भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 612

५९० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


है; इस भावनाने सबके मनमे नयी उत्कण्ठा उत्पन्न कर दी थी ॥ ३ ॥

नटस्याथ ददुर्दैत्याः सत्कारं परया मुदा।
पर्यायार्थे ददुश्चापि रत्नानि सुवहून्यथ ॥ ४ ॥

दैत्योंने भद्र नामक नटको बड़ी प्रसन्नताके साथ उत्तम सत्कार प्रदान किया। उन्होंने वेश-धारणके लिये उसे बहुत-से रत्न दिये ॥ ४ ॥

ततः स ननृते तत्र वरदत्तो नटस्तथा।
सुपुरे पुरवासीनां परं हर्षं समादधत् ॥ ५ ॥

तदनन्तर वर प्राप्त किये हुए उस नटने वहाँ सुपुरमें नृत्य किया और पुरवासियोंके मनमें महान् हर्ष भर दिया ॥ ५ ॥

रामायणं महाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम् ।
जन्म विष्णोरमेयस्य राक्षसेन्द्रवधेप्सया ॥ ६ ॥

उसने रामायण नामक महाकाव्यकी कथावस्तुको लेकर वहाँ एक नाटक किया। उसमें यह दिखाया गया कि राक्षस-राज रावणके वधकी इच्छासे अप्रमेयस्वरूप भगवान् विष्णुका भूतलपर अवतार हुआ ॥ ६ ॥

लोमपादो दशरथ ऋष्यशृङ्गं महामुनिम्।
शान्तामप्यानयामास गणिकाभिः सहानघ ॥ ७ ॥

अनघ ! लोमपादने महामुनि ऋष्यशृङ्गको गणिकाओंके साथ अपने यहाँ बुलवाया; फिर महाराज दशरथने ऋष्य-शृङ्गके साथ उनकी पत्नी शान्ताको भी अपने यहाँ निमन्त्रित किया ॥ ७ ॥

रामलक्ष्मणशत्रुघ्ना भरतश्चैव भारत।
ऋष्यशृङ्गश्च शान्ता च तथारूपैर्नटैः कृताः ॥ ८ ॥

भरतनन्दन ! राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, भरत, ऋष्यशृङ्ग तथा शान्ताका वेश उन्हींके जैसे रूपवाले नटोंने धारण किया था ॥ ८ ॥

तत्कालजीविनो वृद्धा दानवा विस्मयं गताः।
आचचक्षुश्च तेषां वै रूपतुल्यत्वमच्युत ॥ ९ ॥

राजन् ! जो रामके समयमे जीवित थे, वे बूढ़े दानव भी उन्हें देखकर आश्चर्यचकित हो गये और कहने लगे, इनका रूप तो ठीक उन्हीं व्यक्तियोंके तुल्य है ॥ ९ ॥

संस्काराभिनयौ तेषां प्रस्तावानां च धारणम् ।
दृष्ट्वा सर्वे प्रवेशं च दानवा विस्मयं गताः ॥ १० ॥

उनके संस्कार ( वेश-धारण ), अभिनय, प्रस्तावों ( क्रिया-प्रसङ्गों ) का धारण तथा प्रवेश ( पात्रोंका प्रथम दर्शन,) देखकर सभी दानव बड़े विस्मयमे पड़ गये थे ॥ १० ॥

ते रक्ता विस्मयं नेदुरसुराः परया मुदा।
उत्थायोत्थाय नाट्यस्य विषयेषु पुनः पुनः ॥ ११ ॥
ददुर्वस्त्राणि तुष्टाश्च ग्रैवेयवलयानि च।
हारान् मनोहरांश्चैव हेमवैडूर्यभूषितान् ॥ १२ ॥

उस नाटकमे अनुरक्त हुए वे असुरगण नाट्य विषयोंमें बारंबार उठ-उठकर बड़ी प्रसन्नताके साथ आश्चर्ययुक्त कोलाहल करते और संतुष्ट हो नटोंको वस्त्र, गलेका भूषण, कङ्कण, मनोहर हेमवैडूर्यभूषित हार देते थे ॥ ११-१२ ॥

पृथगर्थेषु दत्तेषु लोकैस्ते तुष्टुवुर्नटाः।
असुरांश्च मुनींश्चैव गोत्रैरभिजनैरपि ॥ १३ ॥

लोगोंके इस प्रकार पृथक-पृथक् वस्तुओंकी भेंट देनेपर वे नट बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने उनके गोत्रों और पूर्वजोंका उल्लेख करके उन असुरों और ऋषि-मुनियोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ १३ ॥

प्रेषितं वज्रनाभस्य शाखानगरवासिभिः।
नटस्य दिव्यरूपस्य नरेन्द्रागमनं तदा ॥ १४ ॥

नरेन्द्र ! उस समय शाखा-नगरनिवासी असुरोंने वज्रनाभके पास उस दिव्य रूपधारी नटके पधारनेका शुभ समाचार भेजा ॥

पुरा श्रुतार्थो दैत्येन्द्रः प्रेषयामास भारत।
आनीयतां वज्रपुरं नटोऽसाविति हर्षितः ॥ १५ ॥

भारत ! दैत्यराजने पहले ही यह समाचार सुन लिया था। अतः उसने अत्यन्त हर्षित होकर यह संदेश भेजा कि उस नटको वज्रपुरमें ले आया जाय ॥ १५ ॥

दानवेन्द्रवचः श्रुत्वा शाखानगरवासिभिः।
नीता वज्रपुरं रम्यं नटवेषेण यादवाः ॥ १६ ॥

दानवराजका वह आदेश सुनकर शाखानगरनिवासी असुर नटवेशधारी यादवोंको रमणीय वज्रपुरमें ले गये ॥ १६ ॥

आवासश्च ततो दत्तः सुकृतो विश्वकर्मणा।
एष्टव्यं यच्च तत् सर्वं दत्तं शतगुणोत्तरम् ॥ १७ ॥

दैत्यराजने उन्हें ठहरनेके लिये विश्वकर्माका बनाया हुआ सुन्दर भवन प्रदान किया और जिन-जिन वस्तुओंकी इच्छा या आवश्यकता होती है, उन सबको उन्होंने सौ गुना अधिक करके दे दिया ॥ १७ ॥

अथ कालोत्सवं चक्रे वज्रनाभो महासुरः।
कारयामास रम्यं च चमूवाटं प्रहृष्टवान् ॥ १८ ॥

तदनन्तर महान् असुर वज्रनाभने महाकाल नामक रुद्रदेवका उत्सव आरम्भ किया। उसमे उसने बड़े हर्षमे भरकर रमणीय चमूवाट ( सैनिकोंके मनोरञ्जनका स्थान ) बनवाया ॥ १८ ॥

ततस्तान् परिविश्रान्तान् प्रेक्षार्थाय प्रचोदयत् ।
दत्त्वा रत्नानि भूरीणि वज्रनाभो महाबलः ॥ १९ ॥

तत्पश्चात् जब वे नट पूर्ण विश्राम कर चुके, तब महाबली वज्रनाभने उन्हे बहुत-से रत्न देकर नाट्यकलाका प्रदर्शन करनेके लिये आज्ञा दी ॥ १९ ॥

उपविष्टश्च तान् द्रष्टुं सह ज्ञातिभिरात्मवान्।
छन्ने चान्तःपुरं स्थाप्य चक्षुर्हृद्ये नराधिप ॥ २० ॥