भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 520, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 520

विष्णुपर्व ] द्विसप्ततितमोऽध्यायः ४९९


कुरुनन्दन ! तब बलासुरका विनाश करनेवाले इन्द्रने बृहस्पतिसे यह सब प्रसंग कह सुनाया। उसे सुनकर बृहस्पतिने देवेन्द्रसे कहा—॥ १२ ॥

अहो धिग् ब्रह्मसदनं मयि याते शतक्रतो।
दुर्नीतिमिदमारब्धमत्र भेदो हि दारुणः ॥ १३ ॥

‘अहो, धिक्कार है ! शतक्रतो ! मैं वहाँसे ब्रह्मलोकको चला गया था। इसी बीचमें तुमने यह दुर्नीति आरम्भ कर दी; क्योंकि तुम्हारे इस बर्तावके कारण यहाँ भयंकर भेद (कलह) का अवसर उपस्थित हो गया है ॥ १३ ॥

अनाख्यात्वा कथं नाम भवता भुवनेश्वर ।
ममैतत् कृत्यमारब्धं देव केनापि हेतुना ॥ १४ ॥

‘भुवनेश्वर ! देव ! क्या कारण था कि तुमने मुझसे बताये बिना ही यह दुष्कृत्य आरम्भ कर दिया ॥ १४ ॥

अथवा भवितव्येन कर्मजेन प्रयुज्यते ।
जगद् वृत्रघ्न न विधिः शक्यः समतिवर्तितुम् ॥ १५ ॥

‘अथवा वृत्रासुर-विनाशन इन्द्र ! यह सम्पूर्ण जगत् भावी कर्मफलसे प्रेरित होता रहता है। विधिके विधानका उल्लङ्घन करना असम्भव है ॥ १५ ॥

सहसैव तु कार्याणारम्भो न प्रशस्यते ।
तदेतत् सहसाऽऽरब्धं कार्यं दास्यति लाघवम् ॥ १६ ॥

‘सहसा किया हुआ कार्योंका आरम्भ अच्छा नहीं माना गया है। तुमने जो सहसा यह कार्य आरम्भ कर दिया है, यह अवश्य तुम्हें लघुता (पराजय) प्रदान करेगा’ ॥ १६ ॥

बृहस्पतिं महात्मानं महेन्द्रस्त्वब्रवीद् वचः ।
एवं गतेऽद्य यत् कार्यं तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १७ ॥

तब महेन्द्रने महात्मा बृहस्पतिसे कहा—‘गुरुदेव ! ऐसी परिस्थितिमें आज जो मेरा कर्तव्य हो, उसे आप बतानेकी कृपा करें’ ॥ १७ ॥

तमुवाचाथ धर्मात्मा गतानागततत्त्ववित् ।
अधोमुखश्चिन्तयित्वा बृहस्पतिरुदारधीः ॥ १८ ॥

यह सुनकर भूत और भविष्यके तत्त्वको जाननेवाले उदारबुद्धि धर्मात्मा बृहस्पतिने नीचे मुँह करके कुछ देरतक सोच-विचारकर उनसे कहा--॥ १८ ॥

यतस्व सह पुत्रेण योधयस्व जनार्दनम् ।
तथा शक्र करिष्यामि यथा न्याय्यं भविष्यति ॥ १९ ॥

‘देवेन्द्र ! अब तुम अपने पुत्र जयन्तके साथ युद्धभूमिमें उपस्थित हो श्रीकृष्णके साथ युद्ध और उसमें विजय पानेका प्रयत्न करो। तबतक मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे न्यायसंगत परिणाम प्रकट होगा’ ॥ १९ ॥

बृहस्पतिस्त्वेवमुक्त्वा क्षीरोदं सागरं गतः ।
आचष्ट मुनये सर्वं कश्यपाय महात्मने ॥ २० ॥

ऐसा कहकर बृहस्पतिजी क्षीरसागरके तटपर गये । वहाँ उन्होंने महात्मा कश्यप मुनिसे सब बातें कह सुनायीं ॥२०॥

तच्छ्रुत्वा कश्यपः क्रुद्धो बृहस्पतिमभाषत ।
अवश्यं भाव्यमेतद् भोः सर्वथा नात्र संशयः ॥ २१ ॥

वह सुनकर कश्यपजीने कुपित हो बृहस्पतिजीसे कहा—‘अजी, यह युद्ध अवश्य होगा । सर्वथा होकर रहेगा—इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥

इच्छतः सदृशीं भार्यां महर्षेर्देवशर्मणः ।
अपध्यानकृतो दोषः पतत्येष शतक्रतोः ॥ २२ ॥

‘महर्षि देवशर्माकी पत्नी रुचि सर्वथा उन्हींके समान शुद्ध आचार-विचारवाली थी; परंतु इन्द्रने उसे प्राप्त करनेकी इच्छा की। इससे मुनिने इन्द्रका अनिष्ट-चिन्तन किया । वही यह दोष इस समय इन्द्रपर पड़ रहा है* ॥ २२ ॥

तस्य दोषस्य शान्त्यर्थमारब्धञ्च मुने मया ।
उदवासः स दोषश्च प्राप्त एव सुदारुणः ॥ २३ ॥

‘मुने ! उस दोषकी शान्तिके लिये ही मैंने यह जलवास-रूप तप आरम्भ किया था तथापि वह अत्यन्त दारुण दोष प्राप्त हो ही गया ॥ २३ ॥

तद् गमिष्यामि मध्येऽस्य सहादित्या तपोधन ।
उभौ तौ वारयिष्यामि दैवं संवदते यदि ॥ २४ ॥

‘तपोधन ! अतः अब मैं अदितिके साथ इस युद्धके अवसरपर मध्यस्थ होकर जाऊँगा और यदि दैव अनुकूल रहा तो दोनोंको युद्धसे रोकूँगा’ ॥ २४ ॥

बृहस्पतिस्तु धर्मात्मा मारीचमिदमब्रवीत् ।
प्राप्तकालं त्वया तत्र भवितव्यं तपोधन ॥ २५ ॥

तब धर्मात्मा बृहस्पतिने मरीचिनन्दन कश्यपसे इस प्रकार कहा—‘तपोधन ! अब युद्धका अवसर प्राप्त हो गया । अतः आपको वहाँ अवश्य उपस्थित होना चाहिये’ ॥ २५ ॥

तथेति कश्यपश्चोक्त्वा सम्प्रस्थाप्य बृहस्पतिम् ।
जगामार्चयितुं देवं रुद्रं भूतगणेश्वरम् ॥ २६ ॥

कश्यपजीने ‘बहुत अच्छा’ कहकर बृहस्पतिको वहाँसे भेज दिया और स्वयं वे भूतगणोंके स्वामी रुद्रदेवकी आराधना करनेके लिये चले गये ॥ २६ ॥

तत्र सौम्यं महात्मानमानर्च वृषभध्वजम् ।
वरार्थी कश्यपो धीमानदित्या सहितः प्रभुः ॥ २७ ॥

वहाँ अदितिके साथ बुद्धिमान् भगवान् कश्यपने वर-प्राप्तिकी इच्छा रखकर सौम्यरूपधारी परमात्मा वृषभध्वज शिवकी पूजा की ॥ २७ ॥


* यह प्रसङ्ग महाभारत अनुशासनपर्वके चालीसवें अध्यायमें देख लेना चाहिये ।

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