भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 634
६१२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंश

व्यक्तसंजवनोद्देशो यश्चतुर्दिङ्महाध्वजः ॥ ४५ ॥
स च प्रासादमुख्योऽथ जाम्बवत्या विभूषितः ।
प्रभयाभ्यभवत् सर्वांस्तानन्यो भास्करोयथा ॥ ४६ ॥
जिसके बाहर-भीतरका प्रदेश प्रतिक्षण अभिनव रूप-सौन्दर्यसे युक्त प्रतीत होता था और जिसमें चारों ओर बड़ी-बड़ी ध्वजाएँ फहरा रही थीं। उस मुख्य प्रासादको जाम्बवतीदेवी सुशोभित करती थीं, वह दूसरे सूर्यकी भाँति अन्य सब प्रासादोंको अपनी प्रभासे तिरस्कृत कर रहा था ॥ ४५-४६ ॥

उद्यद्भास्करवर्णाभस्तयोरन्तरमाश्रितः ।
विश्वकर्मकृतो दिव्यः कैलासशिखरोपमः ॥ ४७ ॥
उसकी कान्ति उदयकालके सूर्यकी प्रभाके समान थी । वह रुक्मिणी और सत्यभामाके प्रासादोंके बीचमें बना था । विश्वकर्माद्वारा बनाया गया वह दिव्य प्रासाद कैलास-शिखरके समान शोभा पाता था ॥ ४७ ॥

जाम्बूनद इवादीप्तः प्रदीप्तज्वलनो यथा ।
सागरप्रतिमोऽतिष्ठन्मेरुरित्यभिविश्रुतः ॥ ४८ ॥
तस्मिन् गान्धारराजस्य दुहिता कुलशालिनी ।
गान्धारी भरतश्रेष्ठ केशवेन निवेशिता ॥ ४९ ॥
भरतश्रेष्ठ ! जो जाम्बूनद सुवर्ण तथा प्रज्वलित अग्निके समान देदीप्यमान था, विशालतामें जिसकी समुद्रसे उपमा दी जाती थी, जो मेरुके नामसे विख्यात होकर खड़ा था, उस महान् प्रासादमें गान्धार-राजकी कुलीन कन्या नाग्नजिती सत्या अथवा गान्धारीको भगवान् श्रीकृष्णने ठहराया था ॥ ४८-४९ ॥

पद्मकूल इति ख्यातं पद्मवर्णं महाप्रभम् ।
सुभीमाया महाकूटं वेश्मातिरुचिरप्रभम् ॥ ५० ॥
पद्मकूल नामसे विख्यात, पद्मके समान वर्णवाला, अत्यन्त प्रकाशमान, महान् शिखरके समान ऊँचा और अत्यन्त रुचिर प्रभासे प्रकाशित जो भवन था, वह सुभीमा देवीका निवास-स्थान बना था ॥ ५० ॥

सूर्यप्रभस्तु प्रासादः सर्वकामगुणैर्युतः ।
लक्ष्मणाया नृपश्रेष्ठ निर्दिष्टः शार्ङ्गधन्वना ॥ ५१ ॥
नृपश्रेष्ठ ! जो प्रासाद समस्त मनोवाञ्छित गुणोंसे युक्त तथा सूर्यके समान प्रकाशमान था, उसे शार्ङ्गधन्वा श्रीकृष्णने लक्ष्मणाका आवास निश्चित किया था ॥ ५१ ॥

वैडूर्यमणिवर्णाभः प्रासादो हरितप्रभः ।
यं विदुः सर्वभूतानि परमित्येव भारत ॥ ५२ ॥
वासं तं मित्रविन्दाया देवर्षिगणपूजितम् ।
महिष्या वासुदेवस्य भूषणं तेषु वेश्मसु ॥ ५३ ॥
भारत ! जो हरितकान्तिसे प्रकाशित तथा वैदूर्यमणि-की-सी आभासे उद्भासित था, जिसे समस्त प्राणी सबसे उत्तम समझते थे, वह प्रासाद वासुदेवकी पटरानी मित्रविन्दाका निवास था । देवता तथा ऋषियोंके समुदाय भी उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते थे । वह उन सभी भवनोंमें भूषण-रूप था ॥ ५२-५३ ॥

