भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 633

विष्णुपर्व ] अष्टनवतितमोऽध्यायः ६११


स्त्रियोऽपि यस्यां युध्येरन् किमु वृष्णिमहारथाः ।
व्यूहानामुत्तमा मार्गाः सप्त चैव महापथाः ॥ ३० ॥
उस पुरीमें रहकर स्त्रियाँ भी युद्ध कर सकती थीं; फिर साक्षात् वृष्णिवंशी महारथियोंकी तो बात ही क्या ? उसमें व्यूहोंके उत्तम मार्ग हैं। सात बड़ी-बड़ी सड़कें हैं ॥ ३० ॥

तत्र वै विहिताः साक्षाद् विविधा विश्वकर्मणा ।
तस्मिन् पुरवरश्रेष्ठे दाशार्हाणां यशस्विनाम् ॥ ३१ ॥
वेश्मानि जहृषे दृष्ट्वा ततो देवकिनन्दनः ।
काञ्चनैर्मणिसोपानेरुपपेतानि नृहर्षणैः ॥ ३२ ॥
वहाँ साक्षात् विश्वकर्माने उन विविध मार्गोंका निर्माण किया था। नगरोंमें श्रेष्ठ उस द्वारकापुरीमें यशस्वी दशार्ह-वंशियोंके महल देखकर देवकीनन्दन भगवान् कृष्णको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे महल मनुष्योंको हर्ष प्रदान करनेवाली सोने और मणियोंकी सीढ़ियोंसे अलंकृत थे ॥ ३१-३२ ॥

भीमघोषमहाघोषैः प्रासादवरचत्वरैः ।
समुच्छ्रितपताकानि परिप्लुतवनानि च ॥ ३३ ॥
महान् एवं भयंकर घोषों, महलों तथा सुन्दर आँगनोंसे शोभा पानेवाले उन महलोंके ऊपर ऊँची-ऊँची पताकाएँ फहरा रही थीं। उन महलोंके भीतर लगे हुए उद्यानोंके वृक्ष हवासे घूमते रहते थे ॥ ३३ ॥

काञ्चनाग्राणि भास्वन्ति प्रासादशिखराणि च ।
गृहाणि रमणीयानि मेरुकूटनिभानि च ॥ ३४ ॥
उन महलोंके शिखर सोनेके कंगूरों या कलशोंसे सुशोभित हो उद्भासित होते रहते थे। वे गगनचुम्बी रमणीय भवन मेरुपर्वतके शिखरोंके समान प्रतीत होते थे ॥ ३४ ॥

पाण्डुपाण्डुरशृङ्गैश्च शातकुम्भपरिष्कृतैः ।
रत्नसानुगुहाशृङ्गैरैर्विचित्रैरिव पर्वतैः ॥ ३५ ॥
उन महलोंके शिखर श्वेतसे भी अधिक श्वेत थे। उनमें सोने मढ़े गये थे। वे रत्नमय शिखर, गुफा और चोटियोंवाले विचित्र पर्वतोंके समान शोभा पाते थे ॥ ३५ ॥

पञ्चवर्णैः सुवर्णैश्च पुष्पवृष्टिसमप्रभैः ।
पर्जन्यतुल्यनिर्घोषैर्नानारूपैरिवाद्रिभिः ॥ ३६ ॥
वे गृह पाँच प्रकारके रंगोंसे रँगे गये थे। कितने ही सुनहरे रंगसे सुशोभित थे। कुछ गृहोंकी कान्ति ऐसी जान पड़ती थी, मानो वहाँ फूलोंकी वर्षा हो रही हो। उन महलोंसे मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान शब्द प्रकट होते रहते थे। वे बहुरंगे भवन अनेक रूपवाले पर्वतोंके समान जान पड़ते थे ॥ ३६ ॥

