यत्नः संग्रामे रिपुणा सह ।
इत्युक्त्वा नारदो वाक्यं प्रययौ यत्र वासवः ॥ ५८ ॥
'शत्रुके साथ संग्राम करते समय तुम्हें पार्वती देवीकी स्तुतिके लिये भी अवश्य प्रयत्न करना चाहिये।' ऐसा कहकर नारदजी जहाँ इन्द्र थे, वहीं चले गये ॥ ५८ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शम्बरवधे नारदवाक्ये षडधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शम्बरवधके प्रसङ्गमें नारदजीका वाक्यविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ १०६ ॥
सप्ताधिकशततमोऽध्यायः
प्रद्युम्नके द्वारा शम्बरासुरका वध
वैशम्पायन उवाच
शम्बरस्तु ततः क्रुद्धो मुद्गरं तं समाददे ।
मुद्गरे गृह्यमाणे तु द्वादशार्काः समुत्थिताः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तब क्रोधमें भरे हुए शम्बरासुरने वह मुद्गर हाथमें ले लिया। उसे लेते समय सहसा बारह सूर्य प्रकट हो गये ॥ १ ॥
पर्वताश्चलिताः सर्वे तथैव वसुधात लम्।
उन्मार्गाः सागरा याताः संक्षुब्धाश्चापि देवताः ॥ २ ॥
समस्त पर्वत हिलने लगे, पृथ्वी काँप उठी, सब समुद्र ऊपरको उछलने लगे, इसी प्रकार समस्त देवताओमे भी क्षोभ फैल गया ॥ २ ॥
गृध्रचक्राकुलं व्योम उल्कापातो बभूव ह।
ववर्ष रुधिरं देवः परुषं पवनो ववौ ॥ ३ ॥
आकाशमे गीधोंके समूह मँडराने लगे, उल्कापात होने लगा, बादल रुधिर बरसाने लगे और अत्यन्त रूखी वायु चलने लगी ॥ ३ ॥
एवं दृष्ट्वा महोत्पातान् प्रद्युम्नः स त्वरान्वितः ।
अवतीर्य रथाद् वीरः कृताञ्जलिपुटः स्थितः ॥ ४ ॥
वीर प्रद्युम्न इस प्रकारके महान् उत्पातोंको देखकर फुर्तीके साथ रथसे नीचे उतर दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ ४ ॥
देवीं सस्मार मनसा पार्वतीं शङ्करप्रियाम् ।
प्रणम्य शिरसा देवीं स्तोतुं समुपचक्रमे ॥ ५ ॥
वे मन ही-मन भगवान् शङ्करकी प्रिया देवी पार्वतीका स्मरण करने लगे। उन्होंने सिर झुकाकर देवीको प्रणाम करके उनकी स्तुति आरम्भ की ॥ ५ ॥
प्रद्युम्न उवाच
ॐ नमः कात्यायन्यै गिरीशायै नमो नमः।
नमस्त्रैलोक्यमायायै कात्यायन्यै नमो नमः ॥ ६ ॥
प्रद्युम्नने कहा— सच्चिदानन्दमयी कात्यायनी देवीको प्रणाम है। पर्वतोंकी स्वामिनी पार्वती देवीको वारंवार नमस्कार है। तीनों लोकोंकी मायासस्वरूपा कात्यायनी देवीको मेरा बारंबार अभिवादन है ॥ ६ ॥
विष्णुपर्व ] सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ६४१
नमः शत्रुविनाशिन्यै नमो गौर्यै शिवप्रिये।
नमस्ये शुम्भमथनीं निशुम्भमथनीमपि ॥ ७ ॥
शत्रुओंको नष्ट करनेवाली गौरीदेवीको बारंबार प्रणाम है। शिवप्रिये ! शुम्भ दैत्यको मथ डालनेवाली और निशुम्भ-को भी रौंदनेवाली आपको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ७ ॥
कालरात्रि नमस्तुभ्यं कौमार्यै च नमो नमः।
कान्तारवासिनीं देवीं नमस्यामि कृताञ्जलिः ॥ ८ ॥
कालरात्रि ! आपको प्रणाम है। कौमारी शक्तिरूपा आपको बारंबार नमस्कार है। मैं कान्तारवासिनी देवीको हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ ॥ ८ ॥
