भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 568
५४६श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

निकुम्भ, कृतवर्मा, चारुदेष्ण, भोज, वैतरण, सनत्कुमार, जाम्बवतीपुत्र ऋक्ष, निशठ, उल्मुक तथा दूसरे-दूसरे बहुत से भोजवंशियोंको उठा ले गया ॥ २८-२९ ॥

न तस्य ददृशे देहो मायाच्छन्नो जनेश्वर।
नयतो यादवान् घोरान्गुहां पट्ट्पुरसंज्ञिताम् ॥ ३०॥

जनेश्वर ! घोर यादव वीरोंको पट्ट्पुर नामवाली गुफामें ले जाते समय उस असुरकी देह दिखायी नहीं देती थी; क्योंकि वह उसकी मायासे आच्छादित थी ॥ ३० ॥

तद् दृष्ट्वा कदनं घोरं भैमानां भयवर्धनः।
चुकोप भगवान् कृष्णो बलः सत्यक एव च ॥ ३१ ॥

भीमवंशियोंका वह घोर संहार देखकर शत्रुओंका भय बढ़ानेवाले भगवान् श्रीकृष्ण, बलराम और सात्यकि कुपित हो उठे ॥ ३१ ॥

सविशेषं तथा कामः साम्बश्च परवीरहा।
अनिरुद्धश्च दुर्धर्षो भैमाश्च बहवोऽपरे ॥ ३२॥

कामावतार प्रद्युम्नको विशेष क्रोध हुआ। शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले साम्ब, दुर्धर्ष वीर अनिरुद्ध तथा दूसरे बहुत-से भीमवंशी यादव भी रोषमें भर गये ॥ ३२ ॥

ततः शार्ङ्गयुधः शार्ङ्गं कृत्वा सज्यं नरेश्वर।
दानवेषु प्रवृत्तेषु तृणेष्विव हुताशनः ॥ ३३॥

नरेश्वर ! शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले श्रीकृष्णने अपने उस धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी और जैसे अग्नि तिनकोंमें प्रवेश करती हो, उसी प्रकार वे दानवोंपर धनुषसे बाण बरसाने लगे ॥ ३३ ॥

तं दृष्ट्वा दानवा देवमभिदुद्रुवुरीश्वरम्।
शलभाः कालपाशार्ताः प्रदीप्तमिव पावकम् ॥ ३४ ॥

उन भगवान् गोविन्ददेवको वहाँ देखकर सब दानव उन्हींपर टूट पड़े; ठीक वैसे ही, जैसे कालपाशसे पीड़ित हुए पतिंगे जलती हुई आगमें कूद पड़ते हैं ॥ ३४ ॥

समुत्सृज्य शतघ्नीश्च परिघांश्च सहस्रशः।
शूलानि चाग्नितुल्यानि प्रदीप्तांश्च परश्वधान् ॥ ३५ ॥

वे सहस्रों शतघ्नी, परिघ, अग्नितुल्य त्रिशूल तथा प्रज्वलित हुए फरसे चलाने लगे ॥ ३५ ॥

पर्वताग्राणि वृक्षांश्च घोराश्च विपुलाः शिलाः।
उत्क्षिप्य च गजान्मत्तान् रथानपि हयानपि ॥ ३६॥

पर्वतोंके शिखर, वृक्ष, भयंकर बड़ी-बड़ी शिलाएँ, मतवाले हाथी, रथ और घोड़े—इन सबको उठा-उठाकर भगवान् श्रीकृष्णपर फेंकने लगे ॥ ३६ ॥

नारायणाग्निस्तान् सर्वान् ददाह प्रहसन्निव।
बाणार्चिषा महातेजा जगद्धितकरो हरिः ॥ ३७ ॥

परंतु जगत्का हित करनेवाले महातेजस्वी भगवान् नारायण हरिने हँसते हुए-से अग्निरूप होकर अपनी बाणमयी लपटोंसे उन सबको जलाकर भस्म कर दिया ॥ ३७ ॥


