भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 572
५५०श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

फिर तो उसने बड़े जोरसे सिंहनाद करके अत्यन्त भयंकर परिघद्वारा पक्षिराज गरुड़, बलराम और सात्यकिपर प्रहार किया ॥ २५ ॥

नारायणं चार्जुनं च भीमं चाथ युधिष्ठिरम् ।
यमौ च वासुदेवं च साम्बं कामं च वीर्यवान् ॥ २६ ॥

तत्पश्चात् उस पराक्रमी असुरने श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव तथा श्रीकृष्णकुमार साम्ब और प्रद्युम्नपर भी प्रहार किया ॥ २६ ॥

युयुधे मायया दैत्यः शीघ्रकारी च भारत ।
न चैनं ददृशुः सर्वे सर्वशस्त्रविशारदाः ॥ २७ ॥

भरतनन्दन ! वह शीघ्रकारी दैत्य मायाद्वारा युद्ध कर रहा था; इसलिये सम्पूर्ण शस्त्रोंके ज्ञानमें कुशल वे समस्त वीर उसे देख नहीं पाते थे ॥ २७ ॥

यदा तु नैवापश्यंस्तं तदा बिल्वोदकेश्वरम् ।
दध्यौ देवं हृषीकेशः प्रमथानां गणेश्वरम् ॥ २८ ॥

जब वे उस असुरको नहीं देख सके, तब भगवान् श्रीकृष्णने प्रमथगणोंके स्वामी बिल्वोदकेश्वर देवका स्मरण किया ॥ २८ ॥

ततस्ते ददृशुः सर्वे प्रभावान्नतितेजसः ।
बिल्वोदकेश्वरस्याशु निकुम्भं मायिनां वरम् ॥ २९ ॥

फिर तुरंत ही अत्यन्त तेजस्वी बिल्वोदकेश्वरके प्रभावसे उन सबने मायावियोंमें श्रेष्ठ निकुम्भको देखा ॥ २९ ॥

कैलासशिखराकारं ग्रसन्तमिव विष्ठितम् ।
आह्वयन्तं रणे कृष्णं वैरिणं ज्ञातिनाशनम् ॥ ३० ॥
सज्यगाण्डीव एवाथ पार्थस्तस्य रथेयुभिः ।
परिघं चैव गात्रेषु विव्याधैनमथासकृत् ॥ ३१ ॥

उसका शरीर कैलास शिखरके समान विशाल था। वह इसप्रकार खड़ा था, मानो सबको ग्रस लेगा। वह अपने बन्धु-बान्धवोंका नाश करनेवाले वैरी श्रीकृष्णको युद्धके लिये ललकार रहा था। उस समय जिनके गाण्डीव धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ी हुई थी, उन अर्जुनने रथका भेदन करनेवाले बाणोंद्वारा उसके परिघ और अङ्गोंपर वारंवार प्रहार किया ॥

ते बाणास्तस्य गात्रेषु परिघे च जनाधिप ।
भग्नाः शिलाशिताः सर्वे निपेतुः कुञ्चिताः क्षितौ ॥ ३२ ॥

नरेश्वर ! अर्जुनके वे सभी बाण जो शिलापर तेज किये गये थे, उसके परिघ और अङ्गोंसे टकराकर टूटकर अथवा मुड़कर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३२ ॥

विफलानस्त्रयुक्तांस्तान् दृष्ट्वा बाणान् धनंजयः ।
पप्रच्छ केशवं वीरः किमेतदिति भारत ॥ ३३ ॥

भरतनन्दन ! उन दिव्यास्त्रयुक्त बाणोंको निष्फल हुआ देख वीर अर्जुनने श्रीकृष्णसे पूछा, 'यह क्या हुआ ? ॥ ३३ ॥

पर्वतानपि भिन्दन्ति मम वज्रोपमाः शराः ।
किमिदं देवकीपुत्र विस्मयोऽत्र महान् मम ॥ ३४ ॥

'देवकीनन्दन ! मेरे वज्रतुल्य बाण पर्वतोंको भी विदीर्ण कर डालते हैं (परंतु यहाँ निष्फल हो गये)। यह क्या बात है ? इस विषयमें मुझे महान् आश्चर्य हो रहा है' ॥ ३४ ॥

तमुवाच ततः कृष्णः प्रहसन्निव भारत ।
महद्भूतं निकुम्भोऽयं कौन्तेय शृणु विस्तरात् ॥ ३५ ॥

भारत ! तब श्रीकृष्णने हँसते हुए-से कहा—'कुन्तीनन्दन ! यह निकुम्भ एक महान् भूत है। इसका परिचय विस्तारपूर्वक सुनो ॥ ३५ ॥

पुरा गत्वोत्तरकुरूंस्तपश्चक्रे महासुरः ।
शतं वर्षसहस्राणां देवशत्रुर्दुरानदः ॥ ३६ ॥

'पूर्वकालमें इस दुर्जय देवद्रोही महान् असुरने उत्तरकुरुमें जाकर एक लाख वर्षोंतक तपस्या की थी ॥ ३६ ॥

अथैनं छन्दयामास वरेण भगवान् हरः ।
स वव्रे त्रीणि रूपाणि न वध्यानि सुरासुरैः ॥ ३७ ॥

'तब भगवान् शिवने इसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये आज्ञा दी। उस समय इसने महादेवजीसे तीन रूप माँगे, जो देवताओं और असुरोंके लिये अवध्य हों ॥ ३७ ॥

तमुवाच महादेवे भगवान् वृषभध्वजः ।
मम वा ब्राह्मणानां वा विष्णोर्वाप्रियमचरन् ॥ ३८ ॥
भविष्यसि हरेर्वध्यो न त्वन्यस्य महासुर ।
ब्रह्मण्योऽहं च विष्णुश्च विप्राणां परमा गतिः ॥ ३९ ॥

'तब महान् देव भगवान् वृषभध्वजने इससे कहा—महान् असुर ! यदि तुम मेरा, ब्राह्मणोंका अथवा भगवान् विष्णुका अप्रिय करोगे तो श्रीहरिके हाथसे मारे जाओगे, दूसरे किसीके द्वारा नहीं; क्योंकि मैं और विष्णु दोनों ब्राह्मणोंके हितैषी हैं। उनके परम आश्रय हैं ॥ ३८-३९ ॥

स एष सर्वशस्त्राणामवध्यः पाण्डुनन्दन ।
त्रिदेहोऽतिप्रमाथी च वरमत्तश्च दानवः ॥ ४० ॥

'पाण्डुनन्दन ! वही यह तीन शरीर धारण करनेवाला अत्यन्त प्रमथनशील दानव है, जो वरदान पाकर मदमत्त हो उठा है। यह सम्पूर्ण शस्त्रोंद्वारा अवध्य है ॥ ४० ॥

भानुमत्यापहरणे देहोऽस्यैको हतो मया ।
अवध्यं षट्पुरं देहमिदमस्य दुरात्मनः ॥ ४१ ॥

'भानुमतीके अपहरणके समय मैंने इसके एक शरीरको नष्ट कर दिया था। यह अवध्य षट्पुर इस दुरात्माका दूसरा शरीर है ॥ ४१ ॥

दितिं शुश्रूषति ह्येको देहोऽस्य तपसान्वितः ।
अन्यस्तु देहो घोरोऽस्य येनावसति षट्पुरम् ॥ ४२ ॥

'तथा इसका एक तपस्वी शरीर दिति देवीकी सेवामें