दावाग्निज्वलितप्रख्यैर्निर्मितैर्विश्वकर्मणा ।
आलिखद्भिरिवाकाशमतिचन्द्रार्कभास्वरैः ॥ ३७ ॥
विश्वकर्माके बनाये हुए वे तेजस्वी भवन दावानलकी ज्वालाके समान देदीप्यमान होते थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो वे आकाशमें सुनहरी रेखा खींच रहे हों। उनका प्रकाश चन्द्रमा और सूर्यसे भी बढ़कर था ॥ ३७ ॥

तैर्दशार्हर्महाभागैर्गर्भभासे तद्वनद्रुमैः ।
वासुदेवेन्द्रपर्जन्यैर्गृहमेघैरलंstate->रलंकृता ॥ ३८ ॥
ददृशे द्वारका चारुमेघैरिव संवृता ।
उन चित्रक आदि वर्णोंके वृक्षों तथा दशार्हवंशी महाभाग वीरों एवं गृहरूपी मेघोंसे अलंकृत द्वारकापुरी अत्यन्त शोभा पाती थी और मनोहर घनमालाओंसे घिरे हुए आकाशकी भाँति दिखायी देती थी। भगवान् श्रीकृष्ण ही वहाँ इन्द्र एवं पर्जन्यके रूपमें शोभा पाते थे ॥ ३८ १/२ ॥

साक्षाद् भगवतो वेश्म विहितं विश्वकर्मणा ॥ ३९ ॥
ददृशे वासुदेवस्य चतुर्योजनमायतम् ।
तावदेव च विस्तीर्णमप्रमेयमहाधनम् ॥ ४० ॥
विश्वकर्माका बनाया हुआ साक्षात् भगवान् वासुदेवका भवन चार योजन लंबा और उतना ही चौड़ा दिखायी देता था। उसमें कितना महान् धन लगा था, इसका अनुमान लगाना असम्भव है ॥ ३९-४० ॥

प्रासादवरसम्पन्नं युक्तं जगति पर्वतैः ।
यच्चकार महाभागस्त्वष्टा वासवनोदितः ॥ ४१ ॥
उस विशाल भवनके भीतर अनेकानेक सुन्दर महल और अट्टालिकाएँ बनी थीं। वह प्रासाद जगत्‌के सभी पर्वतीय दृश्योंसे युक्त था। अथवा उसमें जगत्‌के सुप्रसिद्ध पर्वत क्रीड़ाके लिये कृत्रिम रूपसे बनाये गये थे। महाभाग विश्वकर्माने इन्द्रसे प्रेरित होकर उसका निर्माण किया था ॥ ४१ ॥

प्रासादं चैव हेमाभं सर्वभूतमनोहरम् ॥ ४२ ॥
मेरोरिव गिरेः शृङ्गमुच्छ्रितं काञ्चनं महत् ।
रुक्मिण्याः प्रवरं वासं विहितं विश्वकर्मणा ॥ ४३ ॥
वह सुवर्णमय प्रासाद समस्त प्राणियोंके लिये मनोहर था। उसके ऊँचे शिखरपर सुवर्ण मढ़ा गया था; जिससे वह मेरु पर्वतके उत्तुङ्ग शृङ्गकी शोभा धारण करता था। विश्वकर्माने उस श्रेष्ठ प्रासादको महारानी रुक्मिणीके रहनेके लिये बनाया था ॥ ४२-४३ ॥

सत्यभामा पुनर्वेश्म यदावसत् पाण्डुरम् ।
विचित्रमणिसोपानं तद् विदुर्भोगवानिति ॥ ४४ ॥
विमलादित्यवर्णाभिः पताकाभिरलंकृतम् ।
सत्यभामा जिस भवनमें निवास करती थीं, वह श्वेत वर्णका था। उसमें विचित्र मणियोंके सोपान बनाये गये थे। उसे सब प्रकारके भोगोंसे सम्पन्न समझा जाता था। निर्मल सूर्यके समान तेजस्विनी पताकाएँ उस मनोरम प्रासादकी शोभा बढ़ाती थीं ॥ ४४ १/२ ॥