विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 600, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५७८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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( उसे ढालकी भाँति सामने रखकर ) वह दाहिने हाथसे बारंबार गदाका प्रहार करता था ॥ १४ ॥
कन्यार्थं न च कृष्णौ वा कामो वा नृपसत्तम ।
निर्दयं प्रहरन्ति स्म निकुम्भे च महासुरे ॥ १५ ॥
नृपश्रेष्ठ ! कन्याकी रक्षाके लिये ही श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा प्रद्युम्न उस निकुम्भ नामक महान् असुरपर निर्दयतापूर्वक प्रहार नहीं करते थे ॥ १५ ॥
समर्थास्ते महात्मानः शत्रुं हन्तुं दुरासदाः ।
निश्श्वसुर्नरपते दयाभारावपीडिताः ॥ १६ ॥
महाराज ! वे दुर्जय महात्मा उस शत्रु्का वध करनेमें सर्वथा समर्थ थे तो भी दयाके भारसे दबे होनेके कारण वे निःश्वास लेकर रह जाते थे ॥ १६ ॥
श्रेष्ठो धनुष्मतां पार्थः सर्वथा कुशलो युधि ।
नागोष्ट्रविधिना दैत्यं शरपङ्क्त्या जघान ह ॥ १७ ॥
धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन युद्धमें सर्वथा कुशल थे; अतः वे नागोष्ट्र-विधिसे अपने बाणसमूहद्वारा उस दैत्यको घायल करने लगे ॥ १७ ॥
ते तु वैतस्तिकैर्बाणैर्विविधान् दानवान् युधि ।
न कन्यां कलया युक्त्या शिक्षया च महीपते ॥ १८ ॥
पृथ्वीनाथ ! वे श्रीकृष्ण आदि वीर अपनी कला, युक्ति और शिक्षाके प्रभावसे एक-एक बित्तेके बाणोंद्वारा नाना प्रकारके दानवोंको उस युद्धमें घायल करते थे; किंतु राजकन्याको चोट नहीं लगने देते थे ॥ १८ ॥
ततः स कन्यया सार्द्धं तत्रैवान्तरधीयत ।
आसुरीमाश्रितो मायां न च तां वेत्ति कश्चन ॥ १९ ॥
तब वह आसुरी मायाका आश्रय लेकर कन्याके साथ वहीं अन्तर्धान हो गया । उस मायाको उन तीनोंमेंसे कोई नहीं जानता था ॥ १९ ॥
तं कृष्णौ रौक्मिणेयश्च पृष्ठतोऽनुययुस्तदा ।
हारितः शकुनो भूत्वा तस्थावथ महासुरः ॥ २० ॥
श्रीकृष्ण, अर्जुन और प्रद्युम्न तीनोंने ही तत्काल उस दानवका पीछा किया । आगे जाकर वह महान् असुर हारित पक्षी होकर बैठ गया ॥ २० ॥
तं बाणैः पुनरेवाथ वीरो भूयो धनंजयः ।
वैतस्तिकैर्मर्मभिद्भिः कन्यां रक्षन्नताडयत् ॥ २१ ॥
तब वीर धनंजयने पुनः कन्याकी रक्षा करते हुए वैतस्तिक नामक मर्मभेदी बाणोंद्वारा उस दैत्यपर प्रहार किया ॥
स इमां पृथिवीं कृत्स्नां सप्तद्वीपां महासुरः ।
बभ्रामानुगतश्चैव तैर्वीरैररिमर्दनः ॥ २२ ॥
तब वह शत्रुसूदन महान् असुर इस सात द्वीपोंसे युक्त सारी पृथ्वीपर चक्कर लगाने लगा और वे तीनों वीर निरन्तर उसका पीछा करते रहे ॥ २२ ॥
गोकर्णस्योपरिष्टात्तु पर्वतस्य महासुरः ।
पपात वेलां गङ्गायाः पुलिने सह कन्यया ॥ २३ ॥
वह महान् असुर जब गोकर्ण पर्वतके ऊपरसे होकर निकलने लगा, उस समय कन्यासहित गङ्गातीरपर समुद्रके किनारे गिर पड़ा ॥ २३ ॥
न देवा नासुराश्चापि लङ्घयन्ति तपोधनाः ।
गोकर्णं तेजसा गुप्तं महादेवस्य भारत ॥ २४ ॥
भरतनन्दन ! गोकर्ण पर्वत महादेवजीके तेजसे सुरक्षित है । उसे देवता, असुर तथा तपोधन महर्षि भी नहीं लाँघ सकते हैं ॥ २४ ॥
एतदन्तरमासाद्य प्रद्युम्नः शीघ्रविक्रमः ।
कन्यां भानुमतीं भैमो जग्राह रणदुर्जयः ॥ २५ ॥
यह अवसर पाकर भीमकुलभूषण शीघ्रपराक्रमी रणदुर्जय वीर प्रद्युम्नने उस कन्या भानुमतीको अपने साथ ले लिया २५
असुरः सोऽर्दितो राजन् कृष्णाभ्यां निशितैः शरैः ।
त्यक्त्वाथोत्तरगोकर्णं निकुम्भो दक्षिणां दिशम् ।
जगाम पृष्ठतो यातौ कृष्णौ तार्क्यगतौ तदा ॥ २६ ॥
राजन् ! श्रीकृष्ण और अर्जुनद्वारा तीखे बाणोंसे पीड़ित किया गया असुर निकुम्भ उत्तर गोकर्णको त्यागकर दक्षिण दिशाकी ओर चल दिया । गरुड़पर बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन भी उस समय उसके पीछे-पीछे गये ॥ २६ ॥
विवेश षट्पुरं चैव ज्ञातीनामालयं तदा ।
तत्र वीरौ गुहाद्वारि कृष्णौ रात्रौ तदोपतुः ॥ २७ ॥
निकुम्भ अपने सजातीय बन्धुओंके निवासस्थान षट्पुरमें जा घुसा । श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों वीर रातमें वहाँ गुफाके द्वारपर बैठे रहे ॥ २७ ॥
रौक्मिणेयोऽपि कृष्णेन संदिष्टो द्वारकां पुरीम् ।
अनयद् भानुतनयां प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ २८ ॥
श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नने प्रसन्नमनसे भानुकुमारी भानुमतीको द्वारकापुरीमें पहुँचा दिया २८
नयित्वा चाययौ वीरः षट्पुरं दानवाकुलम् ।
ददर्श च गुहाद्वारि कृष्णौ भीमपराक्रमौ ॥ २९ ॥
उसे पहुँचाकर वीर प्रद्युम्न पुनः दानवोंसे भरे हुए षट्पुरमें आये और वहाँ गुफाके द्वारपर भयंकर पराक्रमी श्रीकृष्ण और अर्जुनसे मिले ॥ २९ ॥
१. नागोष्ट्रका अर्थ है सर्प और ऊँट । किसी वनमें एक ऊँटके शरीरपर अजगर सर्प लिपट गया था । यह देख किसी धनुर्धर वीरने अपना अस्त्र-लाघव दिखाते हुए ऐसा बाण मारा, जिससे अजगर तो मारा गया, किंतु ऊँट बाल-बाल बच गया । यही नागोष्ट्र-विधि है । ये अर्जुन आदि वीर अपने बाणोंसे दैत्यको घायल करते थे, किंतु कन्याके शरीरपर आंच नहीं आने देते थे ।