विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 573, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[विष्णुपर्व ] पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ५५१
संलग्न रहता है। जिससे यह षट्पुरमें निवास करता है, वह इसका घोर शरीर दूसरा ही है ॥ ४२ ॥
एतत् तु सर्वमाख्यातं निकुम्भचरितं मया ।
त्वरयास्य वधे वीर कथा पश्चाद् भविष्यति ॥ ४३ ॥
'वीर ! यह सब निकुम्भका चरित्र मैंने कह सुनाया। अब तुम इसके वधके लिये जल्दी करो। यह कथा पीछे होती रहेगी' ॥ ४३ ॥
तयोः कथयतोरेवं कृष्णयोरसुरस्तदा ।
गुहां षट्पुरसंज्ञां तां विवेश रणदुर्जयः ॥ ४४ ॥
श्रीकृष्ण और अर्जुन इस प्रकार बात कर ही रहे थे कि वह रणदुर्जय असुर उस षट्पुर नामवाली गुफामें जा घुसा ॥
अन्विष्य तस्य भगवान् विवेश मधुसूदनः ।
तां षट्पुरगुहां घोरां दुर्धर्षो कुरुनन्दन ॥ ४५ ॥
कुरुनन्दन ! उसके जानेके मार्गका अनुसंधान करके भगवान् मधुसूदन भी उस घोर, दुर्जय षट्पुर नामवाली गुफामें घुस गये ॥ ४५ ॥
चन्द्रसूर्यप्रभाहीनां ज्वलन्तीं स्वेन तेजसा ।
सुखदुःखोष्णशीतानि प्रयच्छन्तीं यथेप्सितम् ॥ ४६ ॥
वहाँ चन्द्रमा और सूर्यका प्रकाश नहीं था। वह गुफा अपने ही तेजसे प्रकाशित होती और वहाँके निवासियोंको सुख-दुःख, गर्मी-सर्दी आदि प्रदान करती थी ॥ ४६ ॥
तत्र प्रविश्य भगवानपश्यत जनाधिपान् ।
युयुधे सह घोरेण निकुम्भेन जनाधिप ॥ ४७ ॥
नरेश्वर ! उस गुफामें प्रवेश करके भगवान् श्रीकृष्णने निकुम्भद्वारा बंदी बनाये गये यादवनरेशोंको देखा; फिर वे उस घोर असुर निकुम्भके साथ युद्ध करने लगे ॥ ४७ ॥
कृष्णस्यानुप्रविष्टास्तु बलाद्या यादवास्तदा ।
प्रविष्टाश्च तथा सर्वे पाण्डवास्ते महात्मनः ॥ ४८ ॥
समेतास्तु प्रविष्टास्ते कृष्णस्यानुमतेन वै।
महात्मा श्रीकृष्णकी अनुमतिसे बलराम आदि समस्त यादववीर भी उस समय उनके पीछे-पीछे उस गुफामें जा घुसे तथा समस्त पाण्डव भी एक साथ ही उसमें घुस आये॥४८॥
युयुधे स तु कृष्णेन रौक्मिणेयः प्रचोदितः ।
आनयद् यादवान् सर्वान् यानयं बद्धवान् पुरा ॥ ४९ ॥
निकुम्भ तो श्रीकृष्णके साथ युद्ध करने लगा। इधर श्रीकृष्णकी आज्ञासे रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न उन सब यादवोंको छुड़ा लाये, जिन्हें निकुम्भने पहले बंदी बना लिया था ॥
ते मुक्ता रौक्मिणेयेन प्राप्ता यत्र जनार्दनः ।
प्रहृष्टमनसः सर्वे निकुम्भवधकाङ्क्षिणः ॥ ५० ॥
प्रद्युम्नद्वारा छुड़ाये गये वे समस्त वीर प्रसन्नचित्त हो निकुम्भका वध करनेकी इच्छासे उस स्थानपर गये, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण युद्ध कर रहे थे ॥ ५० ॥
राजानो वीर मुञ्चेति पुनः कामं यथाम्ब्रुवन् ।
सुमोच चाथ तान् वीरो रौक्मिणेयः प्रतापवान् ॥ ५१ ॥
तब वे राजा जो प्रद्युम्नद्वारा कैद किये गये थे, उन कामस्वरूप प्रद्युम्नसे बार-बार कहने लगे—'वीर ! हमें मुक्त कर दो।' तब प्रतापी वीर रुक्मिणीकुमारने उन सबको छोड़ दिया ॥ ५१ ॥
अधोमुखमुखाः सर्वे बद्धमौना नराधिपाः ।
लज्जयाऽभिप्लुता वीरास्तस्थुर्नष्टश्रियस्तदा ॥ ५२ ॥
वे समस्त वीर नरेश अपना मुँह नीचे किये चुपचाप खड़े थे। उनकी श्री नष्ट हो गयी थी। वे उस समय लज्जामें डूबे हुए थे ॥ ५२ ॥
निकुम्भमपि गोविन्दः प्रयतन्तं जयं प्रति ।
योधयामास भगवान् घोरमात्मरिपुं हरिः ॥ ५३ ॥
पापहारी भगवान् गोविन्द विजयके लिये प्रयत्न करने-वाले अपने घोर शत्रु निकुम्भके साथ युद्ध कर रहे थे ॥५३॥
परिघेनाहतः कृष्णो निकुम्भेन भृशं विभो ।
गदया चापि कृष्णेन निकुम्भस्ताडितो भृशम् ॥ ५४ ॥
प्रभो ! निकुम्भने परिघद्वारा भगवान् श्रीकृष्णपर बड़े जोरका आघात किया तथा श्रीकृष्णने भी गदाद्वारा निकुम्भ-को बारंबार गहरी चोट पहुँचायी ॥ ५४ ॥
तावुभौ मोहमापन्नौ सुप्रहारहतौ तदा ।
ततः प्रव्यथितान् दृष्ट्वा पाण्डवांश्चाथ यादवान् ॥ ५५ ॥
जेपुर्मुनिगणास्तत्र कृष्णस्य हितकाम्यया ।
तुष्टुवुश्च महात्मानं वेदप्रोक्तैस्तथा स्तवैः ॥ ५६ ॥
तब एक दूसरेके द्वारा अच्छी तरह किये गये प्रहारोंसे आहत होकर वे दोनों ही मूच्छित हो गये। इससे पाण्डवों और यादवोंको अत्यन्त व्यथित हुआ देख वहाँ खड़े हुए मुनिगण श्रीकृष्णके हितकी कामनासे 'जप' करने लगे तथा उन्होंने वेदोक्त स्तुतियोंद्वारा परमात्मा श्रीकृष्णका स्तवन किया ॥
ततः प्रत्यागतप्राणो भगवान् केशवस्तदा ।
दानवश्च पुनर्वीरावुद्यतौ समरं प्रति ॥ ५७ ॥
तब भगवान् केशव सजग हो उठे, मानो उनमें पुनः प्राण लौट आये हों। तदनन्तर वह दानव भी होशमें आ गया। फिर वे दोनों वीर युद्धके लिये उद्यत हो गये ॥ ५७ ॥
वृषभाविव नर्दन्तौ गजाविव च भारत ।
शालावृकाविव क्रुद्धौ प्रहरन्तौ रणोत्कटौ ॥ ५८ ॥
भारत ! वे दोनों रणोन्मत्त वीर साँड़ोंके समान हुँकड़ते, हाथियोंके समान चिग्घाड़ते और भेड़ियोंके समान दहाड़ते हुए क्रोधपूर्वक परस्पर प्रहार करने लगे ॥ ५८ ॥