भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 590

५६८ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

सहस्ततालं मधुरं समं च
स भार्यया रेवतराजपुत्र्या ॥ १६ ॥

तदनन्तर मधुपानसे मत्त हुए परम शोभायमान बलराम अपनी पत्नी रेवतराजकुमारी रेवतीके साथ हाथपर ताल देते हुए मधुर स्वरमें सम^१ स्थानके प्रदर्शनपूर्वक गीत गाने लगे ॥ १६ ॥

तं कूर्दमानं मधुसूदनश्च
दृष्ट्वा महात्मा च मुदान्वितोऽभूत् ।
चुकूर्द सत्यासहितो महात्मा
हर्षोगमार्थं च बलस्य धीमान् ॥ १७ ॥

उन्हें गाते देख महात्मा मधुसूदनको बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर तो उन बुद्धिमान् महात्मा श्रीकृष्णने भी बलरामजीका हर्ष बढ़ानेके लिये सत्यभामाके साथ गान आरम्भ कर दिया ॥ १७ ॥

समुद्रयात्रार्थमथागतश्च
चुकूर्द पार्थो नरलोकवीरः ।
कृष्णेन सार्द्धं मुदितश्चकूर्द
सुभद्रया चैव वराङ्गयष्ट्या ॥ १८ ॥

नरलोकके प्रमुख वीर कुन्तीनन्दन अर्जुन भी समुद्र-यात्राके लिये वहाँ आये थे। वे भी आनन्दमें मग्न होकर श्रीकृष्ण और सुन्दराङ्गी सुभद्राके साथ गीत अलापने लगे ॥ १८ ॥

गदश्च धीमानथ सारणश्च
प्रद्युम्नसाम्बौ नृप सात्यकिश्च ।
सत्राजितीसूनुरुदारवीर्यः
सुचारुदेष्णश्च सुचारुरूपः ॥ १९ ॥
वीरौ कुमारौ निशठोल्मुकौ च
रामात्मजौ वीरतमौ चुकूर्दतुः ।

नरेश्वर ! फिर तो बुद्धिमान् गद, सारण, प्रद्युम्न, साम्ब, सात्यकि, उदार पराक्रमी सत्यभामाकुमार भानु और अत्यन्त मनोहर रूपवाले सुचारुदेष्ण, बलरामजीके पुत्र दोनों वीर कुमार निशठ और उल्मुक जो अत्यन्त वीर थे, गाने लगे ॥ १९½ ॥

अक्रूरसेनापतिशंकवश्च
तथापरे भैमकुलप्रधानाः ॥ २० ॥
तद् यानपात्रं ववृधे तदानीं
कृष्णप्रभावेण जनेन्द्रपुत्र ।
आपूर्णमापूर्णमुदारकीर्ते
चुकूर्दद्भिर्नृप भैममुख्यैः ॥ २१ ॥

अक्रूर, यादव-सेनापति अनाधृष्टि, शङ्कु तथा भीमकुलके अन्य प्रधान पुरुष भी वहाँ गान करने लगे। उदार कीर्ति-वाले नरेन्द्रकुमार ! उस समय वह यानपात्र (जहाज) गाते हुए प्रमुख यादव वीरोंसे ज्यों-ज्यों भरता गया त्यों-ही-त्यों श्रीकृष्णके प्रभावसे बढ़ता चला गया ॥ २०-२१ ॥

तै राससक्तैरतिकूर्दमानै-
र्यदुप्रवीरैरमरप्रकाशैः ।
हर्षान्वितं वीर जगत् तथाभू-
च्छेमुश्च पापानि जनेन्द्रसूनो ॥ २२ ॥

वीर राजकुमार ! रासमें संलग्न हो अत्यन्त गीत गाने-वाले उन देवोपम यादववीरोंके साथ सारा जगत् हर्षोल्लाससे परिपूर्ण हो गया। सबके पाप-ताप शान्त हो गये ॥ २२ ॥

देवातिथिश्चात्र च नारदोऽथ
विप्रः प्रियार्थं मुरकेशिशत्रोः ।
चुकूर्द मध्ये यदुसत्तमानां
जटाकलापागलितैकदेशः ॥ २३ ॥

तदनन्तर मुर और केशीके शत्रु श्रीकृष्णका प्रिय करनेके लिये देवताओंके अतिथि विप्रवर नारदजी उन यादव-शिरोमणियोंके बीचमें आकर गान करने लगे। उनके शरीर-का एक देश उनके जटा-कलापसे आच्छादित था ॥ २३ ॥

रासप्रणेता मुनि राजपुत्र
स एव तत्राभवदप्रमेयः ।


१. संगीतमें वह स्थान, जहाँ गाने-बजानेवालोंका सिर या हाथ आप-से-आप हिल जाता है । वह स्थान तालके अनुसार निश्चित होता है । जैसे तितालेमें दूसरे तालपर और चौतालमें पहले तालपर सम होता है । इसी प्रकार भिन्न तालोंमें भिन्न-भिन्न स्थानों-पर सम होता है । वाद्योंका आरम्भ तथा गीतों और वाद्योंका अन्त इसी समपर होता है । परंतु गाने-बजानेके बीच-बीचमें भी सम बराबर आता रहता है ।

२. श्रीमद्भागवतके अनुसार सत्यभामाके बड़े बेटेका नाम भानु था । इनसे छोटे नौ भाइयोंके नाम इस प्रकार हैं—सुभानु, प्रभानु, भानुमान्, चन्द्रभानु, बृहद्भानु, अतिभानु, श्रीभानु और प्रतिभानु ।