भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 613

विष्णुपर्व ] त्रिनवतितमोऽध्यायः [ ५९१


नरेश्वर ! अन्तःपुरकी स्त्रियोंको पर्देकी ओटमें जहाँसे वे अपने नेत्रोंद्वारा सब कुछ देख सकती थीं, बिठाकर मनस्वी वज्रनाभ स्वयं भी जाति-भाइयोंके साथ उन नटोंका अभिनय देखनेके लिये बैठा ॥ २० ॥

भैमापि बद्धनेपथ्या नटवेषधरास्तथा।
कार्यार्थं भीमकर्माणो नृत्यार्थमुपचक्रमुः ॥ २१ ॥

भयंकर कर्म करनेवाले वे यादवकुमार भी उपयुक्त शृङ्गार करके नट-वेश धारण किये नृत्यका उपक्रम करने लगे ॥ २१ ॥

ततो घनं ससुषिरं मुरजानकभूषितम्।
तन्त्रीस्वरगणैर्विद्धमानातोद्यमनन्दयन् ॥ २२ ॥

फिर तो घन (झाँझ और करताल आदि), सुषिर (मुरली आदि), मुरज (मृदङ्ग), आनक (ढोल या नगाड़ा) तथा वीणाके स्वरोंसे मिश्रित दूसरे-दूसरे बाजे उन नटोंद्वारा बजाये जाने लगे ॥ २२ ॥

ततस्तु देवगान्धारं छालिक्यं श्रवणामृतम्।
भैमस्त्रियः प्रजगिरे मनःश्रोत्रसुखावहम् ॥ २३ ॥

तत्पश्चात् यादवकुमारोंके साथ आयी हुई वाराङ्गनाएँ देवगान्धार नामक छालिक्य गान्धर्वका गान करने लगीं, जो कानोंको अमृतके समान मधुर प्रतीत होता था। वह श्रोताके मन और कान दोनोंको सुख देनेवाला था ॥ २३ ॥

आगान्धारग्रामरागं गङ्गावतरणं तथा।
विद्धमासारितं रम्यं जगिरे स्वरसम्पदा ॥ २४ ॥

गान्धार आदि सातों स्वरोंको व्याप्त करके स्थित होनेवाले जो त्रिविध1 ग्राम (कतिपय स्वरोंके समूह), वसन्त आदि राग तथा गङ्गावतरण नामक गीतविशेष हैं, उन्हें रागान्तरसे मिश्रित, व्याप्त तथा रमणीय बनाकर वे अपनी मधुर स्वर-सम्पत्तिके द्वारा गाने लगीं ॥ २४ ॥

लयतालसमं श्रुत्वा गङ्गावतरणं शुभम्।
असुरांस्तोपयामासुरथायोत्थाय भारत ॥ २५ ॥

भारत ! लय और तालके अनुरूप सुन्दर गङ्गावतरणको सुनकर (प्रद्युम्न, गद और साम्ब—ये तीनों बीच-बीचमें) खड़े हो-होकर असुरोंको सन्तोष प्रदान करते थे ॥ २५ ॥

नान्दिं च वादयामासुः प्रद्युम्नो गद एव च।
साम्बश्च वीर्यसम्पन्नः कार्यार्थं नटतां गतः ॥ २६ ॥

कार्यवश नटभावको प्राप्त हुए पराक्रमसम्पन्न प्रद्युम्न, गद और साम्ब नान्दी2 बजाने लगे ॥ २६ ॥

नान्द्यन्ते च तदा श्लोकं गङ्गावतराणाश्रितम्।
रौक्मिणेयस्तदोवाच सम्यक् स्वभिनयान्वितम् ॥ २७॥

उस समय नान्दी (माङ्गलिक पद्यपाठ) के अन्तमें रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नने गङ्गावतरणसे सम्बन्ध रखनेवाले श्लोकका उत्तम अभिनयके साथ पाठ किया ॥ २७ ॥

रम्भाभिसारं कौबेरं नाटकं ननृतुस्ततः।
शूरो रावणरूपेण रम्भावेषा मनोवती ॥ २८ ॥

तत्पश्चात् कुबेरलोकसम्बन्धी रम्भाभिसार नामक नाटकका वे सब लोग अभिनय करने लगे। शूर नामक यादव रावण रूपसे उपस्थित हुए। मनोवती नामक वाराङ्गनाने रम्भाका वेष धारण किया ॥ २८ ॥

नलकूबरस्तु प्रद्युम्नः साम्बस्तस्य विदूषकः।
कैलासो रूपितश्चापि मायया यदुनन्दनैः ॥ २९ ॥

प्रद्युम्न ही नलकूबर बने। साम्ब उनके विदूषक बनकर तदनुरूप कार्य करने लगे। यादवकुमारोंने मायासे वहाँ कैलासको ही मूर्तिमान् कर दिया ॥ २९ ॥

शापञ्च दत्तं क्रुद्धेन रावणस्य दुरात्मनः।
नलकूबरेण च यथा रम्भा चाप्यथ सान्त्विता ॥ ३० ॥
एतत् प्रकरणं वीरा ननृतुर्यदुनन्दनाः।
नारदस्य मुनेः कीर्तिं सर्वज्ञस्य महात्मनः ॥ ३१ ॥

क्रोधमें भरे हुए नलकूबरने जिस प्रकार दुरात्मा रावणको शाप दिया और जिस तरह रम्भाको सान्त्वना प्रदान की, इस प्रकरणका, जिसके द्वारा सर्वज्ञ महात्मा नारद मुनिकी कीर्तिपर प्रकाश पड़ता है, उन वीर यादवकुमारोंने नाटकद्वारा प्रदर्शन किया ॥ ३०-३१ ॥

पादोद्धारेण नृत्येन तथैवाभिनयेन च।
तुष्टुवुर्दानवा वीरा भैमानामिततेजसाम् ॥ ३२ ॥

अत्यन्त तेजस्वी भीमवंशियोंके पाद-विक्षेपपूर्वक किये गये नृत्य और अभिनयसे संतुष्ट हुए दानववीर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ३२ ॥

ते ददुर्वरमुख्यानि रत्नान्याभरणानि च।
हारांस्तरलाच्छिद्रांश्च वैडूर्यमणिभूषितान् ॥ ३३ ॥

उन्होंने अच्छे-अच्छे वस्त्र, रत्नमय आभूषण तथा वर्तुलाकार मणिसे विद्ध एवं वैदूर्यमणिसे विभूषित हार दिये ॥


Footnotes

  1. १. षड्ज, मध्यम और गान्धार—ये तीन ग्राम हैं।

  2. २. यहाँ नान्दि शब्द एक वाद्यविशेषका वाचक है। यह चमड़ेके थैलेके समान होता है और उसके मुखपर शिववाहन नन्दीके मुखकी आकृति बनी रहती है, इसीलिये उसे नान्दी कहते हैं। कुछ लोगोंके मतमें बारह पटहों (नगाड़ों) की ध्वनिको ही नान्दि कहते हैं। कहीं-कहीं नान्दिको जगह नान्दी पाठ है। देवताओं और द्विजों आदिकी शुभाशंसा करनेवाली जो पद्य अथवा गीतमयी वाक्यावली है, जो नाटकके पूर्व रंगमें प्रार्थनाके रूपमें पढ़ी जाती है, उसका नाम नान्दी है। उस नान्दीके अन्तमें सूत्रधार नाटककी प्रस्तावना करता है।