विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 555, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] अशीतितमोऽध्यायः ५३३ ततः संवत्सरे पूर्णे पद्मपत्राणि मण्डिता । तथैवोत्पलपत्राणि न्यसेत् क्षीरे शुचिस्मिते ॥ १९ ॥ प्लवमानानि विप्राय ततो दद्यात् सती सति । कृष्णसारसमानाक्षी तद् दत्त्वा भवति स्म वै ॥ २० ॥ अमृतमय चन्द्रमासे उत्पन्न हुई अरुन्धती ! जो स्त्री यह चाहती हो कि मेरे नेत्र सुन्दर हों, वह निरन्तर दूध अथवा घीसे ही भोजन करे। पवित्र मुसकानवाली देवि ! इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर वह वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित हो कमल और कुमुदके पत्तोंको दूधमें डाले और जब वे उसमें तैरने लगें, तब वह सती उन पत्तोंसहित उस दूधका ब्राह्मण- को दान कर दे। पतिव्रते ! वह दान देकर नारी कृष्णसार मृगके समान नेत्रवाली हो जाती है ॥ १८-२० ॥ इच्छेदोष्ठौ चारुरूपौ या स्त्री धर्मगुणान्विता । सा मृन्मयेन तु पिबेदुदकं वत्सरं सती ॥ २१ ॥ अयाचितेन भुञ्जीत नवम्यां धर्मभागिनी । ततः संवत्सरे पूर्णे विद्रुमं दातुमर्हति ॥ २२ ॥ जो धर्मरूपी गुणसे युक्त सती-साध्वी स्त्री यह चाहती हो कि मेरे ओठ बड़े सुन्दर हों, वह एक वर्षतक मिट्टीके बर्तनसे पानी पीये और धर्मकी भागिनी होकर प्रत्येक नवमी तिथिको बिना माँगे मिले हुए अन्नका भोजन करे। इस प्रकार एक वर्ष पूर्ण हो जानेपर उसे मूँगा दान करना चाहिये ॥ २१-२२ ॥ तेन बिम्बफलाभोष्ठौ स्त्री भवत्येव शोभने । सुभगाथ वपुःपुत्रधनाढ्या गोमती तथा ॥ २३ ॥ शोभने ! ऐसा करनेसे उस स्त्रीके ओठ अवश्य ही बिम्बफलके समान लाल हो जाते हैं तथा वह सौभाग्यवती, रूपवती, पुत्रवती, धनाढ्य और गौओंसे युक्त होती है॥२३॥ या चारुरूपानिच्छेत दन्तानमरवर्णिनि । शुक्लाष्टमीं न साश्नीयाद् भक्तद्वयमनिन्दिता ॥ २४ ॥ अमरवर्णिनि ! जो चाहती हो कि मेरे दाँत बहुत ही सुन्दर और स्वच्छ हों, वह साध्वी स्त्री शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको दोनों समय भोजन त्याग दे ॥ २४ ॥ ततः संवत्सरे पूर्णे दद्याद् रौप्यमयान् सती । दन्तान् प्रक्षिप्य धर्मज्ञे पयस्यतिगुणोदिते ॥ २५ ॥ धर्मज्ञे ! इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर वह सती नारी चाँदीके दाँत बनवाकर उन्हें अत्यन्त उत्तम गुणवाले दूधमें डाल दे और दाँतोंसहित उस दुग्धका ब्राह्मणको दान कर दे ॥ २५ ॥ तेन सा जातिपुष्पाभान् दन्तान् प्राप्नोति सा सती । सौभाग्यमपि चाप्नोति सपुत्रत्वं तथानघे ॥ २६ ॥ अनघे ! ऐसा करनेसे वह सती-साध्वी स्त्री चमेलीके फूल-जैसे श्वेत दाँत पाती है और सौभाग्य तथा पुत्र लाभ करती है ॥ २६ ॥ सर्वमेव मुखं कान्तमिच्छेद् या रुचिरानने । सा पूर्णमास्यां स्नात्वा तु प्राप्य चन्द्रोदये शुभे ॥२७॥ यावकं पयसा सिद्धं दत्त्वा विप्राय भामिनी । ततः संवत्सरे पूर्णे चन्द्रं रूप्यमयं शुभम् ॥ २८ ॥ पद्मे फुल्ले तु विन्यस्य ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयेत् । पूर्णचन्द्रमुखी तेन दानेन स्त्री शुभा भवेत् ॥ २९ ॥ रुचिरानने ! जो स्त्री सम्पूर्ण मुख-मण्डलको ही कमनीय कान्तिसे युक्त देखना चाहे, वह भामिनी पूर्णिमाको स्नान करके शुभ चन्द्रोदय होनेपर दूधमें तैयार किये गये यावकका ब्राह्मणको दान दे। इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर सोने या चाँदीकी चन्द्रमाकी सुन्दर प्रतिमा बनवाकर उसे कमलके फूलपर रखे और ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराये और उसका दान कर दे। वह शुभलक्षणा स्त्री उस दानके द्वारा पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली हो जाती है ॥२७-२९॥ स्तनाविच्छति या नारी तृणराजफलोपमौ । अयाचितं दशम्यां सा नित्यमश्नीत वाग्यता ॥ ३० ॥ संवत्सरे ततः पूर्णे द्वे बिल्वे काञ्चने शुभे । सदक्षिणे ब्राह्मणाय प्रयच्छति धृतात्मने ॥ ३१ ॥ सौभाग्यं परमाप्नोति बहुपुत्रांस्तथैव च । सदोन्नतौ स्तनौ सा स्त्री बिभर्त्यमरवर्णिनि ॥ ३२ ॥ जो नारी यह चाहती है कि मेरे दोनों स्तन ताड़के फलों- के समान पीन हों, वह प्रत्येक दशमी तिथिको सदा मौन रहकर बिना माँगे मिले हुए अन्नका भोजन करे। इस प्रकार एक वर्ष पूर्ण होनेपर जो सोनेके बने हुए दो सुन्दर बेल जितात्मा ब्राह्मणको दक्षिणासहित दानमें देती है, वह परम सौभाग्य एवं बहुत-से पुत्र प्राप्त करती है। देवोपम कान्ति- वाली देवि ! वह स्त्री सदा ऊँचे स्तन धारण करती है॥३०-३२॥ शातोदरत्वमिच्छन्ती क्षिपेदेकान्तभोजिनी । पञ्चम्यां तन्न भोक्तव्यमन्नं तोयेन नित्यदा ॥ ३३ ॥ जो कृशोदरी होना चाहती है (अर्थात् जिसकी यह इच्छा है कि मेरा पेट उभड़ने या बढ़ने न पाये, भीतरको दबा रहे), वह एकान्तमें भोजन करे और पञ्चमीको सदा केवल जलसे अन्न ग्रहण करे ॥ ३३ ॥ ततः संवत्सरे पूर्णे दद्याज्जातिलतां शुभे । फुल्लां सदक्षिणां धन्ये ब्राह्मणाय धृतात्मने ॥ ३४ ॥ शुभे ! धन्ये ! इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर जितात्मा ब्राह्मणको खिली हुई चमेलीकी लताका दक्षिणासहित दान करे ॥ ३४ ॥ हस्ताविच्छति या नारी रूपयुक्तौ सुमध्यमे । द्वादशीं सा क्षिपत्वेवं शाकैः सर्वैरनिन्दितैः ॥ ३५ ॥