विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 522, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] द्विसप्ततितमोऽध्यायः [ ५०१
शुचिं योगं शंसनं शान्तपापं
शर्वं शम्भुं शंकरं भूतनाथम्।
धुरंधरं गोपतिं चन्द्रचिह्नं
हृषीकाणामयनं यामि मूर्ध्ना॥ ३६॥
जो शुचि (पवित्र एवं असङ्ग), योगसे प्राप्त होनेवाले, विभिन्न योगोंके प्रतिपादक, पापशून्य, संहारक, सुखके उत्पत्तिस्थान, कल्याणकारी और सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति हैं, जो अकेले ही सम्पूर्ण विश्वका भार वहन करते हैं, इन्द्रियोंके नियन्ता हैं तथा चन्द्रमाको चिह्नके रूपमें अपने मस्तकपर धारण करते हैं, ज्ञानेन्द्रियोंके आश्रयरूप उन भगवान् शिवको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता और उनकी शरणमें जाता हूँ ॥ ३६ ॥
आशुःशिशानं वृषभं रोरुवाणं
कृतं धर्मं वितथं चाशुशेषम्।
वसुंधरं समृजीकं समं त्वां
धृतव्रतं शूलधरं प्रपद्ये ॥ ३७॥
जो शीघ्र फल देनेवाला, राग आदि दोषोंको शान्त करनेवाला, अभीष्ट मनोरथोंका वर्षक (पूरक), प्रातः सवन आदिके क्रमसे शब्दायमान और अनुष्ठानमें लाया हुआ जो यज्ञादिरूप धर्म है, वह यदि सकामभावसे किया जाय तो नश्वर फल देनेके कारण व्यर्थ हो जाता है और फलभोगके द्वारा उसकी शीघ्र ही समाप्ति हो जाती है; किंतु वही धर्म यदि निष्काम भावसे किया जाय तो वह आत्मशुद्धि-सम्पादनके साथ ही पुण्यरूपी धनको सुस्थिर रखनेवाला होता है—यह दोनों प्रकारका धर्म आपका ही स्वरूप है। आप सभी अवस्थाओंमें सम हैं। उत्तम व्रतको धारण करनेवाले आप त्रिशूलधारी रुद्रदेवकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ३७ ॥
अनन्तवीर्यं धृतकर्माणमाद्यं
यज्ञाशेशं यजतां चाभियाज्यम्।
हविर्भुजं भुवनानां सदैव
ज्येष्ठं द्विजं धर्मभृतां प्रपद्ये ॥ ३८ ॥
आपके बल-पराक्रमका कहीं अन्त नहीं है, आप ही समस्त कर्मोंको धारण करनेवाले आधार हैं अर्थात् आप ही समस्त कर्मों और उनके फलोंके साक्षी हैं। अन्य देवताओंकी भाँति आप यज्ञके अङ्ग नहीं हैं। आप ही सबके आदि कारण हैं। यजमान अपने यज्ञोंद्वारा जिन यज्ञपुरुषकी आराधना करते हैं, उनके वे आराध्यदेव आप ही हैं। आप ही सदा समस्त जगत्के हविष्यभोक्ता अग्निरूप हैं और आप ही धर्मात्माओंमें ज्येष्ठ द्विज (ब्राह्मण) हैं, मैं आपकी शरण लेता हूँ ॥ ३८ ॥
परं गुणेभ्यः पृश्निगर्भस्वरूपं
यशः शृङ्गं व्यूहनं कान्तरूपम्।
शुद्धात्मानं पुरुषं सत्यधामं
सम्मोहनं दुष्कृतिनां नमस्ये ॥ ३९ ॥
आप गुणोंसे परे तथा विष्णुस्वरूप हैं। आप यशके समान व्यापक हैं। सारे प्रपञ्चको व्याप्त करके भी सींगके समान उससे ऊपर उठे हुए हैं। आप ही समस्त प्राणियोंके अङ्ग-प्रत्यङ्गको सुगठित करनेवाले हैं। आपका रूप अत्यन्त कमनीय (मनोहर) है। आप विशुद्ध आत्मस्वरूप अन्तर्यामी तथा सत्यधाम (अबाधित चैतन्यस्वरूप अथवा वैकुण्ठादि नित्यधामस्वरूप) हैं। आप दुराचारियोंको मोह (महान् दुःख) मे डालनेवाले हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ३९ ॥
युक्तोङ्कारं खशिरसं चारुकर्म
दृढव्रतं दृढधन्वानमाजम्।
शूरं वेत्तारं धनुषोऽस्त्रातिरेकं
पतिं पशूनां शमनं नमस्ये ॥ ४० ॥
आप योगियोंके लिये प्रणवरूप हैं। अपने स्वरूपभूत ओंकारके सिर अर्थात् उसकी अर्द्धमात्रा आप ही हैं। आपका कर्म हिंसाशून्य होनेके कारण बड़ा ही मनोहर है। आप दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले हैं। आपका धनुष अत्यन्त सुदृढ़ है। आप बाणोंको दूरतक फेंकनेवाले, शूरवीर, धनुर्वेदके ज्ञाता और अस्त्र-विज्ञानमें सबसे बढ़े-चढ़े हैं। समस्त पशुओं (जीवों) के पति (पालक) तथा जगत्का संहार करनेवाले आप भगवान् शंकरको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ४० ॥
एको रतिश्चैव भूतं भविष्यं
सर्वातिथियो हि जुषत्यरिघ्नः।
अरिंतुदोऽनुत्तमः संविभागी
विभाजको मां भगवान् पातु देवः ॥ ४१ ॥
जो सबके एकमात्र मित्र हैं, भूत और भविष्य जिनका ही स्वरूप है, जो सबके अतिथि (अग्नि) रूपसे हविष्यका सेवन करते हैं, काम आदि शत्रुओंका नाश करनेवाले हैं तथा शत्रुभाव रखनेवाले राक्षसोंको पीड़ा देते हैं, जिनसे उत्तम दूसरा कोई नहीं है, जो यज्ञमें भाग पाते और स्वयं भी भागोंका विभाजन करते हैं, वे भगवान् महादेव मेरी रक्षा करें ॥ ४१ ॥
य एको याति जगतां विश्वमीशो
य एकोऽदान्मरुतां प्राणमग्र्यम्।
येनानुशंष्याच्छश्वतं साम जुष्टं
स मां जुष्यात्सुकृतिश्रेयसेऽद्य ॥ ४२ ॥
जो जगदीश्वर एक होकर भी सम्पूर्ण विश्वमें प्रविष्ट हैं तथा जिन अद्वितीय परमात्माने प्राणस्वरूप मरुद्गणोंको भी उत्तम प्राण प्रदान किया है अर्थात् जो प्राणके भी प्राण हैं, जिन्होंने दयालु होनेके कारण सबके साथ सनातन मैत्री जोड़