भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 595

विष्णुपर्व ] एकोननवतितमोऽध्यायः [ ५७३


वृक्षाम्लसौवर्चलचुक्रपूर्णान्
पौरोगवोक्त्या उपजह्रुरेषाम् ॥ ५८ ॥

शूलमें गूँथकर पकाये गये भैंसाकन्द तथा अन्यान्य कन्द या मूल-फल, नारियल, तपे हुए घीमें तले गये अन्यान्य खाद्यपदार्थ, अम्लवेत, कालानमक और चूकके मेलसे बने हुए लेह्यपदार्थ (चटनी)—ये सब वस्तुएँ पाकशालाध्यक्षके कहनेसे रसोइयोंने इन यादवोंके लिये प्रस्तुत कीं ॥ ५८ ॥

पौरोगवोक्त्या विधिना मृगाणां
मांसानि सिद्धानि च पीवराणि ।
नानाप्रकारान्युपजह्रुरेषाम्
मृष्टानि पक्वानि च चुक्रचूतैः ॥ ५९ ॥

पाकशालाध्यक्षके बताये अनुसार विधिवत् तैयार किये गये मृगनामक कन्दविशेषके मोटे-मोटे गूदे, आमकी खटाई डालकर बनाये गये नाना प्रकारके विशुद्ध व्यञ्जन भी इनके लिये परोसे गये ॥ ५९ ॥

पार्श्वानि चान्ये शकलानि तत्र
ददुः पशूनां घृतमृक्षितानि ।
सामुद्रचूर्णैरवचूर्णितानि
चूर्णेन मृष्टेन समारिचेन ॥ ६० ॥

दूसरे रसोइयोंने पास रखे हुए पोषक शाकोंके टुकड़े-टुकड़े करके उन्हें घीमें तल दिये और उनमें नमक तथा मिर्चके चूर्ण मिलाकर खानेवालोंको परोस दिये ॥ ६० ॥

समूलकैर्दाडिममातुलिङ्गैः
पर्णासहिङ्ग्‌वार्द्रकभूस्तृणैश्च ।
तदोपदंशैः सुमुखोत्चरैस्ते
पानानि हृष्टाः पपुरप्रमेयाः ॥ ६१ ॥

मूली, अनार, बिजौरा नींबू, तुलसी, हींग और भूस्तृण-नामक शाकविशेषके साथ सुन्दर मुखवाले पानपात्र लेकर उन अप्रमेय शक्तिशाली यादवोंने बड़े हर्षके साथ पेय-रसका पान किया ॥ ६१ ॥

कट्वाङ्गशूलैरपि पक्षिभिश्च
घृताम्लसौवर्चलतैलसिक्तैः ।
मैरेयमाध्वीकसुरासवांस्ते
पपुः प्रियाभिः परिवार्यमाणाः ॥ ६२ ॥

कट्वाङ्ग अर्थात् कटुक—परवल, शूलहर (हींग) तथा नमक-खटाई मिलाकर घी और तेलमे सेंके गये लकुच या बड़हर<sup></sup>के साथ मैरेय, माध्वीक, सुरासव नामक मधुका उन यादवोंने अपनी प्रियतमाओंसे घिरे रहकर पान किया ॥

श्वेतेन युक्तानपि शोणितेन
भक्ष्यान् सुगन्धांल्लवणाम्बितांश्च।
आर्द्राङ्किलादान् घृतपूर्णकांश्च
नानाप्रकारानपि खण्डखाद्यान् ॥ ६३ ॥

नरेश्वर ! श्वेत रंगके खाद्य-पदार्थ मिश्री आदि तथा लाल रंगके फलके साथ नाना प्रकारके सुगन्धित एवं नमकीन भोजन एवं आर्द्र (रसदार साग), किलाद (भैंसके दूधमें पकाये गये खीर आदि), घीसे भरे हुए पदार्थ (पूआ-हलुआ आदि) तथा भाँति-भाँतिके खण्ड-खाद्य (खाँड़ आदि) उन्होंने खाये ॥ ६३ ॥

अपानपाश्चोद्धवभोजमुख्याः
शाकैश्च सूपैश्च बहुप्रकारैः ।
पेयैश्च दध्ना पयसा च वीराः
स्वन्नानि राजन् बुभुजुः प्रहृष्टाः ॥ ६४ ॥

राजन् ! उद्धव, भोज आदि श्रेष्ठ यादव वीरोंने जो मादक रसोंका पान नहीं करते थे, बड़े हर्षके साथ नाना प्रकारके साग, दाल, पेय-पदार्थ तथा दही-दूध आदिके साथ उत्तम अन्नका भोजन किया ॥ ६४ ॥

तथारनालांश्च बहुप्रकारान्
पपुः सुगन्धानपि पालवीषु ।
श्रुतं पयः शर्करया च युक्तं
फलप्रकारांश्च बहुंश्च खादन् ॥ ६५ ॥

उन्होंने प्यालोंमें अनेक प्रकारके सुगन्धित आरनाल (कांजीरस) का पान किया। चीनी मिलाये हुए गरम-गरम दूध पीया और भाँति-भाँतिके फल भी खाये ॥ ६५ ॥

तृप्ताः प्रवृत्ताः पुनरेव वीरा-
स्ते भैसमुख्या वनितासहायाः ।
गीतानि रम्याणि जगुः प्रहृष्टाः
कान्ताभिनीतानि मनोहराणि ॥ ६६ ॥

खा-पीकर तृप्त होनेके पश्चात् वे मुख्य-मुख्य यदुवंशी वीर पुनः स्त्रियोंको साथ लेकर बड़े हर्षके साथ रमणीय एवं मनोहर गीत गाने लगे। उनकी प्रेयसी कामिनियाँ अपने हावभावद्वारा उन गीतोंके अर्थका अभिनय करती जाती हैं ॥


<sup>१. यहाँ पक्षीका अर्थ खगवक्त्र है, जो लकुच या बड़हरका बोधक है।</sup>