विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 524, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] द्विसप्ततितमोऽध्यायः ५०३
प्रसूतिरुभयोर्न प्रसूतश्च सूक्ष्मः
पृथग्भूतेभ्यो न पृथक्चैकभूतः ।
स्वयं भूतः पातु मां सर्वसादः
प्रदः स्वादः सम्मदः पातु रत्नम् ॥ ५१ ॥
जो जगत् और जीव दोनोंकी योनि हैं, फिर भी समस्त कारणोंसे अतीत होनेके कारण जो उनकी योनि नहीं हैं, अतएव सूक्ष्म (कठिनतासे समझमें आनेवाले) हैं; सम्पूर्ण भूतोंसे पृथक् हैं और उन सबसे एकभूत अभिन्न होनेके कारण पृथक् नहीं भी हैं, जो स्वयं ही समस्त जगत्के रूपमें प्रकट हुए हैं और सबके लयस्थान भी हैं तथा जो उत्तम दाता, स्वाद (रुचि), हर्ष तथा रमणीय रत्नरूप हैं, वे भगवान् शंकर मेरी रक्षा करें ॥ ५१ ॥
आसन्नः संनतरः साधनानां
श्रद्धावतां भाववृत्तिप्रणेता ।
पतिर्गणानां महतां सत्कृतीनां
पायान्मेषः पूरणः षड्गुणानाम् ॥ ५२ ॥
जो अन्तर्यामी होनेके कारण सबके निकट हैं तथा साधनशील पुरुषोंके लिये संनतर—अनावृत अर्थात् अपरोक्ष हैं, श्रद्धालु मनुष्योंको उनकी श्रद्धाके अनुरूप वृत्ति (ज्ञान एवं भक्ति) प्रदान करनेवाले हैं तथा जो महान् पुण्यात्मा प्रमथगणोंके अधिपति और अभीष्ट मनोरथों एवं सर्वज्ञता आदि छः गुणोंकी पूर्ति करनेवाले हैं, वे भगवान् शिव मेरी रक्षा करें ॥ ५२ ॥
अन्तर्बहिर्वृजिनानां निहन्ता
स्वयं कर्ता भूतभावी विकुर्वन् ।
धृतायुधः सुकृतिनामुत्तमौजाः
प्रणुद्यान्मे वृजिनं देवदेवः ॥ ५३ ॥
जो बाहर-भीतरके पाप-तापोंका नाश करनेवाले तथा स्वयं ही जगत्के कर्ता (निमित्त कारण) हैं, पञ्च भूतोंके आकारमें अपने-आपको प्रकट करना जिनका स्वभाव है अर्थात् जो स्वयं ही जगत्का उपादान कारण बनते हैं और आयुध धारण करके क्रोधादि विकारोंको प्रकट करते हैं, जिनका ओज (बल-पराक्रम) सबसे उत्तम है तथा जो देवताओंके भी देवता हैं, वे परमेश्वर शिव पुण्यात्मा पुरुषोंका तथा मेरा भी पाप-ताप दूर करें ॥ ५३ ॥
येनोद्धतास्त्रैः पुरा मायिनो वै
दग्धा घोरेण वितथान्ताः शरेण ।
महत्कुर्वन्तो वृजिनं देवतानां
ज्यायानीशः पातु विश्वोद्घाता ॥ ५४ ॥
काँटोंकी भाँति उखाड़ फेंका था, अपने भयानक बाणसे उनके तीनों पुरोंको जलाकर उन्हें भी भस्म कर दिया और इस प्रकार शस्त्रोंद्वारा न मारे जानेके कारण उन असुरोंकी मृत्यु व्यर्थ हो गयी थी—यह सब जिनके प्रभावसे सम्भव हुआ तथा जो सबके कारणभूत प्रकृति या प्रधानके भी आश्रय हैं, वे सबसे ज्येष्ठ परमेश्वर शिव मेरी रक्षा करें ॥ ५४ ॥
भागीथसां भागमतोऽन्तमिच्छन्
मखो दाक्षो येन कृत्तोऽन्वधावत् ।
विद्वान् यज्ञस्यादिरथान्तः स देवः
पायादीशो मां दक्षयज्ञान्तहेतुः ॥ ५५ ॥
दक्षके यज्ञमें अधिक भाग ग्रहण करनेवाले देवताओंके भागको जिन्होंने नष्ट करनेकी इच्छा की थी, जिनके द्वारा विच्छिन्न हुआ दक्षका यज्ञ वहीं यज्ञेश्वरकी शरणमें गया था, जो यज्ञके ज्ञाता, आदि और अन्त हैं तथा दक्षयज्ञके विनाशमें हेतु बने हुए हैं, वे सर्वेश्वर महादेवजी मेरी रक्षा करें ॥ ५५ ॥
अन्यो धन्यः संस्कृतश्चोत्तमश्च
जगत् स्रष्टा योऽत्ति सर्वातिगुह्यः।
स मां मुखप्रमुखे पातु नित्यं
विचिन्वानः प्रथमः षड्गुणानाम् ॥ ५६॥
जो ब्रह्मारूपसे जगत्की सृष्टि करके रुद्ररूपसे उसका संहार करते हैं, जो सबकी अपेक्षा अत्यन्त गोपनीय हैं, जड जगत्से भिन्न (विलक्षण) हैं, शम आदि संस्कारोंसे सम्पन्न होनेके कारण धन्य हैं, सबसे उत्तम हैं, जो इन्द्र और अग्निकी प्रधानतावाले यज्ञमें सदा यजमानोंकी पुण्यराशिका संचय करते हैं और ऐश्वर्य आदि छः गुणोंके मुख्य आश्रय हैं, वे परमेश्वर मेरी तथा मेरी संततिकी प्रतिदिन रक्षा करें ॥
गुणत्रैकाल्यं यस्य देवस्य नित्यं
सत्त्वोद्रेको यस्य भावात् प्रसूतः।
गोप्ता गोप्तॄणां सन्मदो दुष्कृतीना-
माद्यो विश्वस्याद्यमानस्य क्रुद्धः ॥ ५७ ॥
जिन परमात्माके गुण भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंमें सदा बने रहते हैं अथवा जिनमें सृष्टि, पालन और संहार कालसम्बन्धी गुण प्रवाहरूपसे नित्य बने रहते हैं; जिनमें सत्त्वगुणकी अधिकता है अर्थात् जो विष्णुरूपसे स्थित हैं, जिनके स्वरूपसे प्रकट हुए श्रीकृष्ण, इन्द्र आदि रक्षकोंके भी रक्षक हैं, जो काल रुद्र बनकर दुराचारियोंको विनाशका कष्ट प्रदान करनेवाले हैं और विश्वके आदिकारण (एवं माता-पिताके समान पालक) होकर भी जो इस जगत्को पीड़ा देनेवाले लोगोंपर कुपित हो उनका विनाश कर डालते हैं, वे परमात्मा मेरी रक्षा करें ॥ ५७ ॥