विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 523, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें५०२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
रखी है, वे भगवान् शिव आज उत्तम कार्य और कल्याणके लिये मुझपर कृपादृष्टि करें ॥ ४२ ॥
ब्रह्मासृजद् यो भुवनोत्तमोत्तमं
वृत्तो विद्वान् ब्राह्मणः षड्गुणस्य ।
सृष्ट्वा रसं व्याहृतिस्थं समग्रं
स मां पायादिह बहुरूपोऽरिहाङ्गैः॥ ४३ ॥
जिन्होंने ब्रह्मा होकर समस्त भुवनोंमें उत्तमोत्तम दिव्यलोककी रचना की है, जो विद्वान् ब्रह्मवेत्ता होनेके कारण छः गुणों ( ऐश्वर्य, ज्ञान, यश, श्री, वैराग्य और धर्म ) से परिपूर्ण हैं, व्याहृतियोंमें स्थित रस तथा उसकी तीन मात्राओंसे उपलक्षित समस्त प्रपञ्चकी सृष्टि करके जो इसके भीतर व्याप्त हैं, वे अनेक रूपधारी, कामादि शत्रुके नाशक, अपने अङ्गोंद्वारा मेरी रक्षा करें ॥ ४३ ॥
व्यञ्जनोऽजनोऽथ विद्वान् समग्रः
स्पृशिः शम्भुः प्राणदः कृत्तिवासाः ।
रसो ध्रुवः पवमानस्य भर्ता
सपत्नीशः शङ्करः सारधाता ॥ ४४ ॥
जो अतीन्द्रिय विषयोंका भी ज्ञान करानेवाले, अजन्मा, विद्वान् तथा सर्वस्वरूप हैं, व्यापक होनेके कारण जो सबका स्पर्श करनेवाले, कल्याणकारी तथा प्राणदाता हैं, जो अपने शरीरपर वस्त्रके स्थानमें गजचर्म धारण करते हैं, ध्रुव रस—अक्षय परमानन्द जिनका स्वरूप है, जो वायुके भी भरण-पोषण करनेवाले हैं, पत्नी और पति ( यजमान और उसकी पत्नी ) के साथ रहकर अर्थात् आत्मारूपसे उनके प्रेरक होकर यज्ञादि कर्मोंका सम्पादन करते हैं तथा सार तत्त्वको धारण करनेवाले हैं, वे भगवान् शंकर मेरी रक्षा करें ॥ ४४ ॥
त्र्यम्बकं पुष्टिदं विबुधाणं
धर्मं विप्राणां वरदं यज्यनां च ।
वराद् वरं रणजेतारमीशं
देवं देवानां शरणं यामि रुद्रम् ॥ ४५ ॥
जो त्रिनेत्रधारी तथा सबको पुष्टि प्रदान करनेवाले हैं, विप्रों—विद्वानोंको भी धर्मका उपदेश करते हैं और यज्ञ करनेवाले यजमानोंको अभीष्ट वर देते हैं, जो श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ, संग्रामविजयी, ईश्वर तथा देवताओंके भी देवता हैं, उन भगवान् रुद्रकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ४५ ॥
आस्यं देवानामान्तकं दुष्कृतीनां
त्रिवृत्स्तोमं वृक्षहं कर्मसाक्ष्यम्।
भूतायनं भूतपतिं गुणज्ञं
गुणाकारं शरणं यामि रुद्रम् ॥ ४६ ॥
जो अग्निरूपसे देवताओंके मुख, दुराचारियोंका अन्त करनेवाले, त्रिवृत आदि स्तोत्रोंसे युक्त सोमयागात्मकरूप, संसारवृक्षका उच्छेद करनेवाले, कर्मोंके साक्षी, भूतोंके लय-स्थान, भूतनाथ, गुणज्ञ और गुणस्वरूप हैं, उन रुद्रदेवकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ४६ ॥
अनुद्धतं यक्षकर्त्तारमन्तं
मध्यं चाद्यं यक्षकृतां साम्यरूपम्।
वेदव्रतेषु बहुधा गीतमीश-
मभित्रिविष्टपं शरणं यामि रुद्रम् ॥ ४७ ॥
जिन्हें कोई प्रबलसे भी प्रबल शत्रु उखाड़ नहीं सकता, जो यज्ञका सम्पादन करनेवाले तथा यजमानोंके आदि, मध्य और अन्त हैं, प्रकृतिकी साम्यावस्था जिनका स्वरूप है, वेदोक्त व्रतों ( यज्ञों ) में अनेकानेक देवताओंके रूपमें जिनका गान किया गया है तथा जो भूतलसे लेकर स्वर्गंतक तीनों लोकोंके ईश्वर हैं, उन भगवान् रुद्रकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ४७ ॥
महाजिनं व्रतिनं मेखलालं
सुतोषणं क्रोधधवं विपापम्।
भूतं क्षेत्रज्ञं गुणिनं वा कपर्दिनं
नतोऽस्मीशं वन्द्यनं वन्दनानाम् ॥ ४८ ॥
जो महान् गजचर्म धारण करनेवाले, उत्तम व्रतधारी, मेखलासे अलंकृत, अनायास ही संतुष्ट होनेवाले, क्रोधके स्वामी, पाप-तापसे रहित, नित्य सिद्ध, क्षेत्रज्ञ, गुणवान्, जटाजूटधारी तथा वन्दनीयोंके भी वन्दनीय हैं, उन भगवान् शंकरको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ४८ ॥
देवं देवानां पावनं पावनानां
कृतिं कृतीनां महतो महान्तम्।
शतात्मानं संस्तुतं गोपतीनां
पतिं देवं शरणं यामि रुद्रम् ॥ ४९ ॥
जो देवताओंके भी देवता, पावनोंके भी पावन, कृतियोंकी भी कृति, यज्ञोंके भी यज्ञ—अर्थात् यजनीयोंके भी यजनीय हैं, जो महान्से भी महान्, शान्तस्वरूप तथा इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ देवताओंके लिये भी स्तवनीय हैं, उन सबके पालक रुद्रदेवकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ४९ ॥
अन्तश्चरं पुरुषं गुह्यसंज्ञं
प्रभासन्तं प्रण, विप्रदीपम्।
हेतुं परं परमस्याक्षरस्य
शुभं देवं गुणिनं संनतोऽस्मि ॥ ५० ॥
जो सबके अन्तःकरणमें विचरनेवाले अन्तर्यामी पुरुष, जिन्हें गुह्य कहा गया है, जो दूसरे प्रकाशसे रहित स्वयं प्रकाशरूप हैं, प्रणव ( ॐकार ) जिनका नाम है, जो परम अक्षर ( जीव ) के भी परम कारण हैं, उन मङ्गलकारी गुणवान् देवता भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ ॥५०॥