भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 598

५७६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

मूर्च्छनाविषयक विधानको नहीं जाना जा सकता । यह कथन सर्वथा उचित ही है ॥ ७९-८१ ॥

षड्ग्रामरागेषु च तन्तु कार्यं
तस्यैकदेशावयवेन राजन् ।
लेशाभिधानां सुकुमारजातिं
निष्ठां सुदुःखेन नराः प्रयान्ति ॥ ८२ ॥

राजन् ! छः ग्रामोंवाले जो राग हैं, उनमें भी छालिक्यका उसके एकदेशीय अवयवके द्वारा गान करना चाहिये । लेश नामक जो छालिक्यकी सुकुमार जाति है, उसका गान करनेवाले मनुष्य भी बड़े दुःखसे ( कठिनाईसे ) उसकी समाप्ति कर पाते हैं ( फिर सम्पूर्ण छालिक्यके गानकी तो बात ही क्या है ? ) ॥ ८२ ॥

छालिक्यगान्धर्वगुणोदयेषु
ये देवगन्धर्वमहर्षिसंघाः ।
निष्ठां प्रयान्तीत्यवगच्छ बुद्ध्या
छालिक्यमेवं मधुसूदनेन ॥ ८३ ॥
भैमोत्तमानां नरदेव दत्तं
लोकस्य चानुग्रहकाम्ययैव ।
गतं प्रतिष्ठाममरोपगेयं
बाला युवानश्च तथैव वृद्धाः ॥ ८४.१॥
क्रीडन्ति भैमाः प्रसवोत्सवेषु
पूर्वं तु बालाः समुदावहन्ति ।
वृद्धाश्च पश्चात् प्रतिमानयन्ति
स्थानेषु नित्यं प्रतिमानयन्ति ॥ ८५ ॥

नरदेव ! जो देवता, गन्धर्व और महर्षियोंके समुदाय हैं, वे ही छालिक्य गान्धर्वके गुणोंके प्रकट करनेकी कलामें पारंगत होते हैं । इस बातको तुम अपनी बुद्धिद्वारा अच्छी तरह जान लो । ऐसा समझकर ही भगवान् मधुसूदनने सम्पूर्ण जगत्‌पर अनुग्रह करनेकी इच्छासे मुख्य यादवोंको छालिक्य गान्धर्वका ज्ञान प्रदान किया था । वह देवताओं-द्वारा गाये जाने योग्य छालिक्य इस प्रकार मनुष्यलोकमें प्रतिष्ठित हुआ है । बालक, युवक और वृद्ध यदुवंशी जन्मोत्सवोंमें उक्त गान्धर्वद्वारा क्रीड़ा या मनोरञ्जन करते थे । पहले बालक उस कलाको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करने लगे । तत्पश्चात् वृद्धलोग भी उसके प्रति आदरका भाव दिखाने लगे; फिर तो सब लोग सदा सभी स्थानोंमें उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ८३—८५ ॥

मर्त्येषु मर्त्यान् यदवोऽतिवीराः
स्ववंशधर्मं समनुस्मरन्तः ।
पुरातनं धर्मविधानतज्ज्ञाः
प्रीतिः प्रमाणं न वयः प्रमाणम् ॥ ८६ ॥

धर्मके विधानको जाननेवाले अत्यन्त वीर यादव अपने पुरातन वंश-धर्मका स्मरण करते हुए मर्त्यलोकमें मनुष्योंको जो सदा सम्मान देते थे, वह इस बातका सूचक है कि प्रेम ही प्रधान एवं महत्त्वकी वस्तु है । अवस्थाका महत्त्व नहीं है ॥ ८६ ॥

प्रीतिप्रमाणानि हि सौहृदानि
प्रीतिं पुरस्कृत्य हि ते दशार्हाः ।
वृष्ण्यन्धकाः पुत्रसखा बभूवु-
र्विसर्जिताः केशिविनाशनेन ॥ ८७ ॥

सौहार्दका मूल आधार है प्रेम । अतः वे दशार्ह, वृष्णि और अन्धक-वंशी यादव पुत्रोंके साथ भी मित्रवत् बर्ताव करते थे । उस उत्सवके बाद भगवान् केशिविनाशन श्रीकृष्णने उन सबको विदा कर दिया ॥ ८७ ॥

स्वर्गं गताश्चाप्सरसां समूहाः
कृत्वा प्रणामं मधुकंसशत्रोः ।
प्रहृष्टरूपस्य सुहृष्टरूपा
बभूव हृष्टः सुरलोकसङ्घः ॥ ८८ ॥

तत्पश्चात् वे अप्सराएँ भी मधु और कंसके शत्रु आनन्दमूर्ति श्रीकृष्णको प्रणाम करके स्वयं भी अत्यन्त हर्षमें मग्न हो स्वर्गलोकको चली गयीं । उस समय देवताओंके समुदायमें हर्ष छा गया ॥ ८८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि भानुमतीहरणे छालिक्यक्रीडावर्णने एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें भानुमतीहरणके प्रसङ्गमें छालिक्यक्रीड़ाका वर्णनविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