भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 506, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 506

विष्णुपर्व ] एकोनसप्ततितमोऽध्यायः [ ४८५


न देवगन्धर्वगणा न राक्षसा न चासुरा नैव च यक्षपन्नगाः ।
मम प्रतिज्ञामपहन्तुमुद्यता मुने समर्थाः खलु भद्रमस्तु ते ॥ ३८ ॥

मुने ! आपका कल्याण हो । यदि समस्त देवता, गन्धर्व, राक्षस, असुर, यक्ष और नाग भी उद्यत होकर आ जायं तो वे मेरी प्रतिज्ञाको नष्ट करनेमें समर्थ नहीं हो सकते, नहीं हो सकते ॥ ३८ ॥

स पारिजातं यदि न प्रदास्यति प्रयाच्यमानो भवतामरेश्वरः ।
ततः शचीव्यास्रमुदितानुलेपने गदां विमोक्ष्यामि पुरंदरोरसि ॥ ३९ ॥

यदि आपके याचना करनेपर अमरेश्वर इन्द्र पारिजात नहीं देंगे तो मैं उनके उस वक्षःस्थलपर, जहाँका अनुलेपन शचीके आलिङ्गनसे मिट गया है, अपनी गदाका प्रहार करूँगा ॥

इति प्रवाच्यो यदि सामपूर्वकं प्रयाच्यमानो न तरुं प्रयच्छति ।
सुनिश्चयं मद्गमनाय सर्वथा त्वयापि कार्यः खलु तत्र निश्चयः ॥ ४० ॥

यदि वे शान्तिपूर्वक माँगनेसे पारिजात वृक्ष नहीं देते हैं तो मेरा इन्द्रलोकपर आक्रमण करनेका उत्तम निश्चय सर्वथा अटल है, यह उन्हें बता दीजियेगा तथा उस दशामें आपको भी वहाँ अवश्य यही निश्चय करना चाहिये ॥ ४० ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे नारदकृष्णभाषणे अष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणके प्रसङ्गमें नारद और श्रीकृष्णका वार्तालापविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६८ ॥


एकोनसप्ततितमोऽध्यायः

स्वर्गमें महादेवजीकी परिचर्याके लिये नृत्य-गीत आदि उत्सव, नारदजीका इन्द्रको श्रीकृष्णका पारिजातके लिये प्रार्थनाविषयक संदेश सुनाना और इन्द्रका अनेक कारण बताकर पारिजातको न देनेका विचार प्रकट करना

वैशम्पायन उवाच
नारदोऽथ मुनिर्गत्वा महेन्द्रसदनं प्रति ।
तां रात्रिमवसत् तत्र ददृशे च महोत्सवम् ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! तदनन्तर नारद मुनिने महेन्द्रभवनमें जाकर उस रातमें वहीं निवास किया और पूर्वोक्त महोत्सवको भी देखा ॥ १ ॥

तत्रादित्या महात्मानो वसवश्च सुरोत्तमाः ।
राजर्षयश्च विद्वांसः स्वर्गताः कर्मभिः शुभैः ॥ २ ॥
नागा यक्षाश्च सिद्धाश्च चारणाश्च तपोधनाः ।
ब्रह्मर्षयश्च शतशो देवर्षिमनवस्तथा ॥ ३ ॥
सुपर्णाश्च महात्मानो मरुतश्च महाबलाः ।
दिवौकसां निकायाश्च शतशोऽन्ये समागताः ॥ ४ ॥

वहाँ महात्मा आदित्यगण, सुरश्रेष्ठ वसुगण, अपने शुभ कर्मोंसे स्वर्गमें गये हुए विद्वान् राजर्षिगण, नाग, यक्ष, सिद्ध, चारण, तपोधन ब्रह्मर्षि, सैकड़ों देवर्षि और मनु, महामना गरुड़ पक्षी, महाबली मरुद्गण तथा देवताओंके जो अन्य सैकड़ों समुदाय हैं, वे सब उस उत्सवमें पधारे थे ॥ २-४ ॥

उपर्युपरि सर्वेषां सोमो देवो महेश्वरः ।
तस्थावमितविक्रान्तः स्वैर्गणैः परिवारितः ॥ ५ ॥
देवर्षिभिर्मुनिश्श्रेष्ठैः संवृतः सर्वभावनः ।
कल्पान्तरसहस्रेषु क्षयो येषां न विद्यते ॥ ६ ॥

सबके ऊपर उमासहित अमित पराक्रमी भगवान् महेश्वर अपने प्रमथगणोंसे घिरे हुए खड़े थे । वे सर्वभावन भगवान् शिव उन मुनिश्रेष्ठ देवर्षियोंसे घिरे हुए थे, जिनका सहस्रों कल्पान्तरोंमें भी विनाश नहीं होता है ॥ ५-६ ॥

यानर्चयन्ति सततं देवा देवेश्वरोपमाः ।
आत्मज्ञा नावलेपान्धा ये च धर्मपथि स्थिताः ॥ ७ ॥

जो अभिमानसे अन्धे नहीं हुए हैं तथा जो धर्मके मार्गपर स्थित रहनेवाले हैं, वे देवेश्वरोंके समान प्रभावशाली आत्मज्ञानी देवता भी उन देवर्षियोंकी सतत आराधना करते हैं ॥ ७ ॥

रुद्राश्च काश्यपा देवमभ्युपासन्त भारत ।
स्कन्दश्च भगवानग्निर्गङ्गा च सरितां वरा ॥ ८ ॥
अर्चिष्मांस्तुम्बुरुश्चैव भारिश्च वदतां वरः ।

भरतनन्दन ! रुद्रगण, कश्यपजीके पुत्र (देवगण), भगवान् स्कन्द, अग्निदेव, सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गा तथा अर्चिष्मान्, तुम्बुरु और वक्ताओंमें श्रेष्ठ भारि (ये तीनों गन्धर्व) वहाँ महादेवजीकी सेवामें उनके पास ही खड़े थे ॥

नेतारो देवदेवानामेते हि तपसान्विताः ॥ ९ ॥

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