विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 570, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५४८ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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भारत ! यदुनन्दन प्रद्युम्नने उनमेंसे किसीको भी बिना बाँधे नहीं छोड़ा । फिर उनके क्षत्रिय-सेनापतियों, कोषाध्यक्षों तथा हाथी, घोड़ों और रथके समूहोंको भी अपने अधीन कर लिया ॥ ६४३॥
अव्यग्रस्तु ततो हन्तुमसुरानुद्यतः प्रभो ॥ ६५ ॥
संनद्ध एव चोवाच ब्रह्मदत्तं द्विजोत्तमम् ।
विस्रब्धं वर्ततां कर्म मा भैः पश्य धनंजयम् ॥ ६६ ॥
प्रभो ! तत्पश्चात् अव्यग्र (शान्त) भावसे स्थित हो वे असुरोंको मार डालनेके लिये उद्यत हो गये और संनद्ध रहकर द्विजश्रेष्ठ ब्रह्मदत्तसे बोले—'ब्रह्मन् ! आप निर्भय हो अपना यज्ञकर्म चालू रखें। देखिये, अर्जुन आपकी रक्षामें खड़े हैं ॥
न देवेभ्यो नासुरेभ्यो नागेभ्यो द्विजसत्तम ।
भयं हि विद्यते तस्य गोप्तारो यस्य पाण्डवाः ॥ ६७ ॥
'द्विजश्रेष्ठ ! पाण्डव जिसके रक्षक हों, उसे न तो देवताओंसे, न असुरोंसे और न नागोंसे ही भय प्राप्त हो सकता है ॥ ६७ ॥
न चासुरैस्तव सुताः स्पृष्टाः खल्वपि चेतसा ।
यज्ञवाटे निरीक्ष्यन्तां मायया निहिता मया ॥ ६८ ॥
'असुरोंने आपकी पुत्रियोंका मनसे भी स्पर्श नहीं किया है। आप यज्ञमण्डपमें देखिये, मैंने मायाद्वारा उन्हें छिपाकर वहीं रख छोड़ा है' ॥ ६८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि षट्पुरवधे चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें षट्पुरवधविषयक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८४ ॥
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः
निकुम्भका जयन्तसे पराजित होकर भगवान् श्रीकृष्णके साथ युद्ध करना, श्रीकृष्णका अर्जुनको निकुम्भका चरित्र बताना, आकाशवाणीकी प्रेरणासे सुदर्शन चक्रद्वारा निकुम्भका वध करना और ब्रह्मदत्तको षट्पुरनगर देकर द्वारकाको प्रस्थान करना
वैशम्पायन उवाच
रुद्धेषु भूमिपालेषु सानुगेषु विशाम्पते ।
आविवेशासुरांश्चाथ कश्मलं जनमेजय ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—प्रजानाथ ! जनमेजय ! जब अनुचरोंसहित सब भूपाल गुफामें बंद कर दिये गये, तब असुरोंपर मोह छा गया ॥ १ ॥
दिशः प्रतस्युस्ते वीरा वध्यमानाः समन्ततः ।
कृष्णानन्तप्रभृतिभिर्यदुभिर्युद्धदुर्मदैः ॥ २ ॥
श्रीकृष्ण, बलराम आदि रणदुर्मद यादवोंद्वारा सब ओरसे मारे जाते हुए वीर असुर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर पलायन करने लगे ॥ २ ॥
निकुम्भस्तानथोवाच रुषितो दानवोत्तमः ।
भित्त्वा प्रतिज्ञां किं मोहाद् भयार्तार्यात विह्वलाः ॥ ३ ॥
यह देख दानवश्रेष्ठ निकुम्भ रोषमें भरकर उनसे बोला—'अरे ! तुमलोग मोहवश अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर भयसे पीड़ित और विह्वल होकर क्यों भागे जा रहे हो ? ॥ ३॥
हीनप्रतिज्ञाः काँल्लोकान् प्रयास्यथ पलायिताः ।
अगत्वापचितिं युद्धे ज्ञातीनां कृतनिश्चयाः ॥ ४ ॥
'प्रतिज्ञाहीन होकर भाग जानेवाले तथा पहले बदला लेनेका निश्चय करके भी युद्धमें अपने भाई-बन्धुओंका ऋण उतारे बिना पीठ दिखानेवाले तुमलोग किन लोकोंमें जाओगे ? ॥ ४ ॥
फलं जित्वेह भोक्तव्यं रिपून् समरकर्कशान् ।
हतेन चापि शूरेण वस्तव्यं त्रिदिवे सुखम् ॥ ५ ॥
'समराङ्गणमें निर्दयतापूर्वक जूझनेवाले शत्रुओंको जीतकर इस लोकमें उत्तम फल (राज्य आदि) का उपभोग प्राप्त होगा अथवा रणमें मारे जानेपर शूरवीरको स्वर्गलोकमें सुखदायक निवास सुलभ होगा ॥ ५ ॥
पलायित्वा गृहं गत्वा कस्य द्रक्ष्यथ हे मुखम् ।
दारान् वक्ष्यथ किं चापि धिग् धिक् किं किं न लज्जथ ॥ ६ ॥
'हे दैत्यो ! भागकर घर जाकर किसका मुँह देखोगे (अथवा किसे मुँह दिखाओगे) ? अपनी पत्नियोंसे क्या कहोगे ? धिक्कार है, धिक्कार है। क्यों ? क्यों तुम्हें लज्जा नहीं आती ?' ॥ ६ ॥
एवमुक्ता निवृत्तास्ते लज्जमाना नृपासुराः ।
द्विगुणेन च वेगेन युयुधुर्यदुभिः सह ॥ ७ ॥
नरेश्वर ! निकुम्भके ऐसा कहनेपर वे असुर लज्जित होकर लौट पड़े और दुगुने वेगसे यादवोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ७ ॥
उत्सवे युद्धशौण्डानां नानाप्रहरणैर्नृप ।
ये यान्ति यज्ञवाटं तं तान् निहन्ति धनंजयः ॥ ८ ॥
यमौ भीमश्च राजा च धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
द्यां प्रयाताश्चाद्यनैन्द्रिः प्रवरश्च द्विजोत्तमः ॥ ९ ॥
राजन् ! नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा युद्धकुशल