विन्ध्यवासिनीं दुर्गघ्नां रणदुर्गा रणप्रियाम् ।
नमस्यामि महादेवीं जयाँ च विजयां तथा ॥ ९ ॥
मैं विन्ध्याचलमें निवास करनेवाली, विपत्तियोंको नष्ट करनेवाली, रणचण्डी, रणप्रिया, जया और विजया नामवाली महादेवीको प्रणाम करता हूँ ॥ ९ ॥
अपराजितां नमस्येऽहमजितां शत्रुनाशिनीम् ।
घण्टाहस्तां नमस्यामि घण्टामालाकुलां तथा ॥ १० ॥
मैं किसीसे पराजित न होनेवाली, शत्रुओंकी विनाश-कारिणी अपराजिता देवीको प्रणाम करता हूँ। घण्टाओंकी मालाओंसे व्याप्त और हाथमें घण्टा धारण करनेवाली देवीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १० ॥
त्रिशूलिनीं नमस्यामि महिषासुरघातिनीम् ।
सिंहवाहां नमस्यामि सिंहप्रवरकेतनाम् ॥ ११ ॥
मैं महिषासुरका संहार करनेवाली त्रिशूलधारिणी देवीको नमस्कार करता हूँ। सिंहपर सवार होनेवाली और सिंहके चिह्नसे अलंकृत श्रेष्ठ ध्वजावाली देवीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥
एकानंशां नमस्यामि गायत्रीं यज्ञसत्कृताम् ।
सावित्रीं चापि विप्राणां नमस्येऽहं कृताञ्जलिः ॥ १२ ॥
रक्ष मां देवि सततं संग्रामे विजयं कुरु ।
मैं एकानंशा देवीको प्रणाम करता हूँ, यज्ञोंमें पूजित गायत्री देवीको नमस्कार करता हूँ और विप्रोंकी सावित्री (रूपसे उपास्य) देवीको भी मैं हाथ जोड़कर अभिवादन करता हूँ। देवि ! आप सर्वदा मेरी रक्षा कीजिये और संग्राममें मुझे विजय प्रदान कीजिये ॥ १२ १/२ ॥
इति कामवचःश्रुत्वा दुर्गा सम्प्रीतमानसा ॥ १३ ॥
उवाच वचनं देवी सुप्रीतेनान्तरात्मना ।
कामस्वरूप प्रद्युम्नके ऐसे प्रार्थनापूर्ण वचनोंसे दुर्गा देवी संतुष्ट हो गयीं। उनका मन प्रसन्न हो गया। तदनन्तर दुर्गा-देवी हृदयमें अत्यन्त आह्लादित हो यह वचन कहने लगीं—॥
पश्य पश्य महाबाहो रुक्मिण्यानन्दवर्धन ॥ १४ ॥
वरं वरय वत्स त्वममोघं दर्शनं मम।
'रुक्मिणीके आनन्दको बढ़ानेवाले महाबाहु प्रद्युम्न ! (मेरी ओर) देख ! देख !! मेरा दर्शन अमोघ है, अतः वत्स ! तू मनोवाञ्छित वर माँग ले' ॥ १४ १/२ ॥
देव्यास्तु वचनं श्रुत्वा रोमाञ्चोद्गतमानसः ॥ १५ ॥
प्रणम्य शिरसा देवीं विज्ञप्तुमुपचक्रमे ।
यदि त्वं देवि तुष्टासि दीयतां मे यदीप्सितम् ॥ १६ ॥
देवीके इस वचनको सुनकर प्रद्युम्न रोमाञ्चित हो गये, हर्षसे उनका हृदय उछलने लगा। तब उन्होंने सिर झुकाकर देवीको प्रणाम करके उनसे इस प्रकार निवेदन किया—'देवि ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मैं जो चाहता हूँ, वह मुझे दीजिये ॥ १५-१६ ॥
वरं च वरदे याचे सर्वमित्रेषु मे जयः ।
यस्त्वया मुद्गरो दत्तः शम्बरस्यात्मसम्भवः ॥ १७ ॥
एष मे गात्रमासाद्य माला पद्मवती भवेत् ।
तथास्त्विति च साप्युक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥ १८ ॥
