विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 603, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपूर्व ] नवतितमोऽध्यायः ५८१
स चक्रेण शिरस्तस्य चकर्त्तासुरसूदनः ।
पश्यतां सर्वभूतानां भूतभव्यभवो हरिः ॥ ६२ ॥
भूत, वर्तमान और भविष्यको उत्पन्न करनेवाले असुरसूदन श्रीहरिने समस्त प्राणियोंके देखते-देखते अपने चक्रसे निकुम्भका सिर काट लिया ॥ ६२ ॥
स मुक्त्वा फाल्गुनं राजञ्छिन्ने शिरसि भारत ।
पपातासुरमुख्योऽथ च्छिन्नमूल इव द्रुमः ॥ ६३ ॥
राजन् ! भरतनन्दन ! सिर कट जानेपर वह मुख्य असुर अर्जुनको छोड़कर जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ६३ ॥
अथाकाशगतं पार्थं पतमानं विहायसः ।
कृष्णवाक्येन जग्राह कार्ष्णिर्वियति मानद ॥ ६४ ॥
मानद ! उस समय श्रीकृष्णकी आज्ञासे प्रद्युम्नने आकाशमें पहुँचकर वहाँसे गिरते हुए अर्जुनको पकड़ लिया ॥
निकुम्भे पतिते भूमौ समाश्वास्य धनंजयम् ।
जगाम द्वारकां देवः पार्थकामसमन्वितः ॥ ६५ ॥
निकुम्भके धराशायी हो जानेपर अर्जुनको आश्वासन दे उनके और प्रद्युम्नके साथ भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकाको चले गये ॥ ६५ ॥
समियाय दशार्होऽथ द्वारकां मुदितो विभुः ।
नारदं च महात्मानं ववन्दे यदुनन्दनः ॥ ६६ ॥
दशार्हवंशी यदुकुलनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने बड़ी प्रसन्नताके साथ द्वारकामें पदार्पण किया और वहाँ महात्मा नारदजीको मस्तक झुकाया ॥ ६६ ॥
नारदोऽथ महातेजा भानुं यादवमब्रवीत् ।
भानो मा कार्षीर्मन्युं त्वं श्रूयतां भैमनन्दन ॥ ६७ ॥
तदनन्तर महातेजस्वी नारदजीने भानु नामक यादवसे कहा—"भैमनन्दन ! भानो ! कन्याका अपहरण होनेके कारण मनमें खेद न करो । मेरी बात सुनो ॥ ६७ ॥
क्रीडन्त्या रैवतोद्याने दुर्वासाः कोपितोऽनया ।
स शशाप ततो रोषान्मुनिर्दुहितरं तव ॥ ६८ ॥
"यह भानुमती किसी दिन रैवतवनके उद्यानमें खेल रही थी । वहाँ इसने दुर्वासा मुनिको क्रोध दिला दिया । तब मुनिने क्रोधवश आपकी पुत्रीको शाप दे दिया—॥ ६८ ॥
अतिदुर्ललितैः कन्या शत्रुहस्तं गमिष्यति ।
सुतार्थे ते मया सार्द्धं मुनिभिः स प्रसादितः ॥ ६९ ॥
बालां व्रतवतीं कन्यामनागसमिमां मुने ।
शप्तवानसि धर्मज्ञ कथं धर्मभृतां वर ।
अनुग्रहं विधत्स्वात्र वयं विज्ञापयामहे ॥ ७० ॥
"यह कन्या अपनी दुर्ललित चेष्टाओंसे शत्रुके हाथमें पड़ जायगी ।' उस समय मैंने तथा दूसरे मुनियोंने आपकी इस पुत्रीके लिये दुर्वासाको प्रसन्न किया और कहा--'मुने ! यह बाला ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाली कन्या है । इसने आपका कोई अपराध भी नहीं किया है; फिर आपने इसे कैसे शाप दे दिया ? धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धर्मज्ञ महर्षे ! इस कन्यापर अनुग्रह कीजिये । इसके लिये हमलोग यहाँ प्रार्थना करते हैं' ॥ ६९-७० ॥
अस्माभिरेवमुक्तस्तु दुर्वासा भैमनन्दन ।
उवाचाधोमुखो भूत्वा मुहूर्तं कृपयान्वितः ॥ ७१ ॥
"भैमनन्दन ! हमारे ऐसा कहनेपर दुर्वासाजी नीचे मुँह किये दो घड़ीतक मौन रहे; फिर दयापूर्वक बोले--॥ ७१ ॥
यदवोचमहं वाक्यं तत् तथा न तदन्यथा ।
रिपुहस्तमवश्या हि गमिष्यति न संशयः ॥ ७२ ॥
अदूषिता तु धर्मेण भर्तारमुपलप्स्यति ।
बहुपुत्रा बहुधना सुभगा च भविष्यति ॥ ७३ ॥
" 'महर्षियो ! मैंने जो बात कही है, वह उसी तरह होगी । उसे कोई बदल नहीं सकता । यह शत्रुके हाथमें अवश्य पड़ेगी, इसमें संशय नहीं है; परंतु यह भी निश्चय है कि यह दूषित नहीं होने पायगी और धर्मके अनुसार पतिको प्राप्त करेगी । इसके बहुत-से पुत्र होंगे । यह बहुत धनसे सम्पन्न और सौभाग्यवती होगी ॥ ७२-७३ ॥
सुगन्धगन्धा च सदा कुमारी च पुनः पुनः ।
न च शोकमिमं घोरं तन्वङ्गी धारयिष्यति ॥ ७४ ॥
" 'इसके शरीरकी गन्ध सदा सुगन्धित होगी । यह पति-समागमकै पश्चात् बारंबार कुमारी ही बनी रहेगी । इस कृशाङ्गी कन्याको अपने अपहरणजनित घोर शोकका स्मरण नहीं रहेगा' ॥ ७४ ॥
एवं भानुमती वीर सहदेवाय दीयताम् ।
श्रद्दधानः स शूरश्च धर्मशीलश्च पाण्डवः ॥ ७५ ॥
"वीर भानो ! तुम मेरी बात मानकर भानुमतीका सहदेवके साथ ब्याह कर दो; क्योंकि पाण्डुपुत्र सहदेव श्रद्धालु, शूरवीर तथा धर्मशील हैं" ॥ ७५ ॥
ततो भानुमतीं भानुर्ददौ माद्रीसुताय वै ।
सहदेवाय धर्मात्मा नारदस्य वचः स्मरन् ॥ ७६ ॥
तदनन्तर नारदजीके वचनोंको याद रखते हुए धर्मात्मा भानुने अपनी कन्या भानुमती माद्रीकुमार सहदेवको दे दी ॥
आनीतः सहदेवश्च प्रेषितश्चक्रपाणिना ।
विवाहे च तदा वृत्ते सभार्यः स पुरीं गतः ॥ ७७ ॥
चक्रपाणि भगवान् श्रीकृष्णने सहदेवको बुलवाया और उस समय विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर उन्हें पत्नीसहित विदा कर दिया, फिर वे अपनी पुरीको चले गये ॥ ७७ ॥
इमं कृष्णस्य विजयं यः पठेच्छृणुयादथ ।