भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 597, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 597

विष्णुपर्व ] एकोननवतितमोऽध्यायः ५७५


वसुदेवनन्दन भगवान् कृष्णमें अनुरक्त थीं। उन्होंने अपने गीत, नृत्य एवं उदार अभिनयोंद्वारा सबको संतोष प्रदान करके प्रसन्न कर लिया। नरेश्वर! उस समय श्रीकृष्णकी इच्छासे जलक्रीडामें आयी हुई उन श्रेष्ठ अप्सराओंने उनकी ओरसे पानके बीड़े प्राप्त किये, जो उनके लिये सम्मान-स्वरूप थे॥ ७२ १/२ ॥

फलानि गन्धोत्तमवन्ति वीरा-
श्छालिक्यगान्धर्वमथाहृतं च॥ ७३॥
कृष्णेच्छया च त्रिदिवान्नुदेव
अनुग्रहार्थं भुवि मानुषाणाम्।

नरदेव ! श्रीकृष्णकी इच्छासे मनुष्योंपर अनुग्रह करनेके लिये स्वर्गसे वह छालिक्य गान्धर्व (दिव्य संगीत एवं नृत्य-विशेष ) भूतलपर लाया गया था; साथ ही उत्तम गन्धोंसे युक्त देवयोग्य फल भी यहाँ लाये गये थे। वीर यादवोंने इन सबका रसास्वादन किया ॥ ७३ १/२ ॥

स्थितं च रम्यं हरितेजसेव
प्रयोजयामास स रौक्मिणेयः ॥ ७४॥
छालिक्यगान्धर्वमुदारबुद्धि-
स्तेनैव ताम्बूलमथ प्रयुक्तम्।

वह रमणीय छालिक्य गान्धर्व भगवान् श्रीकृष्णके ही प्रभावसे इस पृथ्वीपर प्रद्युम्न आदिमें प्रतिष्ठित हुआ । उदारबुद्धि रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नने उक्त गान्धर्व-कलाको प्रयोगमें लाकर दिखाया भी था । उन्होंने ही ताम्बूलका प्रयोग किया ॥ ७४ १/२ ॥

प्रयोजितं पञ्चभिरिन्द्रतुल्यै-
श्छालिक्यमिष्टं सततं नराणाम् ॥ ७५॥
शुभावहं वृद्धिकरं प्रशस्तं
मङ्गल्यमेवाथ तथा यशस्यम् ।
पुण्यं च पुष्ट्यभ्युदयावहं च
नारायणस्येष्टमुदारकीर्तेः ॥ ७६॥

इन्द्रतुल्य पराक्रमी पाँच वीरों ( श्रीकृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और साम्ब) ने यहाँ छालिक्य गान्धर्व-का आयोजन किया था, जो मनुष्योंको सदा ही अभीष्ट है। वह शुभकारक, वृद्धि करनेवाला, प्रशस्त, मङ्गलकारी, यशोवर्द्धक, पुण्यदायक, पुष्टि और अभ्युदयको देनेवाला है । उदारकीर्तिवाले भगवान् नारायणको वह परम प्रिय है ॥ ७५-७६ ॥

जयावहं धर्मभरावहं च
दुःस्वप्ननाशं परिकीर्त्यमानम्।
करोति पापं च तथा विहन्ति
शृण्वन् सुरावासगतो नरेन्द्रः॥ ७७ ॥
छालिक्यगान्धर्वमुदारकीर्ति-
र्मेने किलैकं दिवसं सहस्रम् ।
चतुर्युगानां नृप रेवतोऽथ
ततः प्रवृत्ता च कुमारजातिः ॥ ७८ ॥
गान्धर्वजातिश्च तथापरापि
दीपाद् यथा दीपशतानि राजन्।

उसकी चर्चा करने मात्रसे वह विजयकी प्राप्ति और धर्मका लाभ कराता है । दुःस्वप्नका नाश और पापका निवारण कर देता है । किसी समय देवलोकमें गये हुए उदारकीर्ति राजा रैवतने छालिक्य गान्धर्वको इतनी तन्मयताके साथ सुना था कि उन्हें चार हजार युगोंका समय भी एक दिनके समान ही प्रतीत हुआ । राजन्! उसी छालिक्य गान्धर्वसे कुमारजाति तथा अन्य गान्धर्व जातिकी प्रवृत्ति हुई है। ठीक उसी तरह, जैसे एक दीपकसे सैकड़ों दीपक जल जाते हैं ॥ ७७-७८ १/२ ॥

विवेद कृष्णश्च स नारदश्च
प्रद्युम्नमुख्यैर्नृप भैमुख्यैः ॥ ७९ ॥
विज्ञानमेतद्धि परे यथाव-
दुद्देशमात्राच्च जनास्तु लोके ।
जानन्ति छालिक्यगुणोदयानां
तोयं नदीनामथवा समुद्रः ॥ ८० ॥
ज्ञातुं समर्थो हि महागिरिर्वा
फलाग्रतो वा गुणतोऽथ वापि।
शक्यं न छालिक्यमृते तपोभिः
स्थाने विधानान्यथ मूर्च्छनासु ॥ ८१ ॥

नरेश्वर ! प्रद्युम्न आदि मुख्य-मुख्य यादवोंके साथ भगवान् श्रीकृष्ण और नारदजी ही छालिक्य गुणोदयके इस विज्ञानको यथावत् रूपसे जानते हैं । संसारके दूसरे मनुष्योंको तो इसकी नाम मात्रकी ही जानकारी है। जैसे नदियोंके जलको समुद्र अथवा कोई विशाल पर्वत ही यथार्थ रूपसे जान सकता है, उसी प्रकार भगवान् ही छालिक्यके श्रेष्ठ फल अथवा गुणोंको ठीक-ठीक जानते हैं। तपस्या किये बिना छालिक्य गान्धर्वको तथा उसकी

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