भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 554
५३२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

एवं संवत्सरं कृत्वा ततो दद्याद् द्विजातये ॥ ३ ॥
गोवालरज्जुसुकृतं चामरं च ध्वजं तथा ।
दक्षिणापूर्णमिष्टान्नं शक्त्या वापि शुचिस्मिते ॥ ४ ॥
ऊर्मिमन्तः खरालाग्राः श्रोणिदेशावलम्बिनः ।
तस्या भवन्ति केशास्तु भक्तिमत्या हि भर्तरि ॥ ५ ॥

पवित्र व्रतका पालन करनेवाली देवि ! जो पतिव्रता नारी कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथिको अपना एक समयका भोजन ब्राह्मणको देकर स्वयं उपवासपूर्वक व्यतीत करती है अथवा उस दिन फल-मूल खाकर रहती है, श्वेत वस्त्र धारण करके सदाचारके पालनपूर्वक गुरुजनों तथा देवताओंकी पूजा करती है और इस प्रकार एक वर्षतक इसी नियमका पालन करके वह अन्तमें सुरही गायके बालकी रस्सीसे अच्छी तरह बनाया हुआ चँवर, ध्वज तथा दक्षिणासहित मिष्टान्न यथाशक्ति ब्राह्मणको देती है, उस पतिभक्ता नारीके केश कटि-प्रदेशके नीचे तक लटककर लहराया करते हैं और उनके अग्रभाग घुँघराले हो जाते हैं ॥ २–५ ॥

शिरो निर्वेष्टुकामा तु गोमयेन शिरः सती ।
प्रक्षालयेन्मलं धात्र्या विल्वेन श्रीफलेन च ॥ ६ ॥
गोमूत्रं च सदा प्राश्येच्छिरःस्नानं च मिश्रयेत् ।
कृष्णां चतुर्दशीं त्वेतत् कर्तव्यं वरवर्णिनि ॥ ७ ॥
भवत्यविधवा चैव सुभगा विज्वरा तथा ।
शिरोरोगैर्नच चास्याः शरीरमभितप्यते ॥ ८ ॥

वरवर्णिनि ! जो सिरको सुख पहुँचाना चाहती हो, वह सती-साध्वी स्त्री गोबर, आँवला, कच्चा बेल और श्रीफल (पका बेल)—इन सबको सम मात्रामें मिलाकर उसके द्वारा सिरको धोये । उसकी मैल दूर करे । सदा गोमूत्रका पान करे और सिरके ऊपरसे स्नान करते समय उस जलमें गोमूत्रको भी मिला ले । प्रत्येक कृष्णा चतुर्दशीको इस नियमका पालन करना चाहिये । ऐसा करनेवाली स्त्री विधवा नहीं होती; सौभाग्यवती बनी रहती है । उसे ज्वर आदि रोग नहीं सताते तथा उसके शरीरमें सिर-सम्बन्धी रोगोंसे कष्ट नहीं होता ॥ ६–८ ॥

दर्शनीयं ललाटं या काङ्क्षति स्त्री शुचिस्मिते ।
तिथिं प्रतिपदं नित्यं सा क्षिपेदेकभोजना ॥ ९ ॥
पयसा च तथाश्नीयाद् यावत्संवत्सरो गतः ।
ब्राह्मणाय ततो दद्यात् पटं रूप्यमयं शुभम् ॥ १० ॥
ललाटं रूपसम्पन्नमाप्नोति स्त्री सुमध्यमा ।

पवित्र मुसकानवाली अरुन्धती ! जो स्त्री अपने ललाटको दर्शनीय (शोभासे सम्पन्न) बनाये रखना चाहती है, वह प्रत्येक प्रतिपदा तिथिको एक समय भोजन करके बिताये एवं दूधके साथ भात खाकर रहे । जबतक एक वर्ष पूरा न हो, तबतक ऐसा करती रहे । तदनन्तर ब्राह्मणको सुन्दर सुवर्णमय पट^१ दान करे । ऐसा करनेवाली सुन्दर कटि-प्रदेशवाली स्त्री मनोहर रूप-सौन्दर्यसे युक्त ललाट पाती है ॥ ९-१०½ ॥

सततं स्त्री द्वितीयायां भ्रुवोरिच्छेत् सुरूपताम् ॥ ११ ॥
अनन्तरोपवासेन शाकभक्ताशना सती ।
ततः संवत्सरे पूर्णे ब्राह्मणं स्वस्ति वाचयेत् ॥ १२ ॥
फलैः परिणतैः सौम्यैर्माषाणां दक्षिणान्वितैः ।
लवणेन च भद्रं ते घृतपात्रेण चानघे ॥ १३ ॥

निष्पाप अरुन्धती ! तुम्हारा भला हो, जो भौंहोंका सौन्दर्य चाहती हो, वह सती-साध्वी स्त्री सदा द्वितीया तिथिको एक समय उपवास करके साग-भात खाकर रहे । इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर सुन्दर पके हुए फल, एक माशा सुवर्णकी दक्षिणा, नमक और घीसे भरा हुआ पात्र देकर ब्राह्मणसे स्वस्तिवाचन कराये ॥ ११–१३ ॥

आत्मनः शोभनौ कर्णाविच्छन्ती स्त्री सुमध्यमा ।
नक्षत्रे श्रवणे प्राप्ते ध्रुवं भुञ्जीत यावकम् ॥ १४ ॥
ततः संवत्सरे पूर्णे कर्णौ दद्याद्धिरण्मयौ ।
घृते प्रक्षिप्य विप्राय पयसा सहिते शुभे ॥ १५ ॥

जो सुन्दर कटिप्रदेशवाली स्त्री अपने कानोंको सुन्दर एवं शोभासम्पन्न बनाये रखना चाहती हो, वह श्रवण नक्षत्र प्राप्त होनेपर अवश्य यावक (जौके आटेका हलुवा या पूआ) भोजन करे । इस तरह एक वर्ष पूरा होनेपर दो सुवर्णमय कान बनवाकर उन्हें दुग्धमिश्रित घीमें रखकर ब्राह्मणको दान कर दे ॥ १४–१५ ॥

नासामिच्छेल्ललाटान्तामव्यङ्गां व्याधिवर्जिताम् ।
तिलगुल्मं सदा सिञ्चेद् यावत् पुष्येद्धि रक्षितः ॥ १६ ॥
अनन्तरोपवासेन सेकव्यः सलिलैः सदा ।
तस्मादवाप्य पुष्पाणि घृते प्रक्षिप्य दापयेत् ॥ १७ ॥

जो स्त्री यह चाहती हो कि मेरी नासिका ललाटसे संलग्न हो, उसमें किसी तरहकी विकृति न आये और वह सदा रोग-व्याधिसे रहित एवं सुन्दर बनी रहे तो वह सदा तिलके पौधोंको सींचे और तबतक सींचती रहे, जबतक कि उसके द्वारा सुरक्षित हुए उन पौधोंमें फूल तथा फल न लग जायँ । जिस दिनसे सींचना आरम्भ करे, उसके एक दिन पहले उपवास कर ले; फिर, निरन्तर जलसे सींचती रहे । जब उन पौधोंमें फूल लग जायँ तो उनसे फूल ले घीमें डालकर उस घीका दान कर दे ॥ १६–१७ ॥

स्लक्ष्णीभवेयमिति या स्त्री काङ्क्षत्यमृतोद्भवे ।
अनन्तरं वै भुञ्जाना पयसाथ घृतेन वा ॥ १८ ॥


^१. एक आभूषण, जिसे स्त्रियाँ अपने पट्टीकी तरह सिरमें बाँधती हैं।