भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 635

विष्णुपर्व ] अष्टानवतितमोऽध्यायः [ ६१३


आदित्यपथगं यत् तु मेरोः शिखरमुत्तमम् ।
जाम्बूनदमयं दिव्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ६२ ॥
तदप्युत्पाट्य कृष्णार्थमानीयत विश्वकर्मणा ।
भ्राजमानमतीवाग्र्यं सर्वौषधिसमन्वितम् ॥ ६३ ॥

मेरुपर्वतका उत्तम शिखर जो सूर्यके मार्गतक पहुँचा हुआ है तथा स्वरूपसे जाम्बूनदमय, दिव्य एवं त्रिभुवन-विख्यात है, उसे भी श्रीकृष्णके लिये विश्वकर्मा उखाड़ लाये थे। वह सब प्रकारकी ओषधियोंसे अलंकृत, प्रकाशमान तथा अत्यन्त उत्तम था ॥ ६२-६३ ॥

तदिन्द्रवचनात् त्वष्टा कार्यहेतोः समानयत् ।
पारिजातश्च तत्रैव केशवेनाहृतः स्वयम् ॥ ६४ ॥

विश्वकर्मा इन्द्रके कहनेसे कार्यवश उसे वहाँ ले आये थे। वहीं साक्षात् श्रीकृष्ण पारिजातका वृक्ष भी ले आये थे ॥ ६४ ॥

नीयमाने तु तत्रासीद् युद्धमद्भुतकर्मणः ।
कृष्णस्य येऽभ्यरक्षंस्तु देवाः पादपमुत्तमम् ॥ ६५ ॥

पारिजातके लाये जाते समय अद्भुतकर्मा श्रीकृष्णका उन देवताओके साथ घोर युद्ध हुआ, जो उस उत्तम वृक्षकी रक्षा कर रहे थे ॥ ६५ ॥

पुण्डरीकशतेर्जुष्टं विमानैश्च हिरण्मयैः ।
विहिता वासुदेवार्थं रत्नपुष्पफलद्रुमाः ॥ ६६ ॥

वह वृक्ष सैकड़ों कमलोंसे पूजित तथा सुवर्णमय विमानोंसे सेवित एवं सुरक्षित था। विश्वकर्माने श्रीकृष्णके लिये रत्नमय फूल और फल देनेवाले वृक्षोंका निर्माण किया था ॥ ६६ ॥

पद्मषण्डजलोपेता रत्नसौगन्धिकोत्पलाः ।
मणिहेमप्लवाकीर्णाः पुष्करिण्यः सरांसि च ॥ ६७ ॥

उन्होंने बहुत-सी पोखरियों और सरोवर भी बनाये थे, जिनके जल कमलसमूहोंसे सुशोभित थे, उनमें रत्नमय सौगन्धिक कमल खिले हुए थे। मणि एवं सुवर्णसे जटिल नौकाएँ उनमे सब ओर व्याप्त थीं ॥ ६७ ॥

तासां परमकूलानि शोभयन्ति महाद्रुमाः ।
शालास्तालाः कदम्बाश्च शतशाखाश्च रौहिणाः ॥ ६८ ॥
ये च हैमवता वृक्षा ये च मेरुमहास्तथा ।
आहृत्य यदुसिंहार्थं विहिता विश्वकर्मणा ॥ ६९ ॥

उन पुष्करिणियोंके उत्तम तटोंको बड़े-बड़े वृक्ष सुशोभित करते थे। शाल, ताल, कदम्ब, सैकड़ों शाखाओवाले वटवृक्ष तथा जो हिमालय और मेरुपर्वतपर होनेवाले वृक्ष हैं, उन सबको विश्वकर्माने वहाँसे लाकर यदुसिंह श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये द्वारकामें स्थापित कर दिया था ॥ ६८-६९ ॥

रक्तपीतारुणश्यामाः श्वेतपुष्पाश्च पादपाः ।
सर्वर्तुफलसम्पन्नास्तेषु काननसन्धिषु ॥ ७० ॥

वे वृक्ष लाल, पीले, अरुण और श्याम रंगके थे, उनके फूल श्वेत वर्णके थे। वहाँ वन-उपवनोंकी संधियोमे जो वृक्ष लगे थे, वे सभी ऋतुओंके फलोंसे सम्पन्न थे ॥ ७० ॥

समकूलजलोपेताः शान्तशर्करवालुकाः ।
तस्मिन् पुरवरे नद्यः प्रसन्नसलिला ह्रदाः ॥ ७१ ॥

उस श्रेष्ठ नगरमे जो नदियाँ थीं, वे समान तट और जलसे सुशोभित थीं, उनके कंकड़ और बालू नीचे बैठ गये थे, वहाँ जो हृद (कुण्ड या जलाशय) थे, उनका जल बहुत स्वच्छ था ॥ ७१ ॥

पुष्पाकुलजलोपेता नानाद्रुमलताकुलाः ।
अपराश्चाभवन् नद्यो हेमशर्करवालुकाः ॥ ७२ ॥

वहाँ जो दूसरी नदियाँ थीं, उनके बालू और कंकड़ सुवर्णमय थे तथा वे पुष्पवासित जलसे भरी हुई थीं। उनके तटोंपर नाना प्रकारके वृक्ष और लताएँ फैली हुई थीं ॥ ७२ ॥

मत्तबर्हणसंघैश्च कोकिलैश्च सदामदैः ।
वभूवुः परमोपेतास्तस्यां पुर्यां च पादपाः ॥ ७३ ॥

उस पुरीमें जो जो वृक्ष थे, वे मदमत्त मयूरों तथा सदा मत्तवाले बने रहनेवाले कोकिलोंसे परम शोभायमान थे ॥ ७३ ॥

तत्रैव गजयूथानि पुरे गोमहिषास्तथा ।
निवासश्च कृतस्तत्र वराहमृगपक्षिभिः ॥ ७४ ॥

उस द्वारकापुरीमें ही हाथियोके यूथ और गाय-भैंसोंके झुंड भी रहते थे। वराहों, मृगों और पक्षियोने भी वहाँ अपना निवास बना रक्खा था ॥ ७४ ॥

पुर्यां तस्यां तु रम्यायां प्राकारो वै हिरण्मयः ।
व्यक्तः किष्कुशतोत्सेधो विहितो विश्वकर्मणा ॥ ७५ ॥

उस रमणीय पुरीका परकोटा स्पष्ट ही सोनेका बना हुआ था। विश्वकर्माने उसे सौ हाथ ऊँचा बनाया था ॥ ७५ ॥

अतीव रम्यः सोऽथासीद् वेष्टितः पर्वतो यथा ।
ते च ते च महाशैलाः सरितश्च सरांसि च ।
परिक्षिप्तानि भौमेन वनान्युपवनानि च ॥ ७६ ॥

वह परकोटा बहुत ही सुन्दर एवं रमणीय था और घेरा बने हुए पर्वतके समान जान पड़ता था। विश्वकर्माने उस परकोटेके द्वारा पूर्वोक्त बड़े-बड़े पर्वतों, सरिताओं, सरोवरों, वनों और उपवनोंको भी घेर रखा था ॥ ७६ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि द्वारकाविशेषनिर्माणं नामाष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें द्वारकाका विशेषरूपसे निर्माण-विषयक अठानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९८ ॥