विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
विष्णुपर्व ] नवतितमोऽध्यायः ५७७
नवतितमोऽध्यायः
निकुम्भद्वारा भानुमतीका अपहरण, श्रीकृष्ण, अर्जुन और प्रद्युम्नके साथ उसका युद्ध, गोकर्णतीर्थमें उसका पतन, प्रद्युम्नका भानुमतीको लेकर द्वारका पहुँचाना, फिर तीनोंका निकुम्भके साथ युद्ध, उसकी अद्भुत मायाका वर्णन और श्रीकृष्णद्वारा निकुम्भका वध
वैशम्पायन उवाच
तेषां क्रीडावसक्तानां यदूनां पुण्यकर्मणाम्।
छिद्रमासाद्य दुर्बुद्धिर्देवशत्रुर्दुरासदः ॥ १ ॥
कन्यां भानुमतीं नाम भानोर्दुहितरं नृप।
जहारात्मवधाकाङ्क्षी निकुम्भो नाम दानवः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! जब पुण्यकर्मा यदुवंशी जलक्रीड़ामे आसक्त हो रहे थे, उसी समय मौका पाकर दुर्जय देवद्रोही दुर्बुद्धि दानव निकुम्भने मानो अपने ही वधकी इच्छासे भानु नामक यादवकी पुत्री भानुमतीका अपहरण कर लिया ॥ १-२ ॥
अन्तर्हितो मोहयित्वा यदूनां प्रमदाजनम् ।
मायावी मायया राजन् पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥ ३ ॥
राजन् ! अदृश्यरूपसे अन्तःपुरमें पहुँचकर मायाद्वारा यादवोंकी स्त्रियोंको मोहित करके उस मायावी दानवने पहलेके वैरको याद रखते हुए ही भानुमतीका अपहरण किया था ॥ ३ ॥
भ्रातुर्हि वज्रनाभस्य तस्य कन्या प्रभावती ।
प्रद्युम्नेन हृता वीर वज्रनाभस्तथा हतः ॥ ४ ॥
वीर नरेश ! उसके भाई वज्रनाभकी एक कन्या थी, जो प्रभावतीके नामसे विख्यात थी । प्रद्युम्नेन उसे हर लिया और वज्रनाभको भी मार डाला ॥ ४ ॥
भानोरेव तथारण्ये वसत्यवचरेण हि।
अस्वाधीने दुराधर्षे छिद्रज्ञो दानवाधमः ॥ ५ ॥
तबसे वह नीच दानव अवसरकी खोजके लिये भानुके ही उपवनमे रहा करता था । भानुका कन्यापुर यद्यपि बड़ा ही दुर्धर्ष था, तथापि उस समय किसी रक्षकके अधीन नहीं था । उसकी इस दुर्बलताको दानवाधम निकुम्भ जानता था; ( इसलिये उसे कन्याको हर लेनेका अवसर मिल गया )॥५॥
कन्यापुरे महानादः सहसा समुपस्थितः।
तस्यां ह्रियन्त्यां कन्यायां रुदन्त्यां समितिंजय ॥ ६ ॥
शत्रुविजयी नरेश ! जब उस भानुकुमारीका अपहरण होने लगा और वह रोने-चिल्लाने लगी, उस समय सहसा कन्यापुरमे बड़े जोरसे कोलाहल मच गया ॥ ६ ॥
वसुदेवाहुकौ वीरौ दंशितौ निर्गतावुभौ ।
आर्तनादमुपश्रुत्य भानोः कन्यापुरे तदा ॥ ७ ॥
भानुके कन्यापुरमे होनेवाले आर्तनादको सुनकर वीर वसुदेव और उग्रसेन दोनों कवच धारण करके तत्काल बाहर निकले ॥ ७ ॥
न दृष्टिगोचरे तौ तु ददृशातेऽपकारिणम् ।
तथैव दंशितौ यातौ यत्र कृष्णो महाबलः ॥ ८ ॥
परंतु जहाँतक उनकी दृष्टि गयी, वहाँतक किसी अपराधीको उन्होंने नहीं देखा; फिर वे दोनों उसी तरह कवच बाँधे उस स्थानपर गये, जहाँ महाबली श्रीकृष्ण विराजमान थे ॥ ८ ॥
श्रुतार्थः स्वं विमानं तदारुरोह जनार्दनः ।
पार्थेन सहितस्तार्क्ष्यं नागशत्रुमरिंदमः ॥ ९ ॥
उनके मुखसे द्वारकापुरका सब समाचार सुनकर शत्रुओंका दमन करनेवाले श्रीकृष्ण उस समय अर्जुनके साथ अपने वाहन सर्पशत्रु गरुड़पर आरूढ़ हुए ॥ ९ ॥
रथी त्वमनुगच्छेति संदिश्य मकरध्वजम् ।
त्वरेति गरुडं वीरः संदिदेश च काश्यपम् ॥ १० ॥
फिर वे वीर श्रीकृष्ण प्रद्युम्नको यह आदेश देकर कि तुम रथपर बैठकर मेरे साथ आओ, कश्यपनन्दन गरुड़से बोले, शीघ्रता करो ॥ १० ॥
वज्रं नगरमायान्तं निकुम्भं रणदुर्जयम् ।
पार्थकृष्णौ महात्मानावासेदतूररिंदमौ ॥ ११ ॥
वज्र नामक नगरकी ओर जाते हुए रणदुर्जय निकुम्भको शत्रुओंका दमन करनेवाले महात्मा अर्जुन और श्रीकृष्णने रास्तेमे ही पा लिया ॥ ११ ॥
प्रद्युम्नश्च महातेजा मायिनां प्रवरो नृप ।
निकुम्भश्चाथ तान् दृष्ट्वा त्रिधाऽऽत्मानमथाकरोत् ॥१२॥
नरेश्वर ! मायावियोंमे श्रेष्ठ महातेजस्वी प्रद्युम्न भी उसके पास जा पहुँचे । निकुम्भने उन तीनोंको देखकर अपने तीन रूप बना लिये ॥ १२ ॥
तान् सर्वान् योधयामास निकुम्भः प्रहसन्निव ।
बहुकण्टकगुर्वीभिर्गदाभिरमरोपमः ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् देवोपम वीरे निकुम्भ अनेक काँटोंसे भरी हुई भारी गदाके द्वारा उन सबके साथ हँसता हुआ-सा युद्ध करने लगा ॥ १३ ॥
सव्येनालम्ब्य हस्तेन कन्यां भानुमतीं नृप ।
दक्षिणेनाथ हस्तेन गदया प्राहरत् पुनः ॥ १४ ॥
नरेश्वर ! बाये हाथसे यादवकन्या भानुमतीको पकड़कर
म० ह० १९.-
| ५७८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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( उसे ढालकी भाँति सामने रखकर ) वह दाहिने हाथसे बारंबार गदाका प्रहार करता था ॥ १४ ॥
कन्यार्थं न च कृष्णौ वा कामो वा नृपसत्तम ।
निर्दयं प्रहरन्ति स्म निकुम्भे च महासुरे ॥ १५ ॥
नृपश्रेष्ठ ! कन्याकी रक्षाके लिये ही श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा प्रद्युम्न उस निकुम्भ नामक महान् असुरपर निर्दयतापूर्वक प्रहार नहीं करते थे ॥ १५ ॥
समर्थास्ते महात्मानः शत्रुं हन्तुं दुरासदाः ।
निश्श्वसुर्नरपते दयाभारावपीडिताः ॥ १६ ॥
महाराज ! वे दुर्जय महात्मा उस शत्रु्का वध करनेमें सर्वथा समर्थ थे तो भी दयाके भारसे दबे होनेके कारण वे निःश्वास लेकर रह जाते थे ॥ १६ ॥
श्रेष्ठो धनुष्मतां पार्थः सर्वथा कुशलो युधि ।
नागोष्ट्रविधिना दैत्यं शरपङ्क्त्या जघान ह ॥ १७ ॥
धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन युद्धमें सर्वथा कुशल थे; अतः वे नागोष्ट्र-विधिसे अपने बाणसमूहद्वारा उस दैत्यको घायल करने लगे ॥ १७ ॥
ते तु वैतस्तिकैर्बाणैर्विविधान् दानवान् युधि ।
न कन्यां कलया युक्त्या शिक्षया च महीपते ॥ १८ ॥
पृथ्वीनाथ ! वे श्रीकृष्ण आदि वीर अपनी कला, युक्ति और शिक्षाके प्रभावसे एक-एक बित्तेके बाणोंद्वारा नाना प्रकारके दानवोंको उस युद्धमें घायल करते थे; किंतु राजकन्याको चोट नहीं लगने देते थे ॥ १८ ॥
ततः स कन्यया सार्द्धं तत्रैवान्तरधीयत ।
आसुरीमाश्रितो मायां न च तां वेत्ति कश्चन ॥ १९ ॥
तब वह आसुरी मायाका आश्रय लेकर कन्याके साथ वहीं अन्तर्धान हो गया । उस मायाको उन तीनोंमेंसे कोई नहीं जानता था ॥ १९ ॥
तं कृष्णौ रौक्मिणेयश्च पृष्ठतोऽनुययुस्तदा ।
हारितः शकुनो भूत्वा तस्थावथ महासुरः ॥ २० ॥
श्रीकृष्ण, अर्जुन और प्रद्युम्न तीनोंने ही तत्काल उस दानवका पीछा किया । आगे जाकर वह महान् असुर हारित पक्षी होकर बैठ गया ॥ २० ॥
तं बाणैः पुनरेवाथ वीरो भूयो धनंजयः ।
वैतस्तिकैर्मर्मभिद्भिः कन्यां रक्षन्नताडयत् ॥ २१ ॥
तब वीर धनंजयने पुनः कन्याकी रक्षा करते हुए वैतस्तिक नामक मर्मभेदी बाणोंद्वारा उस दैत्यपर प्रहार किया ॥
स इमां पृथिवीं कृत्स्नां सप्तद्वीपां महासुरः ।
बभ्रामानुगतश्चैव तैर्वीरैररिमर्दनः ॥ २२ ॥
तब वह शत्रुसूदन महान् असुर इस सात द्वीपोंसे युक्त सारी पृथ्वीपर चक्कर लगाने लगा और वे तीनों वीर निरन्तर उसका पीछा करते रहे ॥ २२ ॥
गोकर्णस्योपरिष्टात्तु पर्वतस्य महासुरः ।
पपात वेलां गङ्गायाः पुलिने सह कन्यया ॥ २३ ॥
वह महान् असुर जब गोकर्ण पर्वतके ऊपरसे होकर निकलने लगा, उस समय कन्यासहित गङ्गातीरपर समुद्रके किनारे गिर पड़ा ॥ २३ ॥
न देवा नासुराश्चापि लङ्घयन्ति तपोधनाः ।
गोकर्णं तेजसा गुप्तं महादेवस्य भारत ॥ २४ ॥
भरतनन्दन ! गोकर्ण पर्वत महादेवजीके तेजसे सुरक्षित है । उसे देवता, असुर तथा तपोधन महर्षि भी नहीं लाँघ सकते हैं ॥ २४ ॥
एतदन्तरमासाद्य प्रद्युम्नः शीघ्रविक्रमः ।
कन्यां भानुमतीं भैमो जग्राह रणदुर्जयः ॥ २५ ॥
यह अवसर पाकर भीमकुलभूषण शीघ्रपराक्रमी रणदुर्जय वीर प्रद्युम्नने उस कन्या भानुमतीको अपने साथ ले लिया २५
असुरः सोऽर्दितो राजन् कृष्णाभ्यां निशितैः शरैः ।
त्यक्त्वाथोत्तरगोकर्णं निकुम्भो दक्षिणां दिशम् ।
जगाम पृष्ठतो यातौ कृष्णौ तार्क्यगतौ तदा ॥ २६ ॥
राजन् ! श्रीकृष्ण और अर्जुनद्वारा तीखे बाणोंसे पीड़ित किया गया असुर निकुम्भ उत्तर गोकर्णको त्यागकर दक्षिण दिशाकी ओर चल दिया । गरुड़पर बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन भी उस समय उसके पीछे-पीछे गये ॥ २६ ॥
विवेश षट्पुरं चैव ज्ञातीनामालयं तदा ।
तत्र वीरौ गुहाद्वारि कृष्णौ रात्रौ तदोपतुः ॥ २७ ॥
निकुम्भ अपने सजातीय बन्धुओंके निवासस्थान षट्पुरमें जा घुसा । श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों वीर रातमें वहाँ गुफाके द्वारपर बैठे रहे ॥ २७ ॥
रौक्मिणेयोऽपि कृष्णेन संदिष्टो द्वारकां पुरीम् ।
अनयद् भानुतनयां प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ २८ ॥
श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नने प्रसन्नमनसे भानुकुमारी भानुमतीको द्वारकापुरीमें पहुँचा दिया २८
नयित्वा चाययौ वीरः षट्पुरं दानवाकुलम् ।
ददर्श च गुहाद्वारि कृष्णौ भीमपराक्रमौ ॥ २९ ॥
उसे पहुँचाकर वीर प्रद्युम्न पुनः दानवोंसे भरे हुए षट्पुरमें आये और वहाँ गुफाके द्वारपर भयंकर पराक्रमी श्रीकृष्ण और अर्जुनसे मिले ॥ २९ ॥
१. नागोष्ट्रका अर्थ है सर्प और ऊँट । किसी वनमें एक ऊँटके शरीरपर अजगर सर्प लिपट गया था । यह देख किसी धनुर्धर वीरने अपना अस्त्र-लाघव दिखाते हुए ऐसा बाण मारा, जिससे अजगर तो मारा गया, किंतु ऊँट बाल-बाल बच गया । यही नागोष्ट्र-विधि है । ये अर्जुन आदि वीर अपने बाणोंसे दैत्यको घायल करते थे, किंतु कन्याके शरीरपर आंच नहीं आने देते थे ।
| विष्णु पर्व ] | नवतितमोऽध्यायः | ५७९ |
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उषतुर्द्वारमाक्रम्य षट्पुरस्य महाबलौ ।
कृष्णौ प्रद्युम्नसहितौ निकुम्भवधकाङ्क्षिणौ ॥ ३० ॥
निकुम्भके वधकी इच्छा रखनेवाले महाबली श्रीकृष्ण और अर्जुन प्रद्युम्नके साथ षट्पुरका दरवाजा घेरकर बैठे थे॥
ततोऽन्तरमेतस्माद् बिलादतिबलस्तदा ।
निर्जगाम बली योद्धुं निकुम्भो भीमविक्रमः ॥ ३१ ॥
तदनन्तर भयंकर पराक्रमी अत्यन्त बलशाली बली निकुम्भ युद्धके लिये उस बिलसे बाहर निकला ॥ ३१ ॥
तस्य निर्गच्छतस्तस्माद् बिलात्पार्थो विशाम्पते ।
रुरोध सर्वतो मार्गं शरैर्गाण्डीवनिःसृतैः ॥ ३२ ॥
प्रजानाथ ! उस बिलसे निकलते समय निकुम्भके मार्गको अर्जुनने गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा चारो ओरसे अवरुद्ध कर दिया ॥ ३२ ॥
सोऽभिसृत्य गदां घोरामुद्यम्य बहुकण्टकाम् ।
शिरस्यताडयत् पार्थं निकुम्भो बलिनां वरः ॥ ३३ ॥
तब बलवानोंमें श्रेष्ठ निकुम्भने निकट आकर बहुतेरे कण्टकोंसे भरी हुई अपनी भयानक गदाको उठाकर अर्जुनके मस्तकपर दे मारा ॥ ३३ ॥
अदृष्टेनाहतो वीरः शिरस्यथ मुमोह सः ।
गदयाभिहते पार्थे रक्तं वमति मुह्यति ॥ ३४ ॥
हसित्वा सोऽसुरो दृप्तो रौक्मिणेयमताडयत् ।
तं प्राङ्मुखमुखं वीरं मायावी मायिनां वरम् ।
अदृष्टेनाहतो वीरः शिरस्यथ मुमोह सः ॥ ३५ ॥
उसने अदृश्य रहकर यह आघात किया था । सिरपर गदाकी चोट पड़नेसे वीर अर्जुन मूर्च्छित हो गये । वे रक्त वमन करते हुए जब अचेत हो गये, तब उस घमंडी एवं मायावी असुरने हँसकर मायावियोंमें श्रेष्ठ वीर रुक्मिणी-कुमारको चोट पहुँचायी। वे पूर्वाभिमुख होकर खड़े थे; अतः उस असुरको उन्होंने देखा नहीं था । उस अदृश्य असुरके द्वारा सिरपर आघात होनेसे वीर प्रद्युम्नको भी मूर्च्छा आ गयी ॥ ३४-३५ ॥
तथागतौ तु दृष्ट्वा तौ मुह्यमानौ क्षतादितौ ।
अभिदुद्राव गोविन्दो निकुम्भं क्रोधमूर्च्छितः ॥ ३६ ॥
कौमोदकीं समुद्यम्य गदपूर्वोद्भवो गदाम् ।
भारी आघातसे पीड़ित हो अचेत पड़े हुए उन दोनों वीरोंको देखकर भगवान् श्रीकृष्णका क्रोध बहुत बढ़ गया और वे गदके बड़े भाई गोविन्द कौमोदकी गदा उठाकर निकुम्भकी ओर दौड़े ॥ ३६३ ॥