'वरदे ! मैं यह वर माँगता हूँ कि सब शत्रुओंपर मुझे विजय प्राप्त हो और अपने शरीरसे प्रकट किया हुआ जो मुद्गर आपने शम्बरासुरको दिया है, वह मेरे शरीरपर प्राप्त होकर कमलोंकी माला बन जाय।' तब वे देवी 'ऐसा ही होगा' यह कहकर वहीं ही अन्तर्धान हो गयीं ॥ १७-१८ ॥
प्रद्युम्नस्तु महातेजास्तुष्टो रथमथारुहत् ।
मुद्गरं तं गृहीत्वा च शम्बरः क्रोधमूर्च्छितः ॥ १९ ॥
भ्रामयित्वा स चिक्षेप प्रद्युम्नोरसि वीर्यवान् ।
तब महातेजस्वी प्रद्युम्न संतुष्ट होकर रथपर आरूढ़ हुए। उधर क्रोधसे अचेत हुए पराक्रमी शम्बरने उस मुद्गरको हाथमें लेकर घुमाया और प्रद्युम्नकी छातीपर दे मारा ॥
स गत्वा मदनाभ्याशं माला भूत्वा तु पौष्करी ॥ २० ॥
प्रद्युम्नस्य च कण्ठे तु समासक्ता व्यराजत ।
नक्षत्राणां तु मालायां यथा परिवृतो विधुः ॥ २१ ॥
प्रद्युम्नके निकट जाकर वह मुद्गर कमल-पुष्पोंकी माला बन गया। वह माला प्रद्युम्नके कण्ठमे आसक्त होकर अतिशय शोभा पाने लगी। उस समय वे नक्षत्रोंकी मालासे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित हुए ॥ २०-२१ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।
साधु साध्विति वाचोचुः पूजयन् केशवात्मजम् ॥ २२ ॥
मुद्गरं पुष्पभूतं तु दृष्ट्वा प्रद्युम्नसन्निधौ ।
वैष्णवं परमास्त्रं तु नारदेन यथाहृतम् ॥ २३ ॥
संदधे चापमानम्य इदं वचनमब्रवीत् ।
तत्पश्चात् देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि 'साधु ! साधु !' कहकर केशवकुमारकी प्रशंसा करने लगे। प्रद्युम्नके निकट जब वह मुद्गर कमलपुष्प बन गया, तब प्रद्युम्नने
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| ६४२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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नारदजीके दिये हुए वैष्णव नामक दिव्यास्त्रका संधान किया और अपने धनुषको झुकाकर इस प्रकार कहा—॥ २२-२३½॥
यद्यहं रुक्मिणीपुत्रः केशवस्यात्मजो ह्यहम् ॥ २४ ॥
तेन सत्येन बाणेन जहि त्वं शम्बरं रणे।
'वैष्णवास्त्र ! यदि मैं रुक्मिणीदेवी और भगवान् श्रीकृष्णका पुत्र हूँ, तो इस सत्यके प्रभावसे तुम अपने वाण-द्वारा रणभूमिमें शम्बरासुरको मार डालो' ॥ २४½ ॥
इत्युक्त्वा चापमाकृष्य संधाय च महामनाः ॥ २५ ॥
विक्षेप शम्बरस्याथ दहँल्लोकत्रयं यथा।
ऐसा कहकर महामनस्वी प्रद्युम्नने धनुष खींचकर उसपर वाण रखा और तीनों लोकोंको जलाते हुए उसको शम्बरासुरके ऊपर छोड़ दिया ॥ २५½ ॥
स क्षिप्तो वृष्णिसिंहेन शरः क्रव्यादमोहनः ॥ २६ ॥
हृदयं शम्बरस्याथ भित्त्वा धरणिमागतः।
न चास्य मांसं न स्नायुर्नास्थि न त्वङ् न शोणितम् ॥ २७ ॥
सर्वं तद् भस्मसाद्भूतं वैष्णवास्त्रस्य तेजसा।
वृष्णिवंशके सिंह प्रद्युम्नके द्वारा चलाया गया वह वाण राक्षसोंको मोहमें डालनेवाला था। वह शम्बरासुरके हृदयको विदीर्ण करके पृथ्वीपर आ गया, इससे उस दैत्यका न तो मांस, न स्नायुजाल, न हड्डी, न त्वचा और न रक्त ही शेष बचा। वैष्णवास्त्रके तेजसे वह सब कुछ भस्म हो गया ॥ २६-२७½ ॥
