भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 566, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 566

५४४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे च्छनीय व्यक्तिको उधरसे आनेके लिये मार्ग नहीं मिल पाता फिरकर सेनाकी देखभाल करनेके लिये नियुक्त कर था। साथ ही उन्होंने अपने पुत्र प्रद्युम्नको सब ओर घूम- दिया था ॥ ५६ ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि षट्पुरवधे कृष्णस्य षट्पुरगमने त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥ इस प्रकार श्रीमद्भारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें षट्पुरवधके प्रसङ्गमें श्रीकृष्णका षट् पुरगमनविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥ चतुरशीतितमोऽध्यायः श्रीकृष्णद्वारा यादव-सेनाकी युद्धके लिये नियुक्ति, दानवोंका निष्क्रमण, निकुम्भद्वारा कुछ यादव वीरोंका गुफामें बंदी होना, श्रीकृष्णके द्वारा दानव-सैनिकोंका संहार, प्रद्युम्नद्वारा राजसैनिकोंका गुफामें अवरोध तथा ब्रह्मदत्तको सान्त्वना वैशम्पायन उवाच श्रीकृष्णने उन दोनोंको प्रद्युम्नकी भाँति आकाशमें ही मुहूर्ताभ्युदिते सूर्ये जनचक्षुषि निर्मले । (ऊपरकी ओरसे सेनाकी रक्षाके लिये) नियुक्त कर दिया ॥६॥ बलः कृष्णः सात्यकिश्च तार्क्ष्यमारुरुहुस्तदा ॥ १ ॥ ततः कृष्णस्य वचनादाहतो रणदुन्दुभिः । बद्धगोधाङ्गुलित्राणा दंशिता युद्धकाङ्क्षिणः । जलजा मुरजाश्चैव वाद्यान्येवापराणि च ॥ ७ ॥ बिल्वोदकेश्वरं देवं नमस्कृत्य सुरोत्तमम् ॥ २ ॥ तदनन्तर श्रीकृष्णके कहनेसे युद्धका डंका बजाया गया। आवर्तया जले स्नात्वा रुद्रेण वरदत्तया । शङ्ख, मुरज तथा अन्य बाजे भी बज उठे ॥ ७ ॥ गङ्गायाः पुरुषार्दूल रुद्रवाक्येन पुण्यया ॥ ३ ॥ मकरो रचितो व्यूहः साम्ब्रेन च गदेन च । वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! कुरुश्रेष्ठ ! सारणश्चोद्धवश्चैव भोजो वैतरणस्तथा ॥ ८ ॥ जब सूर्योदय हुए दो ही घड़ी बीती थी और लोगोंके नेत्र निर्मल अनाधृष्टिश्च धर्मात्मा पृथुर्विपृथुरेव च । हो गये थे, उस समय बलभद्र, श्रीकृष्ण और सात्यकि—ये कृतवर्मा च दंष्ट्रश्च निचङ्कुरारिमर्दनः ॥ ९ ॥ तीनों गरुड़पर सवार हुए। उन सबने अपने हाथोंमें गोधाचर्मके साम्ब और गदने यादव सेनाका मकरव्यूह बनाया। बने हुए दस्ताने बाँध रक्खे थे और कवच धारण करके सारण, उद्धव, भोज, वैतरण, धर्मात्मा अनाधृष्टि, पृथु, युद्धके लिये इच्छुक थे। उन्होंने सबसे पहले, जिसे रुद्रदेवने विपृथु, कृतवर्मा, दंष्ट्र तथा शत्रुमर्दन निचङ्क—ये सब उस वर दिया था और जो उन्हींके वचनसे पुण्यमयी हो गयी व्यूहके अग्रभागमें खड़े थे ॥ ८-९ ॥ थी, उस आवर्ता नामवाली गङ्गामें स्नान करके सुरश्रेष्ठ सनत्कुमारो धर्मात्मा चारुदेष्णश्च भारत । बिल्वोदकेश्वरदेवको नमस्कार किया था (इसके बाद वे अनिरुद्धसहायौ तौ पृष्ठानीकं ररक्षतुः ॥ १० ॥ युद्धकी व्यवस्थामें लगे थे।) ॥ १-३ ॥ शेषा यादवसेना तु व्यूहमध्ये व्यवस्थिता । प्रद्युम्नमग्रे सैन्यस्य विधाति स्थाप्य मानदः । रथैरश्वैर्नरैर्नागैर्व्याकुला कुलवर्धन ॥ ११ ॥ रक्षार्थं यज्ञवाटस्य पाण्डवान् विनियुज्य च ॥ ४ ॥ धर्मात्मा सनत्कुमार और चारुदेष्ण ये—दोनों अनिरुद्धके शेषां सेनां गुहाद्वारि भगवान् विनियुज्य च । साथ रहकर सेनाके पृष्ठभागकी रक्षा करने लगे। अपने जयन्तमथ सस्मार प्रवरं च सतां गतिः ॥ ५ ॥ कुलकी वृद्धि करनेवाले नरेश ! रथों, घोड़ों, मनुष्यों और सबको मान देनेवाले, सत्पुरुषोंके आश्रयभूत श्रीकृष्णने हाथियोंसे भरी हुई शेष यादवसेना व्यूहके मध्यभागमें सबसे आगे प्रद्युम्नको सेनाकी रक्षाके लिये उसके ऊपरी भाग खड़ी थी ॥ १०-११ ॥ आकाशमें स्थापित किया। यज्ञमण्डपकी रक्षाके लिये पाण्डवोंको षट्पुरादपि निष्क्रान्ता दानवा युद्धदुर्मदाः । नियुक्त किया तथा शेष सेनाको गुफाके द्वारपर नियुक्त करके आरुह्य मेघनादांश्च गर्दभानपि हस्तिनः ॥ १२ ॥ भगवान् श्रीहरिने जयन्त और प्रवरको स्मरण किया ॥४-५॥ तदनन्तर षट्पुरसे भी रणदुर्मद दानव निकले । उनमेंसे तावापेततुरेवाथ स्वयं चापश्यतां तथा । कुछ मेघके समान गम्भीर शब्द करनेवाले गदहों और वियत्येव नियुक्तौ तौ प्रद्युम्न इव भारत ॥ ६ ॥ हाथियोंपर आरूढ थे ॥ १२ ॥ भरतनन्दन ! वे दोनों वहाँ आ पहुँचे और स्वयं ही मकराञ्छिशुमारांश्च द्रुतानपि च भारत । आकर उन्होंने भगवान्‌का दर्शन किया। तत्पश्चात् भगवान् महिषानपि खड्गांश्च उष्ट्रानपि च कच्छपान् ॥ १३ ॥

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