तावन्योन्यं दुराधर्षौ गर्जन्तावभिपेततुः ॥ ३७ ॥
ऐरावतगतः शक्रः सर्वैर्देवगणैः सह ।
ददर्श तन्महायुद्धं घोरं देवासुरं तदा ॥ ३८ ॥
वे दोनों दुर्धर्ष वीर गर्जना करते हुए एक-दूसरेपर टूट पड़े । ऐरावतपर बैठे हुए इन्द्र समस्त देवताओंके साथ आकर उस समय देवताओं और असुरोंके उस घोर महायुद्धको देखने लगे ॥ ३७-३८ ॥
दृष्ट्वा देवान् हृषीकेशश्चित्रैर्युद्धैररिंदमः ।
इयेष दानवं हन्तुं देवानां हितकाम्यया ॥ ३९ ॥
देवताओंको देखकर शत्रुओंका दमन करनेवाले श्रीकृष्णने उनके हितकी कामनासे विचित्र युद्धोंद्वारा उस दानवको मार डालनेकी इच्छा की ॥ ३९ ॥
स मण्डलानि चित्राणि दर्शयामास केशवः ।
कौमोदकीं महाबाहुर्लालयन् युद्धकोविदः ॥ ४० ॥
युद्धकलाकोविद महाबाहु श्रीकृष्ण अपनी कौमोदकी गदाका लालन करते हुए विचित्र मण्डल (पैंतरे) दिखाने लगे ॥ ४० ॥
तथैवासुरमुख्योधपि गदां तां बहुकण्टकाम् ।
शिक्षया भ्रामयाणोऽथ मण्डलानि चचार ह ॥ ४१ ॥
इसी प्रकार असुरोंमें श्रेष्ठ निकुम्भ भी अपनी बहुत-से कण्टकोंवाली गदाको शिक्षाके अनुसार घुमाता हुआ पैंतरे दिखाने लगा ॥ ४१ ॥
वृषभाविव गर्जन्तौ वृहन्ताविव कुञ्जरौ ।
दृषितान्तरमासाद्य क्रुद्धौ शालावृकाविव ॥ ४२ ॥
जैसे वासिता-मैथुनकी इच्छावाली गायको अपने बीचमें पाकर दो साँड़ हेंकड़ते हुए आपसमें लड़ते हैं; जैसे वासिता हथिनीके लिये दो हाथी चिग्घाड़ते हुए परस्पर युद्ध करते हैं तथा जैसे दो भेड़िये किसी माँदा भेड़ियाके लिये परस्पर जूझते हैं, उसी प्रकार वे श्रीकृष्ण और निकुम्भ क्रोधमें भरकर एक दूसरेसे भिड़े हुए थे ॥ ४२ ॥
आजघान निकुम्भस्तु गदया गदपूर्वजम् ।
स्पष्टाष्टघण्टया वीर नादं मुक्त्वातिदारुणम् ॥ ४३ ॥
वीर नरेश ! निकुम्भने अत्यन्त भयंकर सिंहनाद करके जिसमें आठ घण्टियाँ स्पष्ट दिखायी देती थीं, ऐसी गदाके द्वारा भगवान् गदाग्रजपर आघात किया ॥ ४३ ॥
तत्कालमेव कृष्णोऽपि भ्रामयित्वा महागदाम् ।
निकुम्भमूर्धनि तदा पातयामास भारत ॥ ४४ ॥
भरतनन्दन ! भगवान् श्रीकृष्णने तत्काल ही अपनी विशाल गदा घुमाकर उस समय निकुम्भके मस्तकपर दे मारी ॥ ४४ ॥
• अवष्टभ्य मुहूर्त्तं तु हरिः कौमोदकीं गदाम् ।
तस्थौ जगद्गुरुर्धीमान् सुमोह पतितः क्षितौ ॥ ४५ ॥
उस समय बुद्धिमान् जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण दो घड़ी-तक कौमोदकी गदाको थामे हुए खड़े रहे । तत्पश्चात् (अपनी ही इच्छासे) मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४५ ॥
५८० | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
हाहाभूतं जगत् सर्वं तत्कालमभवत् तदा ।
तथागते वासुदेवे नरदेव महात्मनि ॥ ४६ ॥
नरदेव ! उस समय महात्मा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी वैसी अवस्था हो जानेपर तत्काल सारे जगत्में हाहाकार मच गया ॥ ४६ ॥
आकाशगङ्गातोयेन शीतेन च सुगन्धिना ।
सिषेचामृतमिश्रेण कृष्णं देवेश्वरः स्वयम् ॥ ४७ ॥
स्वयं देवेश्वर इन्द्रने अमृतमिश्रित आकाशगङ्गाके शीतल एवं सुगन्धित जलसे श्रीकृष्णका अभिषेक किया ॥ ४७ ॥
नूनमात्मेच्छया कृष्णस्तथा चक्रे सुरोत्तमः ।
को हि शक्तो महात्मानं युद्धे मोहयितुं हरिम् ॥ ४८ ॥
निश्चय ही सुरश्रेष्ठ श्रीकृष्णने अपनी इच्छासे ही ऐसा (मूर्च्छाका अभिनय) किया था; अन्यथा युद्धमें उन महात्मा श्रीहरिको मूर्च्छित कर देनेकी शक्ति किसमें है ? ॥ ४८ ॥
कृष्णः प्रत्यागतप्राणश्चक्रमुद्यम्य भारत ।
प्रतीच्छेति दुरात्मानमुवाच रिपुनाशनः ॥ ४९ ॥
भारत ! सचेत होनेपर शत्रुनाशन श्रीकृष्णने चक्र उठाकर उस दुरात्मासे कहा—‘अरे ! अब इस चक्रकी चोट सहन कर’ ॥ ४९ ॥
निकुम्भोऽप्यतिमायावी उत्पपात दुरासदः ।
शरीरं तत् परित्यज्य न तु तं वेत्ति केशवः ॥ ५० ॥
उनकी यह बात सुनकर अत्यन्त मायावी दुर्जय वीर निकुम्भ भी अपने उस शरीरको वहीं त्यागकर ऊपरकी ओर उड़ गया । श्रीकृष्णको उसकी इस चालका पता न लगा ॥ ५० ॥
मुमूर्षति मृतो वायमिति मत्वा जनार्दनः ।
ररक्ष स्मरमाणोऽथ वीरो वीरव्रतं विभो ॥ ५१ ॥
प्रभो ! यह मरना चाहता है अथवा मर गया है—ऐसा समझकर वीर-व्रतका स्मरण रखते हुए वीर जनार्दनने उसकी रक्षा की (गिरे हुए उस दानवके शरीरपर अपना अस्त्र नहीं चलाया) ॥ ५१ ॥
अथ प्रद्युम्नकौन्तेयावागतौ लब्धचेतनौ ।
स्थितौ नारायणाभ्याशे निकुम्भवधनिश्चितौ ॥ ५२ ॥
तदनन्तर प्रद्युम्न और अर्जुन दोनों सचेत हो श्रीकृष्णके निकट आकर खड़े हो गये । उन दोनोंने निकुम्भके वधका निश्चय कर लिया था ॥ ५२ ॥
प्रद्युम्नोऽप्यथ मायावी विदितः कृष्णमब्रवीत् ।
निकुम्भस्तात नास्त्यत्र गतः क्वापि सुदुर्मतिः ॥ ५३ ॥
प्रद्युम्न भी मायावी थे; अतः उन्होंने निकुम्भकी मायाको पहचान लिया और श्रीकृष्णसे कहा—‘तात ! निकुम्भ यहाँ नहीं है । वह दुर्बुद्धि कहीं चला गया’ ॥ ५३ ॥
प्रद्युम्नेनैवमुक्ते तु तन्ननाश कलेवरम् ।
प्रजहासाथ भगवानर्जुनेन सह प्रभुः ॥ ५४ ॥
प्रद्युम्नके इतना कहते ही निकुम्भका वह कलेवर अदृश्य हो गया । यह देख अर्जुनके साथ भगवान् श्रीकृष्ण जोर-जोरसे हँसने लगे ॥ ५४ ॥
तदायुतसहस्राणि निकुम्भानां जनाधिप ।
ददृशुस्ते ततो वीराः क्षितौ दिवि च सर्वतः ॥ ५५ ॥
नरेश्वर ! इतनेहीमें उन वीरोंने पृथ्वीपर, आकाशमें तथा सब ओर सहस्रों अयुत (एक करोड़) निकुम्भके शरीर देखे ॥ ५५ ॥
सहस्राण्येव कृष्णं तु तथा पार्थमरिंदम ।
रौक्मिणेयं तथा वीरं तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ५६ ॥
शत्रुदमन नरेश ! श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा रुक्मिणीकुमार वीर प्रद्युम्नके भी सहस्रों शरीर दिखायी दिये । वह अद्भुत-सा दृश्य प्रकट हुआ ॥ ५६ ॥
पाण्डवस्य धनुः केचित्केचिदस्य महाशरान् ।
अन्येऽस्य जगृहुर्हस्तावन्थे पादौ महासुराः ॥ ५७ ॥
किन्हीं महान् असुरोंने अर्जुनका धनुष ले लिया, किन्हींने उनके बड़े-बड़े बाण छीन लिये, दूसरोंने उनके दोनों हाथ पकड़ लिये और अन्य असुरोंने उनके दोनों पैर ॥
एवं गृहाय तं वीरमगमंस्ते विहायसि ।
पार्थानामपि कोट्यस्तु गृहीतानां तदाभवन् ॥ ५८ ॥
इस तरह वीर अर्जुनको पकड़कर वे सब आकाशमें ले गये; फिर उन असुरोंद्वारा पकड़े गये अर्जुनके करोड़ों रूप हो गये ॥ ५८ ॥
नान्तं ददर्श कृष्णश्च कार्ष्णिश्च रिपुनाशनौ ।
विच्छिद्य तौ शरैर्वीरौ निकुम्भं पार्थवर्जितौ ॥ ५९ ॥
शत्रुओंका नाश करनेवाले श्रीकृष्ण और प्रद्युम्न दोनों वीरोंने पार्थसे रहित हो अपने बाणोंसे निकुम्भको काट डाला तो भी उसका अन्त होता नहीं देखा ॥ ५९ ॥
एकैकस्तु द्विधा च्छिन्नो द्वेधा भवति भारत ।
दिव्यज्ञानस्तदा कृष्णो भगवाननुदष्टवान् ॥ ६० ॥
भारत ! एक-एक निकुम्भके दो टुकड़े कर देनेपर वह एकसे दो रूप धारण कर लेता था । उस समय दिव्य-ज्ञानसम्पन्न भगवान् श्रीकृष्णने बारंबार उसके विषयमें विचार किया ॥ ६० ॥
निकुम्भं तत्त्वतश्चापि ददर्श मधुसूदनः ।
स्रष्टारं सर्वमायानां हर्त्तारं फाल्गुनस्य च ॥ ६१ ॥
तब भगवान् मधुसूदनने सम्पूर्ण मायाओंके स्रष्टा तथा अर्जुनका अपहरण करनेवाले निकुम्भको यथार्थ रूपसे देखा ॥
विष्णुपूर्व ] नवतितमोऽध्यायः ५८१
स चक्रेण शिरस्तस्य चकर्त्तासुरसूदनः ।
पश्यतां सर्वभूतानां भूतभव्यभवो हरिः ॥ ६२ ॥
भूत, वर्तमान और भविष्यको उत्पन्न करनेवाले असुरसूदन श्रीहरिने समस्त प्राणियोंके देखते-देखते अपने चक्रसे निकुम्भका सिर काट लिया ॥ ६२ ॥
स मुक्त्वा फाल्गुनं राजञ्छिन्ने शिरसि भारत ।
पपातासुरमुख्योऽथ च्छिन्नमूल इव द्रुमः ॥ ६३ ॥
राजन् ! भरतनन्दन ! सिर कट जानेपर वह मुख्य असुर अर्जुनको छोड़कर जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ६३ ॥
अथाकाशगतं पार्थं पतमानं विहायसः ।
कृष्णवाक्येन जग्राह कार्ष्णिर्वियति मानद ॥ ६४ ॥
मानद ! उस समय श्रीकृष्णकी आज्ञासे प्रद्युम्नने आकाशमें पहुँचकर वहाँसे गिरते हुए अर्जुनको पकड़ लिया ॥
निकुम्भे पतिते भूमौ समाश्वास्य धनंजयम् ।
जगाम द्वारकां देवः पार्थकामसमन्वितः ॥ ६५ ॥
निकुम्भके धराशायी हो जानेपर अर्जुनको आश्वासन दे उनके और प्रद्युम्नके साथ भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकाको चले गये ॥ ६५ ॥
समियाय दशार्होऽथ द्वारकां मुदितो विभुः ।
नारदं च महात्मानं ववन्दे यदुनन्दनः ॥ ६६ ॥
दशार्हवंशी यदुकुलनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने बड़ी प्रसन्नताके साथ द्वारकामें पदार्पण किया और वहाँ महात्मा नारदजीको मस्तक झुकाया ॥ ६६ ॥
नारदोऽथ महातेजा भानुं यादवमब्रवीत् ।
भानो मा कार्षीर्मन्युं त्वं श्रूयतां भैमनन्दन ॥ ६७ ॥
तदनन्तर महातेजस्वी नारदजीने भानु नामक यादवसे कहा—"भैमनन्दन ! भानो ! कन्याका अपहरण होनेके कारण मनमें खेद न करो । मेरी बात सुनो ॥ ६७ ॥
क्रीडन्त्या रैवतोद्याने दुर्वासाः कोपितोऽनया ।
स शशाप ततो रोषान्मुनिर्दुहितरं तव ॥ ६८ ॥
"यह भानुमती किसी दिन रैवतवनके उद्यानमें खेल रही थी । वहाँ इसने दुर्वासा मुनिको क्रोध दिला दिया । तब मुनिने क्रोधवश आपकी पुत्रीको शाप दे दिया—॥ ६८ ॥
अतिदुर्ललितैः कन्या शत्रुहस्तं गमिष्यति ।
सुतार्थे ते मया सार्द्धं मुनिभिः स प्रसादितः ॥ ६९ ॥
बालां व्रतवतीं कन्यामनागसमिमां मुने ।
शप्तवानसि धर्मज्ञ कथं धर्मभृतां वर ।
अनुग्रहं विधत्स्वात्र वयं विज्ञापयामहे ॥ ७० ॥
"यह कन्या अपनी दुर्ललित चेष्टाओंसे शत्रुके हाथमें पड़ जायगी ।' उस समय मैंने तथा दूसरे मुनियोंने आपकी इस पुत्रीके लिये दुर्वासाको प्रसन्न किया और कहा--'मुने ! यह बाला ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाली कन्या है । इसने आपका कोई अपराध भी नहीं किया है; फिर आपने इसे कैसे शाप दे दिया ? धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धर्मज्ञ महर्षे ! इस कन्यापर अनुग्रह कीजिये । इसके लिये हमलोग यहाँ प्रार्थना करते हैं' ॥ ६९-७० ॥
अस्माभिरेवमुक्तस्तु दुर्वासा भैमनन्दन ।
उवाचाधोमुखो भूत्वा मुहूर्तं कृपयान्वितः ॥ ७१ ॥
"भैमनन्दन ! हमारे ऐसा कहनेपर दुर्वासाजी नीचे मुँह किये दो घड़ीतक मौन रहे; फिर दयापूर्वक बोले--॥ ७१ ॥
यदवोचमहं वाक्यं तत् तथा न तदन्यथा ।
रिपुहस्तमवश्या हि गमिष्यति न संशयः ॥ ७२ ॥
अदूषिता तु धर्मेण भर्तारमुपलप्स्यति ।
बहुपुत्रा बहुधना सुभगा च भविष्यति ॥ ७३ ॥
" 'महर्षियो ! मैंने जो बात कही है, वह उसी तरह होगी । उसे कोई बदल नहीं सकता । यह शत्रुके हाथमें अवश्य पड़ेगी, इसमें संशय नहीं है; परंतु यह भी निश्चय है कि यह दूषित नहीं होने पायगी और धर्मके अनुसार पतिको प्राप्त करेगी । इसके बहुत-से पुत्र होंगे । यह बहुत धनसे सम्पन्न और सौभाग्यवती होगी ॥ ७२-७३ ॥
सुगन्धगन्धा च सदा कुमारी च पुनः पुनः ।
न च शोकमिमं घोरं तन्वङ्गी धारयिष्यति ॥ ७४ ॥
" 'इसके शरीरकी गन्ध सदा सुगन्धित होगी । यह पति-समागमकै पश्चात् बारंबार कुमारी ही बनी रहेगी । इस कृशाङ्गी कन्याको अपने अपहरणजनित घोर शोकका स्मरण नहीं रहेगा' ॥ ७४ ॥
एवं भानुमती वीर सहदेवाय दीयताम् ।
श्रद्दधानः स शूरश्च धर्मशीलश्च पाण्डवः ॥ ७५ ॥
"वीर भानो ! तुम मेरी बात मानकर भानुमतीका सहदेवके साथ ब्याह कर दो; क्योंकि पाण्डुपुत्र सहदेव श्रद्धालु, शूरवीर तथा धर्मशील हैं" ॥ ७५ ॥
ततो भानुमतीं भानुर्ददौ माद्रीसुताय वै ।
सहदेवाय धर्मात्मा नारदस्य वचः स्मरन् ॥ ७६ ॥
तदनन्तर नारदजीके वचनोंको याद रखते हुए धर्मात्मा भानुने अपनी कन्या भानुमती माद्रीकुमार सहदेवको दे दी ॥
आनीतः सहदेवश्च प्रेषितश्चक्रपाणिना ।
विवाहे च तदा वृत्ते सभार्यः स पुरीं गतः ॥ ७७ ॥
