विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 632, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें६१० श्रीमद्भागवते खिलभागे [ हरिवंशे
बभौ रैवतकः शैलो रम्यसानुगुहाजिरः । पूर्वस्यां दिशि लक्ष्मीवान् मणिकाञ्चनतोरणः ॥ १५ ॥ द्वारकापुरीकी पूर्व दिशामें शोभासम्पन्न रैवतक पर्वत बड़ा ही मनोहर प्रतीत होता था। उसके शिखर, गुफा और आँगन सभी रमणीय थे। उसके बाहरी फाटक मणि एवं सुवर्णके बने हुए थे ॥ १५ ॥
दक्षिणस्यां लतावेष्टः पञ्चवर्णो विराजते । इन्द्रकेतुप्रतीकाशः पश्चिमां दिशमाश्रितः । सुकक्षो राजतः शैलश्चित्रपुष्पमहावनः ॥ १६ ॥ पुरीके दक्षिण भागमें लतावेष्ट नामक पर्वत शोभा पा रहा था, जो पाँच रंगका होनेके कारण इन्द्रध्वज-सा प्रतीत होता था। पश्चिम दिशामें सुकक्ष नामक रजत पर्वत था, जिसके ऊपर विचित्र पुष्पोंसे अलंकृत महान् वन सुशोभित हो रहा था ॥ १६ ॥
उत्तरां दिशमत्यर्थं विभूषयति वेणुमान् । मन्दराद्रिप्रतीकाशः पाण्डुरः पार्थिवर्षभ ॥ १७ ॥ नृपश्रेष्ठ ! मन्दराचलके समान श्वेत वर्णवाला वेणुमान् पर्वत द्वारकाकी उत्तर दिशाको अत्यन्त शोभासम्पन्न बना रहा था ॥ १७ ॥
चित्रकं पञ्चवर्णं च पाञ्चजन्यं वनं महत् । सर्वर्तुकवनं चैव भाति रैवतकं प्रति ॥ १८ ॥ रैवतक पर्वतके चारों ओर चित्रक, पञ्चवर्ण, विशाल पाञ्चजन्य तथा सर्वर्तुक नामक वन शोभा पा रहे थे ॥ १८ ॥
लतावेष्टितपर्यन्तं मेरुप्रभवनं महत् । भाति भानुवनं चैव पुष्पकं च महद् वनम् ॥ १९ ॥ लतावेष्ट पर्वतके चारों ओर मेरुप्रभ नामक महान् वन, भानुवन तथा पुष्पक नामक विशाल वन शोभा पा रहे थे ॥ १९ ॥
अक्षकैर्बीजकैश्चैव मन्दारैश्चोपशोभितम् । शतावर्तवनं चैव करवीराकरं तथा ॥ २० ॥ भाति चैत्ररथं चैव नन्दनं च वनं महत् । रमणं भावनं चैवं वेणुमन्तं समन्ततः ॥ २१ ॥ सुकक्ष पर्वतके चारों ओर रुद्राक्षोंसे सुशोभित वन, बीजकवन, मन्दार वृक्षोंसे सुशोभित मन्दारवन, शतावर्तवन तथा करवीराकर नामक वन सुशोभित होते थे। वेणुमान् पर्वतके सब ओर चैत्ररथवन, नन्दन नामक महान् वन, रमणवन तथा भावन नामक वन शोभा पाते थे ॥ २०-२१ ॥
वैदूर्यपत्रैर्जलजैस्तदा मन्दाकिनी नदी । भाति पुष्करिणी रम्या पूर्वस्यां दिशि भारत ॥ २२ ॥ भारत ! वहाँ वैदूर्यमणिमय पत्रवाले कमलोंसे सुशोभित मन्दाकिनी नदी पुरीकी पूर्वदिशामें एक रमणीय पुष्करिणीके रूपमें शोभा पाती थी ॥ २२ ॥
सानवो भूषितास्तत्र केशवस्य प्रियैषिभिः । बहुभिर्देवगन्धर्वैश्चोदितैर्विश्वकर्मणा ॥ २३ ॥ विश्वकर्मासे प्रेरित होकर भगवान् केशवका प्रिय चाहनेवाले बहुत-से देवगन्धर्व वहाँके पर्वतीय शिखरोंकी शोभा बढ़ाते थे ॥ २३ ॥
महानदी द्वारवतीं पञ्चाशद्भिर्महामुखैः । प्रविष्टा पुण्यसलिला भावयन्ती समन्ततः ॥ २४ ॥ पुण्यसलिला महानदी मन्दाकिनी पचास बड़े-बड़े स्रोतों-द्वारा द्वारकावासियोंको प्रसन्न करती हुई सब ओरसे उस पुरीमें प्रविष्ट हुई थी ॥ २४ ॥
अप्रमेयां महोत्सेधामगाधपरिखायुताम् । प्राकारवरसम्पन्नां सुधापाण्डुरलेपनाम् ॥ २५ ॥ द्वारकापुरी कितनी बड़ी है, इसका कोई माप नहीं था। उसकी ऊँचाई भी बहुत अधिक थी। वह अगाध खाइयोंसे घिरी हुई थी। सुन्दर परकोटे उसे शोभासम्पन्न कर रहे थे। उस पुरीकी दीवारोंको चूनेसे लीपकर श्वेत बनाया गया था ॥ २५ ॥
तीक्ष्णयन्त्रशतघ्नीभिर्हेमजालैश्च भूषिताम् । आयसैश्च महाचक्रैर्ददर्श द्वारकां पुरीम् ॥ २६ ॥ भगवान्ने द्वारकापुरीको तीखे यन्त्र, शतघ्नी और सोनेकी जालियोंसे विभूषित देखा। वह लोहेके बड़े-बड़े चक्रोंसे सुरक्षित थी ॥ २६ ॥
अष्टौ रथसहस्राणि नगरे किङ्किणीकिनाम् । समुच्छ्रितपताकानि यथा देवपुरे तथा ॥ २७ ॥ देवताओंके नगरकी भाँति द्वारकापुरीमें क्षुद्रघण्टिकाओंसे युक्त आठ हजार रथ शोभा पाते थे, जिनमें ऊँची उठी हुई पताकाएँ फहरा रही थीं ॥ २७ ॥
अष्टयोजनविस्तीर्णामचलां द्वादशायताम् । द्विगुणोपनिवेशां च ददर्श द्वारकां पुरीम् ॥ २८ ॥ द्वारकापुरीकी चौड़ाई आठ योजन थी और लंबाई बारह योजन अर्थात् उसका सम्पूर्ण विस्तार छानवे योजन था। उसका उपनिवेश (समीपस्थ प्रदेश) उससे दुगुना अर्थात् एक सौ बानवे योजन विस्तृत था। श्रीकृष्णने उस अविचल द्वारकापुरीका दर्शन किया ॥ २८ ॥
अष्टमार्गमहारथ्यां महाषोडशचत्वराम् । एवंमार्गपरिक्षिप्तां साक्षादुशनसा कृताम् ॥ २९ ॥ उसमें जानेके लिये आठ महामार्ग थे और सोलह बड़े-बड़े चौराहे बने थे। इस प्रकार विभिन्न मार्गोंसे परिक्षिप्त द्वारकापुरी साक्षात् शुक्राचार्यकी नीतिके अनुसार बनायी गयी थी ॥ २९ ॥