भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 636

६१४ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


नवनवतितमोऽध्यायः

श्रीकृष्णका द्वारका तथा अन्तःपुरमें प्रवेश और मणिपर्वत एवं पारिजातको यथोचित स्थानमें स्थापित करना

वैशम्पायन उवाच
एवमालोकयानः स द्वारकां वृषभेक्षणः।
अपश्यत् स्वगृहं कृष्णः प्रासादशतशोभितम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! वृषभके समान विशाल नेत्रोंवाले श्रीकृष्णने इस प्रकार द्वारकाका निरीक्षण करते हुए अपने आवास-स्थानको देखा, जो सैकड़ों प्रासादोंसे सुशोभित था ॥ १ ॥

मणिस्तम्भसहस्राणामयुतैर्विवृतं शतैः।
तोरणैर्ज्वलनप्रख्यैर्मणिविद्रुमराजतैः ॥ २ ॥

उसमें मणियोंके बने हुए लाखों-करोड़ों खंभे लगे थे, जिनकी प्रभासे वहाँका सब कुछ सुस्पष्ट दिखायी देता था। वहाँके बाहरी फाटक मणि-मूँगे एवं चाँदीके बने हुए थे और प्रज्वलित अग्निके समान उद्भासित होते थे ॥ २ ॥

तत्र तत्र प्रभासद्भिर्विचित्रकाञ्चनवेदिकैः ।
प्रासादस्तत्र सुमहान् कृष्णोपस्थानिकोऽभवत् ॥ ३ ॥

जहाँ-तहाँ प्रकाशित होनेवाले उन फाटकोंमें सोनेकी विचित्र वेदिकाएँ बनी हुई थीं। उन सबसे उद्दीप्त दिखायी देनेवाला श्रीकृष्णका वह महान् प्रासाद उनका उपस्थान-गृह था ॥ ३ ॥

स्फाटिकस्तम्भविवृतो विस्तीर्णः सर्वकाञ्चनः।
पद्माकुलजलोपेता रक्तसौगन्धिकोत्पलाः ॥ ४ ॥

उसमें स्फटिकमणिके खंभे लगे हुए थे, जिनसे वह प्रासाद प्रकाशित होता था। उसका विस्तार बहुत बड़ा था। वहाँकी सभी वस्तुएँ सोनेकी बनी हुई थीं; वहाँकी वावडियों-का जल कमलोंसे आच्छादित था; उनमें लाल रंगके सौगन्धिक कमल खिले हुए थे ॥ ४ ॥

मणिहेमनिभाश्चित्रा रत्नसोपानभूषिताः ।
मत्तबर्हिणजुष्टाश्च कोकिलैश्च सदामदैः ॥ ५ ॥
बभूवुः परमोपेता वाप्यश्च विकचोत्पलाः ।

वे वावडियाँ मणि और सुवर्णके समान विचित्र शोभासे सम्पन्न दिखायी देती थीं; रत्नमयी सीढ़ियोंसे अलंकृत थीं; मतवाले मोर और सदा मदमत्त रहनेवाले कोकिल उनका सेवन करते थे; विकसित कमलोंसे आच्छादित होनेके कारण वे उत्तम शोभासे सम्पन्न हो रही थीं ॥ ५½ ॥

विश्वकर्मकृतः शैलः प्राकारस्तस्य वेश्मनः ॥ ६ ॥
व्यक्तकिष्कुशतोत्सेधः परिखापरिवेष्टितः ।
तद् गृहं वृष्णिसिंहस्य निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ ७ ॥

श्रीकृष्णके उस भवनका परकोटा विश्वकर्माने प्रस्तरसे बनाया था। उसकी ऊँचाई सौ हाथकी थी और वह खाइयोंसे घिरा हुआ था। वृष्णिवंशके सिंह श्रीकृष्णके उस भवनका निर्माण साक्षात् विश्वकर्माने किया था ॥ ६-७ ॥

महेन्द्रसदृशं वेश्म समन्तादर्धयोजनम् ।
ततस्तं पाण्डुरं शौरिर्मूर्ध्नि तिष्ठन् गरुत्मतः ॥ ८ ॥
प्रीतः शङ्खमुपाध्मासीद् द्विषतां रोमहर्षणम् ।
तस्य शङ्खस्य शब्देन सागरश्चक्षुभे भृशम् ।
ररास च नभः कृत्स्नं तच्चित्रमभवत् तदा ॥ ९ ॥

सब ओरसे आधा योजन विस्तृत वह श्रीकृष्णका महल देवराज इन्द्रके भवन-सा मनोहर था। तदनन्तर गरुड़के ऊपर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णने मन-ही-मन प्रसन्न होकर श्वेतवर्णवाले अपने उस पाञ्चजन्य शङ्खको बजाया, जो शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। उस शङ्खके शब्दसे समुद्र विक्षुब्ध हो उठा तथा सम्पूर्ण आकाश-मण्डल गूँजने लगा; उस समय वहाँ यह अद्भुत बात हुई ॥ ८-९ ॥

पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं संश्रुत्य कुकुरान्धकाः ।
विशोकाः समपद्यन्त गरुडस्य च दर्शनात् ॥ १० ॥

पाञ्चजन्यका गम्भीर घोष सुनकर और गरुड़का दर्शन पाकर कुकुर तथा अन्धकवंशी यादव शोकरहित हो गये ॥

शङ्खचक्रगदापाणिं गरुडोपरि स्थितम् ।
दृष्ट्वा जहृषिरे पौरा भास्करोपमतेजसम् ॥ ११ ॥

भगवान् श्रीकृष्णके हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा आदि आयुध सुशोभित थे। वे गरुड़के ऊपर बैठे थे। उनका तेज भगवान् भास्करके समान था। उन्हें देखकर समस्त पुरवासियोंको बड़ा हर्ष हुआ ॥ ११ ॥

ततस्तूर्यप्रणादश्च भेरीणां च महास्वनाः ।
जज्ञिरे सिंहनादाश्च सर्वेषां पुरवासिनाम् ॥ १२ ॥

तदनन्तर तूरही और भेरियाँ बज उठीं, उनकी आवाज बहुत दूरतक फैल गयी; फिर समस्त पुरवासी भी सिंह-नाद कर उठे ॥ १२ ॥

ततस्ते सर्वदाशार्हाः सर्वे च कुकुरान्धकाः ।
प्रीयमाणाः समाजग्मुरालोक्य मधुसूदनम् ॥ १३ ॥

तत्पश्चात् सभी दशार्हवंशी यादव तथा कुकुर और अन्धकवंशके सब लोग भगवान् मधुसूदनका दर्शन करके बड़े प्रसन्न हुए और सभी उनकी अगवानीके लिये आ गये ॥ १३ ॥