चक्रपाणि भगवान् श्रीकृष्णने सहदेवको बुलवाया और उस समय विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर उन्हें पत्नीसहित विदा कर दिया, फिर वे अपनी पुरीको चले गये ॥ ७७ ॥
इमं कृष्णस्य विजयं यः पठेच्छृणुयादथ ।
५८२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
विजयं सर्वकृत्येषु श्रद्दधानो लभेन्नरः ॥ ७८ ॥
जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक भगवान् श्रीकृष्णकी इस विजय-वार्ताको पढ़ेगा या सुनेगा, वह सभी कार्योंमें विजय प्राप्त करेगा ॥ ७८ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि भानुमतीहरणे निकुम्भवधो नाम नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें भानुमतीहरणके प्रसङ्गमें निकुम्भका वधविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९० ॥
एकनवतितमोऽध्यायः
वज्रनाभकी तपस्या और वरप्राप्ति, उसका त्रिभुवन-विजयके लिये उद्योग, इन्द्रकी श्रीकृष्णसे वार्ता, भद्रनामा नटको मुनियोंका वरदान, इन्द्रका हंसोंको आवश्यक कर्तव्य बताकर वज्रनाभपुरमें भेजना
जनमेजय उवाच
भानुमत्यापहरणं विजयं केशवस्य च ।
छालिक्यनयनं चैव देवलोकान्महामुने ॥ १ ॥
क्रीडां च सागरे दिव्यां वृष्णीनाममितौजसाम् ।
अश्रौषं परमाश्चर्यं मुने धर्मभृतां वर ॥ २ ॥
**जनमेजयन कहा—**धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महामुने ! भानुमतीका अपहरण, श्रीकृष्णकी विजय, देवलोकसे छालिक्य गान्धर्वका आनयन और अत्यन्त तेजस्वी वृष्णिवंशियोंकी समुद्रमें होनेवाली दिव्यक्रीड़ा—इन सबका अत्यन्त आश्चर्य-युक्त वर्णन मैंने सुना है ॥ १-२ ॥
वज्रनाभवधो ह्युक्तो निकुम्भवधकीर्तने ।
तन्मे कौतूहलं श्रोतुं प्रसादाद् भवतो मुने ॥ ३ ॥
मुने ! निकुम्भ-वधका वर्णन करते समय आपने वज्रनाभके वधकी भी चर्चा की है। आपकी कृपासे उसे सुननेके लिये मेरे मनमें कौतूहल हो रहा है ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
हन्त ते वर्तयिष्यामि वज्रनाभवधं नृप ।
विजयं चैव कामस्य साम्बस्यैव च भारत ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**नरेश्वर ! भरतनन्दन ! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें वज्रनाभके वधका वृत्तान्त बताऊँगा । साथ ही प्रद्युम्न और साम्बकी विजयका भी वर्णन करूँगा ॥ ४ ॥
मेरोः सानौ नरपते तपश्चक्रे महासुरः ।
वज्रनाभ इति ख्यातो निश्चितः समितिंजयः ॥ ५ ॥
नरेन्द्र ! वज्रनाभ नामसे विख्यात महान् असुर निश्चय ही युद्धमें विजय पानेवाला था । एक समय उसने मेरुपर्वतके शिखरपर बड़ी भारी तपस्या की ॥ ५ ॥
तस्य तुष्टो महातेजा ब्रह्मा लोकपितामहः ।
वरेण च्छन्दयामास तपसा परितोषितः ॥ ६ ॥
उसकी तपस्यासे महातेजस्वी लोकपितामह ब्रह्माजी बहुत संतुष्ट हुए । उन्होंने प्रसन्न होकर उससे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहा ॥ ६ ॥
अवध्यत्वं स देवेभ्यो वव्रे दानवसत्तमः ।
पुरं वज्रपुरं चापि सर्वरत्नमयं शुभम् ॥ ७ ॥
तब उस श्रेष्ठ दानवने देवताओंसे अवध्य होनेका वर माँगा; साथ ही सम्पूर्ण रत्नोंके बने हुए सुन्दर वज्रपुर नामक नगरकी भी याचना की ॥ ७ ॥
स्वच्छन्देन प्रवेशश्च न वायोरपि भारत ।
अचिन्तितेन कामानामुपपत्तिर्नराधिप ॥ ८ ॥
भारत ! उस नगरमें स्वच्छन्दतापूर्वक वायुका भी प्रवेश नहीं होता था । नरेश्वर ! बिना चिन्तन किये ही वहाँ सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंकी प्राप्ति होती रहती थी ॥ ८ ॥
शाखानगरमुख्यानां संवाहानां शतानि च ।
नगरस्याप्रमेयस्य समन्ताज्जनमेजय ॥ ९ ॥
जनमेजय ! उस अप्रमेय नगरके चारों ओर शाखा-नगरोंके मुख्य-मुख्य सैकड़ों उद्यान शोभा पाते थे, जो चहारदीवारियोंसे घिरे हुए थे ॥ ९ ॥
तथा तदभवत् तस्य वरदानेन भारत ।
उवास वज्रनगरे वज्रनाभो महासुरः ॥ १० ॥
भारत ! उसको मिले हुए वरदानसे ही वह नगर उस रूपमें प्रतिष्ठित हुआ था । महान् असुर वज्रनाभ उस वज्र-नगरमें निवास करता था ॥ १० ॥
कोटिशो वरलब्धं तमसुराः परिवार्य ते ।
ऊषुर्वज्रपुरे राजन् संवाहेषु तथैव च ॥ ११ ॥
शाखानगरमुख्येषु रम्येषु च नराधिप ।
हृष्टपुष्टप्रमुदिता नृप देवस्य शत्रवः ॥ १२ ॥
राजन् ! वर पाये हुए वज्रनाभको सब ओरसे घेरकर करोड़ों देवद्रोही असुर हृष्ट, पुष्ट और आनन्दित हो वज्रपुरमें तथा उसके शाखानगरोंके मुख्य-मुख्य घिरे हुए उद्यानोंमें निवास करते थे ॥ ११-१२ ॥
विष्णुपर्व ] एकनवतितमोऽध्यायः ५८३
वज्रनाभोऽथ दुष्टात्मा वरदानेन दर्पितः ।
पुरस्य चात्मनश्चैव जगद् बाधितुमुद्यतः ॥ १३ ॥
अपनेको तथा अपने नगरको प्राप्त हुए वरदानसे घमंडमें भरा हुआ दुष्टात्मा वज्रनाभ सम्पूर्ण जगत्को कष्ट देनेके लिये उद्यत हो गया ॥ १३ ॥
महेन्द्रमब्रवीद् गत्वा देवलोकं विशाम्पते ।
अहमीशितुमिच्छामि त्रैलोक्यं पाकशासन ॥ १४ ॥
प्रजानाथ ! वह देवलोकमें जाकर महेन्द्रसे बोला— 'पाकशासन ! मैं तीनों लोकोंपर शासन करना चाहता हूँ ॥ १४
अथवा मे प्रयच्छस्व युद्धं देवगणेश्वर ।
सामान्यं हि जगत्कृत्स्नं काश्यपानां महात्मनाम् ॥ १५॥
'देवगणेश्वर ! ( या तो मेरे लिये देवलोक खाली कर दो ) अथवा मुझे युद्ध प्रदान करो; क्योंकि सम्पूर्ण जगत्पर सभी महामनस्वी कश्यपपुत्रोंका समान अधिकार है' ॥ १५ ॥
स बृहस्पतिना सार्द्धं मन्त्रयित्वा महेश्वरः ।
वज्रनाभं सुरश्रेष्ठः प्रोवाच कुरुवंशज ॥ १६ ॥
कुरुनन्दन ! तब सुरश्रेष्ठ महेश्वर इन्द्रने वृहस्पतिजीके साथ सलाह करके वज्रनाभसे कहा—॥ १६ ॥
सत्रेपु दीक्षितः सौम्य कश्यपो नः पिता मुनिः ।
तस्मिन् वृत्ते यथा न्यायं तथा स हि करिष्यति ॥ १७ ॥
'सौम्य ! हम सबके पिता कश्यप मुनि यज्ञकी दीक्षा ले चुके हैं । उनका वह यज्ञ पूर्ण हो जानेपर वे जैसा उचित समझेंगे, वैसा हमलोगोंके लिये निर्णय कर देंगे' ॥ १७ ॥
ततः स पितरं गत्वा कश्यपं दानवोऽब्रवीत् ।
यथोक्तं देवराजेन तमुवाचाथ कश्यपः ॥ १८ ॥
तब उस दानवने अपने पिता कश्यपके पास जाकर देवराज इन्द्रने जो कुछ कहा था, सब कह सुनाया । उसकी बात सुनकर कश्यपजीने कहा—॥ १८ ॥
सत्रे वृत्ते करिष्यामि यथा न्याय्यं भविष्यति ।
त्वं तु वज्रपुरे पुत्र वस गच्छ समाहितः ॥ १९ ॥
'वत्स ! यज्ञ समाप्त हो जानेपर जैसा उचित होगा, वैसा करूँगा । तबतक तुम वज्रपुरमें चलकर सावधान होकर रहो' ॥ १९ ॥
एवमुक्ते वज्रनाभः स्वमेव नगरं गतः ।
महेन्द्रोऽपि ययौ देवो द्वारकां द्वारशालिनीम् ॥ २०॥
पिताके ऐसा कहनेपर वज्रनाभ अपने ही नगरको चला गया । उधर महेन्द्रदेव भी सुन्दर द्वारसे सुशोभित होनेवाली द्वारकापुरीको गये ॥ २० ॥
गत्वा चान्तर्हितो देवो वासुदेवमथाब्रवीत् ।
वज्रनाभस्य वृत्तान्तं तमुवाच जनार्दनः ॥ २१ ॥
वहाँ जाकर अदृश्य होकर ही इन्द्रदेवने भगवान् श्रीकृष्णसे वज्रनाभका सारा वृत्तान्त कह सुनाया । तब श्रीकृष्ण उनसे बोले—॥ २१ ॥
शौरेरुपस्थितो देव वाजिमेधो महाक्रतुः ।
तस्मिन् वृत्ते वज्रनाभं पातयिष्यामि वासव ॥ २२ ॥
'देव ! वासव ! मेरे पिताजीका अश्वमेध नामक महान् यज्ञ उपस्थित है । उसके पूर्ण हो जानेपर मैं वज्रनाभको अवश्य मार गिराऊँगा ॥ २२ ॥
तत्रोपायं प्रवेशे तु चिन्तयावः सतां गते ।
नानिच्छया प्रवेशोऽस्ति तत्र वायोरपि प्रभो ॥ २३ ॥
सत्पुरुषोंके आश्रयदाता प्रभो ! उसके नगरमें प्रवेश करनेका क्या उपाय है—यह हम दोनों सोचें; क्योंकि वज्रनाभकी इच्छाके बिना वहाँ वायुका भी प्रवेश नहीं हो सकता' ॥ २३ ॥
ततो गतो देवराजो वासुदेवेन सत्कृतः ।
वाजिमेधे च सम्प्राप्ते वसुदेवस्य भारत ॥ २४ ॥
तत्पश्चात् श्रीकृष्णके द्वारा सत्कार पाकर देवराज इन्द्र चले गये । भारत ! जब वसुदेवजीका अश्वमेध यज्ञ प्राप्त हुआ ( तब उसमें देवराज इन्द्र भी पधारे । ) ॥ २४ ॥
तस्मिन् यज्ञे वर्तमाने प्रवेशार्थं सुरोत्तमौ ।
चिन्तयामासतुर्वीरौ देवराजाच्युतावुभौ ॥ २५ ॥
जब वह यज्ञ चालू हुआ, उस समय सुरश्रेष्ठ वीर-देवराज-इन्द्र और श्रीकृष्ण दोनों वज्रपुरमें प्रवेश करनेके लिये कोई उपाय सोचने लगे ॥ २५ ॥
तत्र यज्ञे वर्तमाने सुनाट्येन नटस्तदा ।
महर्षींस्तोषयामास भद्रनामेति नामतः ॥ २६ ॥
उस यज्ञमे भद्रनामा नामक एक नटने अपने उत्तम नाट्यके द्वारा महर्षियोंको संतुष्ट किया ॥ २६ ॥
तं वरेण मुनिश्रेष्ठाश्छन्दयामासुरात्मवत् ।
स वव्रे तु नटो भद्रो वरं देवेश्वरोपमः ॥ २७ ॥
देवेन्द्रकृष्णच्छन्देन सरस्वत्या प्रचोदितः ।
प्रणिपत्य मुनिश्रेष्ठानश्वमेधे समागतान् ॥ २८ ॥
तब उन श्रेष्ठ मुनियोंने उसे अपने योग्य वर माँगनेके लिये कहा । तब देवेन्द्र तथा श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार सरस्वतीसे प्रेरित हो अश्वमेध यज्ञमें पधारे हुए मुनिवरोंको प्रणाम करके देवेन्द्रतुल्य भद्रनामक नटने इस प्रकार वर माँगा ॥ २७-२८ ॥
नट उवाच
भोज्यो द्विजानां सर्वेषां भवेयं मुनिसत्तमाः ।
सप्तद्वीपां च पृथिवीं विचरेयमिमामहम् ॥ २९ ॥
| ५८४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
प्रसिद्धाकाशगमनः शक्नुवंश्च विशेषतः।
अवध्यः सर्वभूतानां स्थावरा ये च जङ्गमाः ॥ ३० ॥
नट बोला—मुनिवरो ! मैं समस्त द्विजोंके लिये भोजनीय होऊँ अर्थात् सब द्विज मुझे सादर भोजन करावें। अथवा समस्त ब्राह्मण मेरा अन्न भोजन करें। सातों द्वीपोंसे युक्त इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर मैं विचरण कर सकूँ। आकाशमें चलने-फिरनेकी उत्कृष्ट शक्ति मुझे प्राप्त हो। मैं विशेष शक्तिशाली रहकर स्थावर-जङ्गम सभी प्राणियोंके लिये अवध्य होऊँ ॥ २९-३० ॥
यस्य यस्य च वेषेण प्रविशेयमहं खलु।
मृतस्य जीवतो वापि भाव्येनोत्पादितस्य वा ॥ ३१ ॥
सतूर्यस्तादृशः स्यां वै जरारोगविवर्जितः।
तुष्येयुर्मुनयो नित्यमन्ये च मम सर्वदा ॥ ३२ ॥
जो मर गया है, जीवित है, अथवा जो भविष्यरूपसे मेरे द्वारा तत्काल उत्पन्न किया गया है, ऐसे लोगोंमेंसे जिस-जिसके वेषसे मैं कहीं प्रवेश करना चाहूँ, मैं वाद्योंसहित ठीक वैसा ही हो जाऊँ ! जरा और रोग मुझे छू न सकें। मुझपर ऋषि-मुनि तथा अन्य लोग भी नित्य-निरन्तर संतुष्ट रहें ॥ ३१-३२ ॥
एवमस्त्विति सम्प्रोक्तो ब्राह्मणैर्नृपते नटः।
सप्तद्वीपां वसुमतीं पर्यटत्यमरोपमः ॥ ३३ ॥
नरेश्वर ! तब ब्राह्मणोंने 'एवमस्तु' कहकर उस नटको अभीष्ट वरदान दे दिया। तबसे वह देवोपम शक्तिशाली नट सातों द्वीपोंवाली पृथ्वीपर विचरण करता रहता है ॥ ३३ ॥
पुराणि दानवेन्द्राणामुत्तरांश्च कुरूंस्तथा।
भद्राश्वांश्च केतुमालांश्च कालाग्नद्वीपमेव च ॥ ३४ ॥
वह दानवेन्द्रोंके नगरोंमें तथा उत्तर-कुरु, भद्राश्व, केतुमाल तथा कालाग्न द्वीपमें घूमा करता था ॥ ३४ ॥
पर्वणीषु तु सर्वासु द्वारकां यदुमण्डिताम्।
आयाति वरदत्तः स लोकवीरो महानटः ॥ ३५ ॥
वह वर पाया हुआ लोकवीर महानट सभी पर्वोपर यादवोंसे अलंकृत द्वारकापुरीमें आया करता था ॥ ३५ ॥
ततो हंसान् धार्तराष्ट्रान् देवलोकनिवासिनः।
उवाच भगवान्छक्रः सान्त्वयित्वा सुरेश्वरः ॥ ३६ ॥
तदनन्तर देवलोकमें निवास करनेवाले हंसोंको, जो धृतराष्ट्री एवं कश्यपके वंशज थे, देवराज इन्द्रने बुलवाया और उन्हें सान्त्वना देकर कहा—॥ ३६ ॥
भवन्तो भ्रातरोऽस्माकं काश्यपा देवपक्षिणः।
विमानवाहा देवानां सुकृतीनां तथैव च ॥ ३७ ॥
'हंसो ! तुम लोकपिता कश्यपजीकी संतति होनेके कारण हमारे भाई हो, देवपक्षी हो तथा देवताओं और पुण्यात्माओं-के विमानवाहक हो ॥ ३७ ॥
देवानानास्ति कर्तव्यं कार्यं शत्रुवधान्वितम्।
तत् कर्तव्यं न मन्त्रश्च भेत्तव्यो वः कथंचन ॥ ३८ ॥
