विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 596, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५७४ | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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आज्ञापयामास ततः स तस्यां
निशि प्रहृष्टो भगवानुपेन्द्रः।
छालिक्यगेयं बहुसंनिधानं
यदेव गान्धर्वमुदाहरन्ति ॥ ६७ ॥
तदनन्तर हर्षमें भरे हुए भगवान् उपेन्द्रने उस रातमें बहुसंख्यक मनुष्योंद्वारा सम्पन्न होनेवाले उस छालिक्य गानके लिये आज्ञा दी, जिसे गान्धर्व कहते हैं ॥ ६७ ॥
जग्राह वीणामथ नारदस्तु
षड्ग्रामरागादिसमाधियुक्ताम् ।
हल्लीसकं तु स्वयमेव कृष्णः
सवंशघोषं नरदेव पार्थः ॥ ६८ ॥
मृदङ्गवाद्यानपरांश्च वाद्यान्
वराप्सरस्ता जगृहुः प्रतीताः ।
आसारितान्ते च ततः प्रतीता
रम्भोत्थिता साभिनयार्थतत्त्वज्ञा ॥ ६९ ॥
उस समय नारदजीने अपनी वीणा सँभाली, जो छः ग्रामोंपर आधारित राग आदिके द्वारा चित्तको एकाग्र कर देनेवाली थी। नरदेव ! साक्षात् श्रीकृष्णने वंशी बजाकर हल्लीसक ( रास ) नामक नृत्यका आयोजन किया। कुन्तीपुत्र अर्जुनने मृदङ्ग वाद्य ग्रहण किया। अन्य वाद्यको श्रेष्ठ अप्सराओंने ग्रहण किया, जो उनके वादन-कलामें प्रख्यात थीं। आसारित³ (प्रथम आसारनर्तकी-प्रवेश) के बाद अभिनयके अर्थतत्त्वका ज्ञान रखनेवाली रम्भा नामक अप्सरा उठी, जो अपनी अभिनयकलाके लिये विख्यात थी ॥ ६८-६९ ॥
तयाभिनीते वरगात्रयष्ट्या
तुतोष रामश्च जनार्दनश्च ।
अथोर्वशी चारुविशालनेत्रा
हेमा च राजन्नथ मिश्रकेशी ॥ ७० ॥
तिलोत्तमा चाप्यथ मेनका च
एतास्तथान्याश्च हरिप्रियार्थम् ।
जगुस्तथैवाभिनयं च चक्रु-
रिष्टैश्च कामैर्मनसोऽनुकूलैः ॥ ७१ ॥
उसकी अङ्गयष्टि बड़ी सुन्दर थी। उसके द्वारा अभिनय किये जानेपर बलराम और श्रीकृष्णको बड़ा संतोष हुआ। राजन् ! तदनन्तर मनोहर एवं विशाल नेत्रोंवाली उर्वशी, हेमा, मिश्रकेशी, तिलोत्तमा और मेनका—ये तथा और भी बहुत-सी अप्सराएँ श्रीकृष्णका प्रिय करनेके लिये मनके अनुकूल प्रिय कामनाओंको प्रस्तुत करती हुई गाने और अभिनय करने लगीं ॥ ७०-७१ ॥
ता वासुदेवेऽप्यनुरक्तचित्ताः
स्वगीतनृत्याभिनयैरुदारैः ।
नरेन्द्रसूनो परितोषितेन
ताम्बूलयोगाश्च वराप्सरोभिः ॥ ७२ ॥
तदागताभिर्नृवराह्तास्तु
कृष्णेप्सया मानमयास्तथैव ।
नरेन्द्रकुमार ! वे रम्भा आदि अप्सराएँ मन ही-मन
१. क्रमशः सात स्वरोंका समूह ग्राम कहलाता है। संगीतमें सुभीतेके लिये षड्ज, मध्यम और पञ्चम तथा किसी-किसीके मतसे षड्ज, मध्यम और गान्धार नामक तीन ग्राम निश्चित कर लिये गये हैं। जिन्हें क्रमशः नन्द्यावर्त, सुभद्र और जीमूत भी कहते हैं तथा जिनके देवता क्रमसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव हैं। प्रत्येक ग्राममें सात-सात मूर्च्छनाएँ होती हैं। सा ( षड्ज ) से आरम्भ करके ( सा रे ग म प ध नि ) जो सात स्वर हों, उनके समूहको षड्ज ग्राम, म ( मध्यम ) से आरम्भ करके ( म प ध नि सा रे ग ) जो सात स्वर हों, उनके समूहको मध्यम ग्राम और इसी प्रकार गा ( गांधार ) या प ( पञ्चम ) से आरम्भ करके जो स्वर हों, उनके समूहको गांधार अथवा पञ्चम (जैसी अवस्था हो) ग्राम मानते हैं। इनमेंसे पहले दो ग्रामोंका व्यवहार तो इसी लोकमें मनुष्योंद्वारा होता है, पर तीसरे ग्रामका व्यवहार स्वर्गलोकमें नारद करते हैं। यहाँ रागोंके छः स्थानोंको छः ग्राम कहा गया है, जिनके नाम इस प्रकार हैं—मध्य, शुद्ध, भिन्न, गौड, मिश्र और गीत।
२. बहुत-सी स्त्रियोंके साथ किया जानेवाला नृत्य हल्लीसक या रास कहलाता है।
३. भरत मुनिने नृत्य-विधिमें चार प्रकारके आसार (चिह्न) या आसारितका उपदेश किया है, जो क्रमशः इस प्रकार है—पहले नर्तकीका प्रवेश होता है, यह प्रथम आसार है। तदनन्तर आसारित अर्थका अभिनय होता है, जिसे नाट्य कहते हैं, यही उसका दूसरा भेद है। तत्पश्चात् तालका अनुसरण करते हुए जो अङ्गहारण अङ्गविक्षेप ( चमकना, मटकना और हाथ-पैर हिलाना ) होता है, यही तीसरा आसार है। तदनन्तर देवताके चिह्न रूपसे जो नृत्य किया जाता है, वह चौथा आसार है। यहाँ नर्तकीप्रवेश नामक प्रथम आसारके अन्तमें नाट्यके लिये अभिनयकुशल रम्भा खड़ी हुई। उसके द्वारा द्वितीय आसार अर्थात् अभिनय सम्पन्न हो जानेपर शेष दो आसारोंकी पूर्तिके लिये उर्वशी आदिका उपयोग हुआ।