भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 569, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 569

विष्णुपर्व ] चतुरशीतितमोऽध्यायः [ ५४७


जो उस गुफामे निकलनेके मार्गको नहीं देख पाता था, उसमें फेंक देनेके लिये उद्यत हो गये ॥ ४५-४६ ॥

प्रमथ्य तरसा कर्णे यतन्तं रणमूर्धनि ।
जग्राह बलवान् कार्ष्णिः प्रस्फुरन्तं ततस्ततः ॥ ४७ ॥
विनद्य च गुहां वीरो घोरां मायामयीं नृप ।

नरेश्वर ! बलवान् वीर श्रीकृष्णकुमारने युद्धके मुहानेपर विजयके लिये प्रयत्न करते हुए कर्णको वेगपूर्वक पटककर उसके उछल कूद मचाने या छटपटानेपर भी पकड़ लिया और गरजकर उसे घोर मायामयी गुफामें (फेंकनेका विचार किया) ॥ ४७ ॥

दुर्योधनं च राजानं विराटद्रुपदावपि ॥ ४८ ॥
शकुनिं चैव शल्यं च नीलं चापि नदीसुतम् ।
विन्दानुविन्दौ राजानौ जरासंधं च भारत ॥ ४९ ॥
त्रिगर्तान् मालवांश्चैव वासन्त्यांश्च महाबलान् ।
धृष्टद्युम्नादिकांश्चैव पञ्चालानस्त्रकोविदान् ॥ ५० ॥
तथाह्वतिमुवाचेदं मातुलं रुक्मिमेव च ।
शिशुपालं च राजानं भगदत्तं च भारत ॥ ५१ ॥

भारत ! इसी तरह उन्होंने राजा दुर्योधन, विराट, द्रुपद, शकुनि, शल्य, नील, भीष्म, राजा विन्द और अनुविन्द तथा जरासंधको, त्रिगर्त, मालव एवं महाबली वासन्त्यगणोंको और अस्त्रज्ञानमें निपुण धृष्टद्युम्न आदि पाञ्चाल वीरोंको भी पकड़ लिया। फिर अपने मामा आह्वति और रुक्मीको एवं राजा शिशुपाल और भगदत्तको सम्बोधित करके कहा—॥ ४८-५१ ॥

सम्बन्धं च गुरुत्वं च मानयामि नराधिपाः ।
गुहामिमां घोररूपां यत्र प्रक्षेपयामि वः ॥ ५२ ॥
बिल्वोदकेश्वरेणाहमाज्ञप्तः शूलपाणिना ।
प्रक्षेतव्या नरेन्द्रास्ते गुहायामिति धीमता ॥ ५३ ॥

'नरेश्वरो ! हमारे साथ आपलोगोंका जो सम्बन्ध और गुरुत्व है, उसका मैं आदर करता हूँ तो भी आपलोगोंको इस भयंकर गुफामें जहाँ फेंक रहा हूँ, वहाँ फेंकनेके लिये बुद्धिमान् शूलपाणि भगवान् बिल्वोदकेश्वरने मुझे आज्ञा दी है। उन्होंने कहा है कि तुम सब राजाओंको गुफामें फेंक दो ॥

आश्रित्य शाम्बरीं मायां निकुम्भेन महात्मना ।
प्रक्षिप्तान् यादवांश्चैव मोक्षयिष्यामि सर्वथा ॥ ५४ ॥

'महामनस्वी निकुम्भने शाम्बरी मायाका आश्रय लेकर जिन यादवोंको गुफामें डाल रक्खा है, उन्हें मैं सर्वथा छुड़ा लूँगा' ॥ ५४ ॥

इत्युक्तो शिशुपालस्तु राजा सेनापतिस्तथा ।
शरैस्ततर्द तान् भैमान् प्रद्युम्नं च विशेषतः ॥ ५५ ॥

