विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 521, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५०० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तुष्टाव च तमीशानं मारीचः कश्यपस्तदा।
वेदोक्तैः स्वकृतैश्चैव स्तवैः स्तुत्यं जगद्गुरुम्॥ २८॥
उस समय मरीचिनन्दन कश्यपने स्तुति करनेके योग्य जगद्गुरु भगवान् शंकरका वेदोक्त मन्त्रों तथा स्वरचित स्तोत्रोंद्वारा स्तवन किया॥ २८॥
कश्यप उवाच
उरुक्रमं विश्वकर्माणमीशं
जगत्स्रष्टारं धर्मदृश्यं वरेशम्।
खं सर्वं त्वां धृतिमद्धाम दिव्यं
विश्वेश्वरं भगवन्तं नमस्ये॥ २९॥
कश्यपजी बोले—जो विष्णुरूपसे वामन-अवतारके समय महान् पग बढ़ाकर त्रिलोकीको नाप लेनेमें समर्थ हुए हैं, यह सम्पूर्ण विश्व जिनका कर्म है, जो सबके ईश्वर हैं, जगत्की सृष्टि करनेवाले हैं, धर्मके द्वारा जिनका साक्षात्कार होता है, जो अभीष्ट मनोरथोंके स्वामी तथा उनकी पूर्ति करनेवाले हैं, जो सर्वस्वरूप, सात्त्विकी धृतिवाले योगियोंके जो ये चिन्मय धामस्वरूप हैं, उन दिव्यस्वरूप आप भगवान् विश्वेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २९॥
यो देवानामधियः पापहर्ता
ततं विश्वं येन जगन्मयत्वात्।
आपो गर्भं यस्य शुभा धरिष्ये
विश्वेश्वरं तं शरणं प्रपद्ये॥ ३०॥
जो देवताओंके अधिपति और पापहर्ता हैं, जो जगत्-स्वरूप होनेके कारण सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हैं, शुभ जल (जलात्मक वीर्यसे प्रकट होनेवाले शरीर) जिनके गर्भ (अंशभूत चैतन्य) को धारण करते हैं, उन भगवान् विश्वेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ॥ ३०॥
शालावृकान् यो यतिरूपो निजघ्ने
दत्तानिन्द्रेण प्रणुदो हितानाम्।
विरूपाक्षं सुदर्शनं पुण्ययोनिं
विश्वेश्वरं शरणं यामि मूर्ध्ना॥ ३१॥
जिन्होंने यतिरूप होकर—जितेन्द्रिय बनकर इन्द्रके भेजे हुए इन्द्रियरूपी भेड़ियोंको, जो शम-दम आदि हितैषी मित्रों-को दबा देनेवाले हैं, नष्ट कर दिया, जिनके नेत्र विरूप हैं, जो देखनेमें बड़े सुन्दर तथा पुण्यकी योनि हैं, उन भगवान् विश्वेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ और उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ॥ ३१॥
भुङ्क्ते य एको विभुर्जगतो विश्वमद्यं
धाम्नां धाम सुकृतित्वाच्च धृष्यः।<sup>१</sup>
पुष्यात् स मां महसा शाश्वतेन
सोमपानां मरीचिपानां वरिष्ठः॥ ३२॥
जो एकमात्र इस जगत्के स्वामी हैं तथा श्रेष्ठ विश्वका पालन करते (अथवा इसे अपने उपभोगमें लाते) हैं, जो धाम (नेत्र एवं सूर्य आदि) के भी धाम (आश्रय अथवा प्रकाश) हैं तथा सुकृति (पुण्यरूप अथवा सुकृतनामधारी ब्रह्मरूप) होनेके कारण सबके लिये अजेय हैं, सोमपान करनेवाले कर्मठों और चन्द्ररश्मियोंका पान करनेवाले महा-मुनियोंमें जिनका सबसे ऊँचा और गौरवपूर्ण स्थान है, वे भगवान् विश्वेश्वर अपने सनातन तेजसे मेरा पोषण करें॥
अथर्वाणं सुशिरसं भूतयोनिं
कृतिनं वीरं दानवानां च वाधम्।
यज्ञे हुतिं यज्ञियं संस्कृतं वै
विश्वेश्वरं शरणं यामि देवम्॥ ३३॥
जिनका अथर्ववेदके द्वारा प्रतिपादन किया गया है, जिनके पञ्चकोशरूप पाँच सुन्दर मस्तक हैं, जो सम्पूर्ण भूतोंकी योनि अर्थात् समस्त जगत्के कारण हैं, जो विद्वान्, वीर तथा दानवोंके बाधक हैं, यज्ञमें जिनके लिये आहुति दी जाती है, यज्ञसम्बन्धी संस्कारयुक्त हविष्य जिनका स्वरूप है, उन विश्वेश्वरदेवकी मैं शरण लेता हूँ॥ ३३॥
जगज्जालं विततं यत्र विश्वं
विश्वात्मानं प्रतिदेवं गतानाम्।
य ऊर्ध्वगं रथमास्थाय याति
विश्वेश्वरः स सुमना मेऽस्तु नित्यम्॥ ३४॥
जिनके ऊपर यह सारा जगत्रूपी इन्द्रजाल फैला हुआ है, जो सम्पूर्ण विश्वके आत्मा हैं, शरणागतोंके लिये प्रीति एवं सुखको प्रकाशित करनेवाले हैं तथा जो ऊर्ध्वगामी (आकाशचारी) रथपर आरूढ हो यात्रा करते हैं, वे भगवान् विश्वेश्वर मुझपर सदा प्रसन्नचित्त रहे॥ ३४॥
अन्तश्चरं रोचनं चारुशाखं
महाबलं धर्मनेतारमीड्यम्।
सहस्रनेत्रं शतवर्त्मानमुग्रं
महादेवं विश्वसृजं नमस्ये॥ ३५॥
जो अन्तर्यामी आत्मारूपसे सबके भीतर विचरते हैं, प्रकाशमान (चिन्मय) हैं, वेदमयी मनोहर शाखाएँ जिनसे प्रकट हुई हैं, जो महान् बलशाली, धर्मके प्रवर्तक तथा स्तवन करने योग्य हैं। जिनके सहस्रों नेत्र हैं और जिन्हें पानेके लिये सैकड़ों मार्ग हैं (अथवा जो शतपथविहित कर्मफलके दाता हैं) उन उग्रस्वरूप विश्वस्रष्टा महादेवजीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ३५॥
१. 'तस्मात्तत् सुकृतमुच्यते।' इस श्रुतिके अनुसार ब्रह्मका नाम 'सुकृत' है।