विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 574, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें५५२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
अथ कृष्णं तदोवाच नृप वागशरीरिणी।
चक्रेण शमयस्वैनं देवब्राह्मणकण्टकम् ॥ ५९ ॥
नरेश्वर ! उस समय आकाशवाणीने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—'जनार्दन ! यह देवताओं और ब्राह्मणोंके लिये कण्टकरूप है। तुम अपने चक्रद्वारा इसको नष्ट कर दो' ॥
इति होवाच भगवान् देवो बिल्वोदकेश्वरः।
धर्मं यशश्च विपुलं प्राप्नुहि त्वं महाबल ॥ ६० ॥
यह बात स्वयं भगवान् विल्वोदकेश्वरदेवने कही थी। फिर उन्होंने इस प्रकार कहा—'महाबली श्रीकृष्ण ! तुम ( इस दैत्यको मारकर ) महान् धर्म और विशाल यश प्राप्त करो' ॥ ६० ॥
तथेत्युक्त्वा नमस्कृत्य लोकनाथः सतां गतिः।
सुदर्शनं मुमोचाथ चक्रं दैत्यकुलान्तकम् ॥ ६१ ॥
तब 'जो आज्ञा' कहकर सत्पुरुषोंके आश्रयदाता जगदीश्वर श्रीकृष्णने भगवान् विल्वोदकेश्वरको नमस्कार किया और दैत्यकुलका विनाश करनेवाले सुदर्शन चक्रको निकुम्भपर छोड़ दिया ॥ ६१ ॥
तन्निकुम्भस्य चिच्छेद शिरः प्रवरकुण्डलम्।
नारायणभुजोत्सृष्टं सूर्यमण्डलवर्चसम् ॥ ६२ ॥
श्रीकृष्णके हाथसे छूटे हुए सूर्यमण्डलके समान तेजस्वी चक्रने उत्तम कुण्डलोंसे अलंकृत निकुम्भका मस्तक काट डाला ॥
उत्पपात शिरस्तस्य भूमौ ज्वलितकुण्डलम्।
मेघमत्तो गिरेः शृङ्गान्मयूर इव भूतले ॥ ६३ ॥
कान्तिमान् कुण्डलोंसे अलंकृत उसका वह मस्तक पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो मेघके दर्शनसे उन्मत्त हुआ कोई मोर पर्वतके शिखरसे धरतीपर आ गिरा हो ॥ ६३ ॥
निकुम्भे निहते तस्मिन् देवो बिल्वोदकेश्वरः।
तुतोष च नरव्याघ्र जगत्त्रासकरे विभुः ॥ ६४ ॥
नरव्याघ्र ! जगत्को त्रास देनेवाले उस निकुम्भके मारे जानेपर सर्वव्यापी देव विल्वोदकेश्वर बहुत संतुष्ट हुए ॥६४॥
पपात पुष्पवृष्टिश्च शक्रसृष्टा नभस्तलात्।
देवदुन्दुभयश्चैव प्रणेदुररिनाशने ॥ ६५ ॥
आकाशसे इन्द्रकी बरसायी हुई फूलोंकी वृष्टि होने लगी। उस देवशत्रुका नाश हो जानेपर देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं ॥ ६५ ॥
ननन्द च जगत् कृत्स्नं मुनयश्च विशेषतः।
दैत्यकन्याश्च भगवान् यदुभ्यः शतशो ददौ ॥ ६६ ॥
सम्पूर्ण जगत् आनन्दमग्न हो गया। ऋषि-मुनियोंको विशेष प्रसन्नता हुई ! भगवान् श्रीकृष्णने यादववीरोंको सैकड़ों दैत्य-कन्याएँ दे दीं ॥ ६६ ॥
क्षत्रियाणां च भगवान् सान्त्वयित्वा पुनःपुनः।
रत्नानि च विचित्राणि वासांसि प्रवराणि च ॥ ६७ ॥
अन्य क्षत्रिय राजाओंको भी बारंबार सान्त्वना देकर भगवान्ने विचित्र रत्न और श्रेष्ठ वस्त्र प्रदान किये ॥ ६७ ॥
रथानां वाजिमुक्तानां षट् सहस्राणि केशवः।
अददात् पाण्डवेभ्यश्च प्रीतात्मा गदपूर्वजः ॥ ६८ ॥
गदके बड़े भाई श्रीकृष्णने प्रसन्नचित्त होकर पाण्डवोंको छः हजार अश्वयुक्त रथ भेंट किये ॥ ६८ ॥
तदेव चाथ प्रवरं षट्पुरं पुरवर्धनः।
द्विजाय ब्रह्मदत्ताय ददौ तार्क्ष्यवरध्वजः ॥ ६९ ॥
नगरकी वृद्धि करनेवाले भगवान् गरुड़ध्वजने वह षट्पुर नामक श्रेष्ठ नगर ब्रह्मदत्त नामक ब्राह्मणको दे दिया ॥
सत्रे समाप्ते च तदा शङ्खचक्रगदाधरः।
विसर्जयित्वा तत् क्षत्रं पाण्डवांश्च महाबलः ॥ ७० ॥
बिल्वोदकेश्वरस्याथ समाजमकरोत् प्रभुः।
मांससूपसमाकीर्णं बह्वन्नं व्यञ्जनाकुलम् ॥ ७१ ॥
यज्ञ समाप्त होनेपर शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले महाबली भगवान् श्रीकृष्णने उन क्षत्रियों और पाण्डवोंको विदा करके श्रीबिल्वोदकेश्वरके लिये एक सामूहिक उत्सव किया, जिसमें फलोंके गूदे, दाल तथा अन्यान्य व्यंजनोंसे युक्त बहुत-सा अन्न लोगोंको खिलाया गया ॥ ७०-७१ ॥
नियुद्धकुशलान् मल्लान् देवो मल्लप्रियस्तदा।
योधयित्वा ददौ भूरि वित्तं वस्त्राणि चात्मवान् ॥७२॥
अपने मनको वशमें रखनेवाले मल्लप्रिय भगवान् श्रीकृष्णने युद्धकुशल मल्लोंको लड़वाकर उन्हें बहुत-सा धन और वस्त्र दिये ॥ ७२ ॥
मातापितृभ्यां सहितो यदुभिश्च महाबलः।
अभिवाद्य ब्रह्मदत्तं ययौ द्वारवतीं पुरीम् ॥ ७३ ॥
तदनन्तर महाबली श्रीकृष्ण अपने माता-पिता तथा अन्य यादवोंके साथ ब्रह्मदत्तको प्रणाम करके द्वारकापुरीको चले गये ॥ ७३ ॥
स विवेश पुरीं रम्यां हृष्टपुष्टजनाकुलाम्।
पुष्पचित्रपथां वीरो वन्द्यमानो नरैः पथि ॥ ७४ ॥
मार्गमें दूसरे लोगोंका प्रणाम स्वीकार करते हुए वीर श्रीकृष्णने हृष्ट पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई तथा पुष्पोंके बिछाये जानेसे विचित्र पथवाली रमणीय पुरी द्वारकामे प्रवेश किया ॥
इमं यः षट्पुरवधं विजयं चक्रपाणिनः।
शृणुयाद् वा पठेद् वापि युद्धे जयमवाप्नुयात् ॥ ७५ ॥
जो चक्रपाणि भगवान् श्रीकृष्णके इस षट्पुर-वधरूप विजयसूचक चरित्रको सुनता अथवा पढ़ता है, वह युद्धमें विजय पाता है ॥ ७५ ॥