विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 564, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें५४२ · श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
कर्म चासार्यते तत्र विधिदृष्टेन कर्मणा।
यद् विशिष्टं बहुगुणं तदभूच्च नराधिप ॥ २४॥
राजन् ! इधर शास्त्रीय विधिके अनुसार वहाँ यज्ञकर्मका सम्पादन होने लगा। जो विशिष्ट एवं बहुगुण सम्पन्न कार्य था, वह सब सम्पन्न हुआ ॥ २४ ॥
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ता राजानस्तत्र भारत।
सत्रे निमन्त्रिताः पूर्वं ब्रह्मदत्तेन धीमता ॥ २५॥
भारत ! इसी बीचमें वहाँ बहुत-से राजा आये, जिन्हें बुद्धिमान् ब्रह्मदत्तने पहलेसे ही यज्ञमें पधारनेके लिये निमन्त्रण दे रखा था ॥ २५ ॥
जरासंधो दन्तवक्त्रः शिशुपालस्तथैव च।
पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च मालवाः सगणास्तथा ॥ २६॥
रुक्मी चैवाहृतिश्चैव नीलो वा धर्म एव च।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ शल्यः शकुनिरेव च ॥ २७॥
राजनश्चापरे वीरा महात्मानो दृढायुधाः।
आवासिता नातिदूरे षट्पुरस्य च भारत ॥ २८॥
जरासंध, दन्तवक्त्र, शिशुपाल, पाण्डव, धृतराष्ट्रके सभी पुत्र, अपने गणोंसहित मालवनरेश, रुक्मी, आह्वृति, नील, धर्म, अवन्तीके विन्द और अनुविन्द, शल्य, शकुनि, दूसरे वीर नरेश, सुदृढ़ आयुध धारण करनेवाले दूसरे महा-मनस्वी वीर नरेश वहाँ पधारे थे। भरतनन्दन ! उन्हें षट्पुरसे थोड़ी ही दूरपर ठहराया गया ॥ २६-२८ ॥
तान् दृष्ट्वा नारदः श्रीमानचिन्तयदनिन्दितः।
क्षात्रस्य यादवानां च भविष्यति समागमः ॥ २९॥
उन सबको वहाँ उपस्थित देख साधु-महात्मा श्रीमान् नारदजीने सोचा, यहाँ यादवों तथा दूसरे क्षत्रियोंमें संघर्ष होगा ॥ २९ ॥
अत्र हेतुरहं युद्धे तस्मात् तत् प्रयताम्यहम्।
एवं संचिन्तयित्वाथ निकुम्भभवनं गतः ॥ ३०॥
इस युद्धमें मैं ही कारण बनूँगा; अतः उसके लिये अभीसे प्रयत्न आरम्भ करता हूँ। ऐसा सोचकर वे निकुम्भके घरमें गये ॥ ३० ॥
पूजितः स निकुम्भेन दानवैश्च तथापरैः।
उपविष्टः स धर्मात्मा निकुम्भमिदमब्रवीत् ॥ ३१ ॥
निकुम्भ तथा दूसरे-दूसरे दानवोंने वहाँ इनकी बड़ी आवभगत की। धर्मात्मा नारदजी वहाँ एक आसनपर बैठ-कर निकुम्भसे इस प्रकार बोले—॥ ३१ ॥
कथं विरोधं यदुभिः कृत्वा स्वस्थैरिहास्यते ।
यो ब्रह्मदत्तः स हरिः स हितस्य पितुः सखा ॥ ३२॥
'तुमलोग यादवोंके साथ विरोध करके यहाँ कैसे निश्चिन्त बैठे हुए हो। अरे भाई ! जो ब्रह्मदत्त हैं, वे ही श्रीकृष्ण हैं। क्योंकि वे ब्रह्मदत्त उन श्रीकृष्णके पिता वसुदेवके मित्र हैं॥
शतानि पञ्च भार्याणां ब्रह्मदत्तस्य धीमतः।
आनीता वसुदेवस्य सुतस्य प्रियकाम्यया ॥ ३३ ॥
'बुद्धिमान् ब्रह्मदत्तके पाँच सौ भार्याएँ हैं, जिन्हें वे वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये उनकी आराधना करके प्राप्त कर सके थे ॥ ३३ ॥
शतद्वयं ब्राह्मणीनां राजन्यानां शतं तथा।
वैश्यानां शतमेकं च शूद्राणां शतमेव च ॥ ३४ ॥
'उनकी स्त्रियोंमें दो सौ तो ब्राह्मणियाँ थीं, एक सौ क्षत्रिय-कन्याएँ, एक सौ वैश्य-कन्याएँ और एक सौ शूद्रोंकी कन्याएँ थीं ॥ ३४ ॥
ताभिः शुश्रूषितो धीमान् दुर्वासा धर्मवित्तमः।
तेन तासां वरो दत्तो मुनिना पुण्यकर्मणा ॥ ३५ ॥
'उन सबने धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् दुर्वासाकी सेवा की थी। उससे प्रसन्न होकर उन पुण्यकर्मा मुनिने उन्हें वर दिया ॥
एकैकस्तनयो राजन्नेकैका दुहिता तथा।
रूपेणानुपमाः सर्वा वरदानेन धीमतः ॥ ३६॥
'राजन् ! उन बुद्धिमान् मुनिके वरदानसे ब्रह्मदत्तकी प्रत्येक स्त्रीके एक-एक पुत्र और एक-एक कन्या हुई। उनकी वे सारी कन्याएँ अनुपम रूपवती हैं ॥ ३६ ॥
कन्या भवन्ति तनयास्तस्यासुर पुनः पुनः।
सङ्गमे सङ्गमे वीर भर्तृभिः शयने सह ॥ ३७॥
'वीर असुर ! उनकी वे कन्याएँ पतियोंके साथ शयन करते समय प्रत्येक संगमके अवसरपर कुमारी कन्याओंके समान कमनीय हो जाती हैं ॥ ३७ ॥
सर्वपुष्पमयं गन्धं प्रस्रवन्ति वराङ्गनाः।
सर्वदा यौवने न्यस्ताः सर्वाश्चैव पतिव्रताः ॥ ३८ ॥
'वे परम सुन्दरी कन्याएँ अपने शरीरसे सब प्रकारके फूलोंकी सुगन्ध प्रकट करती हैं, सदा युवावस्थामें ही स्थित रहती हैं और सब-की-सब पतिव्रताएँ हैं ॥ ३८ ॥
सर्वा गुणैरप्सरसां गीतनृत्यगुणोदयम्।
जानन्ति सर्वा दैतेय वरदानेन धीमतः ॥ ३९॥
'दैत्यकुमार ! ये सब अप्सराओंके समान गुणवती हैं और बुद्धिमान् दुर्वासाके वरदानसे संगीत और नृत्यके गुणोंको प्रकट करना जानती हैं ॥ ३९ ॥
पुत्राश्च रूपसम्पन्नाः शास्त्रार्थकुशलास्तथा।
स्वे स्वे स्थिता वर्णधर्मे यथावदनुपूर्वशः ॥ ४० ॥
'उनके सभी पुत्र रूप-सौन्दर्यसे सम्पन्न तथा शास्त्रार्थमें कुशल हैं और क्रमशः सभी यथावत्रूपसे अपने-अपने वर्णधर्ममें स्थित रहते हैं ॥ ४० ॥