विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 614, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें५९२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
विमानानि विचित्राणि रथांश्चाकाशगामिनः ।
गजानाकाशगांश्चैव दिव्यनागकुलोद्भवान् ॥ ३४ ॥
विचित्र विमान, आकाशगामी रथ और दिव्य नागोंके कुलमें उत्पन्न हुए आकाशचारी हाथी भी प्रदान किये ॥ ३४ ॥
चन्दनानि च दिव्यानि शीतानि रसवन्ति च ।
गुरूण्यगुरुमुख्यानि गन्धाढ्यानि च भारत ॥ ३५ ॥
चिन्तामणीनुदारांश्च चिन्तिते सर्वकामदान् ।
भरतनन्दन ! उन दानवोंने यादवकुमारोंको दिव्य, शीतल एवं सरस चन्दन, अगरु आदि श्रेष्ठ सुगन्धित पदार्थ तथा चिन्तन करनेमात्रसे सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले उदार चिन्तामणि नामक रत्न भी दिये ॥ ३५१/२ ॥
प्रेक्षासु तासु बह्वीषु ददन्तो दानवास्तथा ॥ ३६ ॥
धनरत्नैर्विरहिताः कृताः पुरुषसत्तम ।
स्त्रियो दानवमुख्यानां तथैव च जनेश्वर ॥ ३७ ॥
पुरुषप्रवर ! नरेश्वर ! वहाँ बहुत बार नाटक देखनेको अवसर मिले । उन सभी अवसरोंपर दानवों तथा प्रधान-प्रधान दानवोंकी स्त्रियोंने इतने उपहार दिये कि वे सब-के-सब धन तथा रत्नोंसे रहित हो गये ॥ ३६-३७ ॥
ततो हंसी प्रभावत्याः सखी प्राह प्रभावतीम् ।
गतास्मि द्वारकां रम्यां भैमगुप्तामनिन्दिते ॥ ३८ ॥
तब प्रभावतीकी सखी हंसीने प्रभावतीसे कहा—'अनिन्दिते ! मैं यादवोंद्वारा सुरक्षित रमणीय द्वारकापुरीमें गयी थी ॥ ३८ ॥
प्रद्युम्नश्च मया दृष्टो विविक्ते चारुलोचने ।
भक्तिश्च कथिता तस्य मया तव शुचिस्मिते ॥ ३९ ॥
'चारुलोचने ! वहाँ एकान्तमे मैंने प्रद्युम्नसे भेंट की । शुचिस्मिते ! तुम्हारी प्रद्युम्नके प्रति जो भक्ति है, उसकी भी मैंने उनसे चर्चा की ॥ ३९ ॥
तेन हृष्टेन कालश्च कृतः कमललोचने ।
अद्य प्रदोषसमये त्वया सह समागमे ॥ ४० ॥
'कमललोचने ! मेरी बात सुनकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने आज ही प्रदोषकालमें तुमसे मिलनेका समय निश्चित किया है ॥ ४० ॥
तदद्य रुचिरश्रोणि तव प्रियसमागमः ।
न ह्यात्मवति भाषन्ति मिथ्या भैमकुलोद्भवाः ॥ ४१ ॥
'अतः सुश्रोणि ! आज ही तुम्हारी अपने प्राणवल्लभसे भेंट होगी; क्योंकि यदुकुलमें उत्पन्न हुए पुरुष अपने प्रेमी-जनोंके प्रति कोई मिथ्या संदेश नहीं देते हैं' ॥ ४१ ॥
ततः प्रभावती हृष्टा हंसीं तामिदमब्रवीत् ।
उषितासि ममावासे स्वप्तुमर्हसि सुन्दरि ॥ ४२ ॥
यह सुनकर प्रभावतीको बड़ा हर्ष हुआ । वह उस हंसीसे इस प्रकार बोली—'सुन्दरि ! तुम पहले भी मेरे घरमें रह चुकी हो । उसी तरह आज भी मेरे ही महलमें शयन करो ॥ ४२ ॥
त्वयाहं सहिताऽऽवासे द्रष्टुमिच्छामि कैशविम् ।
निःसाध्वसा भविष्यामि त्वया सह विहङ्गमे ॥ ४३ ॥
'विहङ्गमे ! आज इस घरमें तुम्हारे साथ रहकर ही मैं केशवकुमार प्रद्युम्नका दर्शन करना चाहती हूँ । तुम्हारे साथ होनेसे मैं निर्भय रहूँगी' ॥ ४३ ॥
हंसी तथेति चोवाच सखीं कमललोचनाम् ।
आरुरोह च तद्धर्म्यं प्रभावत्या विहङ्गमा ॥ ४४ ॥
तब आकाशचारिणी हंसीने अपनी कमललोचना सखी प्रभावतीसे कहा—'बहुत अच्छा, आज यहीं सोऊँगी ।' फिर वह प्रभावतीकी अट्टालिकापर आरूढ हुई ॥ ४४ ॥
विश्वकर्मकृते तत्र हर्म्यपृष्ठे प्रभावती ।
संविधानं चकाराशु प्रद्युम्नागमनक्षमम् ॥ ४५ ॥
विश्वकर्माके बनाये हुए प्रासादपृष्ठमें प्रभावतीने शीघ्र ही प्रद्युम्नके आगमनके योग्य सजावट कर दी ॥ ४५ ॥
तस्मिन् कृते संविधाने काममानयितुं ययौ ।
प्रभावतीमनुज्ञाप्य हंसी वायुसमा गतौ ॥ ४६ ॥
वह सजावट हो जानेपर वायुके समान तीव्र वेगसे चलनेवाली हंसी प्रभावतीसे पूछकर प्रद्युम्नको ले आनेके लिये गयी ॥ ४६ ॥
नटवेषधरं कामं गत्वोवाच शुचिस्मिता ।
अद्य भूतः स भगवन् समयो वर्तते निशि ॥ ४७ ॥
पवित्र मुसकानवाली वह हंसी नटवेषधारी प्रद्युम्नके पास जाकर बोली-'भगवन् ! आपने पहलेसे जो समय निश्चित कर रक्खा है; वह आजकी ही रातमें आ रहा है' ॥ ४७ ॥
तथेति प्राह तां कामः सा निवृत्ताथ पक्षिणी ।
अभ्यागता च सा हंसी प्रभावतिमथाब्रवीत् ।
अभ्येति रौक्मिणेयोऽसावाश्वसायतलोचने ॥ ४८ ॥
तब प्रद्युम्नने उससे कहा--'बहुत अच्छा' उनका यह उत्तर सुनकर पक्षिणी लौट गयी । महलमें लौटकर हंसीने प्रभावतीसे कहा--'विशाललोचने ! धीरज धारण करो ! वे रुक्मिणीनन्दन तुम्हारे पास आ रहे हैं' ॥ ४८ ॥
प्रद्युम्नो नीयमानं तु ददर्श माल्यमात्मवान् ।
भ्रमरैरावृतं वीरः सुगन्धमरिंमर्दनः ॥ ४९ ॥
उधर शत्रुमर्दन मनस्वी वीर प्रद्युम्नने देखा कि प्रभावतीके यहाँ सुगन्धित पुष्पमाला ले जायी जा रही है, जिसपर बहुत-से भ्रमर आ बैठे हैं ॥ ४९ ॥
निलिल्ये तत्र माल्ये तु भूत्वा मधूकरस्तदा ।
प्रभावत्या नीयमाने विदितार्थः प्रतापवान् ॥ ५० ॥