विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 557, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकाशीतितमोऽध्यायः ५३५
बलिं सृजत्वतथ्यं च परित्यजतु भामिनि ॥ ५२ ॥
यशस्विनि ! वह किसी एक शाकका ही भक्षण करे ।
भामिनि ! वह देवताओंके लिये उपहार दे और असत्य भाषणका त्याग करे ॥ ५२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे व्रतकविधानोऽशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसङ्गमें व्रतोंका विधानविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८० ॥
एकाशीतितमोऽध्यायः
उमाके द्वारा व्रतकथनका उपसंहार, श्रीनारदजीका देवियोंद्वारा किये गये व्रतोंका वर्णन करना तथा श्रीकृष्ण-पत्नियोंद्वारा व्रतका अनुष्ठान एवं दान
उमोवाच
बान्धवान् सगुणानिच्छेदेकभक्तेन नित्यदा ।
सप्तमीं सप्तमीं नित्यं क्षपेत् स्त्री पतिदेवता ॥ १ ॥
उमादेवी कहती हैं—जो पतिव्रता स्त्री गुणवान् बान्धवोंकी इच्छा रखती है, वह प्रत्येक सप्तमीको सदा एक समय भोजन करके व्यतीत करे ॥ १ ॥
ततः संवत्सरे पूर्णे वृक्षं दद्याद्धिरण्मयम् ।
सदक्षिणं ब्राह्मणाय शुभबन्धुमती भवेत् ॥ २ ॥
तत्पश्चात् वर्ष पूर्ण होनेपर ब्राह्मणको दक्षिणासहित एक सुवर्णमय वृक्षका दान करे । इससे वह शुभ गुणसम्पन्न बन्धु-बान्धवोंसे युक्त होती है ॥ २ ॥
करञ्जे दीपकं दद्यात् सदा या प्रमदा वरे ।
पूर्णे संवत्सरे दद्यात् सौवर्णं दीपकं ततः ॥ ३ ॥
जो नारी सदा उत्तम करंज (कंजा या करज) वृक्षके नीचे दीप दान करती है, उसे वर्ष पूर्ण होनेपर सुवर्णमय दीपकका दान करना चाहिये ॥ ३ ॥
रुच्या सा स्त्री भवेद् भर्तुरिष्टा पुत्रवती तथा ।
सपत्नीनामधि तथा दीपवज्ज्वलते शुभे ॥ ४ ॥
शुभे ! वह स्त्री अपनी सुन्दर कान्तिसे पतिकी प्राण-वल्लभा बन जाती है और पुत्रवती होती है। वह सपत्नियोंमें सबसे ऊँचा स्थान बना लेती है और दीपककी भाँति प्रकाशित होती रहती है ॥ ४ ॥
या शेषभोजिनी नित्यं नैव च स्यादरुन्तुदा ।
न च स्याद्व्यशना सौम्ये नित्यं च पतिदेवता ॥ ५ ॥
शौचान्विता च सततं न च रूक्षाभिभाषिणी ।
श्वश्रूश्वशुरयोर्नित्यं शुश्रूषाभिरता सती ॥ ६ ॥
किं तस्या व्रतकैः कार्यं किं वा स्यादुपवासकैः ।
या भर्तृदेवता नित्यं सत्यधर्मगुणान्विता ॥ ७ ॥
सौम्ये ! जो स्त्री प्रतिदिन सबके भोजनके पश्चात् शेष अन्नका आहार करती है, किसीके हृदयको चोट नहीं पहुँचाती, बिना खाये नहीं रहती और सदा पातिव्रत्यमें स्थित रहती है; सदा शौचाचारका पालन करती है, कभी रूखी बात नहीं बोलती, प्रतिदिन सास-ससुरकी सेवामें तत्पर रहती है, उस सती स्त्रीको व्रतोंसे क्या करना है ? अथवा उपवासोंसे क्या प्रयोजन है ? जो सदा पतिको ही देवताकी भाँति पूजती है और सत्यधर्म तथा सद्गुणोंसे सम्पन्न है (उसका जीवन सफल है) ॥ ५-७ ॥
विधवा स्त्री तु या हि स्याद् दैवयोगात् सती सति ।
तस्या वक्ष्यामि यो धर्मः पुराणोक्तः सुमध्यमे ॥ ८ ॥
सुन्दर कटिप्रदेशवाली पतिव्रते ! जो सती-साध्वी नारी कभी दैवयोगसे विधवा हो जाय, उसके लिये पुराणोंमें जो धर्म बताया गया है, उसका वर्णन करती हूँ ॥ ८ ॥
पतिं संकल्पयित्वा सा चित्रस्थं वाथ मृन्मयम् ।
तस्य पूजां सदा कुर्यात् सतां धर्ममनुस्मरेत् ॥ ९ ॥
वह पतिके चित्रमें अथवा उसकी मिट्टीकी प्रतिमामें पतिकी भावना करके सदा उसीकी पूजा करे और सत्पुरुषोंके धर्मका निरन्तर स्मरण रखे ॥ ९ ॥
तत एवाभ्यनुज्ञां सा नित्यं याचेत सुव्रता ।
व्रतके चोपवासे च भोजने च विशेषतः ॥ १० ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाली वह स्त्री प्रतिदिन उसी (चित्रगत या प्रतिमागत) पतिसे व्रत, उपवास और विशेषतः भोजनके लिये आज्ञा माँगे ॥ १० ॥
भर्तृलोकान् व्रजत्येव न चेद् व्युच्चरते पतिम् ।
शाण्डिली सूर्यवद् भाति सततं पतिदेवता ॥ ११ ॥
यदि वह अपने पतिका उल्लङ्घन नहीं करती तो पति-लोकमें ही जाती है और स्वर्गमें पतिव्रता शाण्डिलीकी भाँति सदा सूर्यके समान प्रकाशित होती रहती है ॥ ११ ॥
अद्यप्रभृति सर्वेषां देवानां चैव योषितः ।
द्रक्ष्यन्ति पुण्यकविधिं पौराणो यः सनातनः ॥ १२ ॥