भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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विष्णुपर्व ] नवतितमोऽध्यायः ५७७


नवतितमोऽध्यायः

निकुम्भद्वारा भानुमतीका अपहरण, श्रीकृष्ण, अर्जुन और प्रद्युम्नके साथ उसका युद्ध, गोकर्णतीर्थमें उसका पतन, प्रद्युम्नका भानुमतीको लेकर द्वारका पहुँचाना, फिर तीनोंका निकुम्भके साथ युद्ध, उसकी अद्भुत मायाका वर्णन और श्रीकृष्णद्वारा निकुम्भका वध

वैशम्पायन उवाच
तेषां क्रीडावसक्तानां यदूनां पुण्यकर्मणाम्।
छिद्रमासाद्य दुर्बुद्धिर्देवशत्रुर्दुरासदः ॥ १ ॥
कन्यां भानुमतीं नाम भानोर्दुहितरं नृप।
जहारात्मवधाकाङ्क्षी निकुम्भो नाम दानवः ॥ २ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! जब पुण्यकर्मा यदुवंशी जलक्रीड़ामे आसक्त हो रहे थे, उसी समय मौका पाकर दुर्जय देवद्रोही दुर्बुद्धि दानव निकुम्भने मानो अपने ही वधकी इच्छासे भानु नामक यादवकी पुत्री भानुमतीका अपहरण कर लिया ॥ १-२ ॥

अन्तर्हितो मोहयित्वा यदूनां प्रमदाजनम् ।
मायावी मायया राजन् पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥ ३ ॥

राजन् ! अदृश्यरूपसे अन्तःपुरमें पहुँचकर मायाद्वारा यादवोंकी स्त्रियोंको मोहित करके उस मायावी दानवने पहलेके वैरको याद रखते हुए ही भानुमतीका अपहरण किया था ॥ ३ ॥

भ्रातुर्हि वज्रनाभस्य तस्य कन्या प्रभावती ।
प्रद्युम्नेन हृता वीर वज्रनाभस्तथा हतः ॥ ४ ॥

वीर नरेश ! उसके भाई वज्रनाभकी एक कन्या थी, जो प्रभावतीके नामसे विख्यात थी । प्रद्युम्नेन उसे हर लिया और वज्रनाभको भी मार डाला ॥ ४ ॥

भानोरेव तथारण्ये वसत्यवचरेण हि।
अस्वाधीने दुराधर्षे छिद्रज्ञो दानवाधमः ॥ ५ ॥

तबसे वह नीच दानव अवसरकी खोजके लिये भानुके ही उपवनमे रहा करता था । भानुका कन्यापुर यद्यपि बड़ा ही दुर्धर्ष था, तथापि उस समय किसी रक्षकके अधीन नहीं था । उसकी इस दुर्बलताको दानवाधम निकुम्भ जानता था; ( इसलिये उसे कन्याको हर लेनेका अवसर मिल गया )॥५॥

कन्यापुरे महानादः सहसा समुपस्थितः।
तस्यां ह्रियन्त्यां कन्यायां रुदन्त्यां समितिंजय ॥ ६ ॥

शत्रुविजयी नरेश ! जब उस भानुकुमारीका अपहरण होने लगा और वह रोने-चिल्लाने लगी, उस समय सहसा कन्यापुरमे बड़े जोरसे कोलाहल मच गया ॥ ६ ॥

वसुदेवाहुकौ वीरौ दंशितौ निर्गतावुभौ ।
आर्तनादमुपश्रुत्य भानोः कन्यापुरे तदा ॥ ७ ॥

भानुके कन्यापुरमे होनेवाले आर्तनादको सुनकर वीर वसुदेव और उग्रसेन दोनों कवच धारण करके तत्काल बाहर निकले ॥ ७ ॥

न दृष्टिगोचरे तौ तु ददृशातेऽपकारिणम् ।
तथैव दंशितौ यातौ यत्र कृष्णो महाबलः ॥ ८ ॥

परंतु जहाँतक उनकी दृष्टि गयी, वहाँतक किसी अपराधीको उन्होंने नहीं देखा; फिर वे दोनों उसी तरह कवच बाँधे उस स्थानपर गये, जहाँ महाबली श्रीकृष्ण विराजमान थे ॥ ८ ॥

श्रुतार्थः स्वं विमानं तदारुरोह जनार्दनः ।
पार्थेन सहितस्तार्क्ष्यं नागशत्रुमरिंदमः ॥ ९ ॥

उनके मुखसे द्वारकापुरका सब समाचार सुनकर शत्रुओंका दमन करनेवाले श्रीकृष्ण उस समय अर्जुनके साथ अपने वाहन सर्पशत्रु गरुड़पर आरूढ़ हुए ॥ ९ ॥

रथी त्वमनुगच्छेति संदिश्य मकरध्वजम् ।
त्वरेति गरुडं वीरः संदिदेश च काश्यपम् ॥ १० ॥

फिर वे वीर श्रीकृष्ण प्रद्युम्नको यह आदेश देकर कि तुम रथपर बैठकर मेरे साथ आओ, कश्यपनन्दन गरुड़से बोले, शीघ्रता करो ॥ १० ॥

वज्रं नगरमायान्तं निकुम्भं रणदुर्जयम् ।
पार्थकृष्णौ महात्मानावासेदतूररिंदमौ ॥ ११ ॥

वज्र नामक नगरकी ओर जाते हुए रणदुर्जय निकुम्भको शत्रुओंका दमन करनेवाले महात्मा अर्जुन और श्रीकृष्णने रास्तेमे ही पा लिया ॥ ११ ॥

प्रद्युम्नश्च महातेजा मायिनां प्रवरो नृप ।
निकुम्भश्चाथ तान् दृष्ट्वा त्रिधाऽऽत्मानमथाकरोत् ॥१२॥

नरेश्वर ! मायावियोंमे श्रेष्ठ महातेजस्वी प्रद्युम्न भी उसके पास जा पहुँचे । निकुम्भने उन तीनोंको देखकर अपने तीन रूप बना लिये ॥ १२ ॥

तान् सर्वान् योधयामास निकुम्भः प्रहसन्निव ।
बहुकण्टकगुर्वीभिर्गदाभिरमरोपमः ॥ १३ ॥

तत्पश्चात् देवोपम वीरे निकुम्भ अनेक काँटोंसे भरी हुई भारी गदाके द्वारा उन सबके साथ हँसता हुआ-सा युद्ध करने लगा ॥ १३ ॥

सव्येनालम्ब्य हस्तेन कन्यां भानुमतीं नृप ।
दक्षिणेनाथ हस्तेन गदया प्राहरत् पुनः ॥ १४ ॥

नरेश्वर ! बाये हाथसे यादवकन्या भानुमतीको पकड़कर


म० ह० १९.-