भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 609

विष्णुपर्व ] द्विनवतितमोऽध्यायः ५८७


'देवि ! जैसे दूध देनेवाली गौओंके थन और सरिताओंके स्रोत टपकते हैं, उसी तरह उन प्रद्युम्नको देखकर सदा ही स्त्रियोंके जघनप्रदेश आर्द्र हो जाते हैं ॥ २२ ॥

न पूर्णचन्द्रेण मुखं नयने वा कुशेशयैः ।
उत्सहे नोपमातुं हि मृगेन्द्रेणाथ वा गतिम् ॥ २३ ॥

'उनके मुखकी पूर्ण चन्द्रसे, नयनोंकी नीलकमलसे अथवा गति ( चाल ) की सिंहसे मै उपमा नहीं दे सकती (क्योंकि ये सब हीन प्रतीत होते हैं) ॥ २३ ॥

जगतः सारमुद्धृत्य पुत्रः स विहितः शुभे ।
कृत्वाङ्गं वरे साङ्गं विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ २४ ॥

'शुभे ! सुन्दरी ! प्रभावशाली भगवान् विष्णुने सारे जगत्‌का सार निकालकर अनङ्गको साङ्ग करके अपने उस पुत्रका निर्माण किया है ॥ २४ ॥

हृतेन शम्बरो बाल्ये येन पापो निवार्वितः ।
मायाश्च सर्वाः सम्प्राप्ता न च शीलं विनाशितम् ॥ २५ ॥

'बाल्यावस्थामें उन्हें शम्बरासुरने हर लिया था; परंतु उन्होंने बड़े होनेपर उस पापीको मार डाला ! उसकी सारी मायाएँ प्राप्त कर लीं; फिर भी किसीके शीलका विनाश नहीं किया ॥ २५ ॥

यान् यान् गुणान् पृथुश्रोणि मनसा कल्पयिष्यसि ।
एष्टव्यांस्त्रिषु लोकेषु प्रद्युम्ने सर्व एव ते ॥ २६ ॥

'पृथुश्रोणि ! तुम मनसे जिन-जिन उत्तम गुणोंकी कल्पना करोगी अथवा तीनों लोकोंमें जो-जो श्रेष्ठ गुण वाञ्छनीय हैं, वे सब-के-सब प्रद्युम्नमें वर्तमान हैं ॥ २६ ॥

रुच्या वह्निप्रतीकाशः क्षमया पृथिवीसमः ।
तेजसा सूर्यसदृशो गाम्भीर्येण हृदोपमः ।
प्रभावती शुचिमुखीं त्वितीहोवाच भामिनी ॥ २७ ॥

'वे कान्तिमें अग्निके समान, क्षमामे पृथ्वीके तुल्य, तेजमें सूर्यके सदृश तथा गम्भीरतामें सागरके समान हैं' यह सुनकर भामिनी प्रभावतीने शुचिमुखीसे इस प्रकार कहा ॥

प्रभावत्युवाच

विष्णुर्मानुषलोकस्थः श्रुतः सुबहुशो मया ।
पितुः कथयतः सौम्ये नारदस्य च धीमतः ॥ २८ ॥

प्रभावती बोली- सौम्ये ! मैंने बुद्धिमान् नारदजी तथा अपने पिताके मुखसे कई बार सुना है कि भगवान् विष्णु इस समय मनुष्यलोकमे अवतीर्ण होकर विराज रहे हैं ॥

शत्रुः किल स दैत्यानां वर्जनीयः सदानघे ।
कुलानि किल दैत्यानां तेन दग्धानि मानिनि ॥ २९ ॥
प्रदीप्तेन रथाङ्गेन शार्ङ्गेण गदया तथा।
शाखानगरदेशेषु वसन्ति किल येऽसुराः ॥ ३० ॥
इत्येते दानवेन्द्रेण संदिश्यन्ते हि तं प्रति ।

