विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 604, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें५८२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
विजयं सर्वकृत्येषु श्रद्दधानो लभेन्नरः ॥ ७८ ॥
जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक भगवान् श्रीकृष्णकी इस विजय-वार्ताको पढ़ेगा या सुनेगा, वह सभी कार्योंमें विजय प्राप्त करेगा ॥ ७८ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि भानुमतीहरणे निकुम्भवधो नाम नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें भानुमतीहरणके प्रसङ्गमें निकुम्भका वधविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९० ॥
एकनवतितमोऽध्यायः
वज्रनाभकी तपस्या और वरप्राप्ति, उसका त्रिभुवन-विजयके लिये उद्योग, इन्द्रकी श्रीकृष्णसे वार्ता, भद्रनामा नटको मुनियोंका वरदान, इन्द्रका हंसोंको आवश्यक कर्तव्य बताकर वज्रनाभपुरमें भेजना
जनमेजय उवाच
भानुमत्यापहरणं विजयं केशवस्य च ।
छालिक्यनयनं चैव देवलोकान्महामुने ॥ १ ॥
क्रीडां च सागरे दिव्यां वृष्णीनाममितौजसाम् ।
अश्रौषं परमाश्चर्यं मुने धर्मभृतां वर ॥ २ ॥
**जनमेजयन कहा—**धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महामुने ! भानुमतीका अपहरण, श्रीकृष्णकी विजय, देवलोकसे छालिक्य गान्धर्वका आनयन और अत्यन्त तेजस्वी वृष्णिवंशियोंकी समुद्रमें होनेवाली दिव्यक्रीड़ा—इन सबका अत्यन्त आश्चर्य-युक्त वर्णन मैंने सुना है ॥ १-२ ॥
वज्रनाभवधो ह्युक्तो निकुम्भवधकीर्तने ।
तन्मे कौतूहलं श्रोतुं प्रसादाद् भवतो मुने ॥ ३ ॥
मुने ! निकुम्भ-वधका वर्णन करते समय आपने वज्रनाभके वधकी भी चर्चा की है। आपकी कृपासे उसे सुननेके लिये मेरे मनमें कौतूहल हो रहा है ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
हन्त ते वर्तयिष्यामि वज्रनाभवधं नृप ।
विजयं चैव कामस्य साम्बस्यैव च भारत ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**नरेश्वर ! भरतनन्दन ! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें वज्रनाभके वधका वृत्तान्त बताऊँगा । साथ ही प्रद्युम्न और साम्बकी विजयका भी वर्णन करूँगा ॥ ४ ॥
मेरोः सानौ नरपते तपश्चक्रे महासुरः ।
वज्रनाभ इति ख्यातो निश्चितः समितिंजयः ॥ ५ ॥
नरेन्द्र ! वज्रनाभ नामसे विख्यात महान् असुर निश्चय ही युद्धमें विजय पानेवाला था । एक समय उसने मेरुपर्वतके शिखरपर बड़ी भारी तपस्या की ॥ ५ ॥
तस्य तुष्टो महातेजा ब्रह्मा लोकपितामहः ।
वरेण च्छन्दयामास तपसा परितोषितः ॥ ६ ॥
उसकी तपस्यासे महातेजस्वी लोकपितामह ब्रह्माजी बहुत संतुष्ट हुए । उन्होंने प्रसन्न होकर उससे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहा ॥ ६ ॥
अवध्यत्वं स देवेभ्यो वव्रे दानवसत्तमः ।
पुरं वज्रपुरं चापि सर्वरत्नमयं शुभम् ॥ ७ ॥
तब उस श्रेष्ठ दानवने देवताओंसे अवध्य होनेका वर माँगा; साथ ही सम्पूर्ण रत्नोंके बने हुए सुन्दर वज्रपुर नामक नगरकी भी याचना की ॥ ७ ॥
स्वच्छन्देन प्रवेशश्च न वायोरपि भारत ।
अचिन्तितेन कामानामुपपत्तिर्नराधिप ॥ ८ ॥
भारत ! उस नगरमें स्वच्छन्दतापूर्वक वायुका भी प्रवेश नहीं होता था । नरेश्वर ! बिना चिन्तन किये ही वहाँ सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंकी प्राप्ति होती रहती थी ॥ ८ ॥
शाखानगरमुख्यानां संवाहानां शतानि च ।
नगरस्याप्रमेयस्य समन्ताज्जनमेजय ॥ ९ ॥
जनमेजय ! उस अप्रमेय नगरके चारों ओर शाखा-नगरोंके मुख्य-मुख्य सैकड़ों उद्यान शोभा पाते थे, जो चहारदीवारियोंसे घिरे हुए थे ॥ ९ ॥
तथा तदभवत् तस्य वरदानेन भारत ।
उवास वज्रनगरे वज्रनाभो महासुरः ॥ १० ॥
भारत ! उसको मिले हुए वरदानसे ही वह नगर उस रूपमें प्रतिष्ठित हुआ था । महान् असुर वज्रनाभ उस वज्र-नगरमें निवास करता था ॥ १० ॥
कोटिशो वरलब्धं तमसुराः परिवार्य ते ।
ऊषुर्वज्रपुरे राजन् संवाहेषु तथैव च ॥ ११ ॥
शाखानगरमुख्येषु रम्येषु च नराधिप ।
हृष्टपुष्टप्रमुदिता नृप देवस्य शत्रवः ॥ १२ ॥
राजन् ! वर पाये हुए वज्रनाभको सब ओरसे घेरकर करोड़ों देवद्रोही असुर हृष्ट, पुष्ट और आनन्दित हो वज्रपुरमें तथा उसके शाखानगरोंके मुख्य-मुख्य घिरे हुए उद्यानोंमें निवास करते थे ॥ ११-१२ ॥