भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 610, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 610
५८८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

ततस्तां सान्त्वयित्वा सा प्रहसन्तीदमब्रवीत् ॥ ३८ ॥
तब हंसीने उसे सान्त्वना देकर हँसते हुए कहा ॥ ३८ ॥

शुचिमुख्युवाच
तत्र दूती गमिष्यामि तवाहं चारुहासिनि ।
इमां भक्तिं तवोदारां प्रवक्ष्यामि शुचिस्मिते ॥ ३९ ॥
शुचिमुखी बोली—चारुहासिनि ! शुचिस्मिते ! मैं वहाँ तुम्हारी दूती बनकर जाऊँगी और प्रद्युम्नसे तुम्हारी इस उदार भक्तिका वर्णन करूँगी ॥ ३९ ॥

तथा चैव करिष्यामि यथैष्यति तवान्तिकम् ।
साक्षात्कामेन सुश्रोणि भविष्यसि सकामिनी ॥ ४० ॥
सुश्रोणि ! मैं ऐसा प्रयत्न भी करूँगी, जिससे वे तुम्हारे निकट पधारेंगे और तुम साक्षात् कामसे मिलकर अपनी कामना सफल करोगी ॥ ४० ॥

इति मे भाषितं नित्यं स्मरेथाः शुचिलोचने ।
कथाकुशलतां पित्रे कथयस्यायतेक्षणे ॥ ४१ ॥
मम त्वं तत्र मे देवि हितं सम्यक् प्रपत्स्यसे ।
पवित्र नेत्रोंवाली राजकुमारी ! विशाललोचने ! मेरी इस बातको तुम सदा याद रखना । अपने पिताके सामने बराबर मेरे कथा-कौशलकी चर्चा करती हुई यह कहना कि शुचिमुखी कथा कहनेमें बहुत ही कुशल है । देवि ! वहाँ पिताके निकट तुम सदा मेरे हित-साधनका ध्यान रखना ॥

इत्युक्ता सा तथा चक्रे यत्तत् सा तामथाब्रवीत् ॥ ४२ ॥
दानवेन्द्रश्च तां हंसीं पप्रच्छान्तःपुरे तदा ।
प्रभावत्या समाख्याता कथाकुशलता तव ॥ ४३ ॥
तत्त्वं शुचिमुखि ब्रूहि कथां योग्यतया वरे ।
किं त्वया दृष्टमाश्चर्यं जगत्युत्तमपक्षिणि ॥ ४४ ॥
अदृष्टपूर्वमन्यैर्वा योग्यायोग्यमनिन्दिते ।
शुचिमुखीके ऐसा कहनेपर प्रभावतीने वैसा ही किया, जैसा कि उस (हंसी) ने उससे कहा था । उस समय दानवराज वज्रनाभने अन्तःपुरमें उस हंसीसे पूछा—'शुचिमुखि ! प्रभावतीने बताया है कि तुम कथा कहनेमें बड़ी चतुर हो । अतः उत्तम पक्षिणि ! तुम कोई कथा कहो; क्योंकि योग्यतामें बड़ी हो । बताओ, संसारमें तुमने कौन-सी आश्चर्यकी बात देखी है ? अनिन्दिते ! जिसे दूसरोंने पहले कभी नहीं देखा हो, ऐसी कोई योग्य या अयोग्य आश्चर्यकी बात तुमने देखी हो तो बताओ' ॥ ४२-४४ १/२ ॥

सोवाच वज्रनाभं तु हंसी नरवरोत्तम ॥ ४५ ॥
श्रूयतामित्यथामन्त्र्य दानवेन्द्रं महाद्युतिम् ।
नरेशशिरोमणे ! तब हंसीने महातेजस्वी दानवराज वज्रनाभको सम्बोधित करके कहा—सुनिये—॥ ४५ १/२ ॥

दृष्टा मे शाण्डिली नाम साध्वी दानवसत्तम ।
आश्चर्यं कर्म कुर्वन्ती मेरुपाश्र्वे मनस्विनी ॥ ४६ ॥
'दानवश्रेष्ठ ! मैंने मेरुगिरिके पार्श्वभागमें साध्वी मनस्विनी शाण्डिलीको देखा है; जो वहाँ आश्चर्यजनक कार्य करती हैं ॥ ४६ ॥

सुमनाश्चैव कौशल्या सर्वभूतहिते रता ।
कथंचिद् वरशाण्डिल्याः शैलपुत्र्याः शुभा सखी ॥ ४७ ॥
'समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाली कौशल्या सुमनाका भी किसी प्रकार दर्शन किया है, जो शैलपुत्री श्रेष्ठ शाण्डिलीकी शुभ सखी हैं ॥ ४७ ॥

नटश्चैव मया दृष्टो मुनिदत्तवरः शुभः ।
कामरूपी च भोज्यश्च त्रैलोक्ये नित्यसम्मतः ॥ ४८ ॥
'एक नटको भी मैंने देखा है, जिसे मुनियोंने अभीष्ट वर दे रक्खा है । वह शुभलक्षण नट इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला, भोजनीय तथा त्रिभुवनमें सबको सदा ही प्रिय है ॥ ४८ ॥

कुरून् यात्युत्तरान् वीर कालास्रद्वीपमेव च ।
भद्राश्वान् केतुमालांश्च द्वीपानन्यांस्तथानघ ॥ ४९ ॥
'वीर ! वह उत्तर कुरुमें जाता तथा कालास्रद्वीपकी भी यात्रा करता है । अनघ ! वह भद्राश्व, केतुमाल तथा अन्य द्वीपोंमें भी जाया करता है ॥ ४९ ॥

देवगन्धर्वगेयानि नृत्यानि विविधानि च ।
स वेत्ति देवान् नृत्येन विस्मापयति सर्वथा ॥ ५० ॥
'देवता और गन्धर्व ही जिन्हें गाते हैं, उन गीतोंको भी वह गाता है तथा भाँति-भाँतिके नृत्योंको भी जानता है । वह अपने नृत्योंसे देवताओंको भी सर्वथा आश्चर्यचकित कर देता है' ॥ ५० ॥

वज्रनाभ उवाच
श्रुतमेतन्मया हंसि न चिरादिव विस्तरम् ।
चारणानां कथयतां सिद्धानां च महात्मनाम् ॥ ५१ ॥
वज्रनाभ बोला—हंसी ! थोड़े ही दिन हुए मैंने भी महात्मा, सिद्धों और चारणोंके मुखसे यह नटविषयक समाचार विस्तारपूर्वक सुना है ॥ ५१ ॥

कुतूहलं ममाप्यस्ति सर्वथा पक्षिनन्दिनि ।
नटे दत्तवरे तस्मिन् संस्तवस्तु न विद्यते ॥ ५२ ॥
पक्षिनन्दिनि ! मुझे भी उस वरप्राप्त नटको देखनेके लिये सर्वथा उत्कण्ठा हो रही है; परंतु मालूम होता है, मेरी प्रसिद्धि उसके कानोंतक नहीं गयी है ( इसलिये वह अबतक यहाँ नहीं आ सका है) ॥ ५२ ॥

हंस्युवाच
सप्तद्वीपान् विचरति नटः स द्विजोत्तम ।
गुणवन्तं जनं श्रुत्वा गुणकार्यः स सर्वथा ॥ ५३ ॥
तव चेच्छृणुयाद् वीर सङ्गतं गुणविस्तरम् ।
नटं तदागतं विद्धि पुरं तव महासुर ॥ ५४ ॥

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