विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 556, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें५३४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे संवत्सरे ततः प्राप्ते रौक्मे पद्मे ददातु सा । मेरे पैरोंके गुल्फ ( घुट्टियाँ या गट्टे ) और नस-नाड़ियों ढकी ब्राह्मणायाभिरूपाय तथा पद्मद्वयं शुभम् ॥ ३६ ॥ रहें, वह प्रत्येक षष्ठी तिथिको केवल पानीके साथ भात खाय ॥ सुमध्यमे ! जो नारी अपने दोनों हाथोंको सुन्दर रूपसे अग्निर्वा ब्राह्मणो वापि न स्प्रष्टव्यः पदा सदा । युक्त देखना चाहती है, वह द्वादशी तिथिको सब प्रकारके यदा पदा स्पृशेत् तं च वन्देत तपसान्विते ॥ ४४ ॥ अनिन्दित ( उत्तम ) शाकोंद्वारा आहार करके व्यतीत करे। तपस्विनि ! यह व्रत लेनेवाली स्त्रीको सदा ही उचित है इस तरह एक वर्ष व्यतीत होनेपर वह सुवर्णमय कमलपर कि वह अग्नि अथवा ब्राह्मणका पैरसे स्पर्श न करे। यदि दो खिले हुए कमलके फूल रखकर उन सबका सुन्दर एवं कभी स्पर्श हो जाय तो उसको प्रणाम करे ॥ ४४ ॥ सुयोग्य ब्राह्मणको दान करे ॥ ३५-३६ ॥ पादेन न च वै पादं प्रक्षालयितुमर्हति । श्रोणीं विशालामन्विच्छेत् स्त्री क्षिप्रत्वेव सुव्रते । एतैर्नित्यव्रतैर्युक्ता धर्मज्ञा पतिदेवता ॥ ४५ ॥ त्रयोदशीमेकभक्तमश्नात्वेवमयाचितम् ॥ ३७ ॥ कूर्मौ रूप्यमयौ दद्याद् ब्राह्मणाय पतिव्रते । उत्तम व्रतका पालन करनेवाली देवि ! जो नारी विशाल तौ वराय ब्राह्मणाय स्थापयित्वा घृतेऽनघे ॥ ४६ ॥ नितम्ब चाहती हो, वह त्रयोदशी तिथिको केवल एक बार पद्मे चाधोमुखे कृत्वा दद्याद् विप्राय नन्दिनि । अयाचित अन्न भोजन करे और इसी तरह प्रत्येक त्रयोदशी- रक्तैर्द्रव्यैर्मिश्रयित्वा काञ्चनेनाभ्यलंकृते ॥ ४७ ॥ को व्यतीत करे ॥ ३७ ॥ उसे पैरसे पैरको नहीं धोना ( रगड़ना ) चाहिये । इन ततः संवत्सरे पूर्णे लवणं सम्प्रयच्छतु । नित्य व्रतोंसे युक्त हुई धर्मज्ञ पतिव्रता नारी सोने या चाँदीके प्रजापतिमुखाकारं कृत्वा तत्र वरानने ॥ ३८ ॥ दो कछुए बनवावे । निष्पाप पतिव्रते ! फिर उन दोनों वरानने ! इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर प्रजापति कछुओंको घीमें रखकर श्रेष्ठ ब्राह्मणको दान कर दे । ब्रह्माजीके मुखकी-सी आकृतिवाली नमककी राशिका दान नन्दिनि ! इसके सिवा दो कमलोंको उनके मुख नीचेकी करे ॥ ३८ ॥ ओर करके रखे, उन्हें लाल रंगके गन्धादि द्रव्योंसे संयुक्त काञ्चनं चैव दातव्यं तदाकारस्य सर्वदा । करके सुवर्णसे अलंकृत करे; तत्पश्चात् उसका ब्राह्मणको दान अञ्जनेन च धर्मज्ञा शनकैरवचूर्णयेत् ॥ ३९ ॥ कर दे ॥ ४५-४७ ॥ इसी प्रकार प्रजापतिके मुखके आकारका ही सुवर्ण भी सर्वमेव तु या गात्रमिच्छत्यतिमनोहरम् । सदा दान करना चाहिये । धर्मज्ञ नारी धीरे-धीरे अञ्जनसे त्रिरात्रं पुष्पकाले सा करोतु पतिदेवता ॥ ४८ ॥ किसी ब्राह्मणीके नेत्रोंमें काजल लगावे ॥ ३९ ॥ जो पतिदेवता नारी अपने सम्पूर्ण शरीरको ही अत्यन्त रत्नानि चैव पूर्णानि वासो रक्तं च दापयेत् । मनोहर बनाना चाहती हो, वह रजोदर्शनके अवसरपर तीन तेन श्रोणीमभिमतां स्त्री सौम्ये प्रतिपद्यते ॥ ४० ॥ रात उपवास करे ॥ ४८ ॥ सौम्ये ! पूर्ण रत्न और लाल रंगका वस्त्र भी दे । इससे कौमुद्यामथवाषाढ्यां माघ्यां चाश्वयुजे तथा । वह स्त्री अपने मनके अनुकूल नितम्ब पाती है ॥ ४० ॥ मातरं पितरं चैव मन्यतेऽतिथिदैवतम् ॥ ४९ ॥ मधुरां वाचमिच्छन्ती वर्जयेल्लवणं सती । वह कार्तिक, आषाढ़, माघ तथा आश्विनकी पूर्णिमाको संवत्सरं वा मासं वा प्रयच्छेल्लवणं ततः ॥ ४१ ॥ माता, पिता, अतिथि और देवताका आदर-सत्कार एवं सदक्षिणं ब्राह्मणाय परं माधुर्यमिच्छती । पूजन करे ॥ ४९ ॥ शुकवाक्यारुच्छतगुणं भवत्यमरवर्णिनि ! ४२ ॥ घृतं च नित्यं विप्रेभ्यो ददातु लवणं तथा । मधुर वाणीकी इच्छा रखनेवाली सती नारी एक वर्ष या सम्मार्जनं गृहे चैव करोतु पतिदेवता ॥ ५० ॥ एक मासतक नमक खाना छोड़ दे और वाणीके अतिशय वह पतिव्रता ब्राह्मणोंको प्रतिदिन नमक और घी दान माधुर्यकी इच्छा रखकर ब्राह्मणको दक्षिणासहित नमक दान करे । नित्य घरमें झाडू लगावे ॥ ५० ॥ करे । अमरवर्णिनि ! ऐसा करनेसे उसकी वाणीकी मिठास उपलेपनं च धर्मज्ञे बलिकर्म च मानिनि । तोतेकी वाणीसे सौ गुनी अधिक हो जाती है ॥ ४१-४२ ॥ वाग्दुष्टा चैव मा शुभ्रे भक्तवात्मार्थपण्डिता ॥ ५१ ॥ गूढगुल्फशिरौ पादाविच्छन्त्या सोमनन्दिनि । धर्मज्ञे ! मानिनि ! शुभ्रे ! अपने स्वार्थको समझनेमें षष्ठ्यां षष्ठ्यां वरारोहे भोक्तव्यं सलिलौदनम् ॥ ४३ ॥ कुशल नारी घरमें लीपने-पोतने तथा देवताओंको बलि सोमनन्दिनि ! वरारोहे ! जो स्त्री यह चाहती हो कि ( उपहार-सामग्री ) अर्पण करनेका कर्म भी करे। वह कभी दुर्वचनका प्रयोग न करे ॥ ५१ ॥ पर्यश्नतु च सा कञ्चिदपि शाकं यशस्विनि ।