शारदं वर्षणं यद्वत् सेहे धीरो गवां पतिः।
तद्वद् यदुवृषः सेहे बाणवर्षमरिंदमः ॥ ३८ ॥

जैसे धीर साँड़ शरद्ऋतुकी वर्षाको चुपचाप सहन करता है, उसी प्रकार शत्रुओंका दमन करनेवाले यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण दैत्योंकी बाणवर्षाको धैर्यपूर्वक सहन करते रहे ॥ ३८ ॥

न सेहिरेऽसुरा बाणान् नारायणधनुश्च्युतान्।
घर्षं पर्जन्यविहितं वालुकासेतवो यथा ॥ ३९॥

परंतु जैसे बालूके बने हुए सेतु (पुल) मेघोंद्वारा की गयी वर्षाका वेग नहीं सह सकते, उसी प्रकार वे असुर नारायण (श्रीकृष्ण) के धनुषसे छूटे हुए बाणोंको नहीं सह सके ॥ ३९ ॥

न शेकुः प्रमुखे स्थातुं कृष्णस्यासुरसत्तमाः।
व्यादितास्यस्य सिंहस्य वृषभा इव भारत ॥ ४० ॥

भारत ! जैसे मुँह बाये हुए सिंहके सामने बैल नहीं ठहर सकते, उसी प्रकार वे बड़े-बड़े असुर श्रीकृष्णके सम्मुख खड़े नहीं रह सके ॥ ४० ॥

ते वध्यमानाः कृष्णेन दिवमाचक्रमुस्तदा।
जीविताशां वहन्तस्तु नारायणभयार्दिताः ॥ ४१ ॥

नारायणके भयसे पीड़ित हो उनके द्वारा मारे जाते हुए वे असुर जीवनकी आशाका भार वहन करते हुए आकाशमें उड़ चले ॥ ४१ ॥

तानाकाशगतानैन्द्रिर्जयन्तः प्रवरस्तथा।
निजघ्नतुः शरैर्घोरैर्ज्वलतार्चिःसमैः प्रभो ॥ ४२ ॥

प्रभो ! आकाशमें गये हुए उन असुरोंको जयन्त और प्रवर प्रज्वलित अग्नि-शिखाके समान भयंकर बाणोंद्वारा मार गिराते थे ॥ ४२ ॥

निपेतुस्सुराणां तु शिरांसि धरणीतले।
तृणराजफलानीव मुक्तानि शिखरात् तरोः ॥ ४३ ॥

उन असुरोंके कटे हुए सिर वृक्ष-शिखरसे टूटकर गिरे हुए तालफलोंके समान पृथ्वीपर गिरने लगे ॥ ४३ ॥

निपेतुर्बाहवश्छिन्ना दैत्यानां वसुधातले।
कालेनोपहता वीर पञ्चवक्त्रा इवोरगाः ॥ ४४ ॥

वीर ! दैत्योंकी कटी हुई भुजाएँ पृथ्वीपर कालके मारे हुए पाँच मुखवाले सर्पोंके समान गिर रही थीं ॥ ४४ ॥

रौक्मिणेयस्ततः सृष्ट्वा घोरां मायामयीं गुहाम्।
अदृश्यनिष्क्रमं वीरः क्षत्रं प्रक्षेप्तुमुद्यतः ॥ ४५ ॥
गदेन सह धर्मात्मा सारणेन सुतेन च।
साम्बेन चापरैश्चापि पूर्वं ये न प्रवेशिताः ॥ ४६॥

तदनन्तर गद, सारण, अनिरुद्ध, साम्ब तथा अन्य वीरोंके साथ, जिन्हें निकुम्भने पहले अपनी गुफामें नहीं घुसाया था, वीर धर्मात्मा रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न घोर मायामयी गुफाकी सृष्टि करके समस्त क्षत्रिय नरेशोंके समुदायको,