पापरहित मानिनि ! शाखानगरके प्रदेशोंमें जो असुर निवास करते हैं, उन्हें मेरे पिता दानवराज वज्रनाभ भगवान् विष्णुके विषयमें इस प्रकार संदेश दिया करते हैं-'विष्णु दैत्योंके शत्रुकी रूपमें प्रसिद्ध हैं, अतः उन्हें सदाके लिये त्याग देना चाहिये। उन्होंने अपने तेजस्वी चक्र, शार्ङ्ग-धनुष तथा कौमोदकी गदाके द्वारा दैत्योंके बहुत-से कुल दग्ध कर डाले हैं' ॥ २९-३० १/२ ॥

मनोरथो हि सर्वासां स्त्रीणामेव शुचिस्मिते ॥ ३१ ॥
भवेद्धि मे प्रतिकुलं श्रेष्ठं पितृकुलादिति ।

पवित्र मुसकानवाली हंसी ! प्रायः सभी स्त्रियोंका ऐसा ही मनोरथ होता है कि मेरा पतिकुल पितृकुलसे श्रेष्ठ हो ॥

यदि नामाभ्युपायः स्यात् तस्येहागमनं प्रति ॥ ३२ ॥
महाननुग्रहो मे स्यात् कुलं स्यात् पावनं च मे ।

यदि प्रद्युम्नके यहाँ आनेके लिये कोई उपाय हो सके तो यह मुझपर तुम्हारा महान् अनुग्रह होगा और मेरा कुल पवित्र हो जायगा ॥ ३२ १/२ ॥

समर्थनां मे पृष्टा त्वं प्रयच्छ शुचिलापिनि ॥ ३३ ॥
प्रद्युम्नः स्याद् यथा भर्ता स मे वृष्णिकुलोद्भवः ।

पवित्र वार्ता करनेवाली हंसी ! मैंने तुमसे कार्यसिद्धिका उपाय पूछा है। वह उपाय तुम मुझे प्रदान करो। वृष्णिवंशा-वतंस प्रद्युम्न जिस प्रकार मेरे पति हो सकें, वैसा यत्न करो ॥

अत्यन्तवैरी दैत्यानामुद्वेजनकरो हरिः ॥ ३४ ॥
असुराणां स्त्रियो वृद्धाः कथयन्त्यो मया श्रुताः ।

मैंने असुरोंकी बड़ी-बूढ़ी स्त्रियोंके मुखसे यह बात सुनी है कि भगवान् विष्णु दैत्योंके अत्यन्त वैरी और उन्हे उद्वेगमे डालनेवाले हैं ॥ ३४ १/२ ॥

प्रद्युम्नस्य तथा जन्म पुरस्तादपि मे श्रुतम् ॥ ३५ ॥
यथा च तेन निहतो बलवान् कालशम्बरः ।

प्रद्युम्नके जन्मका वृत्तान्त मैंने पहले भी सुना है। जिस प्रकार उनके द्वारा बलवान् कालशम्बर मारा गया था, वह प्रसङ्ग भी मेरे सुननेमें आया है ॥ ३५ १/२ ॥

हृदि मे वर्तते नित्यं प्रद्युम्नः खलु सत्समे ॥ ३६ ॥
हेतुः स नास्ति स्यात् तेन यथा मम समागमः ।

साध्वीशिरोमणे ! प्रद्युम्न सदा मेरे हृदयमें विद्यमान रहते हैं; परंतु ऐसी कोई युक्ति या साधन नहीं है, जिससे उनके साथ मेरा समागम हो सके ॥ ३६ १/२ ॥

दासी त्वाहं सख्याहें दूत्ये त्वां च विसर्जये ॥ ३७ ॥
पण्डितासि वद्योपायं मम तस्य च संगमे ।

आदरणीया सखी ! मैं तुम्हारी दासी हूँ और तुम्हें दूतीके कामपर नियुक्त करती हूँ। तुम विदुषी हो। मेरे और प्रद्युम्नके मिलनका कोई उपाय बताओ ॥ ३७ १/२ ॥