विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 637, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] नवनवतितमोऽध्यायः ६१५
वासुदेवं पुरस्कृत्य शङ्खतूर्यरवैः सह।
उग्रसेनो ययौ राजा वसुदेवनिवेशनम्॥ १४॥
राजा उग्रसेन भगवान् वासुदेवको आगे करके शङ्ख और तूर्य आदि वाद्योंकी ध्वनिके साथ वसुदेवके महलतक उन्हें पहुँचानेके लिये गये॥ १४॥
आनन्दिनी पर्यचरत् स्वेषु वेश्मसु देवकी।
रोहिणी च यशोदा च आहुकस्य च याः स्त्रियः॥ १५॥
वहाँ आनन्दमें डूबी हुई देवकी, रोहिणी, यशोदा तथा उग्रसेनकी रानियोंने अपने-अपने भवनोंमें भगवान् श्रीकृष्णका विशेष सत्कार किया॥ १५॥
ततः कृष्णः सुपर्णेन स्वं निवेशनमभ्यगात्।
अचार च यथोद्देशमीश्वरानुचरो हरिः॥ १६॥
तदनन्तर श्रीकृष्ण गरुड़के द्वारा अपने महलमें गये। इन्द्र आदि ऐश्वर्यशाली देवता जिनके अनुचर हैं, वे श्रीहरि अपने अभीष्ट स्थानपर जा पहुँचे॥ १६॥
अवतीर्य गृहद्वारि कृष्णस्तु यदुनन्दनः।
यथार्हं पूजयामास यादवान् यादवर्षभः॥ १७॥
घरके मुख्य द्वारपर उतरकर यादवशिरोमणि यदुनन्दन श्रीकृष्णने उन यादवोंका यथायोग्य सत्कार किया॥ १७॥
रामाहुकगदाक्रूरप्रद्युम्नादिभिरर्चितः।
प्रविवेश गृहं शौरिरादाय मणिपर्वतम्॥ १८॥
तं च शक्रस्य दयितं पारिजातं महाद्रुमम्।
प्रवेशयामास गृहं प्रद्युम्नो रुक्मिणीसुतः॥ १९॥
बलराम, उग्रसेन, गद, अक्रूर और प्रद्युम्न आदिसे सम्मानित हो श्रीकृष्णने अपने गृहमें प्रवेश किया। उस समय रुक्मिणी-नन्दन प्रद्युम्नने मणिपर्वत तथा इन्द्रके प्रिय महान् वृक्ष पारिजातको लेकर भगवान्के महलमें पहुँचा दिया॥ १८-१९॥
तेऽन्योन्यं ददृशुर्वीरा देहबन्धानमानुषान्।
पारिजातप्रभावेण ततो मुमुदिरे जनाः॥ २०॥
द्वारकावासी वीरोंने वहाँ पारिजात वृक्षके प्रभावसे एक दूसरेके देह-सम्बन्धको अमानुष (दिव्य) देखा, इससे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ॥ २०॥
तैः स्तूयमानो गोविन्दः प्रहृष्टैर्यादवर्षभैः।
प्रविवेश गृहं श्रीमान् विहितं विश्वकर्मणा॥ २१॥
गोविन्दकी स्तुति करने लगे। उनकी स्तुति सुनते हुए वे श्रीमान् भगवान् विश्वकर्माके बनाये हुए उस गृहमें प्रविष्ट हुए॥ २१॥
ततोऽन्तःपुरमघ्ये तं सशृङ्गमणिपर्वतम्।
न्यवेशयदमेयात्मा वृष्णिभिः सहितोऽच्युतः॥ २२॥
तं च दिव्यं द्रुमश्रेष्ठं पारिजातममित्रजित्।
अर्च्यमर्चितमव्यग्रमिष्टे देशे न्यवेशयत्॥ २३॥
तदनन्तर अमेय आत्मबलसे सम्पन्न शत्रुविजयी भगवान् अच्युतने वृष्णिवंशियोंको साथ लेकर शिखरसहित मणिपर्वतको अन्तःपुरमें रक्खा तथा उस दिव्य, पूज्य एवं पूजित वृक्षप्रवर पारिजातको भी शान्तभावसे अभीष्ट स्थानमें स्थापित कर दिया॥ २२-२३॥
अनुज्ञाप्य ततो ज्ञातीन् केशवः परवीरहा।
ताः स्त्रियः पूजयामास संहृता नरकेण याः॥ २४॥
तत्पश्चात् शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले केशवने समस्त भाई-बन्धुओंकी आज्ञा ले उन सब स्त्रियोंका समादर किया, जो नरकासुरद्वारा हरकर लायी गयी थीं॥ २४॥
वस्त्रैराभरणैर्दिव्यैर्दासीभिर्धनसंचयैः।
हारैश्चन्द्रांशुसंकाशैर्मणिभिश्च महाप्रभैः॥ २५॥
दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण, दासीगण, धनकी राशि, चन्द्रकिरणोंके समान श्वेत हीरकहार तथा महान् प्रभापुञ्जसे प्रकाशित मणियोंद्वारा श्रीहरिने उनका सत्कार किया॥ २५॥
पूर्वमभ्यर्चिताश्चैव वसुदेवेन ताः स्त्रियः।
देवक्या सह रोहिण्यां रेवत्या चाहुकेन च॥ २६॥
उनसे भी पहले वसुदेवजी, देवकी, रोहिणी, रेवती तथा उग्रसेनने भी उन सबका समादर किया था॥ २६॥
सत्यभामोत्सन्ना स्त्रीणां सौभाग्येनाभवत् तदा।
कुटुम्बस्येश्वरी त्वासीद् रुक्मिणी भीष्मकात्मजा॥ २७॥
उस समय सौभाग्यकी दृष्टिसे सत्यभामा सभी स्त्रियोंमें श्रेष्ठ मानी गयी; परंतु कुटुम्बकी स्वामिनी तो भीष्मकनन्दिनी महारानी रुक्मिणी ही थीं॥ २७॥
तासां यथार्हमर्ह्याणि प्रासादशिखराणि च।
आदिदेश गृहान् कृष्णः पारिबर्हाश्च पुष्कलान्॥ २८॥
श्रीकृष्णने उन सब रानियोंको यथायोग्य महल, अटारी, प्रासादशिखर, गृह तथा बहुत-से उपहार अर्पित किये॥ २८॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि द्वारकाप्रवेशनं नाम नवनवतितमोऽध्यायः॥ ९९॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें द्वारकाप्रवेशविषयक निन्यानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९९॥