भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 558

५३६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

आजसे समस्त देवताओंकी पत्नियाँ जो पुराणप्रतिपादित सनातन पुण्यकविधि है, उसका दर्शन करेंगी ॥ १२ ॥
मुनिश्च नारदः कृत्स्नं पौराणं ज्ञास्यते विधिम् ।
उपवासस्य धर्मात्मा व्रतकानां तथैव च ॥ १३ ॥
धर्मात्मा नारद मुनि भी व्रत-उपवासकी सम्पूर्ण पौराणिक विधिके ज्ञाता होंगे ॥ १३ ॥
अदितिस्तपसेन्द्राणी त्वं च सोमसुते वरे ।
प्रवर्तने पुण्यकानां व्रतकानां च सर्वदा ॥ १४ ॥
कीर्तनीयाः सतीनां हि भविष्यथ गुणान्विताः ।
श्रेष्ठ सोमकुमारी ! अदिति देवी, इन्द्राणी और तुम भी अपनी तपस्यासे उस विधिको जानोगी । पुण्यों और व्रतोंके प्रवर्तन (आरम्भ) में सदा तुम सद्गुणवती देवियोंका सती नारियोंद्वारा कीर्तन होगा ॥ १४ १/२ ॥
उपवासव्रतविधिं यथावदिह कृत्स्नशः ॥ १५ ॥
प्रादुर्भावेषु सर्वेषु भार्या विष्णोर्महात्मनः ।
ज्ञास्यन्ति पुण्यकविधिं नित्यमेव सनातनम् ॥ १६ ॥
महात्मा विष्णुके सभी अवतारोंमें जो उनकी पत्नियाँ होंगी, वे उपवास-व्रत एवं पुण्यकोंकी सम्पूर्ण सनातन विधिको यहाँ सदा ही यथावत् रूपसे जानेंगी ॥ १५-१६ ॥
सविशेषं च धर्माणां स्त्रीधर्मेषु प्रशस्यते ।
पतिभक्तिरदुष्टत्वमवाग्दुष्टत्वमेव च ॥ १७ ॥
सभी धर्मों अथवा स्त्रीधर्मोंमें पतिभक्ति, दुराचारका अभाव और दुर्वचनका प्रयोग न करना—इन तीनकी विशेष-रूपसे प्रशंसा की जाती है ॥ १७ ॥

नारद उवाच
एवमुक्तास्तु ताः साध्व्यो महादेव्या तपोधनाः ।
जग्मुर्हृष्टा महादेवीं प्रणिपत्य हरप्रियाम् ॥ १८ ॥
नारदजी कहते हैं—देवि ! महादेवी पार्वतीके ऐसा कहनेपर वे साध्वी तपोधना देवियाँ हर्षमें भरकर उन हरप्रिया पार्वतीको प्रणाम करके अपने-अपने स्थानको चली गयीं ॥
अदितिर्व्रतकं चक्रे शृणु यद् धर्मचारिणी ।
उमाव्रतविधिः सर्वः पूर्वोद्दिष्टस्तया कृतः ॥ १९ ॥
धर्मचारिणी अदितिने जो व्रत किया, उसे सुनो—उमाने पहले जो व्रतकी विधि बतायी थी, उस सबका पालन अदिति देवीने किया ॥ १९ ॥
पारिजाते निवध्न्याथ मम दत्तस्तु कश्यपः ।
अदितिव्रतकं नाम तद् दत्तं सत्यभामया ॥ २० ॥
उन्होंने महर्षि कश्यपको पारिजातमें बाँधकर मेरे हाथमें दे दिया । इसीका नाम 'अदितिव्रतक' है । अदितिने जिस तरह व्रतक (व्रतसम्बन्धी दान) दिया था, उसी प्रकार सत्यभामाने भी दिया ॥ २० ॥

तदेव व्रतकं दत्तं सावित्र्या धर्मनित्यया ।
तैरैव युक्तैः संयुक्तमिदं त्वभ्यधिकं कृतम् ॥ २१ ॥
नित्य धर्मपरायणा सावित्रीने भी वही व्रत किया और उसी तरह दान दिया था । उन्हीं समुचित साधनोंसे संयुक्त होनेके कारण यह संध्याकाल अत्यन्त उत्कृष्ट माना गया है ॥
संध्याकाले तु सम्प्राप्ते स्थाने स्थाने तथैव च ।
पूजनं वा नमस्कारो जपेश्च द्विगुणः स्मृतः ॥ २२ ॥
संध्याकाल आनेपर जगह-जगह किया गया पूजन, नमस्कार और जप द्विगुण माना गया है ॥ २२ ॥
सावित्रीव्रतकं कृत्वा तथादित्या व्रतं सती ।
भर्तुः कुलं पितृकुलमात्मानं चैव तारयेत् ॥ २३ ॥
सती नारी सावित्री-व्रत और अदिति व्रतका अनुष्ठान करके पतिकुल, पितृकुल तथा अपने-आपको भी उद्धार कर देती है ॥ २३ ॥
इन्द्राणी व्रतकं चक्रे तदेवौमं यथाविधि ।
रक्तमभ्यधिकं वासो भोजनं चैव सामिषम् ॥ २४ ॥
इन्द्राणीने भी उसी उमाके बताये हुए व्रतका विधि-पूर्वक पालन किया । उनमें अधिक या विशेष बात इतनी ही थी कि उन्होंने लाल रंगका वस्त्र और योग्य पदार्थोंसे युक्त उत्तम भोजन दिया ॥ २४ ॥
चतुर्थे दिवसे वापि पुण्यकार्थे विधिः पुनः ।
अहोरात्रोपवासश्च देयं कुम्भशतं तथा ॥ २५ ॥
चौथे दिन फिर पुण्यकव्रतके लिये दानकी विधि है। एक दिन-रातका उपवास करके सौ घड़ोंका दान करना चाहिये॥
गङ्गाया व्रतकं दत्तं तदेवौमं यशस्करि ।
स्नानमभ्यधिकं त्वात्र प्रत्युषस्यात्मनो जले ॥ २६ ॥
अन्यस्मिन् वा जले माघशुक्लपक्षे हरिप्रिये ।
एतद् गङ्गाव्रतं नाम सर्वकामप्रदं स्मृतम् ॥ २७ ॥
यशका विस्तार करनेवाली हरिप्रिये रुक्मिणी ! गङ्गाजीने भी उसी उमाके बताये हुए व्रतका अनुष्ठान और दान किया। उसमें अधिक बात इतनी ही थी कि वे प्रतिदिन प्रातःकाल माघ शुक्ल पक्षमें अपने ही जलमें अथवा दूसरे जलमें भी स्नान किया करती थीं । यह गङ्गा-व्रत समस्त मनोवाञ्छित कामनाओंको देनेवाला माना गया है ॥ २६-२७ ॥
सप्त सप्त च सप्तार्थ कुलानि हरिवल्लभे ।
स्त्री तारयति धर्मज्ञा गङ्गाव्रतकचारिणी ॥ २८ ॥
हरिवल्लभे ! गङ्गा-व्रतका पालन करनेवाली धर्मज्ञ नारी पितृकुल, मातामहकुल और पतिकुलकी सात-सात पीढ़ियोंका उद्धार कर देती है ॥ २८ ॥
देयं कुम्भसहस्रं तु गङ्गाया व्रतके शुभे ।
तत्क्षणं पारणं चैव तद् व्रतं सार्वकामिकम् ॥ २९ ॥