विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 508, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ४८७
नारदजीने कहा—महेन्द्र ! मैं तुम्हारे छोटे भाई श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये किसी तरह द्वारका जा पहुँचा था, जो वहाँ रहकर कश्यपकी संतानों (देवताओं) के यशका विस्तार करते हैं ॥ २४ ॥
तं तु रैवतकेऽद्राक्षं तदासीनमरिंदमम् ।
रुक्मिण्या सहितं वीरमुमयेव वृषध्वजम् ॥ २५ ॥
वे शत्रुदमन वीर उस समय (द्वारकापुरीके निकटवर्ती) रैवतक पर्वतपर रुक्मिणी देवीके साथ उसी तरह विराजमान थे, जैसे भगवान् शङ्कर उमा देवीके साथ (कैलास या मन्दराचलपर) विराज रहे हों ॥ २५ ॥
पारिजाततरोः पुष्पं तस्य दत्तं मयानघ ।
विस्सापनार्थं देवेश पत्नीनामरुतेजसः ॥ २६ ॥
निष्पाप देवेश्वर ! वहाँ मैंने उन महातेजस्वी श्रीकृष्णके हाथमें उनकी पत्नियोंको विस्मयमें डालनेके लिये पारिजात वृक्षका एक फूल दिया ॥ २६ ॥
तद् दृष्ट्वा तस्य पत्न्यस्तु विस्मयं परमं ययुः ।
बहुकामप्रदं पुष्पं वृक्षराजसमुद्भवम् ॥ २७ ॥
वृक्षराज पारिजातके उस पुष्पको, जो बहुत-सी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है, देखकर उनकी पत्नियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ २७ ॥
गुणास्तासां मया ख्यातास्तस्य पुष्पस्य मानद ।
सृष्टिश्च पारिजातस्य कश्यपेन महात्मना ॥ २८ ॥
मानद ! वहाँ मैंने उनकी पत्नियोंको उस फूलके गुण भी बताये और यह भी कहा कि महात्मा कश्यपने पारिजातकी सृष्टि की है ॥ २८ ॥
अदित्या कश्यपो दत्तः पुण्यार्थं च यथा मम ।
पुष्पदाम्ना वेष्टयित्वा कण्ठे पुण्यार्थमात्मवान् ॥ २९ ॥
त्वं च दत्तो यथा शच्या देवाश्चान्ये सुरेश्वर ।
निष्क्रयश्च यथा दत्तः कश्यपाद्यैर्महर्षिभिः ॥ ३० ॥
सुरेश्वर ! फिर अदितिने पुण्यकी प्राप्तिके लिये आत्मसंयमी महर्षि कश्यपके गलेमे फूलोंकी माला लपेटकर जिस तरह मेरे हाथमें उनका दान कर दिया था तथा शचीने जिस प्रकार तुम्हारा दान किया था और अन्य देवता भी जिस प्रकार अपनी पत्नियोंद्वारा दानमें दिये गये थे एवं कश्यप आदि महर्षियोंने जिस प्रकार मुझे अपना निष्क्रय (मूल्य) दिया था, (वह सारा प्रसङ्ग मैंने वहाँ सुनाया) ॥ २९-३०॥
तच्छ्रुत्वा तस्य पत्न्येका सत्यभामेति विश्रुता ।
पुण्यकार्यं मनश्चक्रे दयिता ते यवीयसः ॥ ३१ ॥
वह सुनकर उनकी एक पत्नीने, जिसका नाम सत्यभामा है तथा जो तुम्हारे छोटे भाईकी बहुत ही प्रिय है, अपने मनमें वह दानरूप पुण्यकार्य करनेका विचार किया ॥ ३१ ॥
तया चाभ्यर्थितो भर्ता देव देव्या गणेश्वरः ।
प्रतिजज्ञे स धर्मार्थं यवीयांस्तव मानद ॥ ३२ ॥
दूसरोंको मान देनेवाले देव ! जैसे देवी पार्वती प्रमथगणोंके स्वामी भगवान् शिवसे कोई बात कहती हैं, उसी प्रकार सत्यभामाने अपने पतिसे पारिजात वृक्षके लिये प्रार्थना की और तुम्हारे छोटे भाईने उसके धर्मकार्यकी सिद्धिके लिये उस वृक्षको ला देनेकी प्रतिज्ञा कर दी ॥ ३२॥
ततो मामुक्तवान् वीरो विष्णुर्बलवतां वरः ।
यथावत् सुरमुख्येश ब्रुवतः शृणु भावतः ॥ ३३ ॥
देवप्रमुख ! देवेश्वर ! तदनन्तर बलवानोंमें श्रेष्ठ वीर श्रीकृष्णने तुमसे कहनेके लिये मुझसे जो बात कही थी, उसे ज्यों-की-त्यों सुना रहा हूँ; तुम ध्यान देकर सुनो ॥ ३३॥
लालनीयो यवीयांस्ते प्रणिपत्याच्युतोऽब्रवीत् ।
आनयेयं सुरश्रेष्ठ पारिजातं वरद्रुमम् ॥ ३४ ॥
तुम्हारे छोटे भाई अच्युतने, जो तुमसे लाड़-प्यार पानेके योग्य हैं, तुम्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहा है—'सुर-श्रेष्ठ ! मैं उत्तम वृक्ष पारिजातको यहाँ लाना चाहता हूँ ॥ ३४॥
मनोरथोऽस्तु सफलो वध्वास्तेऽसुरसूदन ।
धर्मकृत्ये विशेषेण वध्वास्ते सुरसत्तम ॥ ३५ ॥
'असुरसूदन ! सुरश्रेष्ठ ! आपकी बहू सत्यभामाका यह मनोरथ, जो विशेषतः धर्मकार्यसे सम्बन्ध रखता है, सफल होना चाहिये ॥ ३५ ॥
अयं दर्शितकल्याणो लोको लोकगणेश्वर ।
पश्यन्त्यमरकल्याणं मत्प्रभावाच्च मानवाः ॥ ३६ ॥
'लोकगणेश्वर ! यह मनुष्यलोक भी उस कल्याणमय वृक्षका दर्शन कर सके (ऐसी कृपा कीजिये)। मेरे प्रभावसे मनुष्य भी देवताओंके लिये कल्याणकारी वृक्ष पारिजातका दर्शन कर लें (ऐसा अवसर दीजिये)' ॥ ३६ ॥
वैशम्पायन उवाच
वासुदेववचः श्रुत्वा महेन्द्रः कुरुनन्दन ।
नारदं वदतां श्रेष्ठमिदं वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ३७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—कुरुनन्दन ! भगवान् वासुदेवका वह संदेश सुनकर देवराज इन्द्रने वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजीसे इस प्रकार कहा—॥ ३७ ॥
भज्यासनं द्विजश्रेष्ठ युक्तमुक्तं त्वया द्विज ।
संदेशं प्रतिदास्यामि विष्णोरतुलतेजसः ॥ ३८ ॥
'द्विजश्रेष्ठ ! पहले आसन तो ग्रहण कीजिये । ब्रह्मन् ! आपने उचित बात कही है। मैं अनुपम तेजस्वी विष्णुके लिये संदेशका उत्तर दूँगा' ॥ ३८ ॥
आसीने नारदे शक्रो लब्धानुज्ञोऽथ नारदात् ।
स्वमासनं ततो भेजे तस्यैव सदृशं प्रभो ॥ ३९ ॥