भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 559

[विष्णुपर्व ] एकाशीतितमोऽध्यायः ५३७


शुभे ! गङ्गाव्रतमें एक सहस्र घड़ोंका दान करना चाहिये। वह समस्त कामनाओंका पूरक व्रत दुःखसे तारने और मनोरथोंकी पूर्ति करनेवाला है ॥ २९ ॥
यमभार्या चकाराथ व्रतं यामरथं शुभम् ।
हेमन्ते तत् तु कर्तव्यमाकाशे हरिवल्लभे ॥ ३० ॥
हरिवल्लभे ! यमराजकी पत्नीने यामरथ नामक शुभ व्रतका अनुष्ठान किया था। वह व्रत हेमन्त ऋतुमें खुले आकाशके नीचे करना चाहिये ॥ ३० ॥
इमानि चैव वाक्यानि ब्रूयादाकाशमास्थिता ।
स्नात्वा शुचिसमाचारा नमस्कृत्य पतिं शुभे ॥ ३१ ॥
शुभे ! पवित्र आचरणवाली स्त्री स्नानके पश्चात् पतिको नमस्कार करके खुले मैदानमें खड़ी ये निम्नाङ्कित वाक्य कहे—॥
चराम्यहं यामरथं हिमं पृष्ठेन धारये ।
पतिव्रता जीवपुत्रा भवेयं च पुरोऽधिका ॥ ३२ ॥
‘मैं अपनी पीठपर हिम (बर्फ या पाला) का आघात सहती हुई यामरथ व्रतका आचरण कर रही हूँ। मेरी यह कामना है कि मैं पतिव्रता, चिरंजीवी पुत्रोंकी माता और नारियोंमें अग्रगण्या होऊँ ॥ ३२ ॥
सपत्नीरधितिष्ठेयं पश्येयं चैव मा यमम् ।
सभर्तृपुत्रा जीवेयं चिरं च सुखमेव च ॥ ३३ ॥
‘सौतोंपर मेरा प्रभुत्व स्थापित हो, मैं कभी यमका दर्शन न करूँ और अपने पति एवं पुत्रोंके साथ चिरकालतक सुखपूर्वक जीवित रहूँ ॥ ३३ ॥
पतिलोकं च गच्छेयं भवेयं नन्दिनी तथा ।
सुचैला सृष्टहस्ता च स्वजनेष्टा गुणान्विता ॥ ३४ ॥
‘अन्तमें पतिलोकको प्राप्त होऊँ, अपने कुल-परिवारका आनन्द बढ़ानेवाली होऊँ। मेरे वस्त्र स्वच्छ रहें, मेरा हाथ शुद्ध हो, मैं स्वजनोंकी प्यारी एवं सद्गुणवती होऊँ’ ॥ ३४ ॥
एवं कृत्वा ततो विप्रं मधुना स्वस्ति वाचयेत् ।
तिलैरपि तथा कृष्णैः पायसेन तु भोजयेत् ॥ ३५ ॥
इस प्रकार व्रतको पूर्ण करके ब्राह्मणसे स्वस्तिवाचन कराये तथा उसे मधु और काला तिलसे मिश्रित खीर खिलाये ॥
एवं व्रतानि देवीभिः कृतान्यमरवर्णिनि ।
महादेव्या पुरोक्तानि रुद्रपत्नया हरिप्रिये ॥ ३६ ॥
देवोपम कान्तिवाली देवि ! हरिप्रिये ! इस प्रकार रुद्र-पत्नी महादेवी उमाद्वारा पूर्वकालमें बताये गये व्रतोंका अनुष्ठान पहलेकी देवियोंने किया है ॥ ३६ ॥
अहं ब्रवीमि तपसा मदीयेन समन्विताः ।
सर्वा द्रक्ष्यथ गुह्यानि व्रतकानि तथैव च ॥ ३७ ॥
पौराणान्युमया देव्या यानि दृष्टानि वै पुरा ।
कल्याणगुणयुक्तानि पावनानि शुभानि च ॥ ३८ ॥
मैं कहता हूँ, देवियो ! प्राचीन कालमें देवी उमाने जिन कल्याणमय गुणोंसे युक्त, पावन, गुणकारक एवं शुभ पुरातन व्रतोंका साक्षात्कार किया था, उन सबको तुम सब लोग मेरे तपोबलसे सम्पन्न होकर देखोगी ॥ ३७-३८ ॥

वैशम्पायन उवाच
रुक्मिणी व्रतकं चक्रे दृष्ट्वा व्रतकविस्तरम् ।
उमाया वरदानेन दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा ॥ ३९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! रुक्मिणीने उमाके वरदानके अनुसार दिव्यदृष्टिसे व्रतोंका विस्तार देखकर स्वयं भी एक ‘व्रत’ का अनुष्ठान किया ॥ ३९ ॥
उमाव्रतकवत् सर्वं वृषदानं तथाधिकम् ।
रत्नमालाप्रदानं च तथान्नं सार्वकामिकम् ॥ ४० ॥
उन्होंने सब कुछ उमाके व्रतके ही समान किया, किंतु वृषभदान, रत्नमाला-दान और सम्पूर्ण कामनाओंका पूरक अन्नदान—उनसे अधिक किया ॥ ४० ॥
तथा जाम्बवती चक्रे पुरोमाव्रतकं तथा ।
ददावभ्यधिकं सा तु रत्नवृक्षं मनोहरम् ॥ ४१ ॥
जाम्बवतीने भी वैसा ही किया, जैसा पहले उमाने किया था; किंतु उन्होंने मनोहर रत्नमय वृक्षका दान उनकी अपेक्षा अधिक किया ॥ ४१ ॥
सत्या ददौ तथैवाथ पुरोमाव्रतकं तथा ।
पीतमभ्यधिकं वासस्तया दत्तमुमात्रते ॥ ४२ ॥
सत्याने भी पूर्वकालमे उमाद्वारा किये गये व्रतकके समान ही दान किया; परंतु उस उमाव्रतमें उन्होंने पीतवस्त्रका दान अधिक किया ॥ ४२ ॥
रोहिण्याथ च फाल्गुन्या मघया च पुरातने ।
व्रतानि खलु दत्तानि बहूनि कुलवर्धन ॥४३ ॥
कुलकी वृद्धि करनेवाले नरेश ! पुरातन कालमें रोहिणी, फाल्गुनी और मघाने भी बहुत-से व्रत-दान किये थे ॥ ४३ ॥
ददौ शतभिषा चैव व्रतकं पुण्यलक्षणम् ।
येन नक्षत्रमुख्यत्वं जगाम कुरुनन्दन ॥ ४४ ॥
कुरुनन्दन ! शतभिषाने भी पुण्यको लक्षित करानेवाले व्रतकका दान किया था, जिससे उसने नक्षत्रोंमे मुख्यता प्राप्त कर ली ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे उमाव्रतकथनसमाप्तौ
पारिजातहरणकथनसमाप्तौ चैकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसंगमें उमा-व्रतकथन-समाप्तिविषयक इक्यासीवाँ* अध्याय पूरा हुआ ॥ ८१ ॥


* कुछ लोग यहाँ हरिवंश ग्रन्थके पूर्वार्ध भागकी समाप्ति मानते हैं और आगेके ग्रन्थको उत्तरार्धके अन्तर्गत बताते हैं ।