यस्तु प्रासादमुख्योऽत्र विहितो विश्वकर्मणा ।
अतीव रम्यरम्योऽसौ धिष्ठितः पर्वतो यथा ॥ ५४ ॥
सुवार्ताया निवासः स प्रशस्तः सर्वदैवतैः ।
महिष्या वासुदेवस्य केतुमानिति विश्रुतः ॥ ५५ ॥
द्वारकामें विश्वकर्माद्वारा बनाया गया जो प्रमुख प्रासाद था, जो अत्यन्त रमणीयमें भी रमणीय प्रतीत होता था और पर्वतके समान खड़ा था, वह श्रीकृष्णमहिषी सुवार्ताका निवास भवन था । सम्पूर्ण देवता उसकी प्रशंसा करते थे । वह केतुमान् नामसे विख्यात था ॥ ५४-५५ ॥

यस्तु प्रासादमुख्यो वै यं त्वष्टा विदधे स्वयम् ।
योजनायतविष्कम्भः सर्वरत्नमयः शुभः ॥ ५६ ॥
स श्रीमान् विरजा नाम व्यराजत् तत्र सुप्रभः ।
उपस्थानगृहं यत्र केशवस्य महात्मनः ॥ ५७ ॥
जो सभी प्रासादोंमें श्रेष्ठ था, जिसे साक्षात् विश्वकर्मा-ने बनाया था, जिसकी लंबाई-चौड़ाई एक-एक योजन थी, जो सभी रत्नोंद्वारा निर्मित एवं शुभ-स्वरूप था, वह उत्तम प्रभासे युक्त कान्तिमान् प्रासाद वहाँ 'विरजा' नामसे विख्यात होकर बड़ी शोभा पा रहा था। उसीमें महात्मा केशवका उपस्थान-गृह था ॥ ५६-५७ ॥

तस्मिन् सुविहिताः सर्वे रुक्मदण्डाः पताकिनः ।
सदने वासुदेवस्य मार्गसंजवनध्वजाः ॥ ५८ ॥
रत्नजालानि दिव्यानि तत्रैव च निवेशिताः ।
आहृत्य यद्विसिंहेन वैजयन्तोऽचलो महान् ॥ ५९ ॥
वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके उस सुन्दर सदनमें जो मार्गका ज्ञान करानेवाले ध्वज लगे थे, उन सबके दण्ड सुवर्णमय बनाये गये थे तथा उनपर पताकाएँ फहराती रहती थीं । यदुसिंह श्रीकृष्णने वहाँ दिव्य रत्नोंके समूह संचित किये थे तथा वैजयन्त नामक महान् पर्वत वहाँ लाकर स्थापित किया था ॥

हंसकूटस्य यच्छृङ्गमिन्रद्युम्नस्रः प्रति ।
षष्टितालसमुत्सेधमर्धयोजनमायतम् ॥ ६० ॥
इन्द्रद्युम्न सरोवरके पास हंसकूट पर्वतका जो शिखर था, वह साठ ताड़के बराबर ऊँचा और आधा योजन चौड़ा था ॥

सकिन्नरमहानागं तदप्यमिततेजसा ।
पश्यतां सर्वभूतानामानीयत लोकविश्रुतम् ॥ ६१ ॥
अमित तेजस्वी विश्वकर्मा समस्त प्राणियोंके देखते-देखते उस विश्वविख्यात पर्वतशिखरको किन्नर और बड़े-बड़े नागों-सहित वहाँ ले आये थे ॥ ६१ ॥