'इस समय देवताओंके सामने शत्रुवध-सम्बन्धी कार्य उपस्थित है, जो हम सबके लिये आवश्यक कर्तव्य है। उस कार्यको तुम्हें पूरा करना है और इस गुप्त मन्त्रको किसी तरह फूटने नहीं देना है ॥ ३८ ॥
न कुर्वतां देवताज्ञामुग्रो दण्डः पतेदपि।
सर्वत्राप्रतिषिद्धं वो गमनं हंससत्तमाः ॥ ३९ ॥
'देवताओंकी इस आज्ञाका पालन न करनेपर तुम्हारे ऊपर भयानक दण्ड भी पड़ सकता है। श्रेष्ठ हंसो ! तुम्हारी सर्वत्र अप्रतिहत गति है ॥ ३९ ॥
गत्वाप्रवेश्यमन्येषां वज्रनाभपुरोत्तमम्।
इतोऽन्तःपुरवापीषु चरध्वमुचितं हि वः ॥ ४० ॥
'वज्रनाभके श्रेष्ठ नगरमें प्रवेश करना दूसरोंके लिये असम्भव है। तुम वहाँ जाकर अन्तःपुरकी बावड़ियोंमें विचरो, क्योंकि यह कार्य तुम्हारे ही योग्य है ॥ ४० ॥
तस्यास्ति कन्यारत्नं हि त्रैलोक्यातिशयं शुभम्।
नाम्ना प्रभावती नाम चन्द्राभेव प्रभावती ॥ ४१ ॥
'वज्रनाभके एक रत्नस्वरूपा कन्या है, जो त्रिलोकीमें अतिशय सुन्दरी है। उसका नाम प्रभावती है। वह ऐसी प्रतीत होती है मानो चन्द्रमाकी आभा ही उसकी प्रभा बनकर प्रकाशित हो रही हो ॥ ४१ ॥
वरदानेन सा लब्धा मात्रा किल वरानना।
हैमवत्या महादेव्याः सकाशादिति नः श्रुतम् ॥ ४२ ॥
'उसकी माताने गिरिराज हिमवान्की पुत्री महादेवी उमासे मिले हुए वरदानके प्रभावसे उस सुन्दर मुखवाली कन्याको प्राप्त किया है, ऐसा हमारे सुननेमें आया है ॥४२॥
स्वयंवरा च सा कन्या वन्धुभिः स्थापिता सती।
आत्मेच्छया पतिं हंसा वरयिष्यति शोभना ॥ ४३ ॥
'हंसो ! अपने बन्धुओंद्वारा सुरक्षित हुई वह सुन्दरी कन्या प्रभावती स्वयंवरा है। स्वयंवरमें अपनी इच्छाके अनुसार पतिका वरण करेगी ॥ ४३ ॥
तद्भवद्भिर्गुणा वाच्याः प्रद्युम्नस्य महात्मनः।
सद्भूताः कुलरूपस्य शीलस्य वयसस्तथा ॥ ४४ ॥
'अतः तुमलोग प्रभावतीके सम्मुख महात्मा प्रद्युम्नके उत्तम कुल, सुन्दर रूप, अच्छे शील-स्वभाव तथा नयी अवस्थाके श्रेष्ठ गुणोंका बखान करो ॥ ४४ ॥
यदा सा रक्तभावा च वज्रनाभसुता सती।
तस्याः सकाशात् संदेशो नयितव्यः समाधिना ॥४५॥
प्रद्युम्नस्य पुनस्तस्मादानयध्वं तथैव च।
स्वबुद्ध्या प्राप्तकालं च संविधेयं हितं मम ॥ ४६ ॥
विष्णुपर्व ] द्विनवतितमोऽध्यायः [ ५८५
'वज्रनाभकी वह सती साध्वी पुत्री जब प्रद्युम्नके प्रति हृदयसे अनुरक्त हो जाय, तब एकाग्रचित्त होकर उसका संदेश तुम्हे प्रद्युम्नके पास पहुँचाना चाहिये; फिर वहाँसे तुम लोग उस संदेशका उत्तर लाया करो। साथ ही, अपनी बुद्धिसे भी सोच-विचारकर अवसरके अनुरूप कार्य करके मेरा हित-साधन करो ॥ ४५-४६ ॥
नेत्रवक्त्रप्रसादश्च कर्तव्यस्तत्र सर्वथा ॥ ४७ ॥
तथा तथा गुणा वाच्याः प्रद्युम्नस्य महात्मनः ।
यथा यथा प्रभावत्या मनस्तत्र भवेत् स्थितम् ॥ ४८ ॥
'तुम्हे वहाँ अपने नेत्रों और मुखके द्वारा सब प्रकारसे प्रसन्नता प्रकट करनी चाहिये। महात्मा प्रद्युम्नके गुणोंको उसी-उसी प्रकारसे बताना चाहिये, जिससे प्रभावतीका मन उनमें पूर्णतः अनुरक्त हो जाय ॥ ४७-४८ ॥
वृत्तान्तश्चानुदिवसं प्रदेयो मम सर्वथा ।
द्वारवत्यां च कृष्णस्य भ्रातुर्मम यवीयसः ॥ ४९ ॥
'इन सब बातोंका समाचार तुम्हें प्रतिदिन मुझे और द्वारकामे मेरे छोटे भाई श्रीकृष्णको भी बताना चाहिये ॥४९॥
तावद्यत्नश्च कर्तव्यः प्रद्युम्नो यावदात्मवित् ।
पर्यावर्तयेद् वरारोहां वज्रनाभसुतां विभुः ॥ ५० ॥
'जबतक आत्मज्ञानी वैभवशाली प्रद्युम्न वज्रनाभकी सुन्दरी पुत्री प्रभावतीको अपनी न बना लें तबतक तुम्हारा प्रयत्न चालू रहना चाहिये ॥ ५० ॥
अवध्यास्ते तु देवानां ब्रह्मणो वरदर्पिताः ।
देवपुत्रैर्हि हन्तव्याः प्रद्युम्नप्रमुखैर्युधि ॥ ५१ ॥
'ब्रह्माजीके वरदानसे घमंडमें भरे रहनेवाले वज्रनाभ आदि सारे दैत्य देवताओंके लिये अवध्य हैं। वे युद्धमें प्रद्युम्न आदि देवकुमारोंद्वारा ही मारे जा सकते हैं ॥ ५१ ॥
नटो दत्तवरस्तस्य वेषमास्थाय यादवाः ।
प्रद्युम्नाद्या गमिष्यन्ति वज्रनाभविनाशनाः ॥ ५२ ॥
'मुनियोंका वर प्राप्त करनेवाला जो भद्रनामा नट है, उसीका वेष धारण करके प्रद्युम्न आदि यादव वज्रनाभका विनाश करनेके लिये उसके नगरमें जायेंगे ॥ ५२ ॥
एतच्च सर्वं कर्तव्यमन्यच्च सर्वमेव हि ।
प्राप्तकालं विधातव्यमस्माकं प्रियकाम्यया ॥ ५३ ॥
'ये तथा और भी जो समयोचित कर्तव्य प्राप्त हों, उन सबको हमारा प्रिय करनेकी इच्छासे तुमलोगोंको पूर्ण करना चाहिये ॥ ५३ ॥
प्रवेशस्तत्र देवानां नास्ति हंसाः कथंचन ।
वज्रनाभेप्सिते तत्र प्रदेशे खलु सर्वथा ॥ ५४ ॥
'हंसो ! वहाँ वज्रनाभके अभीष्ट प्रदेशमें देवताओंका किसी तरह भी प्रवेश नहीं हो सकता। यह सर्वथा निश्चित है' ॥ ५४ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वज्रनाभवधे एकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९१ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वज्रनाभवधके प्रसंगमें इक्यानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९१ ॥
द्विनवतितमोऽध्यायः
हंसोंका वज्रपुरमें निवास, हंसीका प्रभावतीको प्रद्युम्नके प्रति अनुरक्त कराना, प्रभावतीका हंसीसे प्रद्युम्नकी प्राप्ति करानेका अनुरोध, हंसी और वज्रनाभका संवाद, हंसोंके मुँहसे सब समाचार सुनकर श्रीकृष्णका नटवेषमें प्रद्युम्न आदि यादवोंको वज्रपुरमें भेजना
वैशम्पायन उवाच
ते वासववचः श्रुत्वा हंसा वज्रपुरं ययुः ।
पूर्वोचितं हि गमनं तेषां तत्र जनाधिप ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजा जनमेजय ! इन्द्रकी यह बात सुनकर वे हंस वज्रपुरमें गये। वहाँका मार्ग उनके लिये पूर्व-परिचित था ॥ १ ॥
ते दीर्घिकासु रम्यासु निपेतुर्वीर पक्षिणः ।
पद्मोत्पलैरावृतासु काञ्चनैः स्पर्शनक्षमैः ॥ २ ॥
वीर ! वे पक्षी वहाँके रमणीय सरोवरोंमें, जो स्पर्शके योग्य सुवर्णमय कमलोंसे आवृत थे, जाकर बैठे ॥ २ ॥
ते वै नदन्तो मधुरं संस्कृतापूर्वभाषिणः ।
पूर्वमप्यागतास्ते तु विस्मयं जनयन्ति हि ॥ ३ ॥
वे हंस अपूर्व संस्कृत भाषा बोलते और मधुर कलरव करते थे। यद्यपि वे उस नगरमें पहले भी आ चुके थे, तथापि नये आये हुएके समान वहाँके निवासियोंको आश्चर्यमें डाल रहे थे ॥ ३ ॥
अन्तःपुरोपभोग्यासु चेरुर्वापीषु ते नृप ।
दृष्टास्ते वज्रनाभस्य त्रिविष्टपनिवासिनः ॥ ४ ॥
नरेश्वर ! वे अन्तःपुरके उपभोगमें आनेवाली बावडियोंमें चरने लगे। उन स्वर्गवासी हंसोंपर वज्रनाभकी भी दृष्टि पड़ी ॥ ४ ॥
आलपन्तः सुमधुरं धार्तराष्ट्रा जनेश्वर ।
स तानुवाच दैतेयो धार्तराष्ट्रानिदं वचः ॥ ५ ॥
जनेश्वर ! वे हंस अत्यन्त मधुर बोली बोल रहे थे। उन्हें देखकर उस दैत्यने उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥
| ५८६ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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त्रिविष्टपे नित्यरता भवन्तश्चारुभाषिणः।
यदैवेहोत्सवोऽस्माकं भवद्भिरवगम्यते ॥ ६ ॥
आगन्तव्यं जालपादाः खमिदं भवतां गृहम्।
विस्रब्धं च प्रवेष्टव्यं त्रिविष्टपनिवासिभिः ॥ ७ ॥
'हंसो ! तुमलोग सदा स्वर्गलोकमें रमते और मनोहर बोली बोलते हो। जब कभी यहाँ हमलोगोंके घर उत्सव हो और तुम्हें इसका पता लग जाय, तब तुम अवश्य यहाँ पधारना। यह तुम्हारा अपना ही घर है। स्वर्गनिवासी हंसोंको यहाँ निर्भय होकर प्रवेश करना चाहिये' ॥ ६-७ ॥
ते तथोक्ताः शकुनयो वज्रनाभेन भारत।
तथेत्युक्त्वा हि विविशुर्दानवेन्द्रनिवेशनम् ॥ ८ ॥
भारत ! वज्रनाभके ऐसा कहनेपर उन पक्षियोंने 'तथास्तु' कहकर उसकी बात मान ली और उस दानवराजके महलमें प्रवेश किया ॥ ८ ॥
चक्रुः परिचयं ते च देवकार्यव्यपेक्षया।
मानुषालापिनस्ते तु कथाश्चक्रुः पृथग्विधाः ॥ ९ ॥
उन्होंने देवताओंके कार्यको सिद्ध करनेकी इच्छासे वहाँ सबसे परिचय प्राप्त किया। वे मनुष्योंकी-सी बोली बोलते और भाँति-भाँतिकी कथाएँ कहते थे ॥ ९ ॥
वंशवृद्धाः काश्यपानां सर्वकल्याणभागिनाम्।
स्त्रियो रेमुर्विशेषेण शृण्वन्त्यः सङ्गताः कथाः ॥ १० ॥
समस्त कल्याणमय पदार्थोंका उपभोग करनेवाले कश्यपवंशी दानवोंकी स्त्रियाँ अपने वंशसे सम्बन्ध रखनेवाली सुसङ्गत कथाएँ सुनती हुई उनमें विशेषरूपसे रम जाती थीं ॥
विचरन्तस्ततो हंसा ददृशुश्चारुहासिनीम्।
प्रभावतीं वरारोहां वज्रनाभसुतां तदा ॥ ११ ॥
तदनन्तर वहाँ विचरते हुए हंसोंने उस समय वज्रनाभकी पुत्री मनोहर मुसकानवाली सुन्दरी प्रभावतीको देखा ॥ ११ ॥
हंसाः परिचितां चक्रुस्तां ततश्चारुहासिनीम्।
सखीं शुचिमुखीं चक्रे हंसीं राजसुता तदा ॥ १२ ॥
फिर उन सभी हंसोंने उस चारुहासिनी राजकुमारीसे परिचय कर लिया। राजकुमारी प्रभावतीने उस समय शुचिमुखी नामवाली हंसीको अपनी सखी बना लिया ॥ १२ ॥
सा तां कदाचित् पप्रच्छ वज्रनाभसुतां सखीम्।
विश्रम्मितां पृथक्सूक्तैराख्यानकशतैर्वराम् ॥ १३ ॥
एक दिनकी बात है, शुचिमुखीने सैकड़ों कथाएँ तथा भाँति-भाँतिकी सुन्दर उक्तियाँ सुनाकर अपनी श्रेष्ठ सखी वज्रनाभकुमारी प्रभावतीके मनमें पूर्ण विश्वास पैदा कर लिया। तत्पश्चात् उससे पूछा—॥ १३ ॥
त्रैलोक्यसुन्दरीं वेद्मि त्वामहं हि प्रभावति।
रूपशीलगुणैर्देवि किञ्चित् त्वां वक्तुमुत्सहे ॥ १४ ॥
'प्रभावती ! मैं तुम्हें त्रिभुवनकी अद्वितीय सुन्दरी मानती हूँ। देवि ! तुम रूप, शील और गुणोंमें श्रेष्ठ हो, इसलिये मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ ॥ १४ ॥
व्यतिक्रामति ते भीरु यौवनं चारुहासिनि।
यदतीतं पुनर्नैति गतं स्रोत इवाम्भसः ॥ १५ ॥
'भीरु ! चारुहासिनि ! तुम्हारी जवानी व्यर्थ बीती जा रही है। जैसे जलका बहता हुआ स्रोत फिर पीछे नहीं लौटता, उसी प्रकार जो अवस्था बीत गयी, वह फिर वापिस नहीं आती है ॥ १५ ॥
कामोपभोगतुल्या हि रतिर्देवि न विद्यते।
स्त्रीणां जगति कल्याणि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ १६ ॥
'देवि ! कल्याणि ! संसारमें स्त्रियोंके लिये कामोपभोगके समान दूसरा कोई सुख नहीं है; यह मैं तुमसे सत्य कहती हूँ॥
स्वयंवरे च न्यस्ता त्वं पित्रा सर्वाङ्गशोभने।
न च कांचिद् वरयसे देवासुरकुलोद्भवन् ॥ १७ ॥
'सर्वाङ्गशोभने ! तुम्हारे पिताने तुम्हें स्वयंवरमें उपस्थित किया, परंतु तुम देवताओं तथा असुरोंके कुलमें उत्पन्न हुए किन्हीं योग्य पुरुषका वरण ही नहीं करती हो (इसका क्या कारण है?) ॥ १७ ॥
व्रीडिता यान्ति सुश्रोणि प्रत्याख्यातास्त्वया शुभे।
रूपशौर्यगुणैर्युक्तान् सदृशांस्त्वं कुलस्य हि ॥ १८ ॥
आगतान् नेच्छसे देवि सदृशान् कुलरूपयोः।
'शुभे ! सुश्रोणि ! तुम्हारे इनकार कर देनेपर ब्याहके लिये आये हुए पुरुष लज्जित होकर लौट जाते हैं। देवि ! जो रूप और शौर्य आदि गुणोंसे युक्त हैं तथा तुम्हारे कुलके सर्वथा अनुरूप हैं, ऐसे कुल और रूपमें अपने ही समान पुरुषोंके आनेपर भी तुम उन्हे वरण करना नहीं चाहती (ऐसा क्यों करती हो?) ॥ १८१/२ ॥
इहैष्यति किमर्थं त्वां प्रद्युम्नो रुक्मिणीसुतः ॥ १९ ॥
त्रैलोक्ये यस्य रूपेण सदृशो न कुलेन वा।
गुणैर्वा चारुसर्वाङ्गि शौर्येणाप्यति वा शुभे ॥ २० ॥
'भला रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न यहाँ किसलिये आयेंगे? जिनके रूप और कुलकी समानता करनेवाला त्रिलोकीमें दूसरा कोई नहीं है। शुभे ! सर्वाङ्गसुन्दरी ! वे गुणों अथवा शौर्यमें भी सबसे बढ़कर हैं ॥ १९-२० ॥
देवेषु देवः सुश्रोणि दानवेषु च दानवः।
मानुषेष्वपि धर्मात्मा मनुष्यः स महाबलः ॥ २१ ॥
'सुश्रोणि ! वे महाबली प्रद्युम्न देवताओंमें देवता, दानवोंमे दानव और मनुष्योंमें भी धर्मात्मा मनुष्य है ॥ २१ ॥
यं सदा देवि दृष्ट्वा हि स्रवन्ति जघनानि हि।
आपीनानीव धेनूनां स्रोतांसि सरितामिव ॥ २२ ॥
