विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 507, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४८६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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एताननुविधीयन्ते सर्वदेवगणा नृप।
धर्मनित्यास्तपोनित्याः सतां मार्गमुपाश्रिताः ॥ १०॥
ये सब-के-सब तपोबलसे सम्पन्न होनेके कारण देवाधिदेवोंके भी नेता हैं (उनका नेतृत्व करनेमें समर्थ हैं)। नरेश्वर ! जो नित्य-निरन्तर धर्म और तपमें संलग्न रहकर सत्पुरुषोंके मार्गका आश्रय ले चुके हैं, वे समस्त देवगण इन रुद्र आदिका अनुसरण करते हैं ॥ ९-१० ॥
ये त्विमे मानुषा देवानर्चयन्ति शुभार्थिनः।
तानर्चयन्ति ह्यमरास्तथा राजञ्छुभार्थिनः ॥ ११॥
राजन् ! जो ये मनुष्य मङ्गलकी कामना रखकर उन देवताओंकी पूजा करते हैं, वे देवता भी उन शुभार्थी मनुष्योंको अभीष्ट फल देकर उनका सत्कार करते हैं ॥ ११ ॥
पितृकृत्येषु देवानां संन्यासं ये त्वनुष्ठिताः।
स्वाध्यायवन्तः कौरव्य सदा नियमचारिणः ॥ १२॥
कुरुनन्दन ! जो देवताओं और पितरोंके कृत्योंमें लगे रहते हैं, जिन्होंने संन्यासधर्मका अनुष्ठान किया है, जो सदा स्वाध्यायशील तथा नियमोंके पालनमें तत्पर रहते हैं (उन मनुष्योंको भी अभीष्ट फल देकर ये देवता उनका सत्कार करते हैं) ॥ १२ ॥
गन्धर्वाधिपतिः श्रीमांस्तत्र चित्ररथो नृप।
सपुत्रो वादयामास देववाद्यानि हृष्टवत् ॥ १३॥
नरेश्वर ! उस उत्सवके समय वहाँ श्रीमान् गन्धर्वराज चित्ररथ पुत्रसहित प्रसन्नतापूर्वक देवसम्बन्धी वाद्य बजा रहे थे ॥ १३ ॥
ऊर्णायुश्चित्रसेनश्च हाहा हूहूस्तथैव च।
डुम्बरस्तुम्बुरुश्चैव जगुरन्ये च षड्गुणान् ॥ १४॥
ऊर्णायु, चित्रसेन, हाहा, हूहू, डुम्बर, तुम्बुरु तथा अन्य गन्धर्व छः गुणोंसे युक्त गीत गा रहे थे ॥ १४ ॥
उर्वशी विप्रचित्तिश्च हेमा रम्भा च भारत।
हेमदन्ता घृताची च सहजन्या तथैव च ॥ १५॥
भारत ! उर्वशी, विप्रचित्ति, हेमा, रम्भा, हेमदन्ता, घृताची और सहजन्या—ये अप्सराएँ भी अपने नृत्य और गीत-कलाका प्रदर्शन करती थीं ॥ १५ ॥
जुजोष भगवान् देवस्तदुपस्थानमात्मवान्।
वृत्तेन तुष्टः शक्रस्य जगाम जगतो गतिः ॥ १६॥
आत्मसंयमशील जगदाधार भगवान् महादेव अपनी आराधनासे सम्बन्ध रखनेवाले उस नृत्य-गीत आदिको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करते—उसका आनन्द लेते थे। इन्द्रके उस बर्ताव एवं व्यवहारसे संतुष्ट हो वे भगवान् शिव पुनः अपने स्थानको चले गये ॥ १६ ॥
गते भूतपतौ सर्वे नृपा जग्मुर्यथागतम्।
महेन्द्रेणार्चिता देवाः स्वानेव निलयान् गताः ॥ १७॥
भगवान् भूतनाथके चले जानेपर समस्त राजर्षि (जो अपने पुण्यफलसे स्वर्गमें आये थे,) वहाँसे अपने-अपने स्थानको लौट गये तथा देवता भी देवराज इन्द्रसे सम्मानित हो अपने भवनोंको ही चले गये ॥ १७ ॥
ततः सर्वेषु यातेषु सुखासीनं पुरंदरम्।
सदस्यैः स्वैः सहासीनं नारदोऽभिययौ मुनिः ॥ १८॥
जब सब लोग विदा हो गये और देवराज इन्द्र सुखपूर्वक सिंहासनपर बैठ गये, उस समय अपने सदस्योंके साथ बैठे हुए इन्द्रके पास नारद मुनि गये ॥ १८ ॥
तमिन्द्रः पूजयामास समुत्थाय तपोधनम्।
दिदेश कुशगर्भे च पीठमात्मासनोपमम् ॥ १९॥
इन्द्रने उठकर उन तपोधनका पूजन किया और अपने आसनके समान ही एक पीठ उन्हें बैठनेके लिये दिया, जिसके भीतर कुश बिछा हुआ था ॥ १९ ॥
नारदोऽथ महातेजा महेन्द्रमिदमब्रवीत्।
दूतोऽहममरश्रेष्ठ विष्णोरतुलतेजसः ॥ २०॥
किंतु महातेजस्वी नारदने (खड़े-खड़े ही) महेन्द्रसे कहा—'अमरश्रेष्ठ ! मैं इस समय अनुपम तेजस्वी भगवान् विष्णुका दूत हूँ ॥ २० ॥
किञ्चित्कार्यं पुरस्कृत्य प्रेषितोऽस्मि महात्मना।
आनर्तादार्तिहरणं तस्यैचानघतेजसः ॥ २१॥
'उन महात्मा श्रीकृष्णने कुछ कार्य सामने रखकर मुझे आनर्तदेश (द्वारकापुरी) से यहाँ भेजा है। उन निर्मल तेजस्वी श्रीकृष्णका ही कष्ट दूर करना आजका मुख्य कार्य है (जिसके लिये मैं यहाँ आया हूँ)' ॥ २१ ॥
प्रीतिवाक्यानि हृद्यानि प्रयुज्य मुनये तदा।
ततः प्रहृष्टो भगवानब्रवीत् पाकशासनः ॥ २२॥
तब हर्षमें भरे हुए भगवान् इन्द्रने देवर्षि नारदके प्रति मनको प्रिय लगनेवाले प्रेमपूर्ण वचनोंका प्रयोग करके इस प्रकार पूछा—॥ २२ ॥
किमाह पुरुषश्रेष्ठः शीघ्रमाचक्ष्व मे मुने।
चिरस्य खलु कृष्णेन संस्मृतोऽस्मि महात्मना ॥ २३॥
'मुने ! पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका कौन-सा संदेश है, यह मुझे शीघ्र बताइये। निश्चय ही महात्मा श्रीकृष्णने चिरकालके पश्चात् मेरा स्मरण किया है' ॥ २३ ॥
नारद उवाच
महेन्द्रैन्द्रानुजं द्रष्टुं गतोऽहं भ्रातरं तव।
कथञ्चिद् द्वारकां तत्र काश्यपानां यशस्करम् ॥ २४॥
१. वक्रम, स्निग्ध, मधुर, लास्य, विभक्त तथा अवबद्ध—ये गीतके छः गुण हैं। (नीलकण्ठीसे)