भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 509
४८८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

प्रभो ! जब नारदजी बैठ गये, तब उन्हींसे आज्ञा लेकर इन्द्र अपने सिंहासनपर बैठे, जो उन्हींके अनुरूप था ॥ ३९ ॥

उपविष्टः सुरपतिरथोवाच तपोधनम् ।
निरीक्ष्य स्वबलं वीर्यं हर्षदं वृत्रनाशनः ॥ ४० ॥

सिंहासनपर बैठकर वृत्रासुरका विनाश करनेवाले देवराज इन्द्रने अपने हर्षदायक बल और पराक्रमकी ओर दृष्टिपात करके तपोधन नारदजीसे कहा ॥ ४० ॥

शक्र उवाच
महर्षे कुशलं पृष्ट्वा वक्तव्यस्ते जनार्दनः ।
वचनान्मम धर्मज्ञ सर्वभूतसुखावहः ॥ ४१ ॥

इन्द्र बोले—धर्मज्ञ महर्षे ! आप मेरी ओरसे कुशल पूछकर समस्त प्राणियोंको सुख देनेवाले जनार्दनसे मेरे ही शब्दोंमें इस प्रकार कहियेगा—॥ ४१ ॥

मदनन्तरमीशस्त्वं जगतो नात्र संशयः ।
त्वदीयः पारिजातश्च रत्नान्यन्यानि चाच्युत ॥ ४२ ॥

'अच्युत ! मेरे बाद तुम्हीं इस जगत्‌के ईश्वर हो, इसमें संशय नहीं है। इस दृष्टिसे पारिजात तथा दूसरे-दूसरे रत्न भी तुम्हारे ही हैं ॥ ४२ ॥

त्वं तु भारावतरणं कर्तुं देव महीं गतः ।
मानुष्यं सर्ववृत्तानां स्थितः कार्यस्य सिद्धये ॥ ४३ ॥

'परंतु देव ! तुम पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भूतलपर गये हो और अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये सभी बर्तावों और व्यवहारोंमें मानवीय मर्यादाका ही आश्रय लेते हो ॥ ४३ ॥

त्वयि तीर्णप्रतिज्ञे हि पुनः प्राप्ते त्रिविष्टपम् ।
पूरयिष्यामि वध्वास्ते दृष्टान् कामानधोक्षज ॥ ४४ ॥

'अधोक्षज ! जब तुम भूभारहरणकी प्रतिज्ञा पूरी करके पुनः स्वर्गलोकमें आओगे, उस समय मैं तुम्हारी पत्नी सत्यभामाके सभी अभीष्ट मनोरथोंको पूर्ण करूँगा ॥ ४४ ॥

स्वर्गीयानि च रत्नानि न नेतव्यानि केशव ।
स्वल्पार्थे मानुषं लोकमिति पूर्वकृता स्थितिः ॥ ४५ ॥

'केशव ! किसी छोटे-मोटे कार्यके लिये स्वर्गीय रत्नोंको मनुष्यलोकमें नहीं ले जाना चाहिये। यह पूर्वकालकी ही बाँधी गयी मर्यादा है ॥ ४५ ॥

उत्क्रम्य हि स्थितिं दैवीं प्रवर्तेयि महाबल ।
यद्यहं किं प्रवक्ष्यन्ति प्रजापतिगणाः प्रभो ॥ ४६ ॥

'महान् बलशाली प्रभो ! यदि मैं देवलोककी मर्यादाका उल्लङ्घन करके कोई नया बर्ताव करूँ, तो प्रजापतिगण मुझे क्या कहेंगे ॥ ४६ ॥

ब्रह्मणा सह पुत्रेण सपौत्रेण महात्मना ।
नियमाः सर्वकृत्यानां स्थापिता जगतो ध्रुवाः ॥ ४७ ॥

'पुत्र और पौत्रोंसहित महात्मा ब्रह्माजीने जगत्‌के समस्त कार्योंके लिये कुछ अटल नियम निश्चित कर दिये हैं ॥ ४७ ॥

प्रजापतिकृतं मार्गमपास्य व्रजतो मम ।
श्रुत्वा प्रजापतिर्धीमान्क्रुद्धःशापमप्युत्सृजेत् प्रभुः ॥ ४८ ॥

'यदि मैं प्रजापति ब्रह्माद्वारा नियत किये गये मार्गको छोड़कर चलूँ तो इसे सुनकर बुद्धिमान् भगवान् प्रजापति मुझे शाप भी दे सकते हैं ॥ ४८ ॥

अस्माभिर्भिद्यमानं हि मर्यादासेतुबन्धनम् ।
भेत्स्यन्त्यशङ्किता दैत्या दैत्यपक्षास्तथापरे ॥ ४९ ॥

'यदि हमलोग ही प्राचीन मर्यादारूपी सेतुका बन्धन तोड़ दें तब तो दैत्य तथा दैत्यपक्षके दूसरे लोग निःशङ्क होकर उन मर्यादाओंका भेदन करने लगेंगे ॥ ४९ ॥

स्त्रीनिमित्तमितो नीते पारिजाते द्रुमेश्वरे ।
स्वर्गौकसो भविष्यन्ति विमनस्काश्च मानद ॥ ५० ॥

'मानद ! यदि केवल एक स्त्रीको संतुष्ट करनेके लिये स्वर्गसे वृक्षराज पारिजातको भूतलपर पहुँचा दिया जाय तो स्वर्गलोकके निवासियोंका मन उदास हो जायगा ॥ ५० ॥

उपभोगा मनुष्याणां विहिता ये स्वयंभुवा ।
तैस्तु तुष्यतु मे भ्राता सम् build पश्यन् कालपर्ययम् ॥ ५१ ॥

'स्वयम्भू ब्रह्माने मनुष्योंके लिये जो उपभोगकी वस्तुएँ बनायी हैं, समयके परिवर्तनको देखते हुए मेरे भाईको उन्हींसे संतोष करना चाहिये ॥ ५१ ॥

इहापि तात त्रिदिवे मम यः स्यात् परिग्रहः ।
त्रिदिवस्थोऽपि तं कृष्णः सर्वं भोक्तुमिहार्हति ॥ ५२ ॥

'तात ! इस स्वर्गलोकमें मेरे पास जो भोग-सामग्रियोंका संग्रह है, वह सब श्रीकृष्ण यहाँ रहकर भी तो भोग सकते हैं।

दृष्टे ह्यामिषमोज्यानामभिमानाज्जनार्दनः ।
ततो धर्मं समुत्सृज्य पापमेवानुवर्तते ॥ ५३ ॥

'मर्त्यलोककी भोग्य वस्तुओंसे हृष्ट-पुष्ट होनेके कारण जनार्दन श्रीकृष्णको कुछ अभिमान हो गया है। उस अभिमानके कारण ही वे धर्मका परित्याग करके पापका ही अनुसरण कर रहे हैं ॥ ५३ ॥

स्त्रीवश्यता ख्याप्यमाना कृष्णस्य हि महात्मनः ।
जगत्ययशसा योगं जनयेदिति मे मतिः ॥ ५४ ॥

महात्मा श्रीकृष्ण स्त्रीके वशीभूत रहते हैं, इस बातकी प्रसिद्धि तो उनके लिये संसारमें अयश या कलङ्ककी ही प्राप्ति करायेगी; ऐसा मेरा विश्वास है ॥ ५४ ॥