विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 565, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] त्र्यशीतितमोऽध्यायः [ ५४३
ताः कन्या भौममुख्यानां दत्ताः प्रायेण धीमता ।
अवशेषं शतं त्वेकं यदानीतं किल त्वया ॥ ४१ ॥
'बुद्धिमान् ब्रह्मदत्तने प्रायः उन सब कन्याओंका विवाह मुख्य-मुख्य यदुवंशियोंके साथ कर दिया है। केवल एक सौ शेष रह गयी थीं, जिन्हें तुम हर लाये हो ॥ ४१ ॥
तदर्थं यादवान् वीर योधयिष्यसि सर्वथा ।
सहायार्थं तु राजानो प्रियन्तां हेतुपूर्वकम् ॥ ४२ ॥
'वीर ! उनके लिये भी तुम्हें सर्वथा यादवोंके साथ युद्ध करना होगा। अतः तुम अपनी सहायताके लिये युक्तिपूर्वक यहाँ आये हुए राजाओंको अपने पक्षमे कर लो ॥ ४२ ॥
ब्रह्मदत्तसुतार्थं च रत्नानि विविधानि च।
दीयन्तां भूमिपालानां सहायार्थं महात्मनाम् ॥ ४३ ॥
आतिथ्यं क्रियतां चैव ये समेष्यन्ति वै नृपाः ।
'ब्रह्मदत्तकी पुत्रियोंके लिये उन महामनस्वी नरेशोंकी सहायता प्राप्त करनेके उद्देश्यसे तुम उन्हें नाना प्रकारके रत्न भेंट करो । जो राजा यहाँ आवें, उन सबका आतिथ्य-सत्कार करो' ॥ ४३१/२ ॥
एवमुक्ते तथा चक्रुरसुरास्तेऽतिहृष्टवत् ॥ ४४ ॥
लब्ध्वा पञ्चशतं कन्या रत्नानि विविधानि च।
यथार्हेण नरेन्द्रैस्ता विभक्ता भक्तवत्सलैः ॥ ४५ ॥
नारदजीके ऐसा कहनेपर असुरोंने अत्यन्त प्रसन्न होकर वैसा ही किया। उन भक्तवत्सल नरेशोंने पाँच सौ कन्याएँ और नाना प्रकारके रत्न पाकर उन्हें यथोचित रीतिसे आपसमें बाँट लिया ॥ ४४-४५ ॥
ऋते पाण्डुसुतान् वीरान् वारिता नारदेन ते ।
निमेषान्तरमात्रेण तत्र गत्वा महात्मना ॥ ४६ ॥
केवल पाँचों पाण्डवोंको छोड़कर और सबने कन्याओं और रत्नोंका भाग ग्रहण किया था। महात्मा नारदजीने पलक मारते-मारते वहाँ पहुँचकर वीर पाण्डवोंको उनका भाग लेनेसे रोक लिया था ॥ ४६ ॥
तुष्टैस्तैरसुरा ह्युक्ता राजन् भूमिसत्तमैः ।
सर्वकामसमृद्धार्थैर्भवद्भिः खगमैः स्वयम् ॥ ४७ ॥
अर्चिताः स्म यथान्यायं क्षत्रं किं वः प्रयच्छतु ।
क्षत्रं चार्चितपूर्वं हि दिव्यैर्वीरैर्भवद्विधैः ॥ ४८ ॥
राजन् ! रत्न और कन्या पाकर वे भूपालशिरोमणि बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने असुरोंसे कहा--'आपलोग समस्त मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न तथा स्वयं आकाशमें विचरने-वाले हैं तो भी आपने न्यायोचित रीतिसे हमारा सत्कार किया है; अतः बताइये, यह क्षत्रियसमूह आपलोगोंको क्या दे ? आप-जैसे दिव्य वीरोंने पहले-पहल क्षत्रिय-समाजका पूजन किया है' ॥ ४७-४८ ॥
निकुम्भोऽथाब्रवीद् धृष्टः क्षत्रं सुररिपुस्तदा ।
अनुवर्णयित्वा क्षत्रस्य माहात्म्यं सत्यमेव च ॥ ४९ ॥
यह सुनकर हर्षमें भरे हुए देववैरी निकुम्भने क्षत्रियोंके यथार्थ माहात्म्यका बारंबार वर्णन करके उस समय उनसे इस प्रकार कहा-॥ ४९ ॥
युद्धं नो रिपुभिः सार्द्धं भविष्यति नृपोत्तमाः ।
साहाय्यं दातुमिच्छामो भवद्भिस्तत्र सर्वथा ॥ ५० ॥
'श्रेष्ठ नरेशो ! हमारा अपने शत्रुओंके साथ युद्ध होने-वाला है। उसमें आपलोग सब प्रकारसे हमें सहायता प्रदान करें, यह हमारी इच्छा है' ॥ ५० ॥
एवमस्त्विति तानूचुः क्षत्रियाः क्षीणकिल्विषः ।
पाण्डवेयादृते वीराञ्छ्रुतार्थान्नारदाद् विभो ॥ ५१ ॥
प्रभो ! जिनके पाप क्षीण हो गये थे, उन क्षत्रियोंमेंसे वीर पाण्डवोंको छोड़कर अन्य सबने 'एवमस्तु' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। पाण्डव नारदजीसे सारी बात सुन चुके थे, इसलिये वे उनसे अलग रहे ॥ ५१ ॥
क्षत्रियाः संनिविष्टास्ते युद्धार्थं कुरुनन्दन ।
पत्न्यस्तु ब्रह्मदत्तस्य यज्ञवाटं गता अपि ॥ ५२ ॥
कृष्णोऽपि सेनया सार्द्धं प्रययौ षट्पुरं विभुः ।
कुरुनन्दन ! वे सब क्षत्रिय युद्धके लिये उद्यत हो वहीं डेरा डालकर डटे रहे। इधर ब्रह्मदत्तकी पत्नियाँ यज्ञशालामें प्रविष्ट हुईं और उधरसे सेनासहित भगवान् श्रीकृष्ण भी षट्पुरमें आ पहुँचे ॥ ५२१/२ ॥
महादेवस्य वचनमुद्वहन् मनसा नृप ॥ ५३ ॥
स्थापयित्वा द्वारवत्यामाहुकं पार्थिवं तदा ।
नरेश्वर ! महादेवजीके वचनको मन-ही-मन स्मरण करके द्वारकामें राजा उग्रसेनको बिठाकर भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ आये थे ॥ ५३१/२ ॥
स तया सेनया सार्द्धं पौराणां हितकाम्यया ॥ ५४ ॥
यज्ञवाटस्याविदूरे देवो निविविशे विभुः ।
देशे प्रवरकल्याणे वसुदेवप्रचोदितः ॥ ५५ ॥
भगवान् जनार्दनदेव उस सेनाके साथ आकर षट्पुर-वासियोंके हितकी कामनासे यज्ञमण्डपसे थोड़ी ही दूरपर उत्तम कल्याणमय प्रदेशमें वसुदेवकी आज्ञासे छावनी डालकर ठहर गये ॥ ५४-५५ ॥
दत्तगुल्माप्रतिसरं कृत्वा तं विधिवत् प्रभुः ।
प्रद्युम्नमटने श्रीमान् रक्षार्थं विनियुज्य च ॥ ५६ ॥
श्रीमान् भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ विधिपूर्वक रक्षक सैनिकोंके दल तैनात कर दिये, जिसके कारण किसी अवा-