उनके ऐसा कहनेपर सेनापति राजा शिशुपालने अपने बाणोंद्वारा उन भैभों (यादवो) तथा विशेषतः प्रद्युम्नको पीडित कर दिया ॥ ५५ ॥

बिल्वोदकेश्वरं देवं रौक्मिणेयो नमस्य च ।
आरभन्नृपतिं बद्धुं शिशुपालं महाबलम् ॥ ५६ ॥

तब रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नने बिल्वोदकेश्वरको नमस्कार करके महाबली राजा शिशुपालको बाँधना आरम्भ किया ॥

ततः पाशसहस्राणि गृह्य प्रवरोत्तमः ।
शैलादिरब्रवीद् वीरं रौक्मिणेयं महाबलम् ॥ ५७ ॥

तत्पश्चात् रुद्रदेवके पार्षदोंमें श्रेष्ठ नन्दीने एक सहस्र पाश लेकर महाबली रुक्मिणीकुमार वीर प्रद्युम्नसे कहा—॥

बिल्वोदकेश्वरो देवः प्राह त्वां यदुनन्दन ।
सर्वं कुरु तथा रात्र्यां चोक्तस्त्वं भो यथा मया ॥ ५८ ॥

'यदुनन्दन ! बिल्वोदकेश्वरने तुम्हें यह संदेश दिया है कि मैंने जैसा तुमसे कहा है, उसके अनुसार तुम रातमें सब कार्य करो ॥ ५८ ॥

कन्यार्थं रत्नलब्धांस्तु बद्ध्वा चेमान् नराधिपान् ।
पाशैस्त्वमेव मोक्तुं च प्रमाणं यदुनन्दन ॥ ५९ ॥

'यदुनन्दन ! कन्याओं और रत्नोंपर लुभाये हुए इन राजाओंको पाशोंसे बाँधकर फिर इन्हें मुक्त करनेमें तुम्हीं प्रमाण हो—तुम्हीं चाहो तो उन्हें छोड़ सकते हो ॥ ५९ ॥

असुरांस्तु महाबाहो निःशेषान् कर्तुमर्हसि ।
एवमेव च वक्तव्यस्त्वया वीर जनार्दनः ॥ ६० ॥

'वीर महाबाहो ! तुम इन असुरोंको निःशेष कर डालो—इनमेसे एकको भी जीवित न छोड़ो। तुम्हे जनार्दनसे भी ऐसा ही कहना चाहिये' ॥ ६० ॥

ततः स भगदत्तं च शिशुपालं च भूमिप ।
आह्वितिं चैव रुक्मिं च शेषांश्चान्यान् नराधिपान् ॥ ६१ ॥
बबन्ध हरदत्तैस्तैः पाशैरुत्तमवीर्यधृक् ।
मायामयीं गुहां चैवमानयत् कुरुनन्दन ॥ ६२ ॥

पृथ्वीपते ! कुरुनन्दन ! तदनन्तर उत्तम बल धारण करनेवाले प्रद्युम्नने भगवान् शङ्करके दिये हुए पाशोंसे राजा भगदत्त, शिशुपाल, आह्वृति, रुक्मी तथा शेष अन्य नरेशोंको भी बाँधा और उन सबको मायामयी गुफामें ले आये ॥

बद्ध्वा च रौक्मिणेयोऽथ निःश्वसन्त इवोरगान् ।
अनिरुद्धं चकाराथ रक्षितारं स्वमात्मजम् ॥ ६३ ॥

रुक्मिणीकुमारने फुफकारते हुए सर्पोंके समान लंबी साँस खींचते हुए राजाओंको बाँधकर डाल दिया और अपने पुत्र अनिरुद्धको उनका रक्षक नियुक्त कर दिया ॥ ६३ ॥

तेषां निरवशेषेण बबन्ध यदुनन्दनः ।
सेनापतीन् क्षत्रियांश्च कोषाध्यक्षांश्च भारत ॥ ६४ ॥
हस्त्यश्वरथवृन्दांश्च चकार च तथाऽऽत्मसात् ।

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