हते दैत्ये महाकाये दानवे शम्बरेऽधमे ॥ २८ ॥
जहृषुर्दैवगन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः।
उर्वशी मेनका रम्भा विप्रचित्तिस्तिलोत्तमा ॥ २९ ॥
उस महाकाय अधम दानव शम्बर दैत्यके मारे जानेपर देवता और गन्धर्व हर्षसे खिल उठे तथा उर्वशी, मेनका, रम्भा, विप्रचित्ति और तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥
ननृतुहृष्टमनसो जगत् स्थावरजङ्गमम् ।
देवराजस्तु सुप्रीतः सर्वदेवगणैः सह।
प्रद्युम्नं पुष्पवर्षेण तमभ्यर्च्य प्रहृष्टवत् ॥ ३० ॥
उपर्युक्त अप्सराएँ जब प्रसन्नचित्त होकर नाचने लगीं, उस समय यह चराचर जगत् भी हर्षसे झूम उठा। समस्त देवताओंसहित देवराज इन्द्र अत्यन्त प्रसन्न हो फूलोंकी वर्षासे प्रद्युम्नका सत्कार करके हर्ष विभोर हो गये ॥ ३० ॥
अथ समरहते तु दैत्यराजे मधुमथनस्य सुतेन वैष्णवास्त्रैः।
विगतरिपुभयाः सुराश्च जग्मुर्मकरविभूषणकेतनं स्तुवन्तः ॥ ३१ ॥
मधुसूदन श्रीकृष्णके पुत्र प्रद्युम्नद्वारा समरभूमिमें वैष्णवास्त्रसे दैत्यराज शम्बरके मारे जानेपर समस्त देवताओंका शत्रुसम्बन्धी भय दूर हो गया और वे मकरध्वज प्रद्युम्नकी स्तुति करते हुए अपने स्थानको चले गये ॥ ३१ ॥
स च समरपरिश्रमं वहन् वै नगरसुखं प्रविवेश रौक्मिणेयः।
प्रियतम इव कान्तया प्रहृष्टस्त्वरितपदं रतिदर्शनं चकार ॥ ३२ ॥
अपने शरीरद्वारा युद्धजनित थकावटका भार वहन करते हुए रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नने नगरद्वारमें प्रवेश किया। जैसे प्रेयसीसे मिलकर प्रियतमको प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार अत्यन्त हर्षमें भरे हुए प्रद्युम्नने तुरंत ही अपनी पत्नी रतिके साक्षात्कार किया ॥ ३२ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शम्बरवधे सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शम्बरासुरका वधविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०७ ॥
अष्टाधिकशततमोऽध्यायः
मायावतीसहित प्रद्युम्नका द्वारकामें आगमन और रुक्मिणीके भवनमें प्रवेश
वैशम्पायन उवाच
समाप्तमायो मायाज्ञो विक्रान्तः समरेऽव्ययः।
अष्टम्यां निहतो युद्धे मायावी कालशम्बरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! शम्बरासुर मायाओंका ज्ञाता था, किंतु उसकी सारी माया समाप्त हो गयी। मायावी कालशम्बर रणभूमिमें पराक्रम प्रकट करनेवाला और अविनाशी था, तो भी अष्टमीको युद्धमे प्रद्युम्नद्वारा मार डाला गया ॥ १ ॥
तमृक्षवन्ते नगरे निहत्यासुरसत्तमम्।
गृह्य मायावतीं देवीमागच्छन्नगरं पितुः ॥ २ ॥
ऋक्षवन्त नामक नगरमें असुरशिरोमणि शम्बरका वध करके देवी मायावतीको साथ ले प्रद्युम्न अपने पिताके नगरमें आये ॥ २ ॥
सोऽन्तरिक्षगतो भूत्वा मायावी शीघ्रविक्रमः।
आजगाम पुरीं रम्यां रक्षितां तेजसा पितुः ॥ ३ ॥
शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले मायावी प्रद्युम्न