विष्णुपर्व ] द्विनवतितमोऽध्यायः ५८७
'देवि ! जैसे दूध देनेवाली गौओंके थन और सरिताओंके स्रोत टपकते हैं, उसी तरह उन प्रद्युम्नको देखकर सदा ही स्त्रियोंके जघनप्रदेश आर्द्र हो जाते हैं ॥ २२ ॥
न पूर्णचन्द्रेण मुखं नयने वा कुशेशयैः ।
उत्सहे नोपमातुं हि मृगेन्द्रेणाथ वा गतिम् ॥ २३ ॥
'उनके मुखकी पूर्ण चन्द्रसे, नयनोंकी नीलकमलसे अथवा गति ( चाल ) की सिंहसे मै उपमा नहीं दे सकती (क्योंकि ये सब हीन प्रतीत होते हैं) ॥ २३ ॥
जगतः सारमुद्धृत्य पुत्रः स विहितः शुभे ।
कृत्वाङ्गं वरे साङ्गं विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ २४ ॥
'शुभे ! सुन्दरी ! प्रभावशाली भगवान् विष्णुने सारे जगत्का सार निकालकर अनङ्गको साङ्ग करके अपने उस पुत्रका निर्माण किया है ॥ २४ ॥
हृतेन शम्बरो बाल्ये येन पापो निवार्वितः ।
मायाश्च सर्वाः सम्प्राप्ता न च शीलं विनाशितम् ॥ २५ ॥
'बाल्यावस्थामें उन्हें शम्बरासुरने हर लिया था; परंतु उन्होंने बड़े होनेपर उस पापीको मार डाला ! उसकी सारी मायाएँ प्राप्त कर लीं; फिर भी किसीके शीलका विनाश नहीं किया ॥ २५ ॥
यान् यान् गुणान् पृथुश्रोणि मनसा कल्पयिष्यसि ।
एष्टव्यांस्त्रिषु लोकेषु प्रद्युम्ने सर्व एव ते ॥ २६ ॥
'पृथुश्रोणि ! तुम मनसे जिन-जिन उत्तम गुणोंकी कल्पना करोगी अथवा तीनों लोकोंमें जो-जो श्रेष्ठ गुण वाञ्छनीय हैं, वे सब-के-सब प्रद्युम्नमें वर्तमान हैं ॥ २६ ॥
रुच्या वह्निप्रतीकाशः क्षमया पृथिवीसमः ।
तेजसा सूर्यसदृशो गाम्भीर्येण हृदोपमः ।
प्रभावती शुचिमुखीं त्वितीहोवाच भामिनी ॥ २७ ॥
'वे कान्तिमें अग्निके समान, क्षमामे पृथ्वीके तुल्य, तेजमें सूर्यके सदृश तथा गम्भीरतामें सागरके समान हैं' यह सुनकर भामिनी प्रभावतीने शुचिमुखीसे इस प्रकार कहा ॥
प्रभावत्युवाच
विष्णुर्मानुषलोकस्थः श्रुतः सुबहुशो मया ।
पितुः कथयतः सौम्ये नारदस्य च धीमतः ॥ २८ ॥
प्रभावती बोली- सौम्ये ! मैंने बुद्धिमान् नारदजी तथा अपने पिताके मुखसे कई बार सुना है कि भगवान् विष्णु इस समय मनुष्यलोकमे अवतीर्ण होकर विराज रहे हैं ॥
शत्रुः किल स दैत्यानां वर्जनीयः सदानघे ।
कुलानि किल दैत्यानां तेन दग्धानि मानिनि ॥ २९ ॥
प्रदीप्तेन रथाङ्गेन शार्ङ्गेण गदया तथा।
शाखानगरदेशेषु वसन्ति किल येऽसुराः ॥ ३० ॥
इत्येते दानवेन्द्रेण संदिश्यन्ते हि तं प्रति ।
पापरहित मानिनि ! शाखानगरके प्रदेशोंमें जो असुर निवास करते हैं, उन्हें मेरे पिता दानवराज वज्रनाभ भगवान् विष्णुके विषयमें इस प्रकार संदेश दिया करते हैं-'विष्णु दैत्योंके शत्रुकी रूपमें प्रसिद्ध हैं, अतः उन्हें सदाके लिये त्याग देना चाहिये। उन्होंने अपने तेजस्वी चक्र, शार्ङ्ग-धनुष तथा कौमोदकी गदाके द्वारा दैत्योंके बहुत-से कुल दग्ध कर डाले हैं' ॥ २९-३० १/२ ॥
मनोरथो हि सर्वासां स्त्रीणामेव शुचिस्मिते ॥ ३१ ॥
भवेद्धि मे प्रतिकुलं श्रेष्ठं पितृकुलादिति ।
पवित्र मुसकानवाली हंसी ! प्रायः सभी स्त्रियोंका ऐसा ही मनोरथ होता है कि मेरा पतिकुल पितृकुलसे श्रेष्ठ हो ॥
यदि नामाभ्युपायः स्यात् तस्येहागमनं प्रति ॥ ३२ ॥
महाननुग्रहो मे स्यात् कुलं स्यात् पावनं च मे ।
यदि प्रद्युम्नके यहाँ आनेके लिये कोई उपाय हो सके तो यह मुझपर तुम्हारा महान् अनुग्रह होगा और मेरा कुल पवित्र हो जायगा ॥ ३२ १/२ ॥
समर्थनां मे पृष्टा त्वं प्रयच्छ शुचिलापिनि ॥ ३३ ॥
प्रद्युम्नः स्याद् यथा भर्ता स मे वृष्णिकुलोद्भवः ।
पवित्र वार्ता करनेवाली हंसी ! मैंने तुमसे कार्यसिद्धिका उपाय पूछा है। वह उपाय तुम मुझे प्रदान करो। वृष्णिवंशा-वतंस प्रद्युम्न जिस प्रकार मेरे पति हो सकें, वैसा यत्न करो ॥
अत्यन्तवैरी दैत्यानामुद्वेजनकरो हरिः ॥ ३४ ॥
असुराणां स्त्रियो वृद्धाः कथयन्त्यो मया श्रुताः ।
मैंने असुरोंकी बड़ी-बूढ़ी स्त्रियोंके मुखसे यह बात सुनी है कि भगवान् विष्णु दैत्योंके अत्यन्त वैरी और उन्हे उद्वेगमे डालनेवाले हैं ॥ ३४ १/२ ॥
प्रद्युम्नस्य तथा जन्म पुरस्तादपि मे श्रुतम् ॥ ३५ ॥
यथा च तेन निहतो बलवान् कालशम्बरः ।
प्रद्युम्नके जन्मका वृत्तान्त मैंने पहले भी सुना है। जिस प्रकार उनके द्वारा बलवान् कालशम्बर मारा गया था, वह प्रसङ्ग भी मेरे सुननेमें आया है ॥ ३५ १/२ ॥
हृदि मे वर्तते नित्यं प्रद्युम्नः खलु सत्समे ॥ ३६ ॥
हेतुः स नास्ति स्यात् तेन यथा मम समागमः ।
साध्वीशिरोमणे ! प्रद्युम्न सदा मेरे हृदयमें विद्यमान रहते हैं; परंतु ऐसी कोई युक्ति या साधन नहीं है, जिससे उनके साथ मेरा समागम हो सके ॥ ३६ १/२ ॥
दासी त्वाहं सख्याहें दूत्ये त्वां च विसर्जये ॥ ३७ ॥
पण्डितासि वद्योपायं मम तस्य च संगमे ।
आदरणीया सखी ! मैं तुम्हारी दासी हूँ और तुम्हें दूतीके कामपर नियुक्त करती हूँ। तुम विदुषी हो। मेरे और प्रद्युम्नके मिलनका कोई उपाय बताओ ॥ ३७ १/२ ॥
| ५८८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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ततस्तां सान्त्वयित्वा सा प्रहसन्तीदमब्रवीत् ॥ ३८ ॥
तब हंसीने उसे सान्त्वना देकर हँसते हुए कहा ॥ ३८ ॥
शुचिमुख्युवाच
तत्र दूती गमिष्यामि तवाहं चारुहासिनि ।
इमां भक्तिं तवोदारां प्रवक्ष्यामि शुचिस्मिते ॥ ३९ ॥
शुचिमुखी बोली—चारुहासिनि ! शुचिस्मिते ! मैं वहाँ तुम्हारी दूती बनकर जाऊँगी और प्रद्युम्नसे तुम्हारी इस उदार भक्तिका वर्णन करूँगी ॥ ३९ ॥
तथा चैव करिष्यामि यथैष्यति तवान्तिकम् ।
साक्षात्कामेन सुश्रोणि भविष्यसि सकामिनी ॥ ४० ॥
सुश्रोणि ! मैं ऐसा प्रयत्न भी करूँगी, जिससे वे तुम्हारे निकट पधारेंगे और तुम साक्षात् कामसे मिलकर अपनी कामना सफल करोगी ॥ ४० ॥
इति मे भाषितं नित्यं स्मरेथाः शुचिलोचने ।
कथाकुशलतां पित्रे कथयस्यायतेक्षणे ॥ ४१ ॥
मम त्वं तत्र मे देवि हितं सम्यक् प्रपत्स्यसे ।
पवित्र नेत्रोंवाली राजकुमारी ! विशाललोचने ! मेरी इस बातको तुम सदा याद रखना । अपने पिताके सामने बराबर मेरे कथा-कौशलकी चर्चा करती हुई यह कहना कि शुचिमुखी कथा कहनेमें बहुत ही कुशल है । देवि ! वहाँ पिताके निकट तुम सदा मेरे हित-साधनका ध्यान रखना ॥
इत्युक्ता सा तथा चक्रे यत्तत् सा तामथाब्रवीत् ॥ ४२ ॥
दानवेन्द्रश्च तां हंसीं पप्रच्छान्तःपुरे तदा ।
प्रभावत्या समाख्याता कथाकुशलता तव ॥ ४३ ॥
तत्त्वं शुचिमुखि ब्रूहि कथां योग्यतया वरे ।
किं त्वया दृष्टमाश्चर्यं जगत्युत्तमपक्षिणि ॥ ४४ ॥
अदृष्टपूर्वमन्यैर्वा योग्यायोग्यमनिन्दिते ।
शुचिमुखीके ऐसा कहनेपर प्रभावतीने वैसा ही किया, जैसा कि उस (हंसी) ने उससे कहा था । उस समय दानवराज वज्रनाभने अन्तःपुरमें उस हंसीसे पूछा—'शुचिमुखि ! प्रभावतीने बताया है कि तुम कथा कहनेमें बड़ी चतुर हो । अतः उत्तम पक्षिणि ! तुम कोई कथा कहो; क्योंकि योग्यतामें बड़ी हो । बताओ, संसारमें तुमने कौन-सी आश्चर्यकी बात देखी है ? अनिन्दिते ! जिसे दूसरोंने पहले कभी नहीं देखा हो, ऐसी कोई योग्य या अयोग्य आश्चर्यकी बात तुमने देखी हो तो बताओ' ॥ ४२-४४ १/२ ॥
सोवाच वज्रनाभं तु हंसी नरवरोत्तम ॥ ४५ ॥
श्रूयतामित्यथामन्त्र्य दानवेन्द्रं महाद्युतिम् ।
नरेशशिरोमणे ! तब हंसीने महातेजस्वी दानवराज वज्रनाभको सम्बोधित करके कहा—सुनिये—॥ ४५ १/२ ॥
दृष्टा मे शाण्डिली नाम साध्वी दानवसत्तम ।
आश्चर्यं कर्म कुर्वन्ती मेरुपाश्र्वे मनस्विनी ॥ ४६ ॥
'दानवश्रेष्ठ ! मैंने मेरुगिरिके पार्श्वभागमें साध्वी मनस्विनी शाण्डिलीको देखा है; जो वहाँ आश्चर्यजनक कार्य करती हैं ॥ ४६ ॥
सुमनाश्चैव कौशल्या सर्वभूतहिते रता ।
कथंचिद् वरशाण्डिल्याः शैलपुत्र्याः शुभा सखी ॥ ४७ ॥
'समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाली कौशल्या सुमनाका भी किसी प्रकार दर्शन किया है, जो शैलपुत्री श्रेष्ठ शाण्डिलीकी शुभ सखी हैं ॥ ४७ ॥
नटश्चैव मया दृष्टो मुनिदत्तवरः शुभः ।
कामरूपी च भोज्यश्च त्रैलोक्ये नित्यसम्मतः ॥ ४८ ॥
'एक नटको भी मैंने देखा है, जिसे मुनियोंने अभीष्ट वर दे रक्खा है । वह शुभलक्षण नट इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला, भोजनीय तथा त्रिभुवनमें सबको सदा ही प्रिय है ॥ ४८ ॥
कुरून् यात्युत्तरान् वीर कालास्रद्वीपमेव च ।
भद्राश्वान् केतुमालांश्च द्वीपानन्यांस्तथानघ ॥ ४९ ॥
'वीर ! वह उत्तर कुरुमें जाता तथा कालास्रद्वीपकी भी यात्रा करता है । अनघ ! वह भद्राश्व, केतुमाल तथा अन्य द्वीपोंमें भी जाया करता है ॥ ४९ ॥
देवगन्धर्वगेयानि नृत्यानि विविधानि च ।
स वेत्ति देवान् नृत्येन विस्मापयति सर्वथा ॥ ५० ॥
'देवता और गन्धर्व ही जिन्हें गाते हैं, उन गीतोंको भी वह गाता है तथा भाँति-भाँतिके नृत्योंको भी जानता है । वह अपने नृत्योंसे देवताओंको भी सर्वथा आश्चर्यचकित कर देता है' ॥ ५० ॥
वज्रनाभ उवाच
श्रुतमेतन्मया हंसि न चिरादिव विस्तरम् ।
चारणानां कथयतां सिद्धानां च महात्मनाम् ॥ ५१ ॥
वज्रनाभ बोला—हंसी ! थोड़े ही दिन हुए मैंने भी महात्मा, सिद्धों और चारणोंके मुखसे यह नटविषयक समाचार विस्तारपूर्वक सुना है ॥ ५१ ॥
कुतूहलं ममाप्यस्ति सर्वथा पक्षिनन्दिनि ।
नटे दत्तवरे तस्मिन् संस्तवस्तु न विद्यते ॥ ५२ ॥
पक्षिनन्दिनि ! मुझे भी उस वरप्राप्त नटको देखनेके लिये सर्वथा उत्कण्ठा हो रही है; परंतु मालूम होता है, मेरी प्रसिद्धि उसके कानोंतक नहीं गयी है ( इसलिये वह अबतक यहाँ नहीं आ सका है) ॥ ५२ ॥
हंस्युवाच
सप्तद्वीपान् विचरति नटः स द्विजोत्तम ।
गुणवन्तं जनं श्रुत्वा गुणकार्यः स सर्वथा ॥ ५३ ॥
तव चेच्छृणुयाद् वीर सङ्गतं गुणविस्तरम् ।
नटं तदागतं विद्धि पुरं तव महासुर ॥ ५४ ॥
विष्णुपर्व ] त्रिनवतितमोऽध्यायः ५८९
हंसीने कहा—दैत्यप्रवर ! वह नट सातों द्वीपोंमें विचरता है और गुणवान् पुरुषका नाम सुनकर उसके पास जाता है। उसके कार्य सर्वथा गुणयुक्त होते हैं। वीर महासुर ! यदि वह तुम्हारे श्रेष्ठ एवं विस्तृत गुणोंको सुन ले तो उसे अपने नगरमें आया हुआ ही समझो ॥ ५३-५४ ॥
वज्रनाभ उवाच
उपायः सृज्यतां हंसि येनेह स नटः शुभे।
आगच्छेन्मम भद्रं ते विषयं पक्षिनन्दिनि ॥ ५५॥
वज्रनाभ बोला—शुभे ! पक्षिनन्दिनि हंसी ! तुम्हारा भला हो। तुम ऐसा कोई उपाय करो, जिससे वह नट मेरे राज्यमे आ जाय ॥ ५५ ॥
ते हंसा वज्रनाभेन कार्यहेतोर्विसर्जिताः।
देवेन्द्रायाथ कृष्णाय शशंसुः सर्वमेव तत् ॥ ५६॥
वज्रनाभद्वारा अपने कार्यकी सिद्धिके लिये भेजे गये उन हंसोंने देवराज इन्द्र तथा भगवान् श्रीकृष्णसे वह सब समाचार कह सुनाया ॥ ५६ ॥
अधोक्षजेन प्रद्युम्नो नियुक्तस्तत्र कर्मणि।
प्रभावत्याश्च संसर्गे वज्रनाभवधे तथा ॥ ५७॥
तब भगवान् श्रीकृष्णने प्रद्युम्नको उस कार्यमें नियुक्त किया। उनका काम था प्रभावतीसे मेल-जोल बढ़ाना और वज्रनाभका वध करना ॥ ५७ ॥
दैवीं मायां समाश्रित्य संविधाय हरिर्नटम्।
नटवेषेण भैमानां प्रेषयामास भारत ॥ ५८॥
श्रीहरिने दैवी मायाका आश्रय लेकर प्रद्युम्नको नट बनाकर भेजा । भारत ! उन्होंने नटके वेषमें ही मुख्य-मुख्य यादवोंको वहाँ भेज दिया ॥ ५८ ॥
प्रद्युम्नं नायकं कृत्वा साम्बं कृत्वा विदूषकम्।
पारिपार्श्वे गदं वीरमन्यान् भैमांस्तथैव च ॥ ५९॥
उन्होंने प्रद्युम्नको नायक, साम्बको विदूषक और वीरवर गदको पारिपार्श्वक बनाकर अन्यान्य यादवोंको भी उसी तरह विभिन्न भूमिकाओंमें सजाकर भेजा ॥ ५९ ॥
वारमुख्या नटीः कृत्वा तन्नृत्यसदृशास्तदा।
तथैव भद्रं भद्रस्य सहायांश्च तथाविधान् ॥ ६० ॥
मुख्य-मुख्य वाराङ्गनाओंको नटी बनाकर, जो उस नृत्य, गीत एवं वाद्यके अनुरूप थीं, भेजा। उसी तरह भद्र और उसके सहायकोंको भी तदनुरूप वेषोंमें भेज दिया ॥ ६० ॥
प्रद्युम्नविहितं रम्यं विमानं ते महारथाः।
जग्मुरारुह्य कार्यार्थं देवानामितौजसाम् ॥ ६१॥
वे महारथी वीर प्रद्युम्नके बनाये हुए रमणीय विमानपर आरूढ़ हो महातेजस्वी देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये वहाँ गये ॥ ६१ ॥
एकैकस्य समा रूपे पुरुषाः पुरुषस्य ते।
स्त्रीणां च सदृशाः सर्वे ते स्त्रैणेनरराधिपाः ॥ ६२॥
वे सभी पुरुष रूपमे एक-एक पुरुषके अनुरूप थे तथा वे सभी राजकुमार अपने रूप-सौन्दर्यद्वारा स्त्रियोंकी भी समानता करते थे ॥ ६२ ॥
ते वज्रनगरस्याथ शाखानगरमुत्तमम्।
जग्मुर्दानवसंकीर्णं सुपुरं नाम नामतः ॥ ६३॥
वे सब-के-सब वज्रपुरके उत्तम शाखानगर सुपुरमें, जो दानवोंसे भरा-पूरा था, गये ॥ ६३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वज्रनाभप्रद्युम्नोत्तरे प्रद्युम्नादिगमने द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वज्रनाभ और प्रद्युम्नकी प्रधानतामें होनेवाले युद्धके प्रसङ्गमें प्रद्युम्न आदिका वज्रपुरको गमनविषयक बानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९२ ॥
त्रिनवतितमोऽध्यायः
नटवेशधारी यादवोंका सुपुर और वज्रपुरमें सफल अभिनय करके दानवोंको रिझाकर उनसे उपहार पाना तथा प्रद्युम्नका प्रभावतीके घरमें प्रवेश
वैशम्पायन उवाच
ततः सुपुरवासीनामसुराणां नराधिप।
ददावाज्ञां वज्रनाभो दीयतां गृहमुत्तमम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर ! तदनन्तर वज्रनाभने सुपुरवासी असुरोंको आज्ञा दी कि 'इन नटोंके लिये उत्तम गृह प्रदान करो ॥ १ ॥
आतिथ्यं क्रियतामेषां बहुरत्नमुपायनम्।
वासांसि सुविचित्राणि सुखाय जनरञ्जनम् ॥ २ ॥
'इन सबका आतिथ्य-सत्कार करो। इन्हें उपहारमे बहुत-से रत्न तथा सुन्दर एवं विचित्र वस्त्र प्रदान करो। साथ ही इन्हें सुख पहुँचानेके लिये ऐसी सामग्री भेंट करो, जो मनुष्यमात्रके मनको प्रसन्न करनेवाली हो' ॥ २ ॥
भर्तुराज्ञां समालभ्य तथा चक्रुश्च सर्वशः।
पूर्वश्रुतो नटः प्राप्तः कौतूहलमजीजनत् ॥ ३ ॥
स्वामीकी आज्ञा पाकर उन असुरोंने सब कुछ वैसा ही किया। पहले जिसके विषयमें सुना गया था, वही नट आया
५९० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
है; इस भावनाने सबके मनमे नयी उत्कण्ठा उत्पन्न कर दी थी ॥ ३ ॥
नटस्याथ ददुर्दैत्याः सत्कारं परया मुदा।
पर्यायार्थे ददुश्चापि रत्नानि सुवहून्यथ ॥ ४ ॥
दैत्योंने भद्र नामक नटको बड़ी प्रसन्नताके साथ उत्तम सत्कार प्रदान किया। उन्होंने वेश-धारणके लिये उसे बहुत-से रत्न दिये ॥ ४ ॥
ततः स ननृते तत्र वरदत्तो नटस्तथा।
सुपुरे पुरवासीनां परं हर्षं समादधत् ॥ ५ ॥
तदनन्तर वर प्राप्त किये हुए उस नटने वहाँ सुपुरमें नृत्य किया और पुरवासियोंके मनमें महान् हर्ष भर दिया ॥ ५ ॥
रामायणं महाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम् ।
जन्म विष्णोरमेयस्य राक्षसेन्द्रवधेप्सया ॥ ६ ॥
उसने रामायण नामक महाकाव्यकी कथावस्तुको लेकर वहाँ एक नाटक किया। उसमें यह दिखाया गया कि राक्षस-राज रावणके वधकी इच्छासे अप्रमेयस्वरूप भगवान् विष्णुका भूतलपर अवतार हुआ ॥ ६ ॥
लोमपादो दशरथ ऋष्यशृङ्गं महामुनिम्।
शान्तामप्यानयामास गणिकाभिः सहानघ ॥ ७ ॥
अनघ ! लोमपादने महामुनि ऋष्यशृङ्गको गणिकाओंके साथ अपने यहाँ बुलवाया; फिर महाराज दशरथने ऋष्य-शृङ्गके साथ उनकी पत्नी शान्ताको भी अपने यहाँ निमन्त्रित किया ॥ ७ ॥
रामलक्ष्मणशत्रुघ्ना भरतश्चैव भारत।
ऋष्यशृङ्गश्च शान्ता च तथारूपैर्नटैः कृताः ॥ ८ ॥
भरतनन्दन ! राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, भरत, ऋष्यशृङ्ग तथा शान्ताका वेश उन्हींके जैसे रूपवाले नटोंने धारण किया था ॥ ८ ॥
तत्कालजीविनो वृद्धा दानवा विस्मयं गताः।
आचचक्षुश्च तेषां वै रूपतुल्यत्वमच्युत ॥ ९ ॥
राजन् ! जो रामके समयमे जीवित थे, वे बूढ़े दानव भी उन्हें देखकर आश्चर्यचकित हो गये और कहने लगे, इनका रूप तो ठीक उन्हीं व्यक्तियोंके तुल्य है ॥ ९ ॥
संस्काराभिनयौ तेषां प्रस्तावानां च धारणम् ।
दृष्ट्वा सर्वे प्रवेशं च दानवा विस्मयं गताः ॥ १० ॥
उनके संस्कार ( वेश-धारण ), अभिनय, प्रस्तावों ( क्रिया-प्रसङ्गों ) का धारण तथा प्रवेश ( पात्रोंका प्रथम दर्शन,) देखकर सभी दानव बड़े विस्मयमे पड़ गये थे ॥ १० ॥
ते रक्ता विस्मयं नेदुरसुराः परया मुदा।
उत्थायोत्थाय नाट्यस्य विषयेषु पुनः पुनः ॥ ११ ॥
ददुर्वस्त्राणि तुष्टाश्च ग्रैवेयवलयानि च।
हारान् मनोहरांश्चैव हेमवैडूर्यभूषितान् ॥ १२ ॥
उस नाटकमे अनुरक्त हुए वे असुरगण नाट्य विषयोंमें बारंबार उठ-उठकर बड़ी प्रसन्नताके साथ आश्चर्ययुक्त कोलाहल करते और संतुष्ट हो नटोंको वस्त्र, गलेका भूषण, कङ्कण, मनोहर हेमवैडूर्यभूषित हार देते थे ॥ ११-१२ ॥
पृथगर्थेषु दत्तेषु लोकैस्ते तुष्टुवुर्नटाः।
असुरांश्च मुनींश्चैव गोत्रैरभिजनैरपि ॥ १३ ॥
लोगोंके इस प्रकार पृथक-पृथक् वस्तुओंकी भेंट देनेपर वे नट बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने उनके गोत्रों और पूर्वजोंका उल्लेख करके उन असुरों और ऋषि-मुनियोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ १३ ॥
प्रेषितं वज्रनाभस्य शाखानगरवासिभिः।
नटस्य दिव्यरूपस्य नरेन्द्रागमनं तदा ॥ १४ ॥
नरेन्द्र ! उस समय शाखा-नगरनिवासी असुरोंने वज्रनाभके पास उस दिव्य रूपधारी नटके पधारनेका शुभ समाचार भेजा ॥
पुरा श्रुतार्थो दैत्येन्द्रः प्रेषयामास भारत।
आनीयतां वज्रपुरं नटोऽसाविति हर्षितः ॥ १५ ॥
भारत ! दैत्यराजने पहले ही यह समाचार सुन लिया था। अतः उसने अत्यन्त हर्षित होकर यह संदेश भेजा कि उस नटको वज्रपुरमें ले आया जाय ॥ १५ ॥
दानवेन्द्रवचः श्रुत्वा शाखानगरवासिभिः।
नीता वज्रपुरं रम्यं नटवेषेण यादवाः ॥ १६ ॥
दानवराजका वह आदेश सुनकर शाखानगरनिवासी असुर नटवेशधारी यादवोंको रमणीय वज्रपुरमें ले गये ॥ १६ ॥
आवासश्च ततो दत्तः सुकृतो विश्वकर्मणा।
एष्टव्यं यच्च तत् सर्वं दत्तं शतगुणोत्तरम् ॥ १७ ॥
दैत्यराजने उन्हें ठहरनेके लिये विश्वकर्माका बनाया हुआ सुन्दर भवन प्रदान किया और जिन-जिन वस्तुओंकी इच्छा या आवश्यकता होती है, उन सबको उन्होंने सौ गुना अधिक करके दे दिया ॥ १७ ॥
अथ कालोत्सवं चक्रे वज्रनाभो महासुरः।
कारयामास रम्यं च चमूवाटं प्रहृष्टवान् ॥ १८ ॥
तदनन्तर महान् असुर वज्रनाभने महाकाल नामक रुद्रदेवका उत्सव आरम्भ किया। उसमे उसने बड़े हर्षमे भरकर रमणीय चमूवाट ( सैनिकोंके मनोरञ्जनका स्थान ) बनवाया ॥ १८ ॥
ततस्तान् परिविश्रान्तान् प्रेक्षार्थाय प्रचोदयत् ।
दत्त्वा रत्नानि भूरीणि वज्रनाभो महाबलः ॥ १९ ॥
तत्पश्चात् जब वे नट पूर्ण विश्राम कर चुके, तब महाबली वज्रनाभने उन्हे बहुत-से रत्न देकर नाट्यकलाका प्रदर्शन करनेके लिये आज्ञा दी ॥ १९ ॥
उपविष्टश्च तान् द्रष्टुं सह ज्ञातिभिरात्मवान्।
छन्ने चान्तःपुरं स्थाप्य चक्षुर्हृद्ये नराधिप ॥ २० ॥
विष्णुपर्व ] त्रिनवतितमोऽध्यायः [ ५९१
नरेश्वर ! अन्तःपुरकी स्त्रियोंको पर्देकी ओटमें जहाँसे वे अपने नेत्रोंद्वारा सब कुछ देख सकती थीं, बिठाकर मनस्वी वज्रनाभ स्वयं भी जाति-भाइयोंके साथ उन नटोंका अभिनय देखनेके लिये बैठा ॥ २० ॥
भैमापि बद्धनेपथ्या नटवेषधरास्तथा।
कार्यार्थं भीमकर्माणो नृत्यार्थमुपचक्रमुः ॥ २१ ॥
भयंकर कर्म करनेवाले वे यादवकुमार भी उपयुक्त शृङ्गार करके नट-वेश धारण किये नृत्यका उपक्रम करने लगे ॥ २१ ॥
ततो घनं ससुषिरं मुरजानकभूषितम्।
तन्त्रीस्वरगणैर्विद्धमानातोद्यमनन्दयन् ॥ २२ ॥
फिर तो घन (झाँझ और करताल आदि), सुषिर (मुरली आदि), मुरज (मृदङ्ग), आनक (ढोल या नगाड़ा) तथा वीणाके स्वरोंसे मिश्रित दूसरे-दूसरे बाजे उन नटोंद्वारा बजाये जाने लगे ॥ २२ ॥
ततस्तु देवगान्धारं छालिक्यं श्रवणामृतम्।
भैमस्त्रियः प्रजगिरे मनःश्रोत्रसुखावहम् ॥ २३ ॥
तत्पश्चात् यादवकुमारोंके साथ आयी हुई वाराङ्गनाएँ देवगान्धार नामक छालिक्य गान्धर्वका गान करने लगीं, जो कानोंको अमृतके समान मधुर प्रतीत होता था। वह श्रोताके मन और कान दोनोंको सुख देनेवाला था ॥ २३ ॥
आगान्धारग्रामरागं गङ्गावतरणं तथा।
विद्धमासारितं रम्यं जगिरे स्वरसम्पदा ॥ २४ ॥
गान्धार आदि सातों स्वरोंको व्याप्त करके स्थित होनेवाले जो त्रिविध1 ग्राम (कतिपय स्वरोंके समूह), वसन्त आदि राग तथा गङ्गावतरण नामक गीतविशेष हैं, उन्हें रागान्तरसे मिश्रित, व्याप्त तथा रमणीय बनाकर वे अपनी मधुर स्वर-सम्पत्तिके द्वारा गाने लगीं ॥ २४ ॥
लयतालसमं श्रुत्वा गङ्गावतरणं शुभम्।
असुरांस्तोपयामासुरथायोत्थाय भारत ॥ २५ ॥
भारत ! लय और तालके अनुरूप सुन्दर गङ्गावतरणको सुनकर (प्रद्युम्न, गद और साम्ब—ये तीनों बीच-बीचमें) खड़े हो-होकर असुरोंको सन्तोष प्रदान करते थे ॥ २५ ॥
नान्दिं च वादयामासुः प्रद्युम्नो गद एव च।
साम्बश्च वीर्यसम्पन्नः कार्यार्थं नटतां गतः ॥ २६ ॥
कार्यवश नटभावको प्राप्त हुए पराक्रमसम्पन्न प्रद्युम्न, गद और साम्ब नान्दी2 बजाने लगे ॥ २६ ॥
नान्द्यन्ते च तदा श्लोकं गङ्गावतराणाश्रितम्।
रौक्मिणेयस्तदोवाच सम्यक् स्वभिनयान्वितम् ॥ २७॥
उस समय नान्दी (माङ्गलिक पद्यपाठ) के अन्तमें रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नने गङ्गावतरणसे सम्बन्ध रखनेवाले श्लोकका उत्तम अभिनयके साथ पाठ किया ॥ २७ ॥
रम्भाभिसारं कौबेरं नाटकं ननृतुस्ततः।
शूरो रावणरूपेण रम्भावेषा मनोवती ॥ २८ ॥
तत्पश्चात् कुबेरलोकसम्बन्धी रम्भाभिसार नामक नाटकका वे सब लोग अभिनय करने लगे। शूर नामक यादव रावण रूपसे उपस्थित हुए। मनोवती नामक वाराङ्गनाने रम्भाका वेष धारण किया ॥ २८ ॥
नलकूबरस्तु प्रद्युम्नः साम्बस्तस्य विदूषकः।
कैलासो रूपितश्चापि मायया यदुनन्दनैः ॥ २९ ॥
प्रद्युम्न ही नलकूबर बने। साम्ब उनके विदूषक बनकर तदनुरूप कार्य करने लगे। यादवकुमारोंने मायासे वहाँ कैलासको ही मूर्तिमान् कर दिया ॥ २९ ॥
शापञ्च दत्तं क्रुद्धेन रावणस्य दुरात्मनः।
नलकूबरेण च यथा रम्भा चाप्यथ सान्त्विता ॥ ३० ॥
एतत् प्रकरणं वीरा ननृतुर्यदुनन्दनाः।
नारदस्य मुनेः कीर्तिं सर्वज्ञस्य महात्मनः ॥ ३१ ॥
क्रोधमें भरे हुए नलकूबरने जिस प्रकार दुरात्मा रावणको शाप दिया और जिस तरह रम्भाको सान्त्वना प्रदान की, इस प्रकरणका, जिसके द्वारा सर्वज्ञ महात्मा नारद मुनिकी कीर्तिपर प्रकाश पड़ता है, उन वीर यादवकुमारोंने नाटकद्वारा प्रदर्शन किया ॥ ३०-३१ ॥
पादोद्धारेण नृत्येन तथैवाभिनयेन च।
तुष्टुवुर्दानवा वीरा भैमानामिततेजसाम् ॥ ३२ ॥
अत्यन्त तेजस्वी भीमवंशियोंके पाद-विक्षेपपूर्वक किये गये नृत्य और अभिनयसे संतुष्ट हुए दानववीर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ३२ ॥
ते ददुर्वरमुख्यानि रत्नान्याभरणानि च।
हारांस्तरलाच्छिद्रांश्च वैडूर्यमणिभूषितान् ॥ ३३ ॥
उन्होंने अच्छे-अच्छे वस्त्र, रत्नमय आभूषण तथा वर्तुलाकार मणिसे विद्ध एवं वैदूर्यमणिसे विभूषित हार दिये ॥
Footnotes
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१. षड्ज, मध्यम और गान्धार—ये तीन ग्राम हैं। ↩
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२. यहाँ नान्दि शब्द एक वाद्यविशेषका वाचक है। यह चमड़ेके थैलेके समान होता है और उसके मुखपर शिववाहन नन्दीके मुखकी आकृति बनी रहती है, इसीलिये उसे नान्दी कहते हैं। कुछ लोगोंके मतमें बारह पटहों (नगाड़ों) की ध्वनिको ही नान्दि कहते हैं। कहीं-कहीं नान्दिको जगह नान्दी पाठ है। देवताओं और द्विजों आदिकी शुभाशंसा करनेवाली जो पद्य अथवा गीतमयी वाक्यावली है, जो नाटकके पूर्व रंगमें प्रार्थनाके रूपमें पढ़ी जाती है, उसका नाम नान्दी है। उस नान्दीके अन्तमें सूत्रधार नाटककी प्रस्तावना करता है। ↩
५९२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
विमानानि विचित्राणि रथांश्चाकाशगामिनः ।
गजानाकाशगांश्चैव दिव्यनागकुलोद्भवान् ॥ ३४ ॥
विचित्र विमान, आकाशगामी रथ और दिव्य नागोंके कुलमें उत्पन्न हुए आकाशचारी हाथी भी प्रदान किये ॥ ३४ ॥
चन्दनानि च दिव्यानि शीतानि रसवन्ति च ।
गुरूण्यगुरुमुख्यानि गन्धाढ्यानि च भारत ॥ ३५ ॥
चिन्तामणीनुदारांश्च चिन्तिते सर्वकामदान् ।
भरतनन्दन ! उन दानवोंने यादवकुमारोंको दिव्य, शीतल एवं सरस चन्दन, अगरु आदि श्रेष्ठ सुगन्धित पदार्थ तथा चिन्तन करनेमात्रसे सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले उदार चिन्तामणि नामक रत्न भी दिये ॥ ३५१/२ ॥
प्रेक्षासु तासु बह्वीषु ददन्तो दानवास्तथा ॥ ३६ ॥
धनरत्नैर्विरहिताः कृताः पुरुषसत्तम ।
स्त्रियो दानवमुख्यानां तथैव च जनेश्वर ॥ ३७ ॥
पुरुषप्रवर ! नरेश्वर ! वहाँ बहुत बार नाटक देखनेको अवसर मिले । उन सभी अवसरोंपर दानवों तथा प्रधान-प्रधान दानवोंकी स्त्रियोंने इतने उपहार दिये कि वे सब-के-सब धन तथा रत्नोंसे रहित हो गये ॥ ३६-३७ ॥
ततो हंसी प्रभावत्याः सखी प्राह प्रभावतीम् ।
गतास्मि द्वारकां रम्यां भैमगुप्तामनिन्दिते ॥ ३८ ॥
तब प्रभावतीकी सखी हंसीने प्रभावतीसे कहा—'अनिन्दिते ! मैं यादवोंद्वारा सुरक्षित रमणीय द्वारकापुरीमें गयी थी ॥ ३८ ॥
प्रद्युम्नश्च मया दृष्टो विविक्ते चारुलोचने ।
भक्तिश्च कथिता तस्य मया तव शुचिस्मिते ॥ ३९ ॥
'चारुलोचने ! वहाँ एकान्तमे मैंने प्रद्युम्नसे भेंट की । शुचिस्मिते ! तुम्हारी प्रद्युम्नके प्रति जो भक्ति है, उसकी भी मैंने उनसे चर्चा की ॥ ३९ ॥
तेन हृष्टेन कालश्च कृतः कमललोचने ।
अद्य प्रदोषसमये त्वया सह समागमे ॥ ४० ॥
'कमललोचने ! मेरी बात सुनकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने आज ही प्रदोषकालमें तुमसे मिलनेका समय निश्चित किया है ॥ ४० ॥
तदद्य रुचिरश्रोणि तव प्रियसमागमः ।
न ह्यात्मवति भाषन्ति मिथ्या भैमकुलोद्भवाः ॥ ४१ ॥
'अतः सुश्रोणि ! आज ही तुम्हारी अपने प्राणवल्लभसे भेंट होगी; क्योंकि यदुकुलमें उत्पन्न हुए पुरुष अपने प्रेमी-जनोंके प्रति कोई मिथ्या संदेश नहीं देते हैं' ॥ ४१ ॥
ततः प्रभावती हृष्टा हंसीं तामिदमब्रवीत् ।
उषितासि ममावासे स्वप्तुमर्हसि सुन्दरि ॥ ४२ ॥
यह सुनकर प्रभावतीको बड़ा हर्ष हुआ । वह उस हंसीसे इस प्रकार बोली—'सुन्दरि ! तुम पहले भी मेरे घरमें रह चुकी हो । उसी तरह आज भी मेरे ही महलमें शयन करो ॥ ४२ ॥
त्वयाहं सहिताऽऽवासे द्रष्टुमिच्छामि कैशविम् ।
निःसाध्वसा भविष्यामि त्वया सह विहङ्गमे ॥ ४३ ॥
'विहङ्गमे ! आज इस घरमें तुम्हारे साथ रहकर ही मैं केशवकुमार प्रद्युम्नका दर्शन करना चाहती हूँ । तुम्हारे साथ होनेसे मैं निर्भय रहूँगी' ॥ ४३ ॥
हंसी तथेति चोवाच सखीं कमललोचनाम् ।
आरुरोह च तद्धर्म्यं प्रभावत्या विहङ्गमा ॥ ४४ ॥
तब आकाशचारिणी हंसीने अपनी कमललोचना सखी प्रभावतीसे कहा—'बहुत अच्छा, आज यहीं सोऊँगी ।' फिर वह प्रभावतीकी अट्टालिकापर आरूढ हुई ॥ ४४ ॥
विश्वकर्मकृते तत्र हर्म्यपृष्ठे प्रभावती ।
संविधानं चकाराशु प्रद्युम्नागमनक्षमम् ॥ ४५ ॥
विश्वकर्माके बनाये हुए प्रासादपृष्ठमें प्रभावतीने शीघ्र ही प्रद्युम्नके आगमनके योग्य सजावट कर दी ॥ ४५ ॥
तस्मिन् कृते संविधाने काममानयितुं ययौ ।
प्रभावतीमनुज्ञाप्य हंसी वायुसमा गतौ ॥ ४६ ॥
वह सजावट हो जानेपर वायुके समान तीव्र वेगसे चलनेवाली हंसी प्रभावतीसे पूछकर प्रद्युम्नको ले आनेके लिये गयी ॥ ४६ ॥
नटवेषधरं कामं गत्वोवाच शुचिस्मिता ।
अद्य भूतः स भगवन् समयो वर्तते निशि ॥ ४७ ॥
पवित्र मुसकानवाली वह हंसी नटवेषधारी प्रद्युम्नके पास जाकर बोली-'भगवन् ! आपने पहलेसे जो समय निश्चित कर रक्खा है; वह आजकी ही रातमें आ रहा है' ॥ ४७ ॥
तथेति प्राह तां कामः सा निवृत्ताथ पक्षिणी ।
अभ्यागता च सा हंसी प्रभावतिमथाब्रवीत् ।
अभ्येति रौक्मिणेयोऽसावाश्वसायतलोचने ॥ ४८ ॥
तब प्रद्युम्नने उससे कहा--'बहुत अच्छा' उनका यह उत्तर सुनकर पक्षिणी लौट गयी । महलमें लौटकर हंसीने प्रभावतीसे कहा--'विशाललोचने ! धीरज धारण करो ! वे रुक्मिणीनन्दन तुम्हारे पास आ रहे हैं' ॥ ४८ ॥
प्रद्युम्नो नीयमानं तु ददर्श माल्यमात्मवान् ।
भ्रमरैरावृतं वीरः सुगन्धमरिंमर्दनः ॥ ४९ ॥
उधर शत्रुमर्दन मनस्वी वीर प्रद्युम्नने देखा कि प्रभावतीके यहाँ सुगन्धित पुष्पमाला ले जायी जा रही है, जिसपर बहुत-से भ्रमर आ बैठे हैं ॥ ४९ ॥
निलिल्ये तत्र माल्ये तु भूत्वा मधूकरस्तदा ।
प्रभावत्या नीयमाने विदितार्थः प्रतापवान् ॥ ५० ॥
विष्णुपर्व ] त्रिनवतितमोऽध्यायः [ ५९३
फिर तो सर्वज्ञ एवं प्रतापी वीर प्रद्युम्न प्रभावतीके यहाँ ले जायी जानेवाली मालामें भ्रमर होकर छिप गये ॥ ५० ॥
प्रवेशितं च तन्माल्यं स्त्रीभिर्मधुकरायुतम् ।
उपनीतं प्रभावत्यै स्त्रीभिस्तद् भ्रमरावृतम् ॥ ५१ ॥
स्त्रियोंने भ्रमरोंसे आवृत हुई उस मालाको प्रभावतीके महलमें पहुँचा दिया। फिर दूसरी स्त्रियोंने वह भ्रमरावृत माला प्रभावतीके हाथमें दे दी ॥ ५१ ॥
अविदूरे च विन्यस्तं प्रभावत्या जनाधिप ।
भ्रमरास्ते ययुः सौम्य संध्याकाले ह्युपस्थिते ॥ ५२ ॥
नरेश्वर ! प्रभावतीने उसे पास ही रख लिया। सौम्य ! संध्याकाल उपस्थित होनेपर वे भ्रमर चले गये ॥ ५२ ॥
स भैमप्रवरो वीरस्तैः सहायैर्विहीनतः ।
कर्णोत्पले प्रभावत्या निलिल्ये शनकैरिव ॥ ५३ ॥
उन अपने सहायकोंसे बिछुड़कर वीर यदुश्रेष्ठ प्रद्युम्न धीरेसे प्रभावतीके कानमें पहने गये कमलमें छिप गये ॥ ५३॥
ततः प्रभावती हंसीमुवाच वदतां वरा ।
उद्यतं पूर्णचन्द्रं सा समीक्ष्यातिमनोहरम् ॥ ५४ ॥
तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभावतीने अत्यन्त मनोहर पूर्ण चन्द्रको उदित हुआ देख हंसीसे कहा—॥ ५४ ॥
सखि दह्यन्ति मेऽङ्गानि मुखं च परिशुष्यति ।
औत्सुक्यं हृदि चातीव कोऽयं व्याधिरनौषधः ॥ ५५ ॥
'सखी ! मेरे तो सारे अङ्ग जले जा रहे हैं। मुँह सूख रहा है। हृदयमें अत्यन्त उत्कण्ठा बढ़ गयी है। यह कौन-सा रोग लग गया, जिसकी कोई दवा ही नहीं है ? ॥ ५५ ॥
दधद् द्विगुणमौत्सुक्यमसौ पूर्णनिशाकरः ।
नवोदितः शीतरश्मिः सख्यं हरति च प्रियः ॥ ५६ ॥
'वह शीतल किरणोंवाला नवोदित पूर्ण चन्द्र दूनी उत्सुकता बढ़ा रहा है। वह देखनेमें प्रिय लगता है; परंतु मित्रभावका अपहरण कर रहा है—अप्रियवत् बर्ताव करने लगा है ॥ ५६ ॥
न दृष्टपूर्वो हि मया श्रुतमात्रेण काङ्क्षितः ।
अहो धूमयतेऽङ्गानि स्त्रीस्वभावस्य धिक् खलु ॥ ५७ ॥
'अहो ! जिसे मैंने पहले कभी देखा नहीं है, केवल नाम सुनकर उसे चाहने लगी हूँ तो भी वह मेरे सारे अङ्गोंमें आग सुलगा रहा है। मुझे धूमाच्छन्न किये देता है। नारीके इस स्वभावको धिक्कार है ॥ ५७ ॥
कल्पयामि यथाबुद्ध्या यदि नाभ्येति मे प्रियः ।
कुमुद्वतीगतं मार्गं हा गमिष्याम्यकिंचना ॥ ५८ ॥
'जैसा कि मैं बुद्धिसे सोच रही हूँ, यदि मेरे प्रियतम नहीं आये तो मैं अकिञ्चन नारी उसी मागको अपनाऊँगी, जिसपर कुमुद्वती चल चुकी है। अर्थात् प्रियतम पतिके जीते जी ही युवावस्थामें मुझे अपने प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा। हा ! यह कितने कष्टकी बात है ? ॥ ५८ ॥
मदनाशीविषेणास्मि हा हा दष्टा मनस्विनी ।
शीतवीर्याः प्रकृत्यैव जगतो ह्लादनाः सुखाः ।
दहन्ति मम गात्राणि किं तु चन्द्रगभस्तयः ॥ ५९ ॥
'हाय ! हाय !! मुझ मनस्विनी नारीको कामदेवरूपी विषधर सर्पने डँस लिया है, अन्यथा शीतलता ही जिनकी शक्ति है, जो स्वभावसे ही जगत्को आह्लाद एवं सुख प्रदान करनेवाली हैं, वे चन्द्रमाकी किरणें मेरे अङ्गोंको क्यो जला रही हैं ? ॥ ५९ ॥
प्रकृत्या शीतलो वायुर्नानापुष्परजोवहः ।
दावाग्निसदृशो मेऽद्य दन्दहीति शुभं तनुम् ॥ ६० ॥
'जो स्वभावसे ही शीतल है और नाना प्रकारके पुष्पोंकी सुगन्धित रज लेकर बहती है, वही वायु आज मेरे लिये दावानलके समान होकर मेरे सुन्दर शरीरको अत्यन्त दग्ध किये देती है ॥ ६० ॥
ततः संकल्पये एव स्थैर्यं कार्यमित्रात्मनः ।
नावतिष्ठति निर्वीर्यं मनः संकल्पधर्षितम् ॥ ६१ ॥
'मैं बारंबार संकल्प कर रही हूँ कि मुझे अपने मनको स्थिर कर लेना चाहिये; परंतु मेरा मन कामसे मथित होकर अत्यन्त निर्बल हो गया है; अतः स्थिर नहीं हो पाता है ॥ ६१ ॥
विमनस्कास्मि मुह्यामि वेपथुर्मे महान् हृदि ।
बम्भ्रमीति च मे दृष्टिर्हा हा यामि ध्रुवं क्षयम् ॥ ६२ ॥
'उन्मनी हुई जा रही हूँ, मुझपर मोह छा रहा है। मेरे हृदयमें महान् कम्पन हो रहा है और मेरी दृष्टि बारंबार घूम रही है। हाय ! हाय ! अब निश्चय ही मैं नष्ट हो जाऊँगी' ॥ ६२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वज्रनाभपुरे प्रद्युम्नगमने त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वज्रनाभपुरमें प्रद्युम्नका गमनविषयक तिरानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥
| ५९४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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चतुर्नवतितमोऽध्यायः
प्रद्युम्न और प्रभावतीका गान्धर्वविवाह एवं समागम; फिर गद और चन्द्रवतीका तथा साम्ब और गुणवतीका गान्धर्वविवाह
वैशम्पायन उवाच
आविष्टेयं मया बाला सर्वथेत्यवगम्य तु।
कार्ष्णिर्हृष्टेन मनसा हंसीमिदमुवाच ह ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नने जब यह समझ लिया कि असुरबाला प्रभावतीपर सर्वथा मेरा ( काम का ) आवेश हो गया है, तब वे प्रसन्न मनसे हंसीसे इस प्रकार बोले—॥ १ ॥
दैत्येन्द्रतनयां प्राप्तमवगच्छस्व मामिह।
षट्पदैः सह षट्पादो भूत्वा माल्ये निलीय हि ॥ २ ॥
विधेयोऽस्मि प्रभावत्या यथेष्टं मयि वर्तताम्।
'विहङ्गमे ! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि मैं भ्रमरोंके साथ भ्रमर बनकर इसी मालामें लुक-छिपकर यहाँ दैत्यराजकुमारी प्रभावतीके पास आ गया हूँ ( तुम इसे मेरे आगमनकी सूचना दो )। मैं प्रभावतीका आज्ञापालक हूँ। वह मेरे प्रति जैसा चाहे बर्ताव कर सकती है' ॥ २॥ ॥
इत्युक्त्वा दर्शयामास सुरूपो रूपमात्मनः ॥ ३ ॥
तद्धर्म्यपृष्ठं प्रभया द्योतितं तस्य धीमतः।
अभिभूता प्रभा चैव राजंश्चन्द्रोद्भवा शुभा ॥ ४ ॥
राजन् ! ऐसा कहकर सुन्दर रूपवाले प्रद्युम्नने उसे अपने रूपका दर्शन कराया। वह प्रासादपृष्ठ प्रज्ञावान् प्रद्युम्नकी प्रभासे प्रकाशित हो उठा । उनकी कान्तिसे चन्द्रमाकी सुन्दर कान्ति भी तिरस्कृत हो गयी ॥ ३-४ ॥
प्रभावत्यास्तु तं दृष्ट्वा ववृधे कामसागरः।
चन्द्रस्येवोदये प्राप्ते पर्वण्यां सरितां पतिः ॥ ५ ॥
प्रद्युम्नको देखते ही प्रभावतीके कामरूपी समुद्रमें ज्वार आ गया; ठीक उसी तरह, जैसे पूर्ण चन्द्रोदयका पर्व प्राप्त होनेपर सरिताओंके स्वामी समुद्रमें बाढ़ आ जाती है ॥ ५ ॥
सलज्जाधोमुखी किञ्चित् किञ्चित् तिर्यगवेक्षिणी।
प्रभावती तदा तस्थौ निश्चलं कमलेक्षणा ॥ ६ ॥
प्रभावतीका मुख लज्जासे कुछ नीचेको झुक गया तो भी वह कुछ-कुछ तिरछी चितवनसे अपने प्राणवल्लभकी ओर देख लेती थी। उस समय कमलनयनी प्रभावती स्थिरभावसे खड़ी थी ॥ ६ ॥
करेणाधःप्रदेशे तां चारूभूषणभूषिताम्।
स्पृष्ट्वोवाच वरारोहां रोमाञ्चिततनुस्ततः ॥ ७ ॥
मनोहर आभूषणोंसे विभूषित हुई सुन्दराङ्गी प्रभावतीके मुखके नीचेके भाग (ठोड़ी) का हाथसे स्पर्श करके प्रद्युम्नका शरीर पुलकित हो गया। वे उससे इस प्रकार बोले—॥ ७ ॥
मनोरथशतैर्लब्धं किं पूर्णेन्दुसमप्रभम्।
अधोमुखं मुखं कृत्वा न मां किञ्चित् प्रभाषसे ॥ ८ ॥
प्रभोपमर्दै मा कार्षीश्चन्दनस्य वरानने।
साध्वसं त्यज्यतां भीरु दासः साध्वनुगृह्यताम् ॥ ९ ॥
'सुमुखि ! तुम्हारा यह पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मुख मुझे सैकड़ों मनोरथोंके द्वारा आज प्राप्त हुआ है। तुम इसे नीचेकी ओर करके मुझसे कुछ बोलती क्यों नहीं हो ? तुम अपने मुखचन्द्रकी प्रभाका इस तरह तिरस्कार या लोभ न करो। भीरु ! भय छोड़ो और इस दासपर भलीभाँति अनुग्रह करो ॥ ८-९ ॥
न कालमित्र पश्यामि भीरु भीरुत्वमुत्सृज।
याचाम्येपोऽञ्जलिं कृत्वा प्राप्तकालं निबोध मे ॥ १० ॥
'भीरु ! तुम्हारा यह सज्ज मौनभाव मुझे इस समयके लिये उपयुक्त सा नहीं दिखायी देता। भय त्याग दो। इसके लिये मैं यह हाथ जोड़कर याचना करता हूँ। समयोचित कर्तव्य क्या है—यह मुझसे सुनो ॥ १० ॥
गान्धर्वेण विवाहेन कुरुष्वानुग्रहं मम।
देशकालानुरूपेण रूपेणाप्रतिमा सती ॥ ११ ॥
'संसारमें तुम्हारे रूपकी कहीं तुलना नहीं है। तुम देश-कालके अनुरूप गान्धर्व-विवाह करके मुझपर अनुग्रह करो' ॥
उपस्पृश्य ततो भैमो मणिस्थं जातवेदसम्।
जुहाव समये वीरः पुष्पैर्मन्त्रानुदीरयन् ॥ १२ ॥
तदनन्तर वीर यादव प्रद्युम्नने आचमन करके सूर्यकान्त-मणिमें स्थित अग्निदेवको प्रकट किया और उस समय मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए पुष्पोंद्वारा आहुति दी ॥ १२ ॥
जग्राहार्थ करं तस्या वराभरणभूषितम्।
चक्रे प्रदक्षिणं चैव तं मणिस्थं हुताशनम् ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने प्रभावतीके सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित हाथको अपने हाथमें लिया और सूर्यकान्तमणिमें विराजमान अग्निदेवकी परिक्रमा की ॥ १३ ॥
प्रजज्वाल स तेजस्वी मानयन्नच्युतात्मजम्।
भगवान् जगतः साक्षी शुभस्याथाशुभस्य च ॥ १४ ॥
उस समय सम्पूर्ण जगत्के शुभाशुभके साक्षी तेजस्वी भगवान् अग्निदेव अच्युतकुमार प्रद्युम्नका आदर करते हुए वहाँ प्रज्वलित हो उठे ॥ १४ ॥
विष्णुपर्व ] चतुर्नवतितमोऽध्यायः ५९५
उद्दिश्य दक्षिणां वीरो विप्राणां यदुनन्दनः ।
उवाच हंसीं द्वारस्थां तिष्ठावां रक्ष पक्षिणि ॥ १५ ॥
इसके बाद वीर यदुनन्दनने ब्राह्मणोंके उद्देश्यसे दक्षिणा संकल्प करके द्वारपर खड़ी हुई हंसीसे कहा—'पक्षिणि ! तुम इस भवनके बाहरी द्वारपर खड़ी रहो और हम दोनोंको दूसरोंकी दृष्टि पड़नेसे बचाओ' ॥ १५ ॥
तस्यां प्रणम्य यातायां कामस्तां चारुलोचनाम् ।
प्रगृह्य दक्षिणे हस्ते निनाय शयनोत्तमम् ॥ १६ ॥
यह सुनकर हंसी उन्हें प्रणाम करके चली गयी। तब प्रद्युम्न मनोहर नेत्रोंवाली प्रभावतीका दाहिना हाथ पकड़कर उसे सुन्दर शय्यापर ले गये ॥ १६ ॥
ऊरावेवोपवेश्यैनां सान्त्वयित्वा पुनः पुनः।
चुचुम्ब शनकैर्गण्डं वासयन् मुखमारुतैः ॥ १७ ॥
वहाँ उसे अपनी जाँघपर ही बिठाकर उन्होंने बारंबार सान्त्वना दी और अपने मुखकी सुगन्धित वायुसे उसके कपोलको सुवासित करते हुए धीरेसे उसको चूम लिया ॥ १७॥
ततोऽस्याश्च पपौ वक्त्रपद्मं मधुकरो यथा ।
आलिङ्गिञ्च सुश्रोणीं क्रमेण रतिकोविदः ॥ १८ ॥
तत्पश्चात् जैसे भ्रमर प्रफुल्ल कमलके मकरन्दका पान करता है, उसी प्रकार वे उसके मुखारविन्दका—उसके अधरोंका रस पीने लगे। फिर क्रमशः रति-कला-कुशल प्रद्युम्नने मनोहर नितम्बवाली प्रभावतीका पूर्णरूपसे आलिङ्गन किया ॥ १८ ॥
अरीरमद् रहस्येनां न चोद्वेजितवांस्तदा ।
अपकृष्टं चरत्यर्थं रतिकार्यविशारदः ।
उवास स तया सार्द्धं रमन् कृष्णसुतः प्रभुः ॥ १९ ॥
रतिकला-कोविद एवं सामर्थ्यशाली श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न उसके साथ एकान्तमें रमण करने लगे। वे उसे उद्विग्न नहीं करते थे। कोई क्षुद्र बर्ताव (बलात्कार आदि) भी नहीं करते थे। उसके साथ रमण करते हुए वे रातभर वहीं रहे ॥ १९ ॥
अरुणोदयकाले च ययौ यत्र नटालयम् ।
अकामया प्रभावत्या कथञ्चित्स विसर्जितः ॥ २० ॥
अरुणोदय-कालमें वे वहीं चले गये, जहाँ नटोंका स्थान था। प्रभावती नहीं चाहती थी कि वे एक क्षणके लिये भी उससे अलग हों तथापि किसी तरह उसने उस समय उन्हें विदा किया ॥ २० ॥
तामेव मनसा कान्तां कान्तरूपां समुद्वहन् ।
त उपुर्नटवेषेण कार्यार्थं भैमवंशजाः ॥ २१ ॥
प्रतीक्षन्तस्तदा वाक्यमिन्द्रकेशवयोस्तदा ।
प्रद्युम्न कमनीय रूपवाली उस प्राणवल्लभा प्रभावतीका ही मन-ही-मन चिन्तन करते रहे। वे भीमवंशी यादवकुमार उस समय देवराज इन्द्र और भगवान् श्रीकृष्णके आदेशकी प्रतीक्षा करते हुए अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये वहाँ नट-वेशमे रहने लगे ॥ २१ १/२ ॥
उद्योगं वज्रनाभस्य त्रैलोक्यविजयं प्रति ॥ २२ ॥
प्रतीक्षन्तो महात्मानो गुह्यसंरक्षणे रताः ।
वे महामनस्वी वीर अपने गूढ़ उद्देश्यको सर्वथा छिपाये रखनेके लिये तत्पर होकर वज्रनाभके त्रिलोकविजय-सम्बन्धी उद्योगकी राह देखते थे ॥ २२ १/२ ॥
कश्यपस्य मुनेः सत्रं यावत् तावन्नराधिप ॥ २३ ॥
देवासुराणां सर्वेषामविरोधो महात्मनाम् ।
त्रैलोक्यविजयार्थाय यततां धर्मचारिणाम् ॥ २४ ॥
नरेश्वर ! जबतक कश्यप मुनिका यज्ञ होता रहा, तबतक त्रैलोक्य-विजयके लिये प्रयत्नशील रहनेवाले समस्त महा-मनस्वी धर्मपरायण देवताओं और असुरोंमें परस्पर कोई विरोध नहीं हुआ ॥ २३-२४ ॥
एवं कालं प्रतीक्षाणां वसतां तत्र धीमताम् ।
सम्प्राप्तः प्रावृषो रम्यः सर्वभूतमनोहरः ॥ २५ ॥
इस तरह समयकी प्रतीक्षा करते हुए वहाँ निवास करने-वाले बुद्धिमान् यादववीरोंके समक्ष वर्षा ऋतु प्राप्त हुई, जो समस्त प्राणियोंके लिये रमणीय एवं मनोहर है ॥ २५ ॥
अहर्निशं च वृत्तान्तं प्रयच्छन्ति मनोजवाः ।
शक्रकेशवयोर्हंसाः कुमाराणां महात्मनाम् ॥ २६ ॥
मनके समान वेगशाली हंस उन महामनस्वी यादव-कुमारोंको प्रतिदिन इन्द्र और श्रीकृष्णका समाचार दिया करते थे ॥ २६ ॥
रेमे सह प्रभावत्या प्रद्युम्नश्चानुरूपया ।
रात्रौ रात्रौ महातेजा धार्तराष्ट्राभिरक्षितः ॥ २७ ॥
प्रत्येक रात्रिको हंसोंसे सुरक्षित हुए महातेजस्वी प्रद्युम्न अपनी मनोऽनुरूप भार्या प्रभावतीके साथ रमण करते थे ॥
तैर्हि वज्रपुरं हंसैर्वसद्भिर्वासवाज्ञया ।
व्याप्तं नृप नटांस्तांश्च न विदुः कालमोहिताः ॥ २८ ॥
नरेश्वर ! इन्द्रकी आज्ञासे वज्रपुरमें निवास करनेवाले हंसोंसे वह सारा नगर व्याप्त हो रहा था; परंतु कालसे मोहित हुए दानव यह नहीं जानते थे कि वास्तवमें वे हंस और वे नट कौन हैं ? ॥ २८ ॥
दिवापि रौक्मिणेयस्तु प्रभावत्या नृपालये ।
तिष्ठत्यन्तर्हितो वीरो हंससंघाभिरक्षितः ॥ २९ ॥
राजन् ! वीर रुक्मिणीकुमार दिनमें भी हंससमुदायसे सुरक्षित हो छिपे रूपसे प्रभावतीके घरमें रहते थे ॥ २९ ॥
माययास्य प्रतिच्छाया दृश्यते हि नटालये ।
५९६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
देहार्धेन तु कौरव्य सिषेवेऽसौ प्रभावतीम् ॥ ३० ॥ कुरुनन्दन ! मायासे उनकी छायामात्र नटोंके स्थानमें दिखायी देती थी। वे अपने आधे शरीरसे प्रभावतीका ही सेवन करते थे ॥ ३० ॥
संनतिं विनयं शीलं लीलां दाक्ष्यमथार्जवम् । स्पृहयन्त्यसुरा दृष्ट्वा विद्वत्तां च महात्मनाम् ॥ ३१ ॥ उन महामनस्वी नटोंकी विनय, प्रणति, शील, लीला, चातुरी, सरलता और विद्वत्ता देखकर असुर सदा ही उन्हें चाहते रहते थे ॥ ३१ ॥
रूपं विलासं गन्धं च मञ्जुभाषामथार्यताम् । तासां यादवनारीणां स्पृहयन्त्यसुरस्त्रियः ॥ ३२ ॥ उन असुरोंकी स्त्रियाँ भी यादवकुमारोंके साथ आयी हुई सुन्दरियोंके रूप, विलास, सुगन्ध, मनोहर बोली और श्रेष्ठ स्वभावकी सदा ही अभिलाषा करती थीं ॥ ३२ ॥
वज्रनाभस्य तु भ्राता सुनाभो नाम विश्रुतः । दुहितृद्वयं च नृपते तस्य रूपगुणान्वितम् ॥ ३३ ॥ वज्रनाभके एक भाई था, जो सुनाभ नामसे विख्यात था। नरेश्वर ! उसके दो पुत्रियाँ थीं, जो सुन्दर रूप और उत्तम गुणोंसे युक्त थीं ॥ ३३ ॥
एका चन्द्रवती नाम्ना गुणवत्यथ चापरा । प्रभावत्यालयं ते तु व्रजतः खलु नित्यशः ॥ ३४ ॥ उनमेंसे एकका नाम चन्द्रवती और दूसरीका नाम गुणवती था । वे प्रतिदिन प्रभावतीके महलमें जाया करती थीं ॥ ३४ ॥
ददृशाते तु ते तत्र रतिसक्तां प्रभावतीम् । परिपप्रच्छतुश्चैव विश्रम्भोपगतां सतीम् ॥ ३५ ॥ उन दोनोंने वहाँ प्रभावतीको रतिमें आसक्त देखा । सती-साध्वी प्रभावतीका अपनी इन दोनों बहिनोंपर बड़ा विश्वास था; अतः इन दोनोंने उससे पूछा—( 'बहिन ! तुम किसके साथ क्रीड़ा करती हो ?' ) ॥ ३५ ॥
सोवाच मम विद्यास्ति याधीता काङ्क्षितं पतिम् । रत्यर्थं साऽऽनयत्याशु सौभाग्यं च प्रयच्छति ॥ ३६ ॥ देवं वा दानवं वापि विवशं सद्य एव हि । प्रभावती बोली—'मेरे पास एक विद्या है, जिसका अध्ययन कर लेनेपर वह रतिके लिये शीघ्र ही मनोवाञ्छित पतिको ला देती है और सौभाग्य प्रदान करती है। अभिलषित पुरुष देवता हो या दानव, यह विद्या उसे तत्काल विवश करके अपने पास उसे ला देती है ॥ ३६३ ॥
साहं रमामि कान्तेन देवपुत्रेण धीमता ॥ ३७ ॥ दृश्यतां मत्प्रभावेण प्रद्युम्नः सुप्रियो मम । 'अतः मैं उसी विद्याके प्रभावसे परम बुद्धिमान् देवकुमारको अपना प्राणवल्लभ बनाकर उनके साथ रमण करती हूँ । देखो, मेरे या मेरी विद्याके प्रभावसे प्रद्युम्न मेरे अत्यन्त प्रिय हो गये हैं' ॥ ३७३ ॥
ते दृष्ट्वा विस्मयं याते रूपयौवनसम्पदम् ॥ ३८ ॥ पुनरेवाब्रवीत् ते तु भगिन्यौ चारुहासिनी । प्रभावती वरारोहा कालप्राप्तमिदं वचः ॥ ३९ ॥ उनके रूप और यौवनकी सम्पत्ति देखकर उन दोनों बहनोंको बड़ा विस्मय हुआ । फिर मनोहर हास्यवाली सुन्दरी प्रभावतीने उन दोनों बहनोंसे यह समयोचित बात कही—॥ ३८-३९ ॥
देवा धर्मरता नित्यं दम्भशीला महासुराः । देवास्तपसि रक्ता हि सुखे रक्ता महासुराः ॥ ४० ॥ 'देवता सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं और महान् असुर दम्भी होते हैं। देवता तपस्यामें अनुरक्त होते हैं और महान् असुर सुखमें आसक्त ॥ ४० ॥
देवाः सत्ये रता नित्यमनृते तु महासुराः । धर्मस्तपश्च सत्यं च यत्र तत्र जयो ध्रुवम् ॥ ४१ ॥ 'देवता सदा सत्यमें तत्पर रहते हैं तो महान् असुर असत्यमें । जहाँ धर्म, तप और सत्य होता है, उसी पक्षको युद्धमें निश्चितरूपसे विजय प्राप्त होती है ॥ ४१ ॥
देवपुत्रौ वरयतां पतिविद्यां ददाम्यहम् । उचितौ मत्प्रभावेण सद्य एवोपलप्स्यथः ॥ ४२ ॥ 'अतः तुम दोनों भी दो सुयोग्य देवकुमारोंका वरण कर लो । पतिकी प्राप्ति करानेवाली यह विद्या मैं तुम्हें देती हूँ। तुम मेरे प्रभावसे तत्काल ही अभीष्ट पति प्राप्त कर लोगी' ॥
तां तथेत्यूचतुर्हृष्टे भगिन्यौ चारुलोचनाम् । परिपप्रच्छ भै मं च कार्यं तत् पतिमानिनी ॥ ४३ ॥ तब वे दोनों बहनें अत्यन्त हर्षमें भरकर चारुलोचना प्रभावतीसे बोलीं, 'बहुत अच्छा।' तदनन्तर पतिको आदर देनेवाली प्रभावतीने प्रद्युम्नसे उस कार्यके विषयमें पूछा । ४३ ।
स पितृव्यं गदं वीरं साम्बं चाथाब्रवीत् तदा । रूपान्वितौ सुशीलौ च शूरौ च रणकर्मणि ॥ ४४ ॥ प्रद्युम्नने उस समय अपने चाचा वीरवर गद और भाई साम्बका नाम बताया और कहा—'वे दोनों सुन्दर रूपवाले, सुशील तथा युद्धकर्ममें शूरवीर हैं' ॥ ४४ ॥
प्रभावत्युवाच
परितुष्टेन दत्ता मे विद्या दुर्वाससा पुरा । परितुष्टेन सौभाग्यं सदा कन्यात्वमेव च ॥ ४५ ॥ तब प्रभावती अपनी दोनों बहनोंसे बोली— पूर्वकालमें सेवासे संतुष्ट हुए दुर्वासा मुनिने